Hindu Sanskriti
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एक कप काॅफी Date :- 01-May-2016

जापान के टोक्यो शहर के निकट एक कस्बा अपनी खुशहाली के लिए बहुत प्रसिद्ध है। एक बार एक व्यक्ति उस कस्बे की खुशहाली का कारण जानने के लिए सुबह-सुबह वहाँ पहुँचा। कस्बे में घुसते ही उसे एक काॅफी-शाॅप दिखायी दी। उसने मन ही मन सोचा कि मैं यहाँ बैठ कर चुपचाप लोगों को देखता हूँ और वह धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए शाॅप के अंदर लगी एक कुर्सी पर जा कर बैठ गया। काॅफी शाॅप शहर के रेस्टोरेंट्स की तरह ही थी, पर वहाँ उसे लोगों का व्यवहार कुछ अजीब लगा।

एक आदमी शाॅप में आया और उसने दो काॅफी के पैसे देते हुए कहा, ‘दो कप काॅफी, एक मेरे लिए और एक उस दीवार पर।’ व्यक्ति दीवार की तरफ देखने लगा, लेकिन उसे वहाँ कोई नजर नहीं आया, फिर उस आदमी को काॅफी देने के बाद वेटर दीवार के पास गया और उस पर कागज का एक टुकड़ा चिपका दिया, जिस पर ‘एक कप काॅफी’ लिखा था। व्यक्ति समझ नहीं पाया कि आखिर बात क्या है। उसने सोचा कि कुछ देर और बैठता हूँ और समझने की कोशिश करता हूँ।

थोड़ी देर बाद एक गरीब मजदूर वहाँ आया, उसके कपड़े फटे-पुराने थे, पर फिर भी वह पूरे आत्मविश्वास के साथ शाॅप में घुसा और आराम से एक कुर्सी पर बैठ गया। व्यक्ति सोच रहा था कि एक मजदूर के लिए काॅफी पर इतने पैसे बर्बाद करना कोई समझदारी नहीं है, तभी वेटर मजदूर के पास आर्डर लेने पहुँचा- ‘सर, आपका आर्डर प्लीज!’- वेटर बोला।

‘दीवार से एक कप काॅफी’, मजदूर ने कहा। वेटर ने मजदूर से बिना पैसे लिए एक कप काॅफी दी और दीवार पर लगी ढेर सारे कागज के टुकड़ों में से ‘एक कप काॅफी’ लिखा एक टुकड़ा निकालकर डस्टबिन में फेंक दिया।

व्यक्ति को अब सारी बात समझ आ गयी थी। कस्बे के लोगों का जरूरतमंदों के प्रति यह रवैया देखकर वह भाव-विभोर हो गया। उसे लगा- सचमुच लोगों ने मदद का कितना अच्छा तरीका निकाला है, जहाँ एक गरीब मजदूर भी बिना अपना आत्मसम्मान कम किये एक अच्छी सी काॅफी-शाॅप में खाने-पीने का आनंद ले सकता है। अब वह कस्बे की खुशहाली का कारण जान चुका था और इन्हीं विचारों के साथ वापस अपने शहर लौट गया।

लोभ का अंत नहीं Date :- 01-Apr-2016

एक राजा का जन्मदिन था। सुबह जब वह घूमने निकला, तो उसने तय किया कि वह रास्ते मे मिलने वाले पहले व्यक्ति को पूरी तरह खुश व संतुष्ट करेगा। उसे एक भिखारी मिला। भिखारी ने राजा से भीख माँगी, तो राजा ने भिखारी की तरफ एक ताँबे का सिक्का उछाल दिया।

सिक्का भिखारी के हाथ से छूट कर नाली में जा गिरा। भिखारी नाली में हाथ डाल ताँबे का सिक्का ढूँढ़ने लगा। राजा ने उसे बुलाकर दूसरा ताँबे का सिक्का दिया। भिखारी ने खुश होकर वह सिक्का अपनी जेब में रख लिया और वापस जाकर नाली में गिरा सिक्का ढूँढ़ने लगा। राजा को लगा कि भिखारी बहुत गरीब है, उसने भिखारी को चाँदी का एक सिक्का दिया। भिखारी राजा की जय-जयकार करता फिर नाली में सिक्का ढूँढ़ने लगा। राजा ने अब भिखारी को एक सोने का सिक्का दिया। भिखारी खुशी से झूम उठा और वापस भाग कर अपना हाथ नाली की तरफ बढ़ाने लगा। राजा को बहुत खराब लगा। उसे खुद से तय की गई बात याद आ गयी कि पहले मिलने वाले व्यक्ति को आज खुश एवं संतुष्ट करना है।

उसने भिखारी को बुलाया और कहा कि मैं तुम्हें अपना आधा राज-पाट देता हूँ, अब तो खुश व संतुष्ट हो? भिखारी बोला, मैं खुश और संतुष्ट तभी हो सकूँगा, जब नाली में गिरा ताँबे का सिक्का मुझे मिल जायेगा। हमारा हाल भी उस भिखारी जैसा ही है। हमें भगवान ने आध्यात्मिकता रूपी अनमोल खजाना दिया है और हम उसे भूलकर संसार रूपी नाली में ताँबे के सिक्के निकालने के लिए जीवन गँवाते जा रहे हैं।

कपड़ों का सम्मान Date :- 01-Mar-2016

एक बार की बात है किसी गाँव में एक पंडित जी रहते थे। वैसे तो पंडित जी को वेदों और शास्त्रों का बहुत ज्ञान था, लेकिन वह बहुत गरीब थे। ना ही रहने के लिए अच्छा घर था और ना ही अच्छे भोजन के लिए पैसे। एक छोटी-सी झोपड़ी में रहते थे और भिक्षा माँगकर जो मिल जाता, उसी से अपना जीवनयापन करते थे।

एक बार वह किसी गाँव में भिक्षा माँगने गये, उस समय उनके कपड़े बहुत गंदे थे और काफी जगह से फट भी गये थे। जब उन्होंने एक घर का दरवाजा खटखटाया तो सामने से एक व्यक्ति बाहर आया, उसने जब पंडित को फटे चिथड़े कपड़ों में देखा तो उसका मन घृणा से भर गया और उसने पंडित को धक्के मारकर घर से निकाल दिया। बोला- ‘पता नहीं कहाँ से गंदा पागल चला आया है।’ पंडित जी दुःखी मन से वापस चले आये। जब अपने घर वापस लौट रहे थे तो किसी अमीर आदमी की नजर पंडित के फटे कपड़ों पर पड़ी तो उसने दया दिखाई और पंडित जी को भोजन और पहनने के लिए नये कपड़े दे दिए।

अगले दिन पंडित जी उसी गाँव में उसी व्यक्ति के पास भिक्षा माँगने गये। व्यक्ति ने नये कपड़ों में पंडित जी को देखा और हाथ जोड़कर पंडित जी को अंदर बुलाया और आदर के साथ थाली में बहुत सारे व्यंजन परोसे। पंडित जी ने एक भी टुकड़ा अपने मुँह में नहीं डाला और सारा खाना धीरे-धीरे अपने कपड़ों पर डालने लगे और बोले- ‘ले खा और खा।’ व्यक्ति ये सब बड़े आश्चर्य से देख रहा था, उसने पूछा ‘पंडित जी आप यह क्या कर रहे हैं? सारा खाना अपने कपड़ों पर क्यूँ डाल रहे हैं?’

पंडित जी ने बहुत शानदार उत्तर दिया- ‘क्योंकि तुमने ये खाना मुझे नहीं बल्कि इन कपड़ों को दिया है। इसलिए मैं ये खाना इन कपड़ों को खिला रहा हूँ। कल जब मैं गंदे कपड़ों में तुम्हारे घर आया तो तुमने धक्के मारकर घर से निकाल दिया और आज तुमने मुझे नये कपड़ों में देखकर अच्छा खाना पेश किया। असल में तुमने ये खाना मुझे नहीं, इन कपड़ों को ही दिया है।’ वह व्यक्ति यह सुनकर बहुत दुःखी हुआ।

किसी व्यक्ति की महानता उसके चरित्र और ज्ञान पर निर्भर करती है, पहनावे पर नहीं। अच्छे कपड़े और गहने पहनने से इंसान महान नहीं बनता, उसके लिए अच्छे कर्मों की आवश्यकता होती है।

भाग्यवान व्यक्ति Date :- 01-Feb-2016

एक बार यात्रियों से भरी एक बस कहीं जा रही थी। अचानक मौसम बदला धूलभरी आँधी के बाद बारिश की बूँदे गिरने लगीं। बारिश तेज होकर तूफान में बदल चुकी थी। घनघोर अंधेरा छा गया, भयंकर बिजली चमकने लगी। बिजली कड़ककर बस की तरफ आती और वापस चली जाती, ऐसा कई बार हुआ। सब की साँसे ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे। ड्राईवर ने आखिरकार बस को एक बड़े से पेड़ से करीब पचास कदम की दूरी पर रोक दी और यात्रियों से कहा कि इस बस मे कोई ऐसा यात्री बैठा है, जिसकी मौत आज निश्चित है। उसके साथ-साथ कहीं हमें भी अपनी जिंदगी से हाथ न धोना पड़े। इसलिए सभी यात्री एक-एक कर जाओ और उस पेड़ के हाथ लगाकर आओ, जो भी बदकिस्मत होगा उस पर बिजली गिर जाएगी और बाकी सब बच जाएंगे।

सबसे पहले जिसकी बारी थी, उसको दो-तीन यात्रियों ने जबरदस्ती धक्का देकर बस से नीचे उतारा, वह धीरे-धीरे पेड़ तक गया, डरते-डरते पेड़ के हाथ लगाया और भागकर आकर बस मे बैठ गया। ऐसे ही एक-एक कर सब जाते और भागकर आकर बस मे बैठ चैन की साँस लेते।

अंत में, केवल एक आदमी बच गया, उसने सोचा तेरी मौत तो आज निश्चित है। सब उसे किसी अपराधी की तरह देख रहे थे, जो आज उन्हें अपने साथ ले मरता। उसे भी जबरदस्ती बस से नीचे उतारा गया। वह भारी मन से पेड़ के पास पहुँचा और जैसे ही पेड़ के हाथ लगाया, तेज आवाज से बिजली कड़की और बिजली बस पर गिर गई। बस धूँ-धूँ कर जल उठी। सब यात्री मारे गये, सिर्फ उस एक को छोड़कर, जिसे सब बदकिस्मत मान रहे थे। वो नहीं जानते थे कि उसकी वजह से ही सबकी जान बची हुई थी।

दोस्तों, हम सब अपनी सफलता का श्रेय खुद लेना चाहते हैं, जबकि क्या पता हमारे साथ रहने वाले की वजह से हमें यह हासिल हो पाया हो।

जीवन का नजरिया Date :- 01-Jan-2016

एक अस्पताल के कमरे में दो बुजुर्ग भरती थे। उनमें से एक उठकर बैठ सकता था, परंतु दूसरा उठ नहीं सकता था। जो उठ सकता था, उसके पास एक खिड़की थी, वह बाहर खुलती थी। वह बुजुर्ग उठकर बैठता और दूसरे बुजुर्ग, जो उठ नहीं सकता, उसे बाहर के दृश्य का वर्णन करता। सड़क पर दौड़ती हुई गाडि़याँ, काम के लिये भागते लोग। वह पास के पार्क के बारे में बताता, कैसे बच्चे खेल रहे हैं, कैसे नौजवान कसरत कर रहे हैं आदि-आदि।

दूसरा बुजुर्ग आँखे बंद करके बिस्तर पर ही उन दृश्यों का आनन्द लेता रहता। वह अस्पताल के सभी डाॅक्टर, नर्सों से भी बहुत अच्छी बातें करता। ऐसे ही कई माह गुजर गये। एक दिन सुबह नर्स आई तो देखा कि वह बुजुर्ग, जो उठ सकता था, अभी तक सो रहा है। नर्स ने उसे जगाने की कोशिश कि तो पता चला कि वह तो नींद में ही चल बसा। अब दूसरे बुजुर्ग का पड़ोस वाला बिस्तर खाली हो चुका था, वह बहुत दुःखी हुआ! उसने इच्छा जाहिर की कि उसे पड़ोस के बिस्तर पर शिफ्ट कर दिया जाय।

अब बुजुर्ग खिड़की के पास था। उसने सोचा- चलो, कोशिश करके आज बाहर का दृश्य देखा जाय। काफी प्रयास कर वह कोहनी का सहारा लेकर उठा और बाहर देखा तो अरे यहाँ तो बाहर दीवार थी, ना कोई सड़क, ना ही पार्क, ना ही खुली हवा। उसने नर्स को बुलाकर पूछा तो नर्स ने बताया कि यह खिड़की इसी दीवार की तरफ खुलती है। उस बुजुर्ग ने कहा, लेकिन वह तो रोज मुझे नये-नये दृश्यों का वर्णन करता था। नर्स ने मुस्कराकर कहा, ये उनका जीवन जीने का नजरिया था, वे तो जन्म से अंधे थे। इसी सोच के कारण वे पिछले 2-3 सालों से कैंसर जैसी बीमारी से लड़ रहे थे।

सारांशः जीवन नजरिये का नाम है अनगिनत खुशियाँ। दूसरों के साथ बाँटने में ही हमारी खुशियाँ छिपी हैं। खुशियाँ ज्यादा से ज्यादा शेयर करें, लौटकर खुद को खुशियाँ ही मिलेंगी।

संगत का असर Date :- 01-Dec-2015

चोरी की नीयत से एक चोर राजा के महल में प्रवेश कर गया, उसे खबर थी कि महारानी सोने से पहले अपना हीरो का बहुमूल्य हार पलंग के सिरहाने ही रख कर सो जाती है। चोर मौका देखकर महारानी के पलंग के नीचे छिप गया और महारानी के सोने का इंतजार करने लगा। बहुत रात बीत गयी, महारानी जाग रही थी, तभी महाराजा ने प्रवेश किया। महाराजा काफी चिंता में थे। महारानी से बोले- ‘मैंने एक स्वपन देखा है.. मुझे देवलोक से आदेश हुआ है कि हम अपनी राजकुमारी का विवाह किसी साधु-संन्यासी से कर दें, वरना हमारा यह राज्य किसी घोर विपदा में फँस जायेगा, अकाल पड़ जायेगा, जनता भूखों मरेगी। यह राजपाट सब छिन जायेगा। राजा और रानी दोनों ने निश्चय किया कि वह अपनी राजकुमारी का विवाह किसी साधु-संन्यासी से कर देगें, जिससे उनके राज्य की रक्षा हो सके।

चोर यह सब सुन रहा था। अगले दिन वह साधु-संन्यासियों की कतार में गंगा किनारे बैठ गया। राजा के दरबारी आये और सभी साधु-संन्यासियों से हाथ जोड़ बारी-बारी विनती करने लगे कि आपको महाराज ने याद किया है और अपनी राजकुमारी का विवाह आपसे करना चाहते हैं। सभी साधु-संन्यासी सच्चे थे, मोह-माया से दूर, सुख-वैभव सब त्याग कर केवल प्रभु भक्ति करते थे। किसी ने भी उनकी बात नहीं मानी और स्पष्ट इंकार कर दिया। जब चोर, जो की साधु वेश में बैठा था, तो उससे भी यही निवेदन किया, वह कुछ न बोला.. उसने समझ लिया कि उसके तुरंत हाँ करने से कहीं इनको शक न हो जाये, वह पहले सभी साधु-संन्यासियों के रहन-सहन आदि को सीखना चाहता था, जिस से वक्त पड़ने पर अपना बचाव कर सके। उसकी ख़ामोशी पर राजा के दरबारियों ने फिर प्रयत्न किया, तो उसने कहा- एक सप्ताह बाद आना, तब मैं अपना निर्णय दूँगा।

दरबारियों ने राजा को बात बताई, एक सप्ताह बाद राजा स्वयं उस साधु बने चोर के आगे झोली फैला कर खड़े हो गए और उनसे विनय करने लगे कि वह हमारी राजकुमारी से विवाह कर ले। एक सप्ताह तक साधु-संन्यासियों के बीच रहकर और प्रभु भक्ति में मिलते उनके आत्मिक आनन्द को देखकर उसका हृदय परिवर्तन हो चुका था। वह समझ गया था कि सच्चा सुख कहाँ है, आज उसके इस रूप के कारण ही राजा-महाराजा भी उसके आगे हाथ जोड़कर खड़े हैं। उसने जीवन भर साधु-संन्यासी के रूप में रहने का निश्चय कर डाला और राजा को वही उत्तर दिया जो बाकी साधुओं ने दिया था.. उस ने भी राजकुमारी से विवाह करने से मना कर दिया। यही होता है सही संगत का असर।

सच्चा न्याय Date :- 03-Nov-2015

विक्रमादित्य मालवा देश के बहुत प्रतापी न्यायप्रिय राजा थे इनकी राजधानी उज्जैन थी। भारत में जो विक्रम-संवत् आजकल प्रचलित है, यह उन्हीं के द्वारा आरम्भ किया गया था। इनके राज्य के एक ग्राम में दो स्त्रियाँ रहती थीं, जिनमें एक का नाम था धर्मवती और दूसरी का था दुर्मति। इन दोनों में बहुत मेल-जोल था।

समय आने पर धर्मवती के पुत्र उत्पन्न हुआ और दुर्मति के कन्या। दुर्मति ने जब यह सुना कि धर्मवती के पुत्र उत्पन्न हुआ है, तब उसे बहुत दुःख हुआ और साथ ही ईष्र्या भी। उसने किसी को नहीं बताया कि उसके कन्या हुई है। उसने सबसे यही कहा कि उसके भी पुत्र हुआ है। एक दिन अवसर पाकर, जब धर्मवती घर पर नहीं थी, दुर्मति ने उसके पुत्र का अपहरण कर लिया और अपनी कन्या को समीप के एक ग्राम में अपनी सखी के पास भिजवा दिया। धर्मवती ने जब अपने पुत्र को घर पर न देखा, तब वह रोती-रोती इधर-उधर खोजती रही। जब वह दुर्मति के घर पहुँची, तब उसने अपने पुत्र को देखकर कहा कि ‘यह तो मेरा पुत्र है’, परंतु उसके कथन पर किसी को विश्वास नहीं हुआ। विवाद बढ़ा और मामला विक्रमादित्य के पास पहुँचा। विक्रमादित्य ने दोनों स्त्रियों के वक्तव्यों को सुना, किंतु वे कुछ भी निर्णय न कर सके। उन्होंने उनके भीतरी भावों का पता लगाने के लिए यह घोषणा कर दी कि इनके वक्तव्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि यह बच्चा इन दोनों का पुत्र है, अतः इसके दो टुकड़े करके दोनों में बराबर-बराबर बाँट दिया जाना चाहिये। इसके लिये उन्होंने एक सप्ताह आगे की तिथि निश्चित कर दी। उन्होंने उनके लिये अलग-अलग ठहरने का भी प्रबंध करा दिया और बालक को अपने राज्य की ओर से एक परिचारिका की देखभाल में रखवा दिया।

विक्रमादित्य ने एक गुप्तचर स्त्री को उनका भेद लेने के लिये नियुक्त किया। वह गुप्तचर स्त्री दुर्मति के पास गई। उसने भोजन-वस्त्र आदि से उसकी सहायता की और उसके साथ खूब घुल-मिलकर बातें करने लगी। एक दिन उसे प्रसन्न मुद्रा में देखकर गुप्तचरी ने पूछा- ‘बहन! आज बहुत प्रसन्न हो, क्या बात है।’ दुर्मति ने कहा- ‘यहाँ के राजा बहुत अच्छे हैं। उन्होंने बहुत अच्छा न्याय किया है।’ गुप्तचरी ने पूछा- ‘राजा ने क्या न्याय किया है, बहन।’ दुर्मति ने कहा- ‘राजा ने यह न्याय किया है कि अमुक तिथि को वह बालक दो टुकड़ों में बाँट दिया जायेगा।’

गुप्तचरी ने पूछा- ‘तब इसमें अच्छी बात क्या है, बहन?’ दुर्मति ने कहा- ‘बहन! मुझसे यह नहीं देखा जाता कि मेरे केवल कन्या रहे और उसके पुत्र हो जाये। इस पुत्र के कट जाने पर मेरे तो कन्या रहेगी ही, पर उसके पुत्र नहीं रहेगा। इसी से मुझे प्रसन्नता है।’ गुप्तचरी ने बातों-बातों में यह भी पता लगा लिया कि इसकी कन्या किस ग्राम में है और किस स्त्री के पास है तथा यह सारा समाचार विक्रमादित्य को सुनाया। राजा ने गुप्तरूप से अपने कर्मचारी भेजकर उस कन्या को और जिस स्त्री के पास वह थी, उसे बुलवा लिया और दुर्मति से अलग ठहरा दिया।

बाद में वह गुप्तचरी धर्मवती के पास गई। उसने उसे भी भोजन आदि सुविधाएँ दिलाईं। परंतु उसने देखा कि धर्मवती रात-दिन रोती रहती है। गुप्तचरी ने कहा- बहन! तुम क्यों रोती रहती हो? यदि खानपान आदि में कोई कमी हो तो बताओ, मैं अभी पूरा किये देती हूँ।’ धर्मवती ने कहा- ‘बहन! बहुत दिनों की प्रतीक्षा के बाद पुत्र का मुख देखा था। पुत्र होते ही पंद्रह दिन बाद इसका पिता परलोक सिधार गया। अब पुत्र भी परलोक जा रहा है। अब तो मेरे सामने अंधेरा-ही-अंधेरा है। ऐसा जान पड़ता है कि पुत्र की लाश और मेरी लाश एक ही चिता पर साथ-साथ जलाई जायेगी।’ गुप्तचरी ने यह समाचार भी राजा को दे दिया।

तिथि आने पर दुर्मति और धर्मवती दोनों सभा में उपस्थित हुईं। बालक भी वहाँ लाया गया। जल्लाद हाथ में तलवार लिये बालक के पास खड़ा था। विक्रमादित्य ने दुर्मति को बुलाकर पूछा- ‘कहो, तुम्हें कौन-सा भाग चाहिये?’ दुर्मति ने उत्तर दिया- ‘दायाँ पैर, दायीं छाती, दायाँ हाथ, दायाँ कान और सिर का दायाँ भाग।’

राजा ने धर्मवती से भी यही प्रश्न किया। धर्मवती ने रोते-रोते कहा, ‘राजन्! मुझे कोई भी भाग नहीं चाहिये। यह पुत्र आप इसे ही दे दें। जीवित रहा तो मैं कभी-कभी इसका मुख देखकर नेत्रों को तृप्त कर लिया करूँगी। यही मेरे लिये पर्याप्त है। यदि इसके दो टुकड़े ही करने हों तो इससे पहले मेरे शरीर के दो टुकड़े कर दीजिये।’

कथन सुनने के पश्चात् राजा ने उस गुप्तचरी को बुलाया। गुप्तचरी ने दुर्मति के साथ जो बातचीत हुई थी, वह सब सुना दी। उसी समय उस कन्या को और उसकी उस परिचारिका को भी, जो कि दुर्मति की सखी थी, सभा में उपस्थित किया गया।

परिचारिका ने राजा के भय से सभा में सत्य-सत्य कहा कि ‘यह कन्या दुर्मति की है, जो उसने पालन-पोषण करने के लिये मेरे पास भिजवाई है।’ विक्रमादित्य ने निर्णय दिया कि धर्मवती के हृदय में बालक के प्रति मातृ-स्नेह है और यह पुत्र इसी का है। अतः राजा ने वह पुत्र धर्मवती को दिला दिया और दुर्मति को आर्थिक दण्ड देकर भविष्य में वैसा न करने की चेतावनी दी।

वीर बालक पृथ्वी सिंह Date :- 02-Nov-2015

एक बार औरंगजेब के दरबार में एक शिकारी जंगल से पकड़कर एक बड़ा भारी शेर लाया। लोहे के पिंजरे में बंद शेर बार-बार दहाड़ रहा था। बादशाह कहता था- इससे बड़ा भयानक शेर दूसरा नहीं मिल सकता। दरबारियों ने हाँ में हाँ मिलाई, किंतु वहाँ मौजूद राजा जसवंत सिंह जी ने कहा- इससे भी अधिक शक्तिशाली शेर मेरे पास है। क्रूर एवं अधर्मी औरंगजेब को बड़ा क्रोध आया। उसने कहा, तुम अपने शेर को इससे लड़ने को छोड़ो, यदि तुम्हारा शेर हार गया तो तुम्हारा सर काट लिया जायेगा।

दूसरे दिन किले के मैदान में दो शेरों का मुकाबला देखने बहुत बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई। औरंगजेब भी ठीक समय पर आकर अपने सिंहासन पर बैठ गया। राजा जसवंत सिंह अपने दस वर्ष के पुत्र पृथ्वी सिंह के साथ आये। उन्हें देखकर औरंगजेब ने पूछा- आपका शेर कहाँ है? जसवंत सिंह बोले- मैं अपना शेर अपने साथ लाया हूँ। आप केवल लड़ाई की आज्ञा दीजिये।

औरंगजेब की आज्ञा से जंगली शेर को लोहे के पिंजड़े में छोड़ दिया गया। जसवंत सिंह ने अपने पुत्र को उस पिंजड़े में घुस जाने को कहा। औरंगजेब एवं वहाँ के लोग हक्के-बक्के रह गए। किंतु दस वर्ष का निर्भीक बालक पृथ्वी सिंह पिता को प्रणाम करके हँसते-हँसते शेर के पिंजड़े में घुस गया। शेर ने पृथ्वी सिंह की ओर देखा। उस तेजस्वी बालक के नेत्रों में देखते ही एक बार तो वह पूँछ दबाकर पीछे हट गया, लेकिन मुस्लिम सैनिकों द्वारा भाले की नोक से उकसाए जाने पर शेर क्रोध में दहाड़ मारकर पृथ्वी सिंह पर टूट पड़ा। वार बचाकर बालक एक ओर हटा और अपनी तलवार खींच ली।

पुत्र को तलवार निकालते हुए देखकर जसवंत सिंह ने पुकारा- बेटा, तू यह क्या करता है? शेर के पास तलवार है क्या, जो तू उस पर तलवार चलाएगा? यह हमारे हिन्दू धर्म की शिक्षाओं के विपरीत है और धर्मयुद्ध नहीं है। पिता की बात सुनकर पृथ्वी सिंह ने तलवार फेंक दी और निहत्था ही शेर पर टूट पड़ा। अंतहीन से दिखने वाले एक लम्बे संघर्ष के बाद आखिरकार उस छोटे से बालक ने शेर का जबड़ा फाड़ दिया और फिर पूरे शरीर को चीर दो टुकड़े कर फेंक दिया।

भीड़ उस वीर बालक पृथ्वी सिंह की जय-जयकार करने लगी। अपने और शेर के खून से लथपथ पृथ्वी सिंह जब पिंजड़े से बाहर निकला तो पिता ने दौड़कर अपने पुत्र को छाती से लगा लिया।

तो ऐसे थे हमारे पूर्वजों के कारनामे, जिनके मुख-मंडल वीरता के ओज से ओतप्रोत रहते थे और आज हम क्या बना रहे हैं अपनी संतति को, सारेगामा लिट्ल चैम्स के नचनिये?

आज समय फिर से मुड़कर इतिहास के उसी औरंगजेबी काल की ओर ताक रहा है, हमें चेतावनी देता हुआ कि जरूरत है कि हिन्दू अपने बच्चों को फिर से वही हिन्दू संस्कार दें, ताकि समय पड़ने पर वो शेर से भी भिड़ जाये।

भक्ति की महिमा Date :- 02-Nov-2015

श्री गुरु नानक देव जी अपने शिष्य मर्दाने के साथ किसी गाँव में जा पहुँचे। जब उन्होंने उस गाँव के कब्रिस्थान को देखा तो आश्चर्यचकित रह गए। गुरु नानक देव कब्रिस्थान में क्या देखते हैं कि हर कब्र पर मरने वाले की उम्र लिखी थी। पर उम्र बहुत छोटी लिखी थी, सब कब्रों पर। गुरु नानक देव ने गाँव वालों से पूछा कि क्या कारण है, जो सब यहाँ बचपन में ही मर जाते हैं? कोई 2 साल, कोई 4 साल तो कोई 5 साल।

वहाँ एक बुजुर्ग थे, उन्होंने कहा नहीं, ऐसा नही है। यहाँ हर व्यक्ति अपनी पूरी उम्र ही जीता है परन्तु हमारे यहाँ एक इंसान की वही उम्र यहाँ लिखी जाती है जो उसने भक्ति में लगाई, उस परमात्मा की याद में बिताई। बाकी सारी उम्र तो बेकार गयी। इसलिए कब्र पर सब की उम्र छोटी है।

सारः भगवान की याद में बिताए पल ही सार्थक होते हैं, बाकी जीवन व्यर्थ है।

श्रीनामदेव जी की एकादशी-व्रत के प्रति निष्ठा Date :- 01-Nov-2015

एक बार भगवान के मन में यह उमंग उठी कि श्रीनामदेव जी की एकादशी व्रत-निष्ठा का परिचय लिया जाये। यह विचारकर उन्होंने एक अत्यन्त दुर्बल ब्राह्मण का रूप धारण किया। एकादशी व्रत के दिन श्रीनामदेव के पास पहुँचकर बड़ी दीनता करके अन्न माँगने लगे कि मैं बहुत भूखा हूँ, कई दिन से भोजन प्राप्त नहीं हुआ है, कुछ अन्न दो। श्रीनामदेव जी ने कहा- आज तो एकादशी है, (दूध-फलाहारादि कर लीजिये) अन्न न दूँगा। प्रातःकाल जितनी इच्छा हो, उतना अन्न लीजियेगा। दोनों अपनी-अपनी बात पर बड़ा भारी हठ कर बैठे। इस बात का शोर चारों ओर फैल गया। लोग इकट्ठे हो गये और श्रीनामदेव जी को समझाने लगे कि इस भूखे ब्राह्मण पर क्रोध क्यों करते हो, तुम्हीं मान जाओ, इसे कुछ अन्न दे दो। श्रीनामदेव जी नहीं माने, दिन के चैथे पहर के बीतने पर उस भूखे ब्राह्मण देव ने इस प्रकार पैर फैला दिये कि मानो मर गये। गाँव के लोग श्रीनामदेव जी के भाव को नहीं जानते थे। अतः उन लोगों ने नामदेवजी के सिर ब्राह्मण-हत्या लगा दी और उनका समाज से बहिष्कार कर दिया। पर नामदेव जी बिल्कुल चिंतित नहीं हुए।

अपने नियम के अनुसार जागरण और कीर्तन करते हुए श्रीनामदेव जी ने रात बिताई, प्रातःकाल चिता बनाकर उस ब्राह्मण के मृतक-शरीर को गोद में लेकर उस पर बैठ गये कि हत्यारे शरीर को न रखकर प्रायश्चितस्वरूप उसे भस्म कर देना ही उत्तम है। उसी समय भगवान प्रकट हो गये और मुस्कुराकर कहने लगे कि मैंने तो तुम्हारी परीक्षा ली थी, तुम्हारी एकादशीव्रत की सच्ची निष्ठा तो मैंने देख ली, वह मेरे मन को बहुत ही प्यारी लगी, मुझे बड़ा सुख हुआ। इस प्रकार दर्शन देकर भगवान अन्तर्धान हो गये। लोगों ने जब यह लीला देखी तो श्रीनामदेव जी के चरणों में आकर गिरे और प्रीतिमय चरित्र देखकर सभी उनके भक्त हो गये।

एक बार एकादशी की रात्रि को जागरण-कीर्तन हो रहा था। भगवद्भक्तों को बड़ी प्यास लगी। तब श्रीनामदेव जी जल लाने के लिए नदी पर गये, प्रेतभय से दूसरों को जाने का साहस न था। श्रीनामदेव जी को आया देखकर महाविकरालरूपधारी प्रेतराज अपने साथियों-समेत आकर चारों ओर फेरी लगाने लगा। उसका स्वरूप एवं उसकी माया देखकर श्रीनामदेव जी थोड़ा भी भयभीत न हुए, उसे अपने इष्ट का ही स्वरूप माना और उन्होंने फेंट से झाँझ निकालकर तत्काल एक पद गाया और प्रणाम किया। भगवान तो बड़े ही दयालु हैं, प्रेतराज न जाने कहाँ गया। शोभाधाम श्यामसुन्दर प्रकट हो गये, जिनका दर्शन करके श्रीनामदेव जी परम प्रसन्न हुए और जल लाकर भक्तों को पिलाया।

शिक्षाप्रद कहानीः सच्ची कमाई का फल Date :- 06-Oct-2015

सन्त अबुल अब्बास अपने उपदेश में कहा करते थे- प्रत्येक व्यक्ति को अपने हाथों से परिश्रम करके उस कमाई से जीवनयापन करना चाहिये। ईमानदारी की कमाई से ही बरकत होती है। वे स्वयं टोपियाँ सिलते तथा उन्हें बेचकर जो धन मिलता, उसमें से आधा जरूरतमंद को दे देते और आधे से स्वयं अपना खर्चा चलाते।

एक दिन उनका एक धनिक भक्त दर्शनों के लिए आया। उसने कहा- ‘बाबा! मैं अपने कमाये धन में से कुछ धन दान करना चाहता हूँ। मैं दान किसे दूँ? सन्त ने कहा कि जिसे जरूरतमंद समझो, उसे दे दो।

धनिक ने एक वृद्ध भिखारी को देखा तथा उसे सोने की एक मोहर दे दी। अगले दिन धनिक सड़क पर जा रहा था कि उसने उस भिखारी को दूसरे भिखारी के पास बैठे देखो। उसने दूसरे भिखारी से कहा- ‘कल एक दानी व्यक्ति यहाँ आया था, उसने मुझे सोने की मोहर दी, मैंने उसे बेचकर खूब बढि़या खाना खाया, शराब पी तथा रात को अययाशी की।’ धनिक ने यह वार्तालाप सुना तो उसे बहुत दुःख हुआ। वह सन्त अब्बास के पास पहुँचा तथा यह बात उन्हें बताई।

सन्त अब्बास उसकी बात सुनकर मौन हो गये। उन्होंने अपनी टोपियों की कमाई का एक सिक्का उस धनिक को दिया और बोले- ‘इसे किसी याचक को दे देना और उसके पीछे-पीछे जाकर देखना कि वह इसका क्या करता है।’ धनिक ने वह सिक्का एक याचक को दे दिया।

याचक सिक्का लेकर जंगल की ओर गया तथा उसने थैले में छिपाये पक्षी को उड़ा दिया। धनिक ने पूछा- ‘तुमने यह क्या किया?’ वह बोला- ‘मेरा परिवार कई दिन से भूखा था। मजबूरी में खाने के लिये पक्षी को पकड़कर लाया था। अब तुम्हारे दिये सिक्के से भूख मिट जाएगी, इसलिए पक्षी की हत्या का पाप मोल क्यों लूँ।’

धनिक समझ गया कि उसने छल-कपट तथा गलत तरीके से अर्जित धन वृद्ध भिखारी को दिया तो उसने उसका दुरुपयोग किया और संत जी के ईमानदारी-मेहनत से कमाये धन से उस याचक को पक्षी के प्राणों की रक्षा की प्रेरणा दी।

शिक्षाप्रद कहानीः अनोखी सलाह Date :- 01-Aug-2015

एक जौहरी के निधन के बाद उसका परिवार संकट में पड़ गया। खाने के भी लाले पड़ गए। एक दिन उसकी पत्नी ने अपने बेटे को नीलम का एक हार देकर कहा- ‘बेटा, इसे अपने चाचा की दुकान पर ले जाओ। कहना इसे बेचकर कुछ रुपये दे दें।’

बेटा वह हार लेकर चाचा जी के पास गया। चाचा ने हार को अच्छी तरह से देख परखकर कहा- बेटा, माँ से कहना कि अभी बाजार बहुत मंदा है। थोड़ा रुककर बेचना, अच्छे दाम मिलेंगे। उसे थोड़े से रुपये देकर कहा कि तुम कल से दुकान पर आकर बैठना। अगले दिन से वह लड़का रोज दुकान पर जाने लगा और वहाँ हीरों-रत्नों की परख का काम सीखने लगा। एक दिन वह बड़ा पारखी बन गया। लोग दूर-दूर से अपने हीरे की परख कराने उसके पास आने लगे।

एक दिन उसके चाचा ने कहा, ‘बेटा अपनी माँ से वह हार लेकर आना और कहना कि अब बाजार बहुत तेज है, उसके अच्छे दाम मिल जाएंगे।’ माँ से हार लेकर उसने परखा तो पाया कि वह तो नकली है। वह उसे घर पर ही छोड़ कर दुकान लौट आया।

चाचा ने पूछा, हार नहीं लाए? उसने कहा, वह तो नकली था।

तब चाचा ने कहा- जब तुम पहली बार हार लेकर आए थे, तब मैं उसे नकली बता देता तो तुम सोचते कि आज हम पर बुरा वक्त आया तो चाचा हमारी चीज को भी नकली बताने लगे। आज जब तुम्हें खुद ज्ञान हो गया तो पता चल गया कि हार सचमुच नकली है।

सच यह है कि ज्ञान के बिना इस संसार में हम जो भी सोचते, देखते और जानते हैं, सब गलत है और ऐसे ही गलतफहमी का शिकार होकर रिश्ते बिगड़ते हैं।

शिक्षाप्रद कहानीः अनोखा न्याय Date :- 03-Jul-2015

न्यायाधीश बंकिमचन्द्र चटर्जी बंगाल के रहने वाले थे। अंग्रेजी सरकार की नौकरी करते हुए भी देशभक्ति की और देश को बन्धनमुक्त करने की अग्नि प्रचण्ड वेग से इनके भीतर जला करती थी। राष्ट्रीय गीत ‘वन्देमातरम्’, जिस पर सहस्रों देशवासियों का बलिदान हो चुका है, इन्हीं के द्वारा रचित है। ये एक उच्चकोटि के लेखक और कवि भी थे। श्री अरविन्द ने इन्हें ‘भविष्यदर्शी ऋषि’ कहा है।

बंकिमचन्द्र चटर्जी वर्दवान में मैजिस्ट्रेट थे। एक बार एक ग्रामीण ब्राह्मण का पुत्र कलकत्ते में पढ़ता था। कलकत्ते से उस ब्राह्मण को समाचार मिला कि उसका पुत्र बहुत बीमार है। दरिद्र ब्राह्मण बहुत घबराया और पैदल कलकत्ते के लिये चल पड़ा। मार्ग में रात हो जाने पर उसने एक गाँव में ठहरने का निश्चय किया।

ब्राह्मण भोजन करके लेट गया, किंतु उसे नींद नहीं आई। मध्य रात्रि में उसे अचानक बाहर कुछ आहट सुनाई पड़ी। उसने बाहर निकलकर देखा कि एक व्यक्ति सिर पर सन्दूक उठाये भागा जा रहा है। वह चोर-चोर चिल्लाता हुआ उसके पीछे भागा और उसे पकड़ लिया। संदूक लेकर भागने वाला सिपाही था। उसने सन्दूक को रख दिया और चोर कहकर उल्टे ब्राह्मण को ही पकड़ लिया। गाँव के बहुत-से व्यक्ति इकट्ठे हो गये। उन्होंने जब देखा कि पुलिस का सिपाही एक अज्ञात व्यक्ति को पकड़े हुए है और सन्दूक पास में पड़ा है, तब उन्होंने ब्राह्मण को ही चोर समझा। उसे थाने ले जाया गया और उस पर अभियोग चला। यह अभियोग बंकिमचंद्र चटर्जी के न्यायालय में गया। दोनों के वक्तव्य को सुनकर बंकिम बाबू यह तो ताड़ गये कि ब्राह्मण निर्दोष है और सत्य बोल रहा है, किंतु निर्णय देने के लिये किसी बाहरी प्रमाण की आवश्यकता थी। उन्होंने उस दिन की कार्यवाही स्थगित कर दी।

दूसरे दिन न्यायालय में एक व्यक्ति ने आकर मैजिस्ट्रेट बंकिम बाबू से कहा कि ‘तीन कोस की दूरी पर एक हत्या हो गई है, लाश वहाँ पड़ी है।’ बंकिम बाबू ने तुरंत कटघरे में खड़े हुए पुलिस के सिपाही और ब्राह्मण को आदेश दिया कि ‘तुम दोनों जाकर उस शव को अपने कंधों पर उठाकर ले आओ।’ दोनों उस स्थान पर पहुँचे। वहाँ शव बँधा हुआ रखा था। दोनों ने उसे अपने कंधों पर उठाया और चल पड़े। पुलिस का सिपाही हट्टा-कट्टा था, मौज से ला रहा था। पर ब्राह्मण बहुत दुःखी तथा पुत्र की चिंता और इस विपत्ति के कारण रो रहा था। उसे देखकर सिपाही ने हँसते हुए कहा- ‘कहो पंडितजी! मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि मुझे चुपके से संदूक ले जाने दो, नहीं तो विपत्ति में पड़ोगे। तुम नहीं माने, अब फल भोगो अपनी करनी का, अब कम-से-कम तीन साल की जेल की हवा खानी पड़ेगी।’

ब्राह्मण बेचारा अवाक् था। न्यायालय को स्थूल प्रमाण चाहिये। ब्राह्मण रोता हुआ न्यायालय में पहुँचा। न्यायालय की आज्ञा से शव न्यायालय में रखा गया और उसके बन्धन खोल दिये गये। अब अभियोग प्रारम्भ हुआ। जिस समय दोनों पक्षों के वक्तव्य हो चुके तो एक विचित्र घटना घटी। वह शव उन वस्त्रों को उतारकर खड़ा हो गया और उसने मार्ग में हुई पुलिस के सिपाही और ब्राह्मण की बातों को कहा। उसकी बातें सुनकर बंकिमचन्द्र ने ब्राह्मण को निरपराध घोषित किया और पुलिस के सिपाही को चोरी करने का अपराधी ठहराकर दण्ड दिया।

बंकिम बाबू ने चोरी का पता लगाने के लिए स्वयं यह युक्ति निकाली थी और एक विश्वस्त व्यक्ति को मृत का अभिनय करने के लिए नियुक्त किया था। यदि सभी न्यायाधीश सच्चे हृदय से सत्य की खोज करने का प्रयत्न करें तो अधिकांश अभियोगों में सत्य का पता चल सकता है और सच्चा न्याय हो सकता है।

परोपकार की महिमा Date :- 01-Jun-2015

परोपकार कभी-कभी मनुष्य का जीवन ही बदल देता है। परोपकारी मनुष्य को जीवन में कभी किसी चीज का भय नहीं सताता। दूसरी ओर जब मनुष्य के मन में मोह व लालच भर जाता है, तो उसका मन हर समय परपंच बुनने में ही लगा रहता है। अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लालच में वह अच्छाई भूल जाता है और किसी बुरे काम से परहेज नहीं करता। अपनी स्वार्थसिद्धि के लिये एक के बाद एक दुष्कर्म करता जाता है। इससे वह अपना यह जीवन तो बिगाड़ लेता है, अगले जन्म के लिये भी काँटों की फसल तैयार कर लेता है। किंतु जीवन में उसे कभी अपनी भूल का ज्ञान हो जाये, उसके मन में परोपकार की भावना जागृत हो जाये तो फिर उसका जीवन ही बदल जायेगा। उसके मन में लालच का स्थान खाली हो जायेगा और ईश्वर उसके गुनाहों और पापों को क्षमा कर उसे सद्बुद्धि प्रदान कर परोपकार के मार्ग पर चलने की प्रबल प्रेरणा जगा देता है। तब उसके कल्याण का मार्ग खुल जाता है। परोपकार में बड़ी शक्ति है, जो मनुष्य के विवेक के साथ-साथ उसका शुभ भाग्य भी खोल देता है।

इस पर मुझे एक वृत्तांत याद आ रहा है। एक बार भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन कहीं जा रहे थे। अर्जुन ने देखा, एक ब्राह्मण भीख माँग रहा है। अर्जुन को अच्छा नहीं लगा। उसने श्रीकृष्ण से कहा, प्रभु! इस ब्राह्मण ने कैसे कर्म किये हैं कि ब्राह्मण होकर भीख माँगनी पड़ रही है। अर्जुन ने उस विप्र को स्वर्ण मुद्राओं की एक थैली दी। श्रीकृष्ण मुस्करा कर रह गये। ब्राह्मण देवता वह थैली लेकर चल दिये। मन में बड़ी प्रसन्नता थी। वह सोचते जा रहे थे कि इससे घर बनाऊँगा, अच्छा जीवन व्यतीत करूँगा। इस सोच में चले जा रहे थे। मुद्राओं की थैली कभी एक हाथ में छनकाते, कभी दूसरे में। एक सुनसान स्थान से गुजरते हुए एक चोर ने स्वर्ण मुद्राओं की खनक सुनी। उसने वह थैली ब्राह्मण से छीन ली और भाग गया।

ब्राह्मण देवता बड़े दुःखी हुए। उनकी सुखी जीवन की सारी योजनाएँ धूमिल हो चुकी थीं। अगले दिन वह फिर उसी स्थान पर भिक्षा माँगने लगे। संयोगवश श्रीकृष्ण व अर्जुन फिर उस मार्ग से जा रहे थे। अर्जुन को आश्चर्य हुआ। स्वर्ण मुद्राओं से भरी थैली मिलने के बाद भी वह भिक्षा क्यों माँग रहे हैं। उसने ब्राह्मण देवता से पूछा तो उन्होंने सारा वृत्तांत कह सुनाया। अर्जुन ने उन्हें एक हीरा दिया। ब्राह्मण देवता अर्जुन को धन्यवाद कर चल दिये। हीरे को कभी एक हाथ में उछालते, कभी दूसरे में। मन में वही सोच रहे थे कि इस हीरे को बेचकर घर बनाऊँगा, बच्चों और ब्राह्मणी को अच्छा भोजन व कपड़े दूँगा। अचानक उनका पाँव एक खड्ढ़े में पड़ा, हीरा हाथ से छूटकर पास बहती नदी में जा गिरा। ब्राह्मण देवता फिर अपनी किस्मत को कोसने लगे।

अगले दिन फिर वह उसी स्थान पर भिक्षा माँग रहे थे। श्रीकृष्ण और अर्जुन उसी राह से निकले तो अर्जुन को बड़ा आश्चर्य हुआ। पूछने पर ब्राह्मण ने घटना बताई। आज श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण को दो पैसे दिये और आगे चले गये। ब्राह्मण निराश उठकर अपने घर चल दिया। रास्ते में उसने देखा- एक मछुआरा नदी से मछलियाँ पकड़कर लाया और बेच रहा था। एक मछली भूमि पर तड़प रही थी। ब्राह्मण के मन में दया उपजी। उसने सोचा, इन दो पैसों से मेरा तो कुछ नहीं बनेगा, मछुआरे से मछली खरीदकर इसे फिर नदी में डाल दूँ तो इसके प्राण बच जायेंगे। उनके मन में परोपकार की भावना जागी। उसने दो पैसे देकर मछुआरे से मछली खरीद ली, जैसे ही वह मछली नदी में फेंकने लगे, मछली के मुँह से कुछ गिरा। उन्होंने मछली को जल में डालकर मछली के मुँह से गिरी हुई वस्तु उठाई। आश्चर्यचकित रह गये, अरे यह तो कल वाला हीरा है। ब्राह्मण देवता चिल्लाये- ‘मिल गया, मिल गया।’ पास में वह चोर भी खड़ा था। ब्राह्मण का चिल्लाना सुनकर वह डर गया। उसने सोचा, शायद ब्राह्मण ने मुझे पहचान लिया है। वह दौड़कर ब्राह्मण के पैरों पर गिर पड़ा और गिड़गिड़ा कर प्रार्थना करने लगा, ‘आप मेरी शिकायत राजा से मत करना, उसने स्वर्ण मुद्राओं से भरी थैली लौटा दी। ब्राह्मण देवता प्रसन्न अपने घर चले गये।

एक छोटे से परोपकार ने ब्राह्मण का जीवन बदल दिया। परोपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता।

सत्संग की शक्ति Date :- 01-Mar-2015

एक बार वशिष्ठ जी विश्वामित्र ऋषि के आश्रम में गये। उन्होंने बड़ा स्वागत सत्कार किया। कुछ दिन उन्हें बड़े आदरपूर्वक अपने पास रखा। जब वशिष्ठ जी चलने लगे तो विश्वामित्र ने उन्हें एक हजार वर्ष की अपनी तपस्या का पुण्यफल उपहारस्वरूप दिया। बहुत दिन बाद संयोगवश विश्वामित्र भी वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचे। उनका भी वैसा ही स्वागत सत्कार हुआ। जब विश्वामित्र चलने लगे तो वशिष्ठ जी ने एक दिन के सत्संग का पुण्य फल उन्हें भेंट किया।

विश्वामित्र मन ही मन बहुत खिन्न हुए। वशिष्ठ को एक हजार वर्ष की तपस्या का पुण्य भेंट किया था। वैसा ही मूल्यवान उपहार न देकर वशिष्ठ जी ने केवल एक दिन के सत्संग का तुच्छ फल दिया। इसका कारण उनकी अनुदारता और मेरे प्रति तुच्छता की भावना का होना ही हो सकता है। यह दोनों ही बातें अनुचित हैं।

वशिष्ठ जी विश्वामित्र के मनोभाव को ताड़ गए और उनका समाधान करने के लिए विश्वामित्र को साथ लेकर विश्व भ्रमण के लिए चल दिये। चलते-चलते दोनों वहाँ पहुँचे, जहाँ शेष जी अपने फन पर पृथ्वी का बोझ लादे हुए बैठे थे। दोनों ऋषियों ने उन्हें प्रणाम किया और उनके समीप ठहर गये।

अवकाश का समय देखकर वशिष्ठ जी ने शेष जी से पूछा- भगवन् एक हजार वर्ष का तप अधिक मूल्यवान है या एक दिन का सत्संग? शेष जी ने कहा- इसका समाधान केवल वाणी से करने की अपेक्षा प्रत्यक्ष अनुभव से करना ही ठीक होगा। मैं सिर पर पृथ्वी का इतना भार लिए बैठा हूँ। जिसके पास तप बल है वह थोड़ी देर के लिए इस बोझ को अपने ऊपर ले ले। विश्वामित्र को तप बल पर गर्व था। उन्होंने अपनी संचित एक हजार वर्ष की तपस्या के बल को एकत्रित करके उसके द्वारा पृथ्वी का बोझ अपने ऊपर लेने का प्रयत्न किया, पर वह जरा भी नहीं उठी। अब वशिष्ठ जी को कहा गया कि वे एक दिन के सत्संग बल से पृथ्वी उठावें। वशिष्ठ जी ने प्रयत्न किया और पृथ्वी को आसानी से अपने ऊपर उठा लिया।

शेष जी ने कहा- ‘तप बल की महत्ता बहुत है। सारा विश्व उसी की शक्ति से गतिमान है, परंतु उसकी प्रेरणा और प्रगति का स्रोत सत्संग ही है। इसलिए उसकी महत्ता तप से भी बड़ी है।’ विश्वामित्र का समाधान हो गया और उन्होंने अनुभव किया कि वशिष्ठ जी ने न तो कम मूल्य की वस्तु भेंट की थी और न ही उनका तिरस्कार किया था।

जीवन में सत्य का महत्व Date :- 11-Feb-2015

बनारस में एक बड़े धनवान सेठ रहते थे। वह विष्णु भगवान् के परम भक्त थे और हमेशा सच बोला करते थे। एक बार जब भगवान् सेठ जी की प्रशंसा कर रहे थे, तभी माँ लक्ष्मी ने कहा, ‘स्वामी! आप इस सेठ की इतनी प्रशंसा किया करते हैं, क्यों न आज उसकी परीक्षा ली जाए और जाना जाए कि क्या वह सचमुच इसके लायक है या नहीं?’ भगवान् बोले, ‘ठीक है! अभी सेठ गहरी निद्रा में है आप उसके स्वप्न में जाएँ और उसकी परीक्षा ले लें।’

अगले ही क्षण सेठ जी को एक स्वप्न आया। स्वप्न में धन की देवी लक्ष्मी उनके सामने आईं और बोली, ‘हे मनुष्य! मैं धन की दात्री लक्ष्मी हूँ।’ सेठ जी को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और वो बोले, ‘हे माता! आपने साक्षात् अपने दर्शन देकर मेरा जीवन धन्य कर दिया है, बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?’ ‘कुछ नहीं! मैं तो बस इतना बताने आयी हूँ कि मेरा स्वभाव चंचल है और वर्षों से तुम्हारे भवन में निवास करते-करते मैं ऊब चुकी हूँ और यहाँ से जा रही हूँ।’ सेठ जी बोले, ‘मेरा आपसे निवेदन है कि आप यहीं रहें, किन्तु अगर आपको यहाँ अच्छा नहीं लग रहा है तो मैं भला आपको कैसे रोक सकता हूँ, आप अपनी इच्छानुसार जहाँ चाहें जा सकती हैं’ और माँ लक्ष्मी उसके घर से चली गईं।

थोड़ी देर बाद वे पुनः रूप बदल कर सेठ के स्वप्न में यश के रूप में आयीं और बोलीं, ‘सेठ मुझे पहचान रहे हो?’ सेठ- ‘नहीं महोदय आपको नहीं पहचाना।’ यश- ‘मैं यश हूँ, मैं ही तेरी कीर्ति और प्रसिद्धि का कारण हूँ, लेकिन अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहता, क्योंकि माँ लक्ष्मी यहाँ से चली गयी हैं। अतः मेरा भी यहाँ कोई काम नहीं।’ सेठ- ‘ठीक है, यदि आप भी जाना चाहते हैं तो वही सही।’

सेठ जी अभी भी स्वप्न में ही थे और उन्होंने देखा कि वह दरिद्र हो गए हैं और धीरे-धीरे उनके सारे रिश्तेदार व मित्र भी उनसे दूर हो गए हैं। यहाँ तक कि जो लोग उनका गुणगान किया करते थे वो भी अब बुराई करने लगे हैं।

कुछ और समय बीतने पर माँ लक्ष्मी धर्म का रूप धारण कर पुनः सेठ के स्वप्न में आयीं और बोलीं, ‘मैं धर्म हूँ। माँ लक्ष्मी और यश के जाने के बाद मैं भी इस दरिद्रता में तुम्हारा साथ नहीं दे सकता, मैं जा रहा हूँ।’ जैसी आपकी इच्छा। सेठ ने उत्तर दिया और धर्म भी वहाँ से चला गया।

कुछ और समय बीत जाने पर माँ लक्ष्मी सत्य के रूप में स्वप्न में प्रकट हुईं और बोलीं, ‘मैं सत्य हूँ। लक्ष्मी, यश और धर्म के जाने के बाद अब मैं भी यहाँ से जाना चाहता हूँ।’ ऐसा सुन सेठ जी ने तुरंत सत्य के पाँव पकड़ लिए और बोले, ‘हे महाराज! मैं आपको नहीं जाने दूँगा। भले ही सब मेरा साथ छोड़ दें, मुझे त्याग दें, पर कृपया आप ऐसा मत करिये। सत्य के बिना मैं एक क्षण नहीं रह सकता। यदि आप चले जायेंगे तो मैं तत्काल ही अपने प्राण त्याग दूँगा।’

‘लेकिन तुमने बाकी तीनों को बड़ी आसानी से जाने दिया, उन्हें क्यों नहीं रोका’, सत्य ने प्रश्न किया। सेठ जी बोले, ‘मेरे लिए वे तीनों भी बहुत महत्त्व रखते हैं लेकिन उन तीनों के बिना भी मैं भगवान् के नाम का जाप करते-करते उद्देश्यपूर्ण जीवन जी सकता हूँ, परन्तु यदि आप चले गए तो मेरे जीवन में झूठ प्रवेश कर जाएगा और मेरी वाणी अशुद्ध हो जायेगी, भला ऐसी वाणी से मैं अपने भगवान् की वंदना कैसे कर सकूँगा, मैं तो किसी भी कीमत पर आपके बिना नहीं रह सकता।

सेठ जी का उत्तर सुन सत्य प्रसन्न हो गया और उसने कहा, ‘तुम्हारी अटूट भक्ति ने मुझे यहाँ रूकने पर विवश कर दिया और अब मैं यहाँ से कभी नहीं जाऊँगा।’ और ऐसा कहते हुए सत्य अंतध्र्यान हो गया।

सेठ जी अभी भी निद्रा में थे। थोड़ी देर बाद स्वप्न में धर्म वापस आया और बोला, ‘मैं अब तुम्हारे पास ही रहूँगा क्योंकि यहाँ सत्य का निवास है।’ सेठ जी ने प्रसन्नतापूर्वक धर्म का स्वागत किया। उसके तुरंत बाद यश भी लौट आया और बोला, ‘जहाँ सत्य और धर्म है, वहाँ यश स्वतः ही आ जाता है, इसलिए अब मैं भी तुम्हारे साथ ही रहूँगा।’ सेठ जी ने यश की भी आव-भगत की और अंत में माँ लक्ष्मी आयीं। उन्हें देखते ही सेठ जी नतमस्तक होकर बोले, ‘हे देवी! क्या आप भी पुनः मुझ पर कृपा करेंगी?’ ‘अवश्य जहाँ, सत्य, धर्म और यश हों, वहाँ मेरा वास निश्चित है।’ माँ लक्ष्मी ने उत्तर दिया। यह सुनते ही सेठ जी की नींद खुल गयी। उन्हें यह सब स्वप्न लगा, पर वास्तविकता में वह एक कड़ी परीक्षा से उत्तीर्ण हो कर निकले थे।

मित्रों, हमें भी हमेशा याद रखना चाहिए कि जहाँ सत्य का निवास होता है वहाँ यश, धर्म और लक्ष्मी का निवास स्वतः ही हो जाता है। सत्य है तो सिद्धि, प्रसिद्धि और समृद्धि है।

दर्द का रिश्ता Date :- 30-Nov-2014

एक सात साल की बच्ची दुकान पर एक गुडि़या को बड़े प्यार से देख रही थी। उसने दुकानदार से कहा, ‘अंकल, यह गुडि़या मुझे खरीदनी है, अपनी छोटी बहन के लिये।’ दुकानदार ने गुडि़या बच्ची के हाथ में देकर कहा, ‘लाओ पचास रुपये।’ बच्ची जरा सहम गयी और बोली, ‘अंकल मेरे पास तो पचास रुपये नहीं, मेरे पास तो इतने ही पैसे हैं।’ दुकानदार ने वह पैसे उठाये और गिनने लगा। वह केवल पैंतीस रुपये थे।

दुकानदार बच्ची से बोला, ‘यह तो कम हैं, इतने पैसों में गुडि़या नहीं मिलेगी। जाओ घर से और पैसे ले आओ।’ बच्ची ने गुडि़या कसकर पकड़ ली और बोली, ‘अंकल, मेरे पास और पैसे नहीं हैं और मुझे बहुत जल्दी है। मेरी माँ मेरी छोटी बहन के पास चली जायेगी। मेरी बहन को यह गुडि़या बहुत पसंद है।’ अंकल प्लीज, अगर मेरी मम्मी चली गई तो मैं अपनी छोटी बहन को यह गुडि़या नहीं भेज सकूँगी और मेरी बहन को यह गुडि़या बहुत पसंद है। प्लीज अंकल! इतना कहते-कहते उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली।

वहाँ खड़े-खड़े मैं उस बच्ची और दुकानदार की बातें सुन रहा था। मेरे मन में कई सवाल उभर रहे थे। इस बच्ची की माँ इस छोटी-सी बच्ची को छोड़कर क्यों जा रही है और फिर इसकी छोटी बहन तो और छोटी होगी। फिर वह बच्ची अपनी माँ के बिना कहाँ गई होगी। यह बच्ची अपनी माँ के साथ क्यों नहीं जा रही, क्या मजबूरी है इसकी। मैंने बच्ची के हाथ से पैसे ले लिये। मैंने कहा, ‘लाओ बेटा, मैं पैसे गिनता हूँ। बच्ची की आँख बचाकर मैंने अपनी जेब से कुछ पैसे निकालकर उन पैसों में मिला दिये और पैसे गिनने का नाटक करने लगा। मैंने सहसा कहा, ‘अरे यह तो पचास रुपये से ज्यादा हैं, लो बेटा यह दस रुपये अधिक हैं, लो अपने पास रखो।’ मैंने पचास रुपये दुकानदार को दिये और बच्ची से कहा, बेटा अब यह गुडि़या तुम्हारी है, इसे अपनी छोटी बहन को भेज देना। मेरी माँ को सफेद गुलाब बहुत पसंद है, इन बचे हुए पैसों से मैं अपनी माँ के लिए सफेद गुलाब का फूल खरीदूँगी उस सामने फूल वाले से। मैंने उसे सफेद गुलाब का फूल खरीदवा दिया। बच्ची कृतज्ञ आँखों से मुझे धन्यवाद देकर चल पड़ी, उसे जाने की जल्दी थी।

सहसा आज सुबह अखबार में पढ़ी एक दर्दनाक घटना स्मरण हो आई। कल एक ट्रक ड्राईवर, जो नशे में धुत ट्रक चला रहा था, उसने एक कार में टक्कर मार दी थी। इस दुर्घटना में एक तीन साल की बच्ची की घटनास्थल पर ही मृत्यु हो गई थी, जबकि बच्ची की माँ को गम्भीर चोटें आईं थीं, वह जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही थी। गाड़ी चलाने वाला महिला का पति घायल हुआ था, पर उनकी सात साल की बच्ची बाल-बाल बच गई थी।

मेरा दिल एक अंजान आशंका से भर उठा। बच्ची अभी मेरी आँखों से ओझल नहीं हुई थी। मैं बच्ची के पीछे-पीछे चल पड़ा। मेरे मन में सवाल उठा, ‘कहीं यह वही सात साल की बच्ची तो नहीं।’ अब मेरी आशंका पक्की होने लगी। थोड़ी दूर चलने के बाद बच्ची एक गली में मुड़ गई। मैं तेज कदमों से चलता हुआ उसी गली में मुड़ गया। बच्ची जिस घर में गई, वहाँ से रोने-चीखने की आवाजें आ रहीं थीं। कोहराम मचा हुआ था। कल जिस बच्ची को अंतिम विदाई दी गई थी, आज उसकी माँ को अंतिम विदाई देने की तैयारियाँ हो रहीं थीं। बच्ची की माँ को भी डाॅक्टर नहीं बचा पाये। उसके परिवार वाले उसके मृत शरीर को अंतिम विदाई देने की तैयारी कर रहे थे। बेचारा घायल पति अभी भी हाॅस्पिटल में था।

बच्ची हाथ में गुडि़या लिये माँ के मृत शरीर के पास पहुँची। उसने वह गुडि़या अपनी माँ को देते हुए कहा, मम्मी, यह गुडि़या प्रीति को दे देना, उसे बहुत पसंद थी, फिर उसने वह गुलाब का फूल माँ को देते हुए कहा, मम्मी तुम्हें सफेद गुलाब बहुत अच्छे लगते हैं ना, यह तुम्हारे लिए है, इतना कहते-कहते वह अपनी माँ से लिपट कर सिसकने लगी। किसी का साहस नहीं हो रहा था, उस बच्ची को संभालने का। मेरी आँखों से अनायास आँसू बह निकले। मैं उस निर्दयी ट्रक ड्राईवर को कोसने लगा, जिसने नशे की हालत में दो जिंदगियाँ मौत के दामन में सुला दीं। इस मासूम बच्ची का क्या कसूर था, जिसके सिर से माँ का साया छिन गया। बच्ची का पिता शायद कुछ समय बाद यह सब भूलकर दूसरी शादी कर ले, तब इस बच्ची का क्या होगा, क्या सौतेली माँ बच्ची को वह स्नेह और प्यार दे पायेगी? सोच-सोचकर मेरा मन व्याकुल हो रहा था।

सहसा मेरा मन एक अजीब से दर्द से तिलमिला उठा। मैं साहस करके आगे बढ़ा और बच्ची को माँ के मृत शरीर से अलग किया। बच्ची ने आँख उठाकर मेरी ओर देखा और मेरी टाँगों से लिपटकर फफक पड़ी। मेरी आँखें सावन-भादों-सी बरस पड़ीं। देखने वाले एक अंजान को देखकर विस्मित थे और मैं इस दर्द के रिश्ते को समझने का प्रयत्न कर रहा था।

प्रभु की माया बड़ी निराली है Date :- 10-Aug-2014

भगवान की बनाई हुई यह दुनिया बड़ी ही विचित्र है, यहाँ एक ही समान परिस्थिति होने पर भी एक सुखी है तो एक दुःखी है। कोई खोता है तो कोई पाता है। यही भगवान की माया है और इसी से यह संसारचक्र चल रहा है।

भगवान के धाम में वास होना परम सौभाग्य की बात होती है, वास होते हुए भी प्रमुख मंदिर में ठाकुर की सेवा मिल जाये तो कहना ही क्या है। इसी प्रकार एक पुरानी घटना है- बाँके बिहारी मंदिर वृन्दावन धाम की।

एक सफाई कर्मचारी की सेवा बाँके बिहारी मंदिर के अन्दर लगी हुई थी। वर्षों से वह अपनी सेवा सुचारू रूप से कर रहा था। प्रतिदिन आने वाले असंख्य भक्तों को देखता और उपर ठाकुर बाँके बिहारी को सतत खड़े देखता। एक दिन अचानक उसे विचार हुआ कि हमारा यह ठाकुर हमेशा एक ही स्थान पर खड़ा रहता है, अवश्य ही थक जाता होगा। भक्ति प्रेमवश वह अपने ठाकुर बाँके बिहारी से मन-ही-मन बोला कि आप लगातार एक ही स्थान पर खड़े-खड़े थक जाते होंगे, अतः आज मैं आपके स्थान पर खड़ा हो जाउँगा और आप एक दिन का विश्राम कर लें। ठाकुर ने कहा कि यह खड़े रहने का खेल बड़ा निराला है, यह तुमसे न हो सकेगा। पर वह सफाई कर्मचारी नहीं माना, ठाकुर को भक्त के आग्रह के सम्मुख झुकना पड़ा।

एक दिन ठाकुर का वेश धारण कर सफाई कर्मचारी को श्री बाँके बिहारी ने अपनी पारम्परिक चैकी पर खड़ा कर दिया। साथ ही उसे एक बात की शपथ भी दिलवा दी कि मंदिर के प्रांगण में चाहे कुछ भी हो रहा हो, तुम्हें चुप रहना पड़ेगा। अब मंदिर में भक्तों का आवागमन होना चालू हो गया। एक साहूकार को काफी अच्छा लाभ हुआ था, वह ठाकुर जी को धन्यवाद करने मंदिर में आया और दर्शन के समय एक बड़ी धनराशि मंदिर के प्रांगण में गिर गई। वह सेठ चला गया, तभी वहाँ एक परेशान व्यक्ति आया और भगवान से याचना करने लगा कि मुझे इतना धन दो, ताकि मेरे बच्चों की स्कूल फीस आदि की व्यवस्था हो जाए। वह निर्धन ज्यों ही ठाकुर जी को दण्डवत करने को झुका, तभी उसे सेठ की छोड़ी गई धनराशि मिल गई और वह उसे लेकर धन्यवाद करता हुआ अपने घर चला गया। यह सब घटना ठाकुर वेशधारी कर्मचारी चुपचाप खड़ा देख रहा था।

सेठ को कुछ समय पश्चात् अपनी धनराशि गिर जाने का पता चला, वह पुलिस स्टेशन गया और पुलिस के साथ बाँके बिहारी मंदिर पहुँच गया। इतनी देर में मंदिर में एक अन्य भक्त ठाकुर जी से निवेदन करने पहुँचा कि मैं 15 दिनों के लिए समुद्री यात्रा पर जा रहा हूँ, आप मेरी यात्रा में सुरक्षा बनाए रखना। यह कहकर वह जिस स्थान पर सेठ की धनराशि गिरी थी, नतमस्तक होकर प्रार्थना करने हेतु बैठ गया। उसी समय सेठ ने पुलिस को कहा कि इसी स्थान पर जहाँ यह व्यक्ति बैठा है, मेरी धनराशि गिरी थी। पुलिस ने उस व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया।

अब ठाकुर बने कर्मचारी से चुप नहीं रहा गया, वह वहीं से बोल उठा कि धनराशि इसने नहीं उठाई, बल्कि इससे पहले एक निर्धन भक्त आया था, वह उसे उठाकर ले गया है। जब सारा खेल खुल गया तो बाँके बिहारी वहाँ प्रकट हो गए और उस कर्मचारी से बोले कि तुझे चुप रहने के लिए कहा गया था। तुझे नहीं मालूम इस व्यक्ति की यात्रा संकटपूर्ण है, इसका जहाज समुद्र में डूबना ही है, अतः मैंने इसे चोरी के आरोप में गिरफ्तार कराकर इसके जीवन की रक्षा करनी है। साथ ही, साहूकार ने बहुत धन कमाया है, उसकी राशि किसी निर्धन के काम आ गई, तो इसे कुछ अन्तर नहीं पड़ेगा। अब तुझे मालूम पड़ा कि मैं यहाँ खड़ा-खड़ा क्या-क्या सांसारिक कार्यकलापों को पूरा करता रहता हूँ। यह सुनकर सफाई कर्मचारी ठाकुर बाँके बिहारी के चरणों में गिर गया।

- मदन मोहन, प्रमुख समाजसेवी

अविश्वसनीय सत्य Date :- 01-Jun-2014

हर व्यक्ति के जीवन में कुछ ऐसी घटनायें हो जाती हैं, जिन्हें सहज भुलाया नहीं जा सकता। आज जो घटना मैं आपको बताने जा रहा हूँ, वह 70 वर्ष पहले की है, किन्तु यह दृश्य आज भी चलचित्र की भांति मेरी आँखों के सामने घूम जाता है

घटना 1944 की है। मेरी आयु उस समय 9 वर्ष की थी। जिस जगह यह अद्भुत घटना घटी थी, वह आज पाकिस्तान में है। पाकिस्तान की राजधानी रावलपिंडी से करीब ग्यारह मील दक्षिण पश्चिम में तख्तपड़ी नाम का गाँव था। गाँव में स्वनिर्मित कुछ गुफाएँ थीं। ऐसा कहा जाता है कि अपने वनवास के समय कुछ समय पांडव यहाँ रूके थे। इन गुफाओं में हमेशा कुछ महात्मा आकर ठहरते थे। जिस समय का मैं उल्लेख कर रहा हूँ, यहाँ एक उच्च कोटि के महात्मा अपने एक शिष्य के साथ इन गुफाओं में आये हुए थे।

रविवार का दिन था। मैं अपने पिताजी के साथ महात्मा जी के दर्शनों के लिये गया हुआ था। महात्मा जी, जो अधिकतर गम्भीर मुद्रा में रहते थे, आज बड़े प्रसन्न थे। धर्म की बातें हो रहीं थीं। 8-10 लोग बैठे थे। अक्टूबर का महीना था। महात्मा जी रह-रहकर गुफा की ओर देख रहे थे। जब ऐसा कई बार हुआ तो मेरे पिताजी से रहा नहीं गया। उन्होंने अपनी जिज्ञासा मिटाने के लिए उनसे पूछ लिया, ‘भगवन्! आप बार-बार गुफा की ओर क्या देख रहे हैं?’

महात्मा जी मुस्करा कर बोले, ‘मोहन लाल, गुफा के द्वार पर वह टिड्डी बड़ी बेचैन है। कभी अन्दर जाती, कभी बाहर आती है। जानते हो क्यों? आज इसकी शादी है। यह अपने दूल्हे की प्रतीक्षा बड़ी आतुरता से कर रही है। अभी थोड़ी देर में इसका दूल्हा पेशावर से आने वाला है।’ इतना कहकर महात्मा जी चुप हो गये। सभी अचम्भित थे। पेशावर वहाँ से करीब 200 मील दूर था और एक टिड्डा वहाँ से कैसे आयेगा। महात्मा जी फिर बोले, ‘आश्चर्य मत करो, यह विधाता का लिखा है, दूल्हा बस आने वाला है।’

थोड़ी ही देर में एक पठान एक गट्ठर लिये वहाँ पहुँचा। गट्ठर एक ओर रखकर महात्मा जी की ओर बड़ा। महात्मा जी बोले, ‘आओ नूर मोहम्मद, मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा कर रहा हूँ।’ महात्मा जी के मुँह से अपना नाम सुनकर वह अवाक रह गया। उनको मत्था टेक कर उनके सामने बैठ गया और बोला, ‘महाराज, मैं तो आपसे कभी मिला नहीं, आप मेरा नाम कैसे जानते हैं?’ तुम पेशावर से आये हो ना! कहो कैसे आना हुआ। महात्मा जी के पैरों पर मत्था टेकते हुए बोले, ‘महाराज! आप सब जानते हैं। मैं यहाँ अर्जन सिंह की दुकान पर कम्बल देने आया था। पता चला एक सिद्ध पुरुष गुफा में ठहरे हैं, इसलिये उसकी दुकान पर जाने से पहले आपके दर्शन करने आया हूँ। सोचा सर्दी शुरू हो रही है, रात को ठंड हो जाती है, पहले आपको एक कम्बल भेंट करूँ, फिर बाकी दुकान पर दे दूँगा।’

इतना कहकर उसने कम्बल का गट्ठर खोला, दो-तीन कम्बल हटा कर एक ओर रखकर, नीचे से एक कम्बल निकाला और महात्मा जी को दिया। कम्बल उठाते ही उसके नीचे से एक टिड्डा छलांग मारकर गुफा की ओर भागा और प्रतीक्षा कर रही टिड्डी के पास पहुँच गया। दोनों झट से गुफा के अंधकार में खो गये। उपस्थित सभी इस दृश्य को देख रहे थे।

महात्मा जी मेरे पिताजी से बोले, ‘देखा, मोहनलाल, इस टिड्डी का दूल्हा पेशावर से कैसे आ गया?’ नूर मोहम्मद कुछ समझा नहीं कि ये क्या माजरा है। नूर मोहम्मद ने जिज्ञासावश पूछ ही लिया। महात्मा जी ने उसे सारा वृत्तांत सुनाया तो हैरानी से उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं।

इस घटना को मैं आज भी याद करता हूँ तो सारा शरीर रोमांचित हो उठता है।

– नन्दकिशोर सेठी, मीडिया प्रभारी (बद्रीभगत झण्डेवाला देवी मंदिर)

चार पत्नियाँ Date :- 01-Mar-2014

एक बहुत प्रसिद्ध व्यापारी था। उसके पास अनगिनत धन-सम्पत्ति, हीरे-मोतियों का भण्डार था। उसकी चार पत्नियाँ थीं। वह अपनी चैथी पत्नी से बहुत प्यार करता था तथा उसे बहुत चाहता था। वह उसे संसार के महँगे से महँगे कपड़े व जेवर लेकर देता था, उसे बढि़या से बढि़या खाता-पिलाता व संसार के सभी भौतिक सुख उसे प्रदान करता था।

व्यापारी को अपनी तीसरी पत्नी से बहुत लगाव था। उसे उस पर बहुत घमंड भी था और सभी के सामने उसकी बहुत तारीफ करता था। किन्तु व्यापारी को हर समय चिंता रहती थी कि वह किसी अन्य पुरुष के साथ भाग न जाए।

वह व्यापारी अपनी दूसरी पत्नी को उसके सद्गुणों के कारण बहुत मान-सम्मान देता था। वह पत्नी बड़ी उदार थी तथा वह बहुत शांत स्वभाव की थी। व्यवसायी उस पर बहुत विश्वास करता था। जब कभी भी उसे किसी समस्या का सामना करना पड़ता, तो वह उससे परामर्श करता था और वह सदा उस समस्या का समाधान करने में सहायक होती थी।

व्यवसायी की पहली पत्नी उसके प्रति बहुत ही वफादार थी। उसके धन-दौलत की पूरी निगरानी रखती थी और उसे संभाल कर रखती थी। घर का सारा कामकाज देखती थी और पूरा घर सम्भालती थी। किन्तु व्यापारी अपनी पहली पत्नी से बिल्कुल प्यार नहीं करता था, हालांकि पत्नी उससे बहुत प्यार करती थी।

जब व्यापारी का अंतिम समय निकट आया, तब उसने अपनी चैथी पत्नी को बुलाया और कहा- मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ और संसार के सभी सुख तुम्हें प्रदान किए हैं। मैंने तुम्हारी देखभाल बहुत अच्छी तरह की है। अब, जब मैं मर रहा हूँ, क्या तुम मेरे पीछे-पीछे आकर मेरा साथ दोगी? चैथी पत्नी ने कहा- बिल्कुल नहीं और वह उठकर चली गई।

अब उसने अपनी तीसरी पत्नी को बुलाया और उससे कहा- मैंने तुम्हें बहुत प्यार किया है और तुम्हें सब कुछ दिया है। अब जब मैं मर रहा हूँ, क्या तुम मरकर मेरे साथ रहोगी? पत्नी ने कहा- नहीं, जीवन इतना सुंदर है। मैं तुम्हारे मरने के बाद दूसरा विवाह करके सुखपूर्वक इस संसार के सुख भोगूँगी। इतना सुनकर व्यापारी को बड़ा धक्का लगा।

फिर उसने दूसरी पत्नी को बुलाया और कहा- तुमने मेरा सदैव साथ दिया है। जब भी आवश्यकता पड़ी, मैंने तुम्हारी सहायता ली है। अब भी मुझे तुम्हारी सहायता की आवश्यकता है। क्या तुम मेरे साथ मर सकोगी ताकि अगले जन्म में भी मेरा मार्गदर्शन कर सको। पत्नी ने उत्तर दिया- मुझे दुःख है कि मैं आपकी ये इच्छा पूरी नहीं कर सकती। मैं अधिक से अधिक आपको चिता तक पहुँचा सकती हूँ ताकि तुम्हारे पार्थिव शरीर का दाह संस्कार ठीक से हो जाए। इतना कहकर वह भी चली गई।

अब व्यापारी को पहली पत्नी का ध्यान आया। उसने सोचा- मैंने जीवन में उसे कोई सुख नहीं दिया, सदा उसका तिरस्कार किया है। फिर भी उसने उसे बुलाया और कहा- मैंने जीवन में तुम्हें कोई सुख नहीं दिया, तुम सदैव मेरा और मेरे घर-बार का ध्यान रखती रहीं। अब मैं मर रहा हूँ तो क्या तुम मेरा साथ दोगी और आगे भी इसी प्रकार मेरा ध्यान रखोगी? पत्नी ने धीरे से कहा- मैंने जीवन भर आपका साथ दिया और अब भी आपको विश्वास दिलाती हूँ कि आपका साथ नहीं छोडूँगी। इतना सुनकर व्यापारी ने सोचा कि मैंने जीवन भर जिसकी अवज्ञा की, दूसरी पत्नियों के प्यार में अंधा होकर इसका तिरस्कार किया है, फिर भी आज ये मेरे साथ चलने को तैयार है। यह सुनकर व्यापारी ने राहत की सांस ली।

वास्तव में, हम सब की चार पत्नियाँ हैं। चैथी पत्नी हमारा शरीर है। जीते-जी हम उसका कितना भी ध्यान रखें और उसे सुख दें, वह हमारा साथ इस जन्म के बाद नहीं देगा। वह हमारे साथ नहीं जाएगा।

हमारी तीसरी पत्नी हमारी धन-सम्पत्ति, हमारा मान-सम्मान एवं हमारा ऐश्वर्य है, जो हमारे जाने के बाद किसी और के हो जाएंगे।

हमारी दूसरी पत्नी हमारा परिवार और बंधु-बांधव हैं, जो जीते-जी तो हमारा पूरा ध्यान रखते हैं, परन्तु हमारा साथ यहीं तक निभा सकते हैं। आगे हमारे साथ नहीं जाते। उनका नाता केवल श्मशान भूमि तक का ही है।

हमारी पहली पत्नी हमारा आत्मा है। जीते-जी हम उसकी परवाह नहीं करते। उसका कहना नहीं मानते। सदा उसका तिरस्कार करते हैं। फिर भी वह हमारा साथ नहीं छोड़ती और हमारे साथ रहती है। जीवन भर हम अपनी तीन पत्नियों के चलते पहली पत्नी का ध्यान नहीं रख पाते। इसलिए हमें जीते-जी हमारी पहली पत्नी यानि आत्मा का ध्यान रखना चाहिए और उसकी बात माननी चाहिए क्योंकि वह सदैव हमारा भला चाहती है और हमारा साथ कभी नहीं छोड़ती। हम से अच्छे कर्म करवाकर हमारा अगला जीवन संवारती है।

दैविक चमत्कार Date :- 06-Feb-2014

कभी-कभी हमारे जीवन में कुछ ऐसी घटनाएँ हो जाती हैं जो किसी चमत्कार से कम नहीं होतीं। इस लेख में मैं एक ऐसे ही अद्भुत दैविक चमत्कार के बारे में बताने जा रहा हूँ।

घटना एक दशक से अधिक पुरानी है। डाक्टर अहमद परिवार सहित केरल के एक नगर में रहते थे। वे एक विशेष प्रकार के कैंसर रोग के विशेषज्ञ थे। उनकी ख्याति देश-विदेश में फैली हुई थी। उन्होंने कई ऐसे रोगियों को इस रोग से मुक्त कराया, जिनको दूसरे चिकित्सकों ने जवाब दे दिया था।

इसी सिलसिले में एक अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठी में भाग लेने के लिए उन्हें मुम्बई आने का निमंत्रण मिला। इस गोष्ठी में देश-विदेश के कैंसर विशेषज्ञ भाग लेने वाले थे। निश्चित तिथि को डाक्टर अहमद हवाई अड्डे पहुँचे और विमान में अपना स्थान ग्रहण किया। गन्तव्य स्थान से कुछ देर पहले विमान के इंजन में कुछ खराबी आ जाने से विमान को एक छोटे एयरपोर्ट पर उतारना पड़ा। बाहर आने पर डाक्टर अहमद को पता चला कि कल से पहले विमान उड़ान नहीं भर सकेगा। डाक्टर अहमद बड़े निराश हो गए। उनका कल प्रातः 10 बजे से पहले मुम्बई पहुँचना आवश्यक था। उन्होंने वहाँ से किराए पर एक वाहन लिया, जिससे वह पाँच घंटे में मुम्बई पहुँच सकते थे। दुर्गम पहाड़ी इलाका था, इसलिए बड़ी सावधानी से जाने का उन्हें निर्देश मिला।

वह अभी कुछ दूर ही पहुँचे थे कि सहसा आकाश में तेज हवाओं के साथ बादल छा गए, बिजली चमकने लगी और तेज हवाओं ने तूफान का रूप धारण कर लिया। चारों ओर अंधकार की स्थिति बन गई। तेज बारिश आरम्भ हो गई। चालक बहुत धीमी गति से वाहन चला रहा था, किन्तु उस आँधी-तूफान में वह रास्ता भटक गया। जब तूफान रूका और बारिश थमी, तब तक रात हो चुकी थी। दूर-दूर तक किसी बस्ती का आभास नहीं हो रहा था। सहसा दूर उन्हें एक रोशनी की किरण दिखाई दी। धीरे-धीरे वे रोशनी के करीब पहुँच रहे थे। अब वे एक पुराने जर-जर मकान के सामने खड़े थे। थकान और निराशा से भरे डाक्टर अहमद गाड़ी से उतरे। उन्होंने दरवाजा खटखटाया। एक वृद्धा ने दरवाजा खोला, उसके हाथ में लालटेन थी और वह आगन्तुकों को बड़ी उत्सुकता से देख रही थी। डाक्टर अहमद ने कहा- तूफान और बरसात में हम रास्ता भटक गए हैं। मुझे मुम्बई जाना था। हम बहुत थके हुए हैं और प्यास के मारे गला सूख रहा है। वृद्धा ने उन्हें अन्दर आने को कहा और कमरे में आकर एक सोफे पर बैठने का इशारा किया। वृद्धा ने कहा- मैं आपके लिए पानी और काफी बनाकर लाती हूँ।

सहसा उन्हें किसी की हल्की-सी कराहट सुनाई दी। उन्होंने आँखें घुमाकर देखा, कमरे में एक चारपाई पर एक बेहद कमजोर बालक लेटा हुआ था जो धीरे-धीरे कराह रहा था। इतने में वृद्धा काफी और कुछ खाने का सामान लेकर कमरे में आई। काफी पीकर डाक्टर अहमद कुछ अच्छा महसूस कर रहे थे। उन्होंने उस बालक के बारे में पूछा। वृद्धा ने उत्तर दिया- यह मेरा एकमात्र पोता है। इसके माता-पिता की एक दुर्घटना में मृत्यु हो चुकी है। अब यह मेरा एकमात्र सहारा है, किन्तु यह एक विशेष प्रकार के कैंसर रोग से पीडि़त है। बहुत इलाज करवाया है, किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। डाक्टर कहते हैं कि इस रोग का इलाज केवल डाक्टर अहमद ही कर सकते हैं जो केरल में रहते हैं और उन्होंने ऐसे कई मरीजों का सफलतापूर्वक इलाज किया है। मेरे पास कोई साधन नहीं कि मैं इस बालक को उनके पास ले जाउँ। इसको तिल-तिल मरता देख रही हूँ, किन्तु कुछ कर नहीं सकती। इतना कहते-कहते वृद्धा के आँखों से अश्रुधारा बह निकली।

इतना सुनते ही डाक्टर अहमद खड़े हो गए, उनके मुखमण्डल पर आश्चर्य के भाव थे। वे बोले- माता जी, मैं ही डाक्टर अहमद हूँ। मेरे विमान में खराबी आना और आँधी-तूफान में रास्ता भटककर आपके पास पहुँचना- यह सब एक दैविक चमत्कार ही है। शायद कुदरत ने इस बच्चे के इलाज के लिए ही ये सारा खेल रचा है। अब आप चिंता न करें, मैं इसका इलाज करूँगा और उपर वाले ने चाहा तो ये बालक बिल्कुल ठीक हो जाएगा।

इतना सुनते ही वृद्धा की आँखें खुली की खुली रह गईं। वह वहीं जमीन पर लेट गई और अपना हाथ उठाकर कहने लगी- ऐ मेरे ईश्वर, ये तेरा कैसा चमत्कार है, तेरी लीला के आगे मैं नतमस्तक हूँ। आज मुझे विश्वास हो गया है कि तू चाहे तो सब कुछ कर सकता है। वह जमीन पर लेटे-लेटे बार-बार ईश्वर के इस चमत्कार के लिए उसका धन्यवाद कर रही थी।
 


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