Hindu Sanskriti
Sort By Year

दूसरों को देखना हो तो उन्हे उन्हीं के दृष्टिकोण से और उन्हीं की परिस्थिति में पहुँचकर देखो, फिर उनकी ग़लतियाँ उतनी नही दिखाई देंगी!

Posted By :- DSPP 31-Jan-2014

बुराइयाँ जीवन में आएँ, उससे पहले उन्हे मिट्टी में मिला दो, अन्यथा वो तुम्हें मिट्टी में मिला देंगी!

Posted By :- DSPP 30-Mar-2014

दूसरों के जो आचरण हमें पसंद नही, वैसा आचरण हमें दूसरों के साथ भी नही करना चाहिए!

Posted By :- DSPP 30-Jan-2014

बुद्धिमान व्यक्ति को क्रोध ऐसे त्याग देना चाहिए, जैसे साँप अपनी केंचुली को त्याग देता है!

Posted By :- DSPP 29-Jan-2014

Eat your food as your medicines, otherwise you have to eat medicines as your food.

Posted By :- DSPP 29-Apr-2014

धर्म परिवर्तन केवल धर्म का ही परिवर्तन नही, अपितु माता-पिता द्वारा दिए गये संस्कारों और उनकी सीख का भी परिवर्तन है!

Posted By :- DSPP 28-Jan-2014

जो गीता अर्जुन को केवल एक बार सुनने को मिली, वही गीता हमें प्रतिदिन पढ़ने-सुनने को मिल रही है- यह भगवान की कितनी विलक्षण कृपा है, फिर भी हम उसके ज्ञान को अपने अंदर नही उतार पा रहे हैं!

Posted By :- DSPP 28-Feb-2014

लोगों ने गीता को कंठ में रखा हुआ है, इसलिए इसकी दयनीय स्थिति बनी हुई है! इस स्थिति से उबरने के लिए गीता को कंठ से नीचे उतारना होगा, यानी उसे आचरण में लाना होगा, इससे हमारा जीवन आनन्द से भर जाएगा!

Posted By :- DSPP 27-Jan-2014

समय और समझ दोनों एक साथ खुशकिस्मत लोगों को ही मिलते हैं क्योंकि अक्सर समय पर समझ नही आती और समझ आने पर समय निकल जाता है!

Posted By :- DSPP 27-Apr-2014

भगवान को हम जानें, ये ज्ञान है! भगवान हमें जानें, ये भक्ति है!

Posted By :- DSPP 26-Jan-2014

वक्त और हालात दोनों इंसान की ज़िंदगी में कभी एक जैसे नहीं होते! वक्त इंसान की ज़िंदगी बदल देता है और हालात बदलने में वक्त नहीं लगता!

Posted By :- DSPP 26-Feb-2014

प्रार्थना के लिए सौ बार हाथ जोड़ने के बजाय, दान देने के लिए एक बार हाथ खोलना अधिक महत्वपूर्ण है!

Posted By :- DSPP 25-Mar-2014

बोलना तो वह है जो सुनने वालों को वशीभूत कर दे और न सुनने वालों में भी सुनने की इच्छा उत्पन्न कर दे!

Posted By :- DSPP 25-Jan-2014

अगर अपनी संतान से सुख चाहते हो तो अपने माता-पिता को सुख पहुँचाओ, उनकी सेवा करो!

Posted By :- DSPP 25-Feb-2014

Success without a positive attitude is called 'Luck' and success with a positive attitude is called 'Achievement'. So, always try to be an achiever.

Posted By :- DSPP 24-May-2014

जुनून आपसे वह करवाता है, जो आप कर नहीं सकते; हौसला आपसे वह करवाता है जो आप करना चाहते हैं, और अनुभव आपसे वह कराता है जो आपको करना चाहिए! इन तीन गुणों का मेल हो तो कार्य की कीर्ति दासों दिशाओं में गूँजती है!

Posted By :- DSPP 24-Apr-2014

ग़लती करने में कोई नुकसान नहीं है, परंतु अहंकारवश ग़लती न मानना पतन का कारण बन जाता है!

Posted By :- DSPP 23-Mar-2014

यह बड़े आश्चर्य की बात है कि परमात्मा की दी हुई चीज़ तो अच्छी लगती है, पर परमात्मा अच्छे नही लगते!

Posted By :- DSPP 23-Feb-2014

नेतृत्व उस व्यक्ति को मिलता है जो खड़ा होकर अपने विचार व्यक्त कर सके!

Posted By :- DSPP 22-Oct-2014

कुपथ्य का त्याग और पथ्य का सेवन करना तथा संयम से रहना— ये तीनों बातें दवाइयों से भी बढ़कर रोग दूर करने वाली हैं!

Posted By :- DSPP 22-May-2014

हिंसा और हथियारों से किसी को हराया तो जा सकता है, पर जीता नहीं जा सकता! जीतना तो हृदय परिवर्तन से ही संभव है, जो अहिंसा नामक दिव्य अमृत का कार्य है!

Posted By :- DSPP 22-Mar-2014

जैसे सूखी लकड़ियों के साथ मिली होने से गीली लकड़ी भी जल जाती है, उसी तरह पापियों के संपर्क में रहने से धर्मात्माओं को भी उनके समान दंड भोगना पड़ता है!

Posted By :- DSPP 22-Jan-2014

मूर्खों की सफलताओं की अपेक्षा बुद्धिमानों की ग़लतियाँ अधिक मार्गदर्शक होती हैं!

Posted By :- DSPP 22-Feb-2014

एक मिनट में जिंदगी नहीं बदलती, पर एक मिनट सोच कर लिया हुआ फ़ैसला पूरी ज़िंदगी बदल देता है!

Posted By :- DSPP 21-Oct-2014

कोई भी व्यक्ति सच्चाई, ईमानदारी तथा लोक- हितकारिता के राजपथ पर पूरी निष्ठा के साथ चलता रहे तो उसे कोई भी बुराई क्षति नहीं पहुँचा सकती!

Posted By :- DSPP 21-May-2014

आदमी जन्म के साथ महान नहीं होता, वह संस्कारों की अग्नि में तपता है, तब महान बनता है, संस्कार जीवन की संपदा हैं! संस्कारों से ही हमारा जीवन सुंदर और संपन्न बनता है!

Posted By :- DSPP 21-Mar-2014

धूर्त व्‍यक्ति सच्ची मानसिक शांति का आनंद कभी प्राप्त नही कर सकता! अपने छल-कपट से वह स्वयं ही उलझनों में फँसा रहता है!

Posted By :- DSPP 21-Jan-2014

धन के रहते हुए तो मनुष्य संत बन सकता है, पर धन की लालसा रहते हुए मनुष्य संत नहीं बन सकता!

Posted By :- DSPP 21-Feb-2014

कामयाब आदमी को खुशी भले ही ना मिले पर हमेशा खुश रहने वाले आदमी के कामयाबी कदम चूमती है!

Posted By :- DSPP 20-Oct-2014

धैर्य एक ऐसा गुण है जो व्यक्ति की कार्यक्षमता में वृद्धि करता है, उसे आगे ले जाता है तथा उसे पूर्णता प्रदान करता है!

Posted By :- DSPP 20-May-2014

जब आप जीवन में सफल होते हैं तो आपके अपनों को पता चलता है कि आप कौन हैं! जब आप जीवन में असफल होते हैं तो आपको पता चलता है कि आपके अपने कौन हैं!

Posted By :- DSPP 20-Mar-2014

कुसंगति में रहने की अपेक्षा अकेले रहना अधिक उत्तम है! अत्यधिक समझदार व्यक्ति पर भी कुसंग अपना प्रभाव दिखा ही देता है!

Posted By :- DSPP 20-Jan-2014

वास्तव में वही पुरुष धन्य है और वही मानव कहलाने योग्य है, जो जहाँ है, जिस स्थिति में है, वहाँ उसी स्थिति में रहकर यथाशक्ति, यथायोग्य समाज के हित के लिए सोचते-बोलते और करते हैं!

Posted By :- DSPP 20-Feb-2014

ज्ञानी हमें सीख देता है कि हमें क्या करना चाहिए, जबकि अज्ञानी हमें सीख देता है कि हमें क्या नहीं करना चाहिए!

Posted By :- DSPP 19-May-2014

अधिक संपन्न होने पर भी जो असंतुष्ट रहता है, वह सदा निर्धन है और धन से रहित होने पर भी जो संतुष्ट है, वह सदा धनी है!

Posted By :- DSPP 19-Jan-2014

हम लोकप्रिय तो बनना चाहते हैं, पर लोकहित करना नही चाहते!

Posted By :- DSPP 19-Feb-2014

जीवन में दो ही व्यक्ति असफल होते हैं! पहले वे जो सोचते हैं, पर करते नहीं; दूसरे वे जो करते हैं, पर सोचते नहीं!

Posted By :- DSPP 18-Mar-2014

अपने अंदर से अहंकार को निकाल कर स्वयं को हल्का करें, क्योंकि उँचा वही उठता है जो हल्का होता है!

Posted By :- DSPP 18-Jun-2014

क्षणभर का समय है ही क्या, ऐसा सोचने वाला मनुष्य मूर्ख होता है और एक कौड़ी है ही क्या, यह सोचने वाला दरिद्र हो जाता है!

Posted By :- DSPP 18-Jan-2014

पक्षपात ही सब अनर्थो का मूल है! यदि तुम किसी के प्रति दूसरे की तुलना में ज़्यादा प्रेम प्रदर्शित करोगे तो उससे कलह ही बढ़ेगा!

Posted By :- DSPP 17-May-2014

संसार की कामना से पशूता का और भगवान की कामना से मनुष्यता का आरंभ होता है!

Posted By :- DSPP 17-Feb-2014

अगर किसी देश को भ्रष्टाचार–मुक्त और सुन्दर-मन वाले लोगों का देश बनाना है तो समाज के तीन प्रमुख सदस्य ये काम कर सकते हैं- पिता, माता और गुरु!

Posted By :- DSPP 16-Jun-2014

सबसे गुणी और सबसे मेहनती नही, बल्कि वह इंसान ज़्यादा प्रगति करता है, जो बदलाव को आसानी से स्वीकार कर लेता है!

Posted By :- DSPP 16-Feb-2014

हिन्दी की बात मत करो, हिन्दी में बात करो! तभी हम अपनी मातृभाषा को उसका सही स्थान दिलवा पाएँगे!

Posted By :- DSPP 15-May-2014

हम मन के हीन विचारों के कारण ही दीन बने रहते हैं! दरिद्रता से अधिक हमारे दरिद्रतापूर्ण विचार हैं जो एक कुत्सित वातावरण की रचना करते हैं!

Posted By :- DSPP 15-Mar-2014

केवल अपने सुख से सुखी होना और अपने दुःख से दुःखी होना- यह पशुता है तथा दूसरे के सुख से सुखी होना और दूसरे के दुःख से दुःखी होना- यह मनुष्यता है!

Posted By :- DSPP 15-Feb-2014

रिश्ते और रास्ते एक ही सिक्के के दो पहलू हैं! कभी रास्ते पे चलते-चलते रिश्ते बन जाते हैं और कभी रिश्ते निभाते-निभाते रास्ते बदल जाते हैं!

Posted By :- DSPP 14-May-2014

जो उपदेशों से कुछ नही सीखता, उसे तकलीफ़ों की आँधी से ही सीख मिलती है!

Posted By :- DSPP 14-Feb-2014

जब व्यक्ति आत्म-मंथन कर स्वयं अपनी ग़लतियाँ दूर करता है, तब उसकी सफलता में कोई संदेह नहीं रह जाता!

Posted By :- DSPP 13-Mar-2014

शिष्टाचार शारीरिक सुंदरता के अभाव (कमी) को पूर्ण कर देता है! शिष्टाचार के अभाव में सौंदर्य का कोई मूल्य नही रहता!

Posted By :- DSPP 13-Feb-2014

किसी काम का ना आना बुरी बात नहीं है, बल्कि सीखने की कोशिश ना करना बुरी बात है!

Posted By :- DSPP 12-Mar-2014

अगर कोई आपके साथ बुरा करता है तो उसे दंड ज़रूर दें! कैसे? बदले में उसके साथ अच्छा व्यवहार करके उसे शर्मिंदा करें और फिर उसके द्वारा की गयी बुराई और खुद की अच्छाई दोनों को भूल जाएँ!

Posted By :- DSPP 12-Feb-2014

माता-पिता और बड़ों का आशीर्वाद हमारे मानसिक व शारीरिक विकास के लिए ज़रूरी है! यदि हम अपने माता-पिता को खुश नही रख सके तो परमपिता परमेश्वर को कैसे प्रसन्न रख पाएँगे?

Posted By :- DSPP 11-May-2014

तुम्हारे चरित्र को तुम्हारे अपने कर्मों के सिवाय और कोई कलंकित नहीं कर सकता!

Posted By :- DSPP 11-Mar-2014

नफ़रत बहुत सोच-समझकर करनी चाहिए, क्योंकि नफ़रत करते-करते एक दिन हम भी वही बन जाते हैं, जिससे नफ़रत कर रहे हैं!

Posted By :- DSPP 11-Feb-2014

मनुष्य दूसरे के जिस कर्म की निंदा करे, उसको स्वयं भी न करे! जो दूसरे की निंदा करता है, किंतु स्वयं उसी निन्द्य कर्म में लगा रहता है, वह उपहास का पात्र बनता है!

Posted By :- DSPP 09-May-2014

जो क्रोध को क्षमा से दबा लेता है, वही श्रेष्ठ पुरुष है! जो क्रोध को रोक लेता है, निंदा सह लेता है और दूसरों के सताने पर भी दुखी नही होता, वही पुरुषार्थ का स्वामी होता है! एक मनुष्य सौ वर्ष तक यग्य करे और दूसरा क्रोध न करे तो क्रोध न करने वाला ही श्रेष्ठ कहलाता है!

Posted By :- DSPP 09-Feb-2014

कैसा आश्चर्य है कि लोग बुरा करने से नहीं डरते, किंतु बुरा कहलाने से डरते हैं! झूठ बोलते हैं, किंतु झूठा कहलाना नहीं चाहते! बेईमानी करते हैं, किंतु बेईमान कहलाना नही चाहते! सारांश यह है कि बुरे काम से घृणा नही, किंतु बुरे नाम से घृणा है!

Posted By :- DSPP 08-May-2014

यदि आप सही हैं तो आपको गुस्सा होने की ज़रूरत नहीं और यदि आप ग़लत हैं तो आपको गुस्सा होने का कोई हक नहीं!

Posted By :- DSPP 08-Mar-2014

हर किसी को खुश रखने के चक्कर में इंसान को अपने कार्यों से समझौता नहीं करना चाहिए!

Posted By :- DSPP 07-May-2014

हमारे देश में नैतिक चेतना जाग्रत करने की सख़्त ज़रूरत है और इसे बचपन से बच्चों में संस्कारित करना होगा, तभी हमारा देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो सकता है!

Posted By :- DSPP 07-Feb-2014

जो अपनी शक्ति के अनुसार दूसरों का भला करता है, उसका भला भगवान अपनी शक्ति के अनुसार करते हैं!

Posted By :- DSPP 06-Mar-2014

सच्चा मित्र वह है जो आप के अतीत को समझता हो, आप के भविष्य में विश्वास रखता हो, और आप जैसे है वैसे ही आप को स्वीकार करता हो।

Posted By :- DSPP 06-Jun-2014

केवल वही आलसी नहीं है, जो कुछ नहीं करता, वह भी आलसी है जो बेहतर कर सकता था, लेकिन उसने प्रयत्न नहीं किया!

Posted By :- DSPP 05-Apr-2014

व्यक्ति अपने गुणों से ऊपर उठता है! ऊँचे स्थान पर बैठ जाने से वो ऊँचा नहीं हो जाता है!

Posted By :- DSPP 04-Sep-2014

संतोष से बढ़कर अन्य कोई लाभ नहीं, जो मनुष्य इस विशेष सदगुण से संपन्न है वह त्रिलोकी में सबसे धनी व्यक्ति है!

Posted By :- DSPP 04-Mar-2014

दो तरह से चीज़ें देखने से छोटी नज़र आती हैं - एक दूर से और दूसरी गरूर से!

Posted By :- DSPP 03-May-2014

किसी के अहित की भावना करना अपने अहित को निमंत्रण देना है!

Posted By :- DSPP 03-Mar-2014

जैसे किसी कंपनी का काम अच्छा करने से उसका मालिक प्रसन्न हो जाता है, ऐसे ही संसार की सेवा करने से उसका मालिक (भगवान) प्रसन्न हो जाता है, इसलिए हमे यथासंभव परोपकार करते रहना चाहिए!

Posted By :- DSPP 02-Mar-2014

किसी क़ाम को करने के बाद पछताने से बेहतर है कि काम करने से पहले उसके अच्छे-बुरे के बारे में सोच लिया जाए!

Posted By :- DSPP 02-Jul-2014

यदि दरवाजा पश्चिम की ओर खुलता हो तो सूर्योदय दर्शन असंभव है! इसी प्रकार मनोवृत्ति नकारात्मक हो तो मन की प्रसन्नता असंभव है!

Posted By :- DSPP 02-Feb-2014

संसार की वस्तुएँ कुछ भी, कितनी भी, कैसी भी पाकर शांति का अनुभव नहीं हो सकता, क्योंकि सामान से सुविधाएँ मिल सकती हैं, शांति नही! शांति तो सदविचारों से मिलती है!

Posted By :- DSPP 01-May-2014

हर व्यक्ति दुनिया को बदलने की सोचता है, लेकिन कोई भी व्यक्ति स्वयं को बदलने की नहीं सोचता!

Posted By :- DSPP 01-Jun-2014

दूसरों का सहयोग कीजिए, परंतु इतना भी सहज मत हो जाइए कि दूसरा आपको गुलाम समझे!

Posted By :- DSPP 01-Jul-2014

जब हम क्रोध की अग्नि में जलते हैं तो इसका धुँआ हमारी ही आँखों में जाता है!

Posted By :- DSPP 01-Feb-2015

बड़ों का अनुकरण करने की इच्छा हो तो धनवानों को नही, बल्कि सज्जनों और परोपकारियों को सामने रखना चाहिए!

Posted By :- DSPP 01-Feb-2014

Hindu Sanskriti © Copyright 2014, All Rights Reserve
Website by - paraash.com