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शृंखला 47: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 01-Dec-2015

यों तो आदि शंकराचार्य के विषय में बहुत कुछ लिखा जा सकता है, परन्तु जो कार्य प्रारम्भ किया गया, उसका समापन भी जरूरी है, ताकि पाठकों को आर्यावर्त की अन्य महान विभूतियों के जीवन के विषय से भी अवगत कराया जा सके। अतः इस श्रृंखला की यह आखिरी कड़ी पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है।

इस श्रृंखला में हमने संक्षेप में उनकी इस विजययात्रा का उल्लेख करने के साथ-साथ पाठकों को उनके प्रमुख ग्रंथों एवं काव्य-स्तुति रचनाओं से भी परिचित कराया। शंकराचार्य जी के जीवन-वृत्त एवं ग्रंथावली के विषय में अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं, परन्तु ये सभी विस्तृत और साधारणजन के लिए दुरूह है। इसलिये हमने उनके जीवन एवं दर्शन की यह श्रृंखला शुरू की थी, ताकि सरल भाषा द्वारा भारत की इस विलक्षण विभूति के बारे में अपने पाठकों को दुर्लभ जानकारी दे सकें।

आदिशंकराचार्य भारतवर्ष के महान दार्शनिक, धर्मोद्धारक, कवि, मनीषी, शास्त्रवेत्ता एवं विचारक होने के साथ एक कर्मयोगी थे, जिन्होंने सनातन धर्म के पुनरुत्थान हेतु एक ऐसी दिग्विजय यात्रा का संकल्प लेकर कश्मीर से कन्याकुमारी तक सनातन धर्म-ध्वज लहराया। इस यात्रा के अदम्य साहस, धैर्य और जिजीविषा की मिसाल विश्व में अन्यत्र नहीं मिलती। वे अद्वैत वेदांत के अद्भुत व्याख्याकार थे। भारतवर्ष की चारों दिशाओं में चार पारम्परिक मठों की स्थापना की। दो पंथों की शुरुआत की ‘दशनामी’ एवं ‘शन्मत’।

शंकर ने ‘अैद्वत’ सिद्धांत का प्रतिपादन करते हुए इस बात पर विशेष जोर दिया कि व्यक्तिगत स्तर पर हम सभी उस परमात्मा के ही रूप हैं और हमारा अस्तित्व भी परमात्म का अंश है, यानि शारीरिक स्तर पर अलग होकर आत्मिक रूप से सभी एक हैं। उनके अनुसार स्वंगीकार (Self Realization) ही वह कुंजी है, जो हमारे लिए मोक्ष के द्वार खोल सकती है।

कुछ लोगों का मानना है कि स्वयं शिव ‘शंकर’ के रूप में अवतरित हुए ताकि आर्यावर्त में सनातन धर्म का पुनरुत्थान हो सके। यह बात सही प्रतीत भी होती है क्योंकि सिर्फ 32 वर्ष के जीवनकाल में कोई भी व्यक्ति इतनी यात्राएँ, शास्त्रार्थ, ग्रंथ रचना और बृहद पीठों की स्थापना आदि कैसे कर सकता है। जाहिर है, शंकर में एक ऐसी दैवी शक्ति रही होगी, जिसने उन्हें इतना ऊर्जावान बनाया। उनके जीवन की कतिपय घटनाएँ इस बात की गवाह हैं कि उनकी यह विलक्षण प्रतिभा और जिजीविषा ईश्वरीय देन थी।

हिन्दू धर्म को सुनियोजित बनाकर अल्पायु में ही चार धामों में चार पीठों की स्थापना करना कोई सहज काम नहीं था। विभिन्न हिन्दू जाति-प्रजातियों को इकट्ठा कर ‘दशनामी’ सम्प्रदाय की शुरुआत की तथा चारों मठों में शंकराचार्यों की परम्परा प्रारम्भ की, जो आज भी जारी है। हिन्दू समाज में एक्य स्थापित करने हेतु उन्होंने चार वर्णों से चार शिष्य लिये, 1. पद्मपाद रसनन्दन, 2. हस्तामलक, 3. मंडनमिश्र तथा 4. तोटक या तोटकाचार्य। संन्यासियों का दशनामी सम्प्रदाय (दशनामी अखाड़ा) जो कि संन्यासियों की दस परम्पराओं को दर्शाता है। इस सम्प्रदाय में शैव और वैष्णव का मतभेद नहीं है, अर्थात् ये दोनों ही स्वीकार्य हैं।

शंकराचार्य के दर्शन (philosophy) का मूल आधार ‘आत्मा’ के अस्तित्व की स्वीकृति थी, जबकि उन दिनों बौद्ध धर्म का बोलबाला था और बौद्ध ‘आत्मा’ को नहीं मानते थे। आदि शंकराचार्य ने शास्त्रार्थ कर अनेक बौद्ध विद्वानों को हिन्दूधर्म की ओर उन्मुख किया।

कुल मिलाकर धर्म और वैदिक संस्कृति के क्षेत्र में उनका योगदान युगों तक स्मरण किया जायेगा। इस श्रृंखला में हमने श्री आदिशंकराचार्य जैसी विलक्षण विभूति के बारे में अपने पाठकों को यथासंभव सही जानकारी देने की कोशिश की है, परंतु इसके बावजूद अनेक त्रुटियों की संभावना रहती है। अतः पाठकों से हमारा यही सविनय निवेदन है कि वे हमारी इन त्रुटियों को नजरअंदाज करते हुए इस महान संत के जीवन से प्रेरणा लेकर सनातन धर्म की पावन परम्पराओं का निर्वाह करते रहें और मानवता को प्रेम और शांति के मार्ग पर अग्रसर होने में अपना योगदान दें।

भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम् मूढ़मते।

- सीए. ओ.पी. पारीक

श्रृंखला 46: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 01-Nov-2015

शंकर ने अनेकानेक विशिष्ट ग्रंथों की रचना की, जिनसे उनके गहन अध्ययन एवं आध्यात्मिक उन्नयन का बोध होता है। कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि इनमें से कुछ ग्रंथ शंकराचार्य परम्परा के बाद के आचार्यों द्वारा लिखे गए। आचार्य के ग्रंथों के विषय में श्रृंगेरी के शंकराचार्य की देखरेख में श्री रंगम स्थित वाणी विलास प्रेस से 20 जिल्दों वाली एक ग्रंथावली प्रकाशित हुई है, जिसे अब तक की सर्वाधिक प्रामाणिक माना जाता है। यह निर्णय करना कठिन है कि इस विपुल शंकर साहित्य में अन्य शंकराचार्यों और मठाधीशों की रचनाओं का समावेश कितना है। हालांकि, शंकर के प्रमुख भाष्य ग्रंथ निर्विवाद रूप से उन्हीं के द्वारा रचित हैं।

इतने विपुल साहित्य की रचना सिर्फ 32 साल के जीवन में कर पाना असम्भवप्रायः प्रतीत होता है। मानो, उनको कोई दैवी शक्ति प्राप्य थी, जिसकी बदौलत यह सब कुछ सम्भव हो पाया। श्रृंगेरी पीठ के अनुसार, शंकर ने कैलाशधाम में देह त्याग की। कुछ अन्य विद्वानों का मानना है कि उन्होंने केरल में ही शरीर त्यागा था, लेकिन अधिकांश विद्वान लोग उनके द्वारा हिमालय में देह त्याग को अपेक्षाकृत प्रामाणिक मानते हैं। तिथि अनुसार उनकी प्रयाण तिथि के बारे में भी मतभेद हैं। जैसे- वैशाख शुक्ल दशमी, वैशाख शुक्ल पूर्णिमा और कार्तिक शुक्ल एकादशी को इनके प्रयाण की तिथि को अपने-अपने मतानुसार विद्वान प्रामाणिक मानते रहे हैं।

आमतौर पर यह माना गया है कि जब आचार्य कश्मीर गए और वहाँ उन्हें सर्वग्य-पद से विभूषित किया गया, तत्पश्चात् वे बद्रीनाथ धाम चले गए। वहाँ उन्होंने कुछ समय वास किया। इसी दौरान वे दत्तात्रेय जी के दर्शन करने उनकी गुफा में गए। वहीं पर हिमालय की गोद में उन्होंने देहत्याग किया। यह बात अधिक प्रामाणिक लगती है क्योंकि केदारनाथ धाम के निकट आचार्य की समाधि अभी भी मौजूद है। यह भी सर्वमान्य है कि उन्होंने अपने कतिपय ग्रंथों की रचना हिमालय प्रवास के दौरान की थी। जो भी हो, आदि शंकराचार्य द्वारा रचित सत्-साहित्य मानवता की अमूल्य धरोहर है। भारतवर्ष के लिए यह गर्व का विषय है, जहाँ ऐसे विलक्षण प्रतिभावान मनीषियों ने जन्म लेकर विश्व को अपने ज्ञान से प्रकाशित किया।

श्रृंखला 45: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 06-Oct-2015

श्री शंकर के अन्य ग्रंथों की तुलना में विवेक-चूड़ामणि एक लघु ग्रंथ है, परन्तु अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह ‘गागर में सागर’ जैसा है। विवेक चूड़ामणि साधना और सम्यक् ज्ञानोपलब्धि पर विशेष जोर देता है। इसमें सांसारिकता त्याग कर सर्वथा जीवन मुक्ति को आदर्श बताया गया है। जैसे- ‘मुक्र्तिनी शतकोटि जन्मसु कृतैः पुण्येर्विना न लभ्यते।’ अर्थात् मुक्ति सैकड़ों करोड़ जन्मों के पुण्यों बगैर प्राप्त नहीं होती। कुछ ऐसा ही मन्तव्य श्रीकृष्ण का भी भगवद्गीता में है, जब वे कहते हैं-

अनेक जन्म संसिद्धस्ततो याति परांगतिम्। (भगवद्गीता 6-45)

विवेक चूड़ामणि में कैवल्य प्राप्ति को सर्वोत्तम सिद्धि बताया गया है। ग्रंथ के आरम्भ में ही शंकर ने ब्राह्मणत्व की श्रेष्ठता पर जोर दिया है, पर यह जाति विशेष के महत्व की बात ना होकर गुणों की बात है, अन्यथा इसका गलत अर्थ भी लगाया जा सकता है। इस ग्रंथ के दूसरे श्लोक में वे कहते हैं, जीवों को प्रथम तो मानव जीवन ही दुर्लभ है और उसमें भी पुरुषत्व और अधिक दुर्लभ। ये दोनों होकर भी ब्राह्मणत्व का मिलना अति कठिन है। तत्पश्चात् ब्राह्मण होने से वैदिक धर्म का पालन करने वाला विद्वान ब्राह्मण होना और अधिक कठिन। आत्मा और अनात्मा का विवेक, सम्यक् अनुभव, ब्रह्मात्म भाव से स्थिति और मुक्ति- ये सभी अनन्त जन्मों के शुभकर्मों के पुण्य-प्रताप बिना प्राप्य नहीं हैं।

विवेक चूड़ामणि में शंकर ने ब्रह्मनिष्ठा के महत्व के माध्यम से ज्ञानोपलब्धि के उपाय बताये हैं। अन्य ग्रंथों की भाँति विवेक चूड़ामणि में भी शंकर ने देहासक्ति की निन्दा करते हुए स्थूल शरीर की नश्वरता का बोध कराया है। सार रूप में देखा जाये तो विवेक चूड़ामणि में नित्य समाधि के लिए वैराग्य को ही सर्वोत्तम साधन माना है। वे कहते हैं- अत्यन्त वैराग्यवतः समाधिः

श्रृंखला 44: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 12-Sep-2015

शंकर के ग्रंथों की संक्षिप्त विवेचना के इस क्रम में हम इस कड़ी में उनकी काव्य रचना ‘सौन्दर्य लहरी’ की चर्चा करेंगे। मूलतः सौन्दर्य लहरी तंत्र को साहित्य की परम्परा का ग्रंथ कहा जा सकता है क्योंकि इसमें सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करने के साधन निहित हैं। साधना पथ पर अग्रसर होने के लिए यह एक अद्भुत ग्रंथ है। प्राचीन काल से चली आ रही शाक्त साधना के अनेक पक्षों को इस ग्रंथ में पिरोया गया है। इस ग्रंथ में साधना के अमोघ प्रयोग निहित हैं। इसकी भाषा प्रांजलता भी सौंदयपूर्ण है, जिसमें श्री शंकर का वर्णन चातुर्य झलकता है। सौंदर्य लहरी आदि शंकराचार्य की एक कालजयी रचना है।

सौंदर्य लहरी का एक-एक मंत्र एक सुन्दर मोती की तरह और इन मोतियों को शंकर ने भाव भक्ति की माला में पिरोया है। यह एक तरह से गागर में सागर है और यह सागर और कुछ नहीं, बस माँ भगवती श्री महात्रिपुर सुन्दरी के असीम सौन्दर्य का समन्दर है। आप इसमें डुबकी लगाएँ या इसकी लहरों में खेलें, अनिवर्चनीय आनन्द की गारंटी है।

साधना, भक्ति, शास्त्र एवं भवन सौन्दर्य का जैसा सन्निवेश ‘सौंदर्य लहरी’ में मिलता है, विश्व साहित्य में अन्यत्र नहीं मिलता। यह स्तुति शंकर की मौलिकता की परिचायक है।

इसमें काव्यार्थ तो है ही, साथ-साथ एक रहस्यवाद जिसके गूढ़ार्थ का बोध होने पर पाठक सहज ही परमतत्त्व का अपूर्व आनन्द प्राप्त कर सकता है। ‘सौंदर्य लहरी’ की स्तुति माँ भगवती के चरण कमलों को समर्पित है। यह माता भक्तों की पूजा- उपासना से प्रसन्न होती है। इसका नित्य नियमानुसार पाठ, जप एवं मनोकामना पूर्ति विधानों का पालन करने से इस कलिकाल में सिद्धि प्राप्त होती है। माँ भगवती के भव्य सौंदर्य का वर्णन करते हुए श्री शंकर का यह सुंदर श्लोक उद्धृत करता हूँ-

ललाटं लावण्य द्युतिविमलमाभाति तव यद्द्वितीयं तन्मन्ये मकुट घटितं चन्द्र शकलम

विपर्यासन्यासादुभयमपि संभूय च मिथः सुघाले पस्युतिः परिणमति राका हिमकरः।

अर्थः हे माँ! आपका ललाट लावण्य एवं कांति से चमक रहा है तथा आपके मुकुट के एक भाग में जो चन्द्रकला विराजमान है, उन दोनों चन्द्रखण्डों (कांतिमय ललाट और मणि मुकुट) को उलट-पलट कर अगर अमृतरस से जोड़ दिया जाए तो वह शरद पूर्णिमा जैसी पूर्णता को प्राप्त हो जाता है।

पाठक निश्चय ही माँ भगवती के इस चन्द्रस्वरूप मुखमण्डल की कल्पना कर अभिभूत होंगे। 

- सीए. ओ.पी. पारीक

श्रृंखला 43: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 01-Aug-2015

अगर आप ध्यान से शंकर के गीता भाष्य को समझें तो पाएंगे कि यह अपने आप में कोई शास्त्रोक्त विवेचना न होकर गीता में प्रतिपादित कर्मयोग, ज्ञानयोग और तत्वज्ञान के सिद्धांतों का शंकरीय विस्तार है, परन्तु फिर भी इसमें शंकर के चिंतन की मौलिकता झलकती है। जैसे कि वे कहते हैं-

सुतरां यह सिद्ध हुआ कि गीता में किंचित् मात्र भी श्रौत या स्मार्त कर्म के साथ समुच्चय नहीं दीखता क्योंकि अज्ञान या आसक्ति आदि दोषों से कर्म में लगे हुए जिस व्यक्ति को यज्ञ, दान अथवा तप से अन्तःकरण शुद्ध होकर, परमार्थ विषयक, ऐसा ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि यह सब ‘एक ब्रह्म’ ही है और वह अकत्र्ता है।’ इस प्रकार शंकर ने गीता का संदर्भ लेकर अपने अद्वैत के सिद्धान्त की परिपुष्टि की है। शंकर के अनुसार प्रवृत्ति रूप कर्म, वास्तव में देखा जाये तो वह कर्म नहीं होता, जिससे कि ज्ञान के साथ उसका समुच्चय हो सके, क्योंकि सच्चा आत्मज्ञानी न तो ऐसा मानता है कि ‘मैं’ करता हूँ और ना ही उन कर्मों का फल चाहता है। उन्होंने तत्ववेत्ता जनकादि का उदाहरण देकर समझाने की चेष्टा की है कि वे (जनकादि) तत्ववेत्ता होते हुए भी लोकसंग्रह के लिए कर्मों में प्रवृत्त थे। ‘गुण ही गुणों में बरत रहे हैं’ (गीता), इसी ज्ञान से वे परम सिद्धि को प्राप्त हुए। योगीश्वर कृष्ण ने कहा कि योगी लोग अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।

आश्चर्य होता है जब शंकर अपनी नितांत निजी व्याख्या करते हुए घोषणा करते हैं कि ‘सुतरां गीता शास्त्र में निश्चय किया हुआ अर्थ यही है कि केवल तत्त्वज्ञान से ही मुक्ति हो सकती है, कर्म-सहित ज्ञान से नहीं।’ आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाये तो यह शंकर का मौलिक विचार कहा जाएगा क्योंकि गीता के अनुसार तो कर्मसहित ज्ञान से भी मोक्ष संभव है। इससे यह साबित होता है कि शंकर के गीताभाष्य में उनके स्वतंत्र चिंतन का प्रभाव दिखाई देता है। शंकर का यह कहना काफी हद तक सही है कि युद्धभूमि में शोकसागर में डूबे अर्जुन को गीतोपदेश देने का अभिप्राय उसे आत्मज्ञान देकर शोक से उबारना था, ना कि उसके क्षत्रिय कर्म का आभास दिलाना था। कृष्ण ने अर्जुन को स्पष्ट शब्दों में कहा था कि जो मर गए हैं और जो जीते हैं, दोनों ही के लिए ‘पंडित’ यानि आत्मज्ञानी शोक नहीं करते।

शंकर ने कृष्ण-अर्जुन संवाद की परमार्थ दृष्टि को आत्मज्ञान के माध्यम से समझाने की कोशिश की है। कृष्ण ने अर्जुन में यह आत्मज्ञान जगाने के लिए कहा कि हर काल में मैं सदैव और वैसे ही तू भी हर काल में था और ये युद्धभूमि में खड़े राजागण भी थे, अर्थात् हमारे शरीरों का नाश होने के बाद भी हम रहेंगे क्योंकि तीनों कालों में आत्मरूप से ही सब कुछ ‘नित्य’ है। तभी ये भीष्मादि अशोच्य क्यों हैं, इसलिए कि वे नित्य हैं और अर्जुन अगर इस ज्ञान को हृदयंगम कर ले तो इस आत्मज्ञान से उसका इस सम्पूर्ण शोक से उद्धार हो सकता है।

 
श्रृंखला 42: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 03-Jul-2015

वास्तव में, आदि शंकराचार्य से पूर्व भी कई गीता भाष्य विद्वानों द्वारा लिखे गए और ये भी महत्वपूर्ण भाष्य थे, परन्तु आज उनमें से कोई भी भाष्य उपब्लध नहीं है। इनमें से एक ‘भर्तृप्रपंच’ द्वारा प्रतिपादित भाष्य है, जिसका उल्लेख स्वयं श्री शंकराचार्य ने भी किया है। देखा जाये तो आदि शंकराचार्य ने भर्तृप्रपंच जी द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त का खंडन किया है। भर्तृप्रपंच के अनुसार, मोक्ष प्राप्ति के लिए ज्ञान और कर्म दोनों का संयोग होना आवश्यक है, जबकि श्री शंकराचार्य विशुद्ध ज्ञान को ही मोक्ष प्राप्ति का साधन मानते हैं। इस विषय में एकायन सम्प्रदाय एवं उपनिषदों की व्याख्या में भी भेद है। एकायन मतानुसार आत्मा-परमात्मा का ही अंश है और इस प्रकार वह पूर्णरूपेण उसी पर आश्रित है, जबकि उपनिषद आत्मा व परमात्मा (ब्रह्म) के ऐक्य का निरूपण करते हैं। गीता में भी यह बात स्पष्ट रूप से बताई गई है, जब योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं कि जीव परमेश्वर का ही सनातन अंश है। वे जीव की ईश्वर में शरणागति की बात करते हैं और कहते हैं कि एक परमात्मा के आश्रय में ही उसका कल्याण निहित है।

‘मामेकं शरणं ब्रजः’

गीतानुसार, ईशभक्ति मुक्तिमार्ग का प्रमुख साधन है। यहाँ तक कि गीता के अनुसार, भक्तिहीन कर्म व्यर्थ होता है और इसी प्रकार भक्तिहीन ज्ञान भी शुष्क और नीरस होता है। एकायन पंथी प्रकृति को परमेश्वर के अधीन मानते हैं, जबकि उपनिषद प्रकृति को मिथ्या करार देते हैं क्योंकि उपनिषदों के अनुसार, ज्ञानी के लिए प्रकृति का अस्तित्व नहीं है। एकायन मत के अनुसार, ज्ञानी प्रकृति के खेल को साक्ष्य बनकर देखता रहता है। कुछ हद तक एकायन के सिद्धांतों का गीता भी प्रतिपादन करती है। इसे देखते हुए ऐसा लगता है कि गीता भी आदि शंकराचार्य के सिद्धांतों का पूर्णरूपेण समर्थन नहीं करती, जो आदि शंकराचार्य के स्वतंत्रा चिंतन का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

गीता भाष्य में श्री शंकर के अपने कतिपय विचार बिन्दु हैं जो मान्य वेदान्तिक सिद्धांतों से मेल नहीं खाते। इन्हें द्वैत एवं अद्वैत सिद्धांतों को मानने वाले यानि दोनों ही पक्ष अपने-अपने समर्थन में मान सकते हैं। यही बात कुछ हद तक गीता के साथ भी है, जिसमें कई ऐसे श्लोक हैं, जिनमें दोनों ही पक्षों का समर्थन परिलक्षित होता है। जहाँ तक श्रीशंकर का प्रश्न है, वे दृढ़ता के साथ मानते हैं कि बिना विशुद्ध ज्ञान के मोक्ष पाना असंभव है। इस विषय में गीता का यह श्लोक विशेषकर उल्लेखनीय है-

न योगेन, न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया
ब्रह्मात्मकबोधेन मोक्षः सिद्धयति नान्यथा।

- सीए. ओ.पी. पारीक

श्रृंखला 41: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 01-Jun-2015

जैसा कि हम जानते हैं, वेदान्त के तीन प्रमुख स्रोत हैं- पहला सारे उपनिषादि, दूसरा वेद व्यास द्वारा रचित ‘ब्रह्मसूत्र’ और तीसरा गीता। इन तीनों के आधार पर ही वेदान्त साहित्य की रचना हुई। अनेक विद्वानों, दार्शनिकों एवं धर्म-प्रवर्तकों ने इन पर भाष्य लिखे। इन भाष्यों का महत्व इसलिए भी है कि इन मूल ग्रंथों के सिद्धांतों की व्याख्या कर इन विद्वानों ने इन में प्रतिपादित विचारों का प्रचार एवं पुष्टि अपने-अपने ढंग से की। इन तीनों में गीता का विशेष महत्व है क्योंकि यह माना गया कि गीता स्वयं श्रीकृष्ण की वाणी में उपनिषदों एवं वेद के मूल तत्वों पर आधारित अद्भुत संदेश है। चूँकि हिन्दुओं ने श्रीकृष्ण को ईश्वर का अवतार माना है, इसलिए इसका महत्व और भी अधिक है।

विचारणीय है कि गीता का स्वतंत्र और गहन अध्ययन कम हुआ है, हालांकि कतिपय विद्वानों और महात्माओं ने इस पर टीका और भाष्य लिखे हैं। मजे की बात है कि गीता के इन टीकाकारों में अच्छा-खासा मत वैभिन्य है, जो कि स्वाभाविक है। इसका कारण है गीता का अर्थ समझना भी एक दुष्कर काम है, जो साधारण जन के वश का नहीं है, फिर भी इन विद्वानों ने अपने ढंग से गुत्थी को सुलझाने की चेष्टा की है। इसी भाष्य परम्परा में आदि शंकराचार्य जी का भाष्य एक मील का पत्थर कहा जा सकता है।

गीता जैसे अतुलनीय ग्रंथ को बुद्धिगम्य बनाने की शंकर की चेष्टा कहाँ तक सफल रही है, यह तो विद्वत्समाज ही बता सकता है, पर मेरी अल्पबुद्धि के अनुसार इस प्रखर ज्ञानी ने जिस प्रकार गीता की टीका की है, वह उनके अद्वैत के सिद्धान्त को कुछ हद तक प्रतिष्ठित करती प्रतीत होती है, मगर गहराई से विश्लेषण करें तो गीता शंकर के सिद्धांतों का भी पूर्णतया समर्थन नहीं करती। गीता में ऐसे कई श्लोक हैं, जिन्हें आवश्यकतानुसार द्वैत और अद्वैत- दोनों का प्रमाण बनाया जा सकता है।

वैसे देखा जाए तो शंकर के सिद्धान्त का सही प्रतिपादन तो ब्रह्मसूत्र में किया गया है, परन्तु गीता भाष्य में भी यह स्पष्ट दिखाई देता है। संक्षेप में, यह सिद्धांत मानता है कि निष्काम भाव से स्वकर्म में प्रवृत्त होकर चित्त की शुद्धि करनी चाहिए। चित्त शुद्ध नहीं होगा तो जिज्ञासा नहीं होगी। बिना जिज्ञासा के मोक्ष की इच्छा नहीं हो पाएगी। इस इच्छा के जागृत होने पर विवेक का उदय होगा। यहाँ विवेक का अर्थ है नित्य और अनित्य वस्तु में भेद करना और इसे समझना। संसार के सभी पदार्थ अनित्य हैं। केवल आत्मा नित्य है। इस बात का अनुभव होने से वैराग्य उत्पन्न होता है। लोक-परलोक के सुखों और भोगों के प्रति विरक्ति जब तक पूर्णतया नहीं हो जाती, वैराग्य की स्थिति नहीं आती। शंकर के सिद्धांत के अनुसार मोक्ष का पहला कारण ‘ज्ञान’ होता है जो कि शम-दम-तितिक्षा और कर्म के त्याग से आता है। शंकर का दृढ़ विश्वास है कि बिना इस विशुद्ध ज्ञान के मोक्ष प्राप्ति संभव नहीं है।

अनेक विद्वान शंकर को मायावादी बताते हैं, परन्तु यह न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने माया का कभी प्रतिपादन नहीं किया, बल्कि ब्रह्म और माया के भेद की गुत्थी को सुलझाने की कोशिश अवश्य की है। आदि शंकराचार्य निवृत्ति मार्ग के उपदेष्टा हैं और गीता भाष्य में उन्होंने भगवद्गीता को निवृत्ति मार्ग का प्रतिपादक ग्रंथ माना है। शंकर के मतानुसार मोक्ष के लिए संन्यास (भोगों के प्रति विरक्ति और ज्ञान की साधना) आवश्यक है, यानि श्रीरामकृष्ण परमहंस की भाँति संसार में रहते हुए भी सांसारिक भोग-विलास और कामना आदि से पूर्णतया निर्लिप्त हो जाना है।

मेरी राय में गीताभाष्य में भी शंकर ने इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। इसमें कोई संशय नहीं कि आदि शंकराचार्य एक ज्ञानमार्गी दार्शनिक थे और इस क्षेत्र में पूरे विश्व इतिहास में उन जैसा कोई दूसरा ज्ञानी दार्शनिक नहीं मिलता। उनके गीताभाष्य का सार मोक्ष साधन में निहित है और उस मोक्ष का स्वरूप है जीवात्मा परमात्मा की अभिन्नता का ज्ञान, यानि यह समझना कि दोनों एक स्वरूप हैं। इसी ज्ञान का नाम ‘मोक्ष’ है।

न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया।
ब्रह्मात्मकबोधेन मोक्षः सिद्धति नान्यथा।।

श्रृंखला 40: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 07-May-2015

वर्तमान समय में हम देशवासी अपने महान संतों और महापुरुषों को भूलते जा रहे हैं। 23 अप्रैल 2015 को आदिशंकराचार्य की जयंती थी, परन्तु राष्ट्रीय मीडिया में विश्व की इस महान विभूति के विषय में कोई चर्चा नहीं थी। बहरहाल, शंकर की कीर्ति उनके आध्यात्मिक दर्शन में सदैव अक्षुण्ण रहेगी। शंकर किसी भी महान विचारक यानि कान्ट, प्लेटो, शाॅपेनआवर, एक्विना या सुकरात के सामने इक्कीस ठहरते हैं। 32 वर्ष के अल्प जीवनकाल में शंकर ने जो काम किया है, वह अद्भुत और बेमिसाल कहा जाएगा। वे एक विद्वान, कवि, विचारक और संत के सम्मिलित व्यक्तित्व थे, जिनके लिए कहा जा सकता है कि ‘न भूतो न भविष्यति’।

पिछली कतिपय कडि़यों में हम शंकर द्वारा रचित अनेक आध्यात्मिक, दार्शनिक ग्रंथों की चर्चा करते आ रहे हैं। अगर गौर करें तो उनका समस्त दर्शन उपनिषदों में निष्पादित ‘वेदान्त’ के सिद्धान्त पर आधारित कहा जा सकता है। वेदान्त के मायने हैं- ‘वेदों का अन्त’। संक्षेप में कहा जाये तो इसका सार है- ‘ईश्वर (ब्रह्म) व आत्मा एक हैं।’ शंकर ने ब्रह्मसूत्र के भाष्य में इसे और भी अच्छे से प्रतिपादित किया है।

गौरतलब है कि शंकर के समक्ष बहुदेववाद तो फिर भी क्षम्य था, परन्तु नास्तिकवाद व सांख्य सिद्धान्त कतई मंजूर नहीं था। वे जब संन्यासी बने, उस समय वे शिव, विष्णु, ब्रह्मा आदिशक्ति आदि अनेक देवताओं की पूजा-अर्चना करते थे जो हिन्दू धर्म में ईश्वर के रूप में मान्य हैं, परन्तु बाद में उपनिषदों के अध्ययन से उनके हृदय में अद्वैत का उदय हुआ एवं अद्वैत ही उनके दर्शन का सर्वोपरि सिद्धान्त बन गया।

दिलचस्प बात है कि वे जब सुदूर दक्षिण से उत्तर भारत आये तो यहाँ के विद्वत समाज में उनके प्रति घोर आशंका रही परन्तु अपने बनारस प्रवास के दौरान उन्होंने सहज ही वहाँ के पंडितों और दार्शनिकों में अपना सिक्का जमा लिया। इस दौरान बनारस में उन्हें अनेक शिष्यों ने गुरु रूप में अपनाया। कहा जाता है बनारस प्रवास के दौरान ही उन्होंने उपनिषदों पर विस्तृत टीकाएँ लिखीं। इनका ‘गीता भाष्य’ भी संभवतः बनारस में ही लिखा गया था।

शंकर भारतवर्ष के समस्त धार्मिक व आध्यात्मिक वांड्गमय के प्रबद्ध ज्ञाता थे और यही वजह थी कि उन्होंने इनके विषय में एक खोजी की तरह अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर प्रमाण खोजे। शंकर यह नहीं मानते थे कि कार्य के पीछे ‘कारण’ का होना जरूरी है। उनके अनुसार, क्या हमने ‘कारण’ की महत्ता, उसकी भूमिका, स्पष्टता और विश्वसनीयता को जरूरत से अधिक नहीं तूल दिया है। इसलिए हमें बजाय तर्क के एक ऐसी ‘अंतर्दृष्टि’ की जरूरत है जो हमें बेमतलब की बातों से हटाकर आवश्यक ज्ञान का बोध करा सके, अर्थात् ‘शाश्वत’ ना कि नश्वर या लौकिक। दूसरे शब्दों में, एक ऐसा आत्मबोध जो अवशेष में से ही ‘पूर्ण’ को पा सके। इसे शंकर के दर्शन की पहली शर्त कहा जा सकता है।

दूसरी उल्लेखनीय बात अवलोकन की है, अर्थात् हम ऐसे देख सकें, जिसमें पड़ताल और सोच के माध्यम से विषय वस्तु की समझ हो सके, ना कि कोई उपलब्धि, ध्न या सत्ता कामना हो।

तीसरी सबसे जरूरी बात है कि दार्शनिक को अपनी साधना में संयम, धीरज और सुकून से काम लेना होगा, इसे भौतिक आकर्षणों से ऊपर उठकर साधना करनी होगी। उसे अपने आत्मिक परमानन्द के भाव से ब्रह्मलीन होना होगा, ताकि ब्रह्म की अनन्त सत्ता से ‘एक’ हो सके। इस प्रकार ऐसे साधक के लिए तर्क या कारण जरूरी नहीं है।

- सीए. ओ.पी. पारीक

श्रृंखला 39: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 01-Apr-2015

कतिपय विद्वानों का मत है कि इसकी रचना शंकर के द्वारा नहीं की गई है क्योंकि इस की कवितावली शंकर द्वारा रचित ‘उपदेश सहरसी’ से बिल्कुल भिन्न प्रतीत होती है, जो कि वास्तव में शंकर ने ही लिखी है। एक और तर्क दिया जाता है कि विवेक चूड़ामणि में ‘निर्विकल्प समाधि’ के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया गया है जबकि शंकराचार्य के अन्य दार्शनिक ग्रंथों में ‘समाधि’ का प्रयोग नगण्य है। पाश्चात्य विद्वान कोमान्स के अनुसार, सम्भवतः ‘विवेक चूड़ामणि’ के रचयिता श्रृंगेरीपीठ के शंकरोत्तर (शंकर के बाद के) कोई अन्य पीठाधीश शंकराचार्य रहे होंगे। लेकिन एक अन्य विद्वान एन्स्टन के अनुसार, शंकर द्वारा रचित अन्य दार्शनिक ग्रंथों की भाँति विवेक चूड़ामणि के मूल में भी वही वेदान्तिक भाव झलकता है, जो शंकर की विशेषता है, बल्कि यह कुछ हद तक ‘योग वशिष्ठ’ से मिलता-जुलता दर्शन है।

जहाँ तक इन विद्वानों के मत-मतान्तर का प्रश्न है, प्रोफेसर जाॅन ग्राइम्स के विचार इस सम्बन्ध में अधिक संतुलित एवं ग्राह्य हैं। ग्राइम्स के अनुसार, विवेक चूड़ामणि वस्तुतः शंकर की ही रचना है, परन्तु यह कई मायनों में अन्य रचनाओं से अलग जान पड़ती है। ग्राइम्स के अनुसार, यह जरूरी नहीं कि ‘प्रकारणा’ प्रबन्ध और भाष्य दोनों हमेशा एक-दूसरे से मेल खाते हों।

लेखक के विचार से कुल मिलाकर विवेक चूड़ामणि भी शंकर की मूलभूत वेदान्तिक अवधारणा के अनुरूप ही है, अर्थात् कि ब्रह्म ही एकमात्र ध्रुव यानि एकमेव है, जिसमें अन्य या दूसरा कुछ भी नहीं है और यह उसकी एकात्मता है जो ‘स्व’ और आत्मा के विभेद का परिच्छेदन करता है, यानि स्वयंभू (आत्मलीन) है। इसी में यह सत्य भी छुपा है कि जो बहु-आयामी जगत हम देख रहे हैं, वह सब मिथ्या है। ब्रह्म ही एकमात्र यथार्थ इसकी प्रकृति ‘सत्यम-ज्ञानम-अनन्तम’ कही जा सकती है। इस प्रकार निष्काम कर्म ही मन को परिशुद्ध कर इस काबिल बनाते हैं कि वह आत्मज्ञान ग्रहण कर सके और जो अज्ञान (अविद्या) है, वही सांसारिक बंधन का मूल कारण है। आत्मज्ञान ही मुक्ति का एकमात्र साधन है और यह मुक्ति अथवा मोक्ष तब तक प्राप्य नहीं है, जब तक मानव इस एकात्मता ‘ब्रह्मतेमकत्वबोधम्’ का ज्ञान नहीं हासिल कर ले।

इस तमाम विवाद का पटाक्षेप करते हुए स्वामी दयानंद जी ने कहा कि ‘मैं नहीं समझता कि ‘विवेक चूड़ामणि’ का रचनाकार शंकर ना होकर कोई और भी होता तो इससे कुछ विशेष अन्तर नहीं पड़ता क्योंकि फिर भी यह एक महान कृति मानी जाएगी।

- सीए. ओ.पी. पारीक

श्रृंखला 38: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 03-Mar-2015

वेदान्तिक दर्शन की पराकाष्ठा स्व-विवेक या ‘स्व’ द्वारा मुक्ति यानि ‘मोक्ष’ में निहित है। यह परमपद भगवत्कृपा या गुरू के मार्गदर्शन से प्राप्य है। यह ब्रह्म में एकाकार होना है, जिसे आत्म-ब्रह्म कहा गया है। इस अद्वैत की जो व्याख्या शंकर के यहाँ मिलती है, अन्यत्र नहीं। उनके अनुसार एकम् ब्रह्म एक धु्रव सत्य है, क्योंकि ‘अद्वैत’ कहता है कि सिर्फ एक का ही वजूद है, अन्य सब कुछ उस पर एक पर ही चढ़ी परतें मात्र है। यह जो ‘स्व’ (Self) है, वही एकमात्र स्थिर शुद्ध चेतना है, अन्य सभी कुछ निरंतर घटित हो रहे बदलाव अवास्तविक हैं। सार रूप में समझें तो हमारी मूल प्रकृति या कहें कि सारे ब्रह्माण्ड की प्रवृत्ति ज्ञान-आधारित अस्तित्व (आत्मतत्व) है, जिसे ‘सत्चित् आनन्द’ कहा गया है।

मुक्ति के विषय में शंकर ‘विवेक चूड़ामणी’ के एक श्लोक में कहते हैं- ‘तुम्हीं वास्तव में ‘सर्वोच्च स्वयंभू’ हो लेकिन अज्ञान की संगत से तुम इस निरात्म (Not Self) के बंधन में पड़े हुए हो, जोकि इस जीवन-मरण-चक्र का मुख्य कारण है। अज्ञान से उपजे समस्त प्रभाव (जड़ें, शाखाएँ आदि) ज्ञानाग्नि पड़ने पर तब भस्म हो जाते हैं, जब आप इस ‘स्व’ और ‘निरात्म’ में भेद कर पाते हो।’ (विवेक चूड़ामणी सूत्र 47)

आगे चलकर शंकर कहते हैं- ‘मात्र शास्त्र-ज्ञान से किसी व्यक्ति की मुक्ति सम्भव नहीं है, चाहे उसने कितना भी वेदान्त-अध्ययन किया होगा, जब तक वह अपनी देह और इन्द्रियों के साथ मिथ्या सम्बन्ध को अपनी पहचान मानता रहेगा, जो कि नितान्त अवास्तविक है।’ (विवेक चूड़ामणी सूत्र 162)

मैंने ये दोनों सूत्र इसलिए उद्धृत किए हैं क्योंकि मेरी राय में शंकर के अद्वैत दर्शन का सार तत्व, मानो इन दोनों सूत्रों में समा गया है। इनमें शंकर ने ‘स्व’ की झूठी पहचान को इस संसार का मूल कारण बताया है, अर्थात् अगर हम आत्मचिन्तन द्वारा दैहिक अस्तित्व तथा आत्मिक ब्रह्म को एक समझने की भूल को हटा दें तो हमारी मुक्ति सम्भव है, अन्यथा नहीं।

श्री शंकर द्वारा रचित विवेक चूड़ामणी भाष्य एक ना होकर वेदान्त अध्यात्म का एक अद्भुत काव्य कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। ‘विवेक चूड़ामणी’ का शाब्दिक अर्थ है विवेकमय मणियुक्त रत्नाभूषण और यह वास्तव में शंकर का विश्व को दिया गया आत्मज्ञानरूपी आभूषणों का उपहार है। इसके पद्य संस्कृत भाषा की एक ऐसी सुन्दर काव्य कृति है, जिसे पढ़कर, बार-बार पढ़ने का मन करेगा और अगर आत्मसात् कर सकें तो आपकी मुक्ति (मोक्ष) का प्रथ प्रशस्त होगा।

- सीए. ओ.पी. पारीक

श्रृंखला 37: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 11-Feb-2015

वेदान्त के तमाम उपदेशों में गीता सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृति मानी गई है। इसी कारण वेदान्त के महान आचार्य शंकर ने इस पर अर्थपूर्ण टीका या भाष्य की रचना की, जिसमें उन्होंने इसकी व्याख्या करने का प्रयास किया। यह टीका संस्कृत भाषा में है, परन्तु इसका अनुवाद अंग्रेजी एवं अन्य अनेक भाषाओं में हुआ है। इन अनुवादों में सर्वोत्तम अनुवाद श्री अलादी महादेव शास्त्रीजी का माना जाता है, जिन्होंने गीता भाष्य के अलावा अन्य अनेक ग्रंथों का अंग्रेजी अनुवाद किया, जैसे- तैत्तिरीय उपनिषद, अमृत बिन्दु, दक्षिण मूर्ति स्तोत्र, प्रणव वर्तिक आदि अनेक ग्रंथ हैं।

गीता भाष्य के आरम्भ में ही दूसरे अध्याय में शंकर ने ‘सांख्य योग’ की अपने ढंग से मौलिक व्याख्या की है। उनकी विवेचनानुसार कृष्ण अर्जुन की कमजोरियों की भत्र्सना करते हुए यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि सिर्फ आत्मज्ञान द्वारा ही विपत्तिजनक दुःख को दूर किया जा सकता है। उन्होंने सांख्य और योग के अन्तर को भी आत्मज्ञान और कर्म के संदर्भों से जोड़कर समझाया है। उनके अनुसार, ज्ञान एवं कर्म की संयुक्ति से ही संताप नष्ट हो सकते हैं। स्थैर्य के लिए प्रज्ञा व विवेक आवश्यक है। आत्मतत्व सर्वदा निर्विकार व अपरिवर्तनीय है। वह वास्तविक एवं अवास्तविक में भेद नहीं करता क्योंकि कर्म के विषय में उसका कोई सरोकार नहीं है। प्रज्ञावान को कर्म से संन्यास लेना ही होगा। प्रज्ञावान के लिए तो ज्ञानयोग ही मार्ग है। उसके लिए दुःखों का कोई मतलब नहीं होता, क्योंकि वह सदैव आत्मा में रमता है, जबकि सांसारिक व्यक्ति के लिए आत्मज्ञान की उच्च स्थिति में जा पाना लगभग असम्भव है। उसके लिए ज्ञान द्वारा कर्म का साधन श्रेष्ठ है। उसे कर्मानुसार फल भी व्याप्य है। इस प्रकार एक सांसारिक को कर्मयोग का साधन करना उत्तम है। गीता द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त के आधार पर ही शंकराचार्य ने मनीषियों के लिए निम्न सात विशेषताएँ बताई हैं-

1. आत्मतुष्टि, 2. शांतचित्त यानि चित्त का स्थैर्य, 3. किसी भी वस्तु (लभ्य या अलभ्य) में लगाव का न होना, 4. इन्द्रियाकर्षण से मुक्त रहना अथवा इन्द्रिय सुखों में अनासक्ति, 5. भगवद्भक्ति के साथ-साथ वैचारिक रूप से जितेन्द्रिय होना, 6. समस्त ब्रह्माण्ड को एक स्वप्नवत् अवस्था की भाँति समझना, 7. व्यक्तिपरक इच्छाओं को वश में रखना।

श्रृंखला 36: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 01-Jan-2015

कालान्तर में शंकर के पारम्परिक अद्वैत के विषय में पूरब एवं पश्चिम के अनेक विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से व्याख्यायित करने की प्रचेष्टा की है। विशेषकर ‘जीवन मुक्ति’ के सिद्धान्त पर भी अच्छी खासी गवेषणा हुई है। आधुनिक संतों में श्री रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि रमण और कांची के शंकराचार्य श्री चन्द्रशेखर सरस्वती आदि ने इसे अपने-अपने ढंग से एक अलग परिप्रेक्ष्य से समझाने की कोशिश की है।

पश्चिम के कुछ विद्वानों ने भी अद्वैत के ‘जीवन मुक्ति’ सिद्धान्त पर विश्लेषणात्मक ग्रंथ लिखे हैं, जिनमें लान्स नेल्सन लिखित ग्रंथ का ‘हिन्दू-चिन्तन’ में ‘जीवनमुक्ति धारणा’ तथा जे.एस. स्प्रोकोफ द्वारा लिखी पुस्तक प्रमुख है। 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में अनेक अमेरिकी विद्वान शंकर के अद्वैत, गीता भाष्य और अन्य वेदान्तिक विचारों से प्रभावित हुए एवं उन्होंने इन पर विश्लेषणात्मक सामग्री प्रकाशित की। विचारणीय है कि शंकर के दर्शन ने एक पूरे विद्वत्समाज को अद्वैत और जीवनमुक्ति के विषय में सोचने व समझने के लिए प्रेरित किया, जो देश काल की सीमाओं में भी आबद्ध नहीं हो सका। इस प्रकार उनका यह ‘मोक्ष’ का सिद्धांत एक ऐसा मानवीय प्रकल्प बन चुका है, जिससे मानवता के सोच के क्षितिज को अतिशय विस्तार मिला है।

जैसे कि 20वीं सदी में इस भारतीय दर्शन पर हमारे से भी कहीं अधिक काम पश्चिम के विद्वानों ने किया। मसलन, फ्रांसिस एक्स क्लूनी ने अपने ग्रंथ थियोलाॅजी आफ्टर वेदान्ता में लिखा कि उपनिषद मानवता के लिए ज्ञान के ऐसे स्रोत हैं, जो परमसत्य जानने की कुंजी कहे जा सकते हैं तथा ये वेदों (उपनिषद) के व्यक्तिगत अनुभव तथा तर्क से कहीं अधिक प्रामाणिक हैं। क्लूनी ने चेतावनी देते हुए लिखा कि इनको पढ़ने वाला व्यक्ति स्वयं इसका पात्र होना चाहिए, तभी इन्हें पढ़ने-समझने का अधिकारी है, अन्यथा नहीं।

अब आप समझ गए होंगे कि मोक्ष का सिद्धान्त या अवधारणा शंकर के दर्शन में कितना महत्वपूर्ण है।

- सीए. ओ.पी. पारीक

श्रृंखला 35: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 30-Nov-2014

शंकर के मतानुसार निर्गुण ब्रह्म ही सभी उपनिषदों का मुख्य विषय है। सारी श्रुतियाँ इसी निर्गुण ब्रह्म का प्रतिपादन करती लगती हैं। आदिशंकराचार्य के अनुसार सगुण ब्रह्म तो ‘माया विशिष्ट’ है, अर्थात् इस संसार की भाँति मायिक सत्ता से युक्त है। जहाँ तक परमार्थिक सत्ता का सवाल है, इसके अन्तर्गत निर्गुण ब्रह्म ही प्रधान है। आचार्य ने निर्गुण ब्रह्म के स्वरूप के लिए दो प्रकार के लक्षणों का निर्धारण किया। एक तो स्वरूप लक्षण और दूसरा तटस्थ लक्षण। शंकराचार्य ने ब्रह्म के संदर्भ में ‘सत्य’, ‘ज्ञान’ एवं ‘अनन्त’ इन तीन शब्दों की विशद व्याख्या की है। उनके अनुसार यदि ब्रह्म को आप कत्र्ता मानते हैं तो पाएंगे कि ज्ञान की पूरी प्रक्रिया में ‘ज्ञाता’, ‘ज्ञेय’ तथा ‘ज्ञान’- तीनों ही सदैव विद्यमान हैं। इन तीनों का योग ‘त्रिपुटि’ कहलाया। शंकर के दर्शन में यह ब्रह्म ही ‘सत्’ (सत्ता), ‘चित्’ (ज्ञान) और आनन्द अर्थात् सच्चिदानन्द है क्योंकि यही उसके स्वरूप लक्षण हैं। गौरतलब है कि माया विच्छिन्न होने के कारण यही ब्रह्म बाद में सगुण स्वरूप धारण कर अपर ब्रह्म अथवा ईश्वर कहलाता है।

शंकर के अनुसार, यह ब्रह्म सजातीय, विजातीय एवं स्वगत आदि विभेदों से रहित होकर एकरूप, एकरस, अखण्ड, अद्वैत या सच्चिदानन्द है। शंकर के निर्गुण ब्रह्म एवं सगुण ब्रह्म काफी हद तक कबीर के सगुण व निर्गुण ब्रह्म के समकक्ष हैं। यह भी आश्चर्य का विषय है कि निर्गुण ब्रह्म को प्रधान मानते हुए भी शंकर ने मंदिरों और मठों की स्थापना कर उनमें प्रतिष्ठित विग्रहों की पूजा-पाठ आदि कर्मकाण्डों को अंजाम दिया क्योंकि सम्भवतः सनातन धर्म के पुनर्रुत्थान के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ा।

माया- ‘माया’ का सिद्धांत हिन्दू दर्शन के लिए नई बात नहीं है। अनेक हिन्दू ऋषियों और संतों ने अपने-अपने ढंग से माया के विषय में व्याख्या की। उदाहरणार्थ, कबीर ने लिखा- ‘माया बहुत ठगिनि मैं जानी।’ इसके अतिरिक्त उपनिषद, गीता, वेदान्तिक आदि ग्रंथों में अस्फुट रूप से ‘मायावाद’ का उल्लेख आता है, जिसके आधार पर शंकर ने अपने मायावाद सिद्धांत का प्रतिपादन किया होगा।

आचार्य के अनुसार, ‘माया’ ही अविद्या और अज्ञान है जो हमारी प्रकृति में अन्तर्निहित होकर उस परम सत्य को ढक लेती है, जिसके परिणामस्वरूप हम सांसारिक कर्मों में आबद्ध हो जाते हैं और आत्मज्ञान से विस्मृत हो जाते हैं। अगर ‘ब्रह्म’ अर्थात् परम सत्य को जानना है तो निश्चय ही हमें माया से मुक्त होना आवश्यक है क्योंकि माया ना तो ‘सत्’ है और ना ही ‘असत्’। इसलिए माया को अनिवर्चनीय कहा गया है। जिस प्रकार सूर्योदय होने पर स्वयमेव अंधकार की निवृत्ति हो जाती है, उसी प्रकार ज्ञानोदय होने पर माया का भ्रमजाल भी समाप्त हो जाता है। शंकर के ही शब्दों में, ‘‘निर्विशेष, निर्लक्षण ब्रह्म से सविशेष और सलक्षण जगत की उत्पत्ति कैसे हुई। एक ही ब्रह्म से इस ब्रह्माण्ड के अनेक जगतों की सृष्टि किस प्रकार हुई? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए माया के स्वरूप को जानना नितान्त आवश्यक है।’’ (ब्रह्मसूत्र - शंकर भाष्य 1/4/3)

- सीए. ओ.पी. पारीक

श्रृंखला 34: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 29-Oct-2014

शंकर ने उपनिषद्, भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र पर विस्तार से भाष्य लिखे हैं। इसके अतिरिक्त उनके जीवन और लेखन दोनों में ‘शास्त्रार्थ’ की प्रवृत्ति साफ झलकती है। वे सांख्य, बौद्ध, जैन, वैशेषिका एवं अन्य अ-वेदान्तिक हिन्दू दर्शन का पुरजोर खण्डन करते हैं। उनके लेखन को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं- भाष्य (टीका), प्रकरण ग्रंथ (विवेचना) और स्तोत्र (भक्ति ऋचाएँ)। इनमें ‘भज गोविन्दम्’ स्तोत्र की श्रेणी में आता है। वे भगवद्गीता और उपनिषद् सम्बन्धित भाष्यों में इन ग्रंथों की विश्लेषणात्मक व्याख्या करते नजर आते हैं जो कि उनके वेदान्तिक दर्शन की पुष्टि करती लगती है। शंकर की सबसे पुरानी टीका ‘ब्रह्मसूत्र’ है, जो अब अपने मूलरूप में उपलब्ध नहीं है। उनकी भक्ति रचनाएँ स्तोत्र के रूप में हैं, जिन्हें गाया भी जा सकता है। ये सब संस्कृत कविता के उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जैसे कि ‘सौन्दर्य लहरी’ एवं ‘भज गोविन्दम्’ आदि।

टीका के अतिरिक्त ‘ब्रह्मसूत्र’ पर उनका भाष्य भी अनूठा है क्योंकि इसमें वे ‘धर्मव्याधा’ एवं विदुर आदि के बारे में कुछ दिलचस्प ज्ञान देते हैं। उनके अनुसार इन्हें जो ब्रह्मज्ञान था, वह पूर्वजन्मों से चला आ रहा था और इसका प्रभाव वर्तमान जीवन में नहीं हटाया जा सकता। जो ज्ञान वेदों के अध्ययन से प्राप्त होता है, वही ज्ञान ‘पुराणों’ और इतिहास से भी पाया जा सकता है। तैत्तिरिय उपनिषद् के भाष्य में शंकर लिखते हैं-

सर्वसमसाधिकारो विद्यायाम साः श्रेयः केवल्य विद्यायो वेति सिद्धम् अर्थात् (ब्रह्म) ज्ञान पाने का अधिकार हर किसी को है क्योंकि जीवन का सर्वोपरि उद्देश्य ज्ञान द्वारा ही प्राप्य होता है।

शंकर ने महसूस किया कि तत्कालीन हिन्दू समाज विभिन्न मतों, पंथों एवं नवीन धर्मों (बौद्ध, जैन) के चक्कर में पूरी तरह बँट चुका था। वे सनातनधर्म के पुनरुत्थान के लिए इस विभाजित समाज में एकीकरण लाना चाहते थे, अतएव उन्होंने ‘पंचरत्नम्’ नामक सुन्दर स्तोत्रों की रचना की, जिनमें पंचेश्वरों यानि शिव, विष्णु, शक्ति, गणेश एवं आदित्य (सूर्य) की अभ्यर्थना की गई। देखने में सहज लगने वाली शंकर की यह सोच कितनी बुद्धिमत्तापूर्ण थी, इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है, अर्थात् इन पाँचों देवताओं में जिसके प्रति भी आपकी श्रद्धा-आस्था है, उसी की मूर्ति मध्य में रखकर आप सम्बन्धित सूत्र का पाठ कर सकते हैं। जैसे- आप शिवभक्त हैं तो शिव को बीच में स्थापित करके शिव पंचरत्न स्तोत्र का पाठ करेंगे और बाकी चार देवता, उनकी दाहिने ओर दो और बाएँ ओर दो विराजमान होंगे। इस प्रकार कितनी समझदारी से शंकर ने हिन्दुओं में धार्मिक एकता स्थापित करने का काम कर दिखाया। अगले अंक में हम शंकर के ‘ज्ञानयोग’ सम्बन्धित विचारों पर चर्चा करेंगे।

श्रृंखला 33: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 01-Oct-2014

इस लेख में हम ‘भज गोविन्दम्’ के कतिपय विशिष्ट श्लोकों पर चर्चा करेंगे। इसी संदर्भ में प्रस्तुत है यह श्लोक-

अंगं गलितं पलितं मुण्डम्, दशनविहिनं जातं तुण्डम्।
वृद्धो याति गृहित्वा दण्डम्, तदपि न मुंचत्याशापिण्डम्।।

उपरोक्त श्लोक ‘भज गोविन्दम्’ ग्रंथ का 15वाँ श्लोक है और इसका भावार्थ इस प्रकार है- ‘शरीर गलने लग गया है यानि सारी त्वचा में झुर्रियाँ पड़ने लगी हैं। सिर के बाल पक गए हैं। मुँह के सब दाँत गिर चुके हैं, फिर भी मानव आशा-तृष्णा को नहीं छोड़ता।’

इस श्लोक में शंकर मनुष्य की चिर-कामना प्रवृत्ति की आलोचना कर रहे हैं। वे कहते हैं कि शारीरिक रूप से सर्वांग रूपेण जर्जर होने के बावजूद मनुष्य की कामना यानि भोग करने की प्रवृत्ति खत्म नहीं हो पाती। शंकर ने अपने इस विचार को बड़े काव्यात्मक रूप से वर्णित किया है कि किस प्रकार वृद्धावस्था में शरीर परिक्लान्त होकर ढीला पड़ जाता है, बाल सफेद हो जाते हैं, दाँत सब गिर जाते हैं और यह बूढ़ा व्यक्ति एक लकुटी के बल पर चल पाता है परन्तु फिर भी आशाओं की गठरी का बोझ ढोने को आतुर रहता है। आशाएँ और आकांक्षाएँ उसका पीछा नहीं छोड़तीं, उसे निरन्तर सताती रहती हैं और वह मरते दम तक इनसे मुक्त नहीं हो पाता। मिर्जा गालिब ने क्या खूब कहा है-

‘ख्वाहिशें इतनी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले’

मनुष्य की चिर-प्यासी अतृप्त वासनाएँ हरदम उसके मन को उद्वेलित करती रहती हैं और इस प्रकार वह अपनी बोझिल और उत्पीडि़त वृद्धावस्था में भी एक व्यथित जिंदगी जीने को बाध्य होता है। शंकर मानव को उसकी इस विषम स्थिति का बोध कराते हुए उसे यह उपदेश देते हैं कि वह वृद्धावस्था का इंतजार करने के बजाय जवानी से ही ईश्वर को भजे ताकि उस कठिन जीवन संध्या के दौरान मन में सुख-शांति रहे। युवावस्था से ही कामवासनाओं और अन्य भोगों की इच्छा पर नियंत्रण रखा जाये तो वृद्धावस्था के परिपक्व शेष दिन ईश-स्मरण और आन्तरिक संतोष से परिपूर्ण बीतेंगे। वे यह चेतावनी दे रहे हैं कि जैसे-जैसे शरीर पुराना पड़ेगा, दुव्र्यसनों से पाली-पोसी गई कामनाएँ और अधिक तीव्र होती चली जाएंगी। अतएव अभी से यानि समय रहते गोविन्द को भजो।

‘भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, गोविन्दम् भज मूढ़मते’

- सीए. ओ.पी. पारीक

 

श्रृंखला 32: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 01-Sep-2014

शंकर ने अनेक ग्रंथों की रचना की परन्तु इनमें भी ‘भज गोविन्दम्’ को विशिष्ट कहा जाएगा, क्योंकि यह एक अति लघु ग्रंथ होते हुए भी शंकर-रचित अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसका भी मूल आधार वेदान्त ही है। सबसे अच्छी बात ये है कि इन स्तोत्रों को मधुर स्वर में गाया जा सकता है बल्कि आज भी दक्षिण भारत की कुछ संस्कृत पाठशालाओं में बच्चे इसका गायन करते देखे जा सकते हैं। मधुर लय में भज-गोविन्दम् का गायन एक अतीन्द्रीय अनुभव का भान कराता है।

इसके गायन की यह विशेषता है कि पहले श्लोक की टेक मानकर इसका सहगान किया जाता है, यानि हर श्लोक के बाद सम्मिलित स्वरों में टेक को दोहराया जाता है। ऐसा मानते हैं कि शंकर ने ‘भज गोविन्दम्’ के लिए मूलतः बारह श्लोकों की रचना की थी, जिन्हें हम ‘द्वादश मंजरिका स्तोत्रम्’ के नाम से जानते हैं। इससे उनके शिष्यों को प्रेरणा मिली और शिष्यों ने इस अवसर पर एक-एक श्लोक कहा और इस प्रकार चैदह श्लोक बने, जो कि ‘चतुर्दश मंजरिका’ के नाम से विख्यात हुए। उन्हें सुनने के पश्चात् शंकर ने पुनः चार श्लोकों में सभी सच्चे साधकों को आशीर्वाद दिया। कालान्तर में और कई श्लोक जुड़े और यह छत्तीस श्लोकों का मोह-मुद्गर बन गया, जो देश में काफी लोकप्रिय हुआ। मगर देखा जाए तो शुरू के बारह श्लोक ही शंकर द्वारा रचित मौलित श्लोक कहे जा सकते हैं।

भज गोविन्दम् की गणना भक्ति गीतों में की जाती है और इसकी केवल एक टेक को ही हम प्रार्थना श्लोक कह सकते हैं। अन्य सभी श्लोक शंकर के प्रमुख वेदान्तिक सिद्धान्त का प्रतिपादन करते प्रतीत होते हैं। वास्तव में, इनमें साधकों के लिए अत्यन्त सरल शब्दों में ब्रह्म-प्राप्ति की सहजतम राह सुझाई गई है, जिस पर चलकर वे अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। ध्यान से देखें तो भज गोविन्दम् साधकों के लिए एक चेतावनी का संदेश देता है। स्पष्ट तौर पर यह ग्रंथ उपदेशात्मक है, जिसमें गुरू अपने शिष्यों बल्कि समस्त विश्व को उपदेश दे रहे हैं। ‘भज गोविन्दम्’ में संत-सुलभ कठोरता झलकती है क्योंकि शंकर इसमें भावुकता का आश्रय नहीं लेते बल्कि आत्म-कल्याण हेतु साधक पर कठोर प्रहार करते हैं।

शंकर ने भज गोविन्दम् में गलत जीवन पद्धति अपनाने वालों पर चाबुक जैसा चलाया है कि सही रास्ते पर आ जाओ, गोविन्द को भजो वरना समय कम है और तुम मोह-माया जाल में फँसकर निरंतर मृत्यु की ओर अग्रसर हो रहे हो। शंकर ने ‘भज गोविन्दम्’ के माध्यम से जो बात कही है, उसमें कहीं भी नरमी नहीं बरती है, बल्कि सीधे कठोर प्रहार किया है।

‘भज गोविन्दम्’ एवं अन्य वेदान्त ग्रंथों में मुख्य अन्तर यही है कि भज गोविन्दम् अपने खास अंदाज में दुःखों के कारणों का विश्लेषण करते हुए ब्रह्म प्राप्ति के मार्ग को बताता है, बल्कि यह सिर्फ राह ही नहीं सुझाता, वरन् उसकी बुराइयों और गिरते हुए मानव मूल्यों को भी स्पष्ट करता है। चेतावनी देता है कि अहंकार और वासना की राह पर चलने के भयावह परिणाम अवश्यम्भावी हैं।

श्रृंखला 31: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 01-Aug-2014

आदि शंकराचार्य ने ‘अद्वैत’ के सिद्धांत की जैसी व्याख्या की वह अन्यत्र नहीं मिलती। उन्होंने आत्मा की एकरूपता का प्रतिपादन कर एक अनूठी अद्वैत परम्परा का पोषण किया। ‘ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या’, शंकर के दर्शन का मूल सिद्धांत कहा जा सकता है। शंकर ने जीवन के गूढ़ रहस्यों का वेदान्तिक विवेचन किया। संस्कृत भाषा को लोक सुलभ बनाने में उनका विशेष योगदान था। अपने अत्यल्प जीवन काल में शंकर ने 200 से अधिक स्तोत्रों का सृजन किया। उनकी रचनाएँ दर्शन और साहित्य की अनमोल पूँजी कहीं जाएंगी, जिनमें कविता, वेदान्त, भारतीय दर्शन, विज्ञान, मानववाद एवं आध्यात्मिकता को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया। इस प्रकार शंकर धर्म और दर्शन क्षेत्र के महानतम व्यक्तित्व कहे जा सकते हैं, जिनमें ज्ञान-योग और कर्मयोग का अद्भुत समन्वय मिलता है।

स्वामी विवेकानंद जी के अनुसार, शंकर ने हमें ईश्वर प्रदत्त तीन उपहारों के विषय में ज्ञान दिया और ये हैं-
(1) यह शरीर जिसमें आत्मा का अस्थायी निवास होता है,
(2) प्रभु प्राप्ति की पिपासा,
(3) वह गुरु जो अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारा मार्गदर्शन कर सके।

अगर उपरोक्त तीनों उपहारों को हम सही ढंग से समझ लेते हैं तो हमारे लिये मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। शंकर के अनुसार, ज्ञान मुक्ति का साधन तो अवश्य है परन्तु इसके साथ-साथ कतिपय गुणों का होना भी जरूरी है। उनके अनुसार किताबें ईश्वर को प्राप्त नहीं करा सकतीं, पर वे अज्ञान का नाश अवश्य करती हैं अर्थात् सच्चे आत्मज्ञान के लिये सिर्फ पुस्तकें पर्याप्त नहीं हैं बल्कि प्रभु भक्ति और स्मरण भी जरूरी है। इसी को ध्यान में रखते हुए शंकर ने लिखा- ‘भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भव गोविन्दम् मूढमते।’ शंकर ने अनेक ग्रंथों की रचना की परन्तु इसके साथ-साथ अपने स्वयं के जीवन से हमें यह भी सिखाया कि मुक्ति के लिये भक्ति और कर्मयोग भी आवश्यक है।

शृंखला 30: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 01-Jul-2014

शंकर के अद्वैत-अनुभव के विषय में आपने पिछली दो कडि़यों में पढ़ा। अब हम थोड़ा और आगे बढ़ते हैं। उनका अद्वैत ना तो शुष्क ज्ञान है और ना ही शुष्क तर्क। इसमें ईश-भक्ति का सुन्दर समावेश है। शंकर भक्ति की रसिकता को स्वीकार करते हैं, परन्तु वे कतिपय अन्य विद्वानों (श्रीधर आदि) की भाँति भक्ति को अतिशय मान्यता नहीं देते। शंकर ने वेदान्त के साथ भक्ति का समन्वय एक संतुलित ढंग से करने की चेष्टा की, जबकि अनेक समकालीन संतों (जैसे कि विष्णु स्वामी, रामानुज, निम्बार्क, वल्लभ, मीरा इत्यादि) ने भक्ति को अतिशय उत्कट रूप देने की कोशिश की। अद्वैत के साथ भक्ति का समन्वय शंकर का मौलिक विचार था। कहा जाता है कि वे सम्पूर्ण भारतवर्ष में, एक बार नहीं, तीन बार घूमे लेकिन वे कबीर और मीरा की तरह जन-सन्त नहीं थे क्योंकि वास्तव में शंकर एक महान तत्वज्ञानी थे, जिन्होंने वेदान्त का अध्ययन ही नहीं किया वरन् स्वयं अनुभव किया। वे असाधारण प्रतिभाशाली थे और ‘जीनियस’ आमतौर से सर्वजन आंदोलक नहीं होते। जनता के लिए उनका सर्वप्रिय उद्बोधन (जो आज भी लोकप्रिय है), इस श्लोक में दिखाई देता है-

भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम् मूढ़मते

अद्वैत एवं उपासना का समन्वय शंकर का मौलिक विचार था, जो अद्वैत की उपनिषदात्मक व्याख्या से हटकर है। इसी प्रकार उन्होंने वेदान्त और भक्ति के समन्वय की सोच को अपने ढ़ंग से रखा परन्तु इसमें उन्होंने भक्ति को एक सीमा तक ही मान्यता दी। उन्होंने जगत को मिथ्या बताया और ब्रह्म को ही एकमात्र सत्य बताया। हालांकि उनकी शिक्षाओं में इस सिद्धांत से विरोधाभास भी पाया जाता है, क्योंकि उन्होंने सांसारिक कर्मों के प्रतिपालन आदि पर जोर देते समय उसे ‘माया’ मात्र नहीं माना।

उन्होंने हिन्दू धर्म को ‘आत्मविद्या’ में परिणत करने में अहम भूमिका निभाई। उनके अनुसार आत्मा सभी जीवों में ब्रह्म के अंश-स्वरूप विद्यमान है, यानि वह ब्रह्म से पृथक ना होकर ब्रह्म का ही अंश है। इस सर्वव्याप्त ब्रह्म और अविनाशी आत्मा का संयोग ही मुक्ति का मार्ग है। शंकर का दर्शन दिव्यत्व का दर्शन है जो दिव्यत्व प्राप्ति के सभी मार्गों को अंगीकार करता है। जिस प्रकार अनेक नदियाँ विभिन्न राहों से चलकर अन्ततोगत्वा सागर में लीन होती हैं, उसी तरह आत्माएँ भी ईश्वर में समाहित हो जाती हैं। शंकर का अद्वैत आत्माओं के ऐक्य का सिद्धान्त है, जहाँ शत्रु, मित्र, पापी, दुर्बल, चापलूस, दुष्ट सभी आत्मरूप से ‘एक’ हैं। अपने इस आध्यात्मिक दर्शन का प्रतिपादन कर शंकर ने हिन्दू धर्म को जड़ता से मुक्त किया है और यही उनका महान योगदान है।

- सीए. ओ.पी. पारीक

श्रृंखला 29: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 01-Jun-2014

पिछली कड़ी में हमने श्री शंकर के अद्वैतानुभव आधार पर अद्वैत-सिद्धान्त के विषय में संक्षिप्त जानकारी दी। शंकर दर्शन के विषय में हम यह चर्चा जारी रखते हुए आगे बढ़ते हैं-

हालांकि हमारे अनेक प्राचीन ऋषियों ने स्वानुभव के आधार पर ‘आत्मा’ के अद्वैत पक्ष पर मीमांसाएँ लिखीं। उपनिषद् इस के प्रमाण हैं, परन्तु ये सब साधारण-जन और अद्वैत के नये-नये विद्यार्थियों के समझ के बाहर जान पड़ते हैं। शंकर की टीकाओं में इन सिद्धांत की जटिलताओं को सहज बनाने की कोशिश की गई है। शंकर ने इन सिद्धांत के निहित सत्य को स्पष्ट और ऐक्य रूप से एक साधक के दृष्टिकोण से धु्रव सत्य की तरह पेश करने का सफल प्रयत्न किया।

जैसा कि हम जानते हैं कि अद्वैतवाद आत्मा को ‘एकमात्र’ सच्चाई स्वीकारता है। स्वयं शंकर द्वैत का खण्डन करते हुए कहते हैं, ‘ब्रह्म सत्यम् जगद्मिथ्या।’ लोग आत्मा को विभिन्न ढंग से शब्दों में परिभाषित करते रहे हैं, परन्तु वास्तव में देखा जाए तो आत्म-तत्व अपरिभाषित और अपरिमित है, जिसका कोई भी सटीक वर्णन सम्भव नहीं है, परन्तु फिर भी इनमें सर्वाधिक ग्राह्य जो परिभाषा कही जा सकती है, वो तीन शब्दों में समा सकती है। ये हैं- ‘सत्’, ‘चित्’ और ‘आनन्द’। ‘सत्’ यानि जो सर्वदा विद्यमान, अजन्मा, अजर-अमर तथा समय व विस्तार से परे है। यह सत् सर्वदा वर्तमान है कि जिसका कोई भूत या भविष्यत् नहीं है। ‘चित्’ का अर्थ है- जाज्वल्यमान ज्ञान, जो स्वयं प्रकाशित होकर अपनी ही महिमा से अन्य समस्त वस्तुओं को आलोकित करता है। ‘आनन्द’ उस परम शांति को कहते हैं जो हमारे अन्दर के आत्मन् में विराजती है।

इसी प्रकार तुलनात्मक तौर पर आत्मा को व्याख्यायित करने की कोशिश की गई है, परन्तु सच यह है कि इसकी तुलना करना सम्भव ही नहीं है। यह अतुलनीय है। हमारे शास्त्र भी इसे ‘नेति-नेति’ बताते हैं। फिर भी इसकी निकटतम तुलना एक विशाल महासागर से की गई है, जिसमें अनंत गहराई है परन्तु लहरें बिल्कुल नहीं है यानि पूर्णतया शान्त समुद्र जैसे हो, ऐसी ही कुछ कल्पना की जा सकती है। स्पष्ट है, शब्दों की एक सीमा होती है। शब्द हर स्थिति एवं अनुभव को अक्षरशः नहीं कह सकते। ‘मौन’ और ‘समाधि’ में निहित आध्यात्मिक अनुभव ही आत्मन् को जानने में सक्षम है।

- सीए. ओ.पी. पारीक

श्रृंखला 28: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 01-May-2014

इस श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने शंकर के अद्वैतानुभव की चर्चा आरम्भ की थी और इस संदर्भ में गुरू द्वारा पूछे गये प्रश्न (तुम कौन हो) के उत्तर में उनका कवित्व पद भी उद्धृत किया था। इस उत्तर का उल्लेख उनके द्वारा रचित ‘आत्म शतकम्’ और ‘निर्वाण शतकम्’ में भी किया गया है। इसका सार यह है कि मैं (शंकर) तो सर्वग्य, सर्वव्यापी, अजर-अमर, चिरन्तन आनन्द हूँ। निर्वाण शतकम् में शंकर कहते हैं कि मैं समस्त गुण प्रकृति विहीन हूँ, जो ना तो संसार में संलिप्त है और ना ही इससे मुक्ति में। ये सब पद शंकर की अल्पायु में ही जागृत अद्वैतानुभव को दर्शाते हैं।

देखा जाये तो ‘अद्वैत-दर्शन’ का उल्लेख ‘नासदीय सूक्तम्’ और ‘ऋग्वेद’ में भी मिलता है, जो बाद में जाकर भगवद्गीता में परिपूर्ण रूप से परिलक्षित हुआ। मसलन, गीता के दूसरे अध्याय के 16वें श्लोक में योगेश्वर श्रीकृष्ण कहते हैं-

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि द्रष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।।

अर्थात्- किसी भी हाल में अस्तित्व-रहित अस्तित्व में प्रवेश कर सकता है और ना ही कोई अस्तित्व समूल रूप से मिटाया जा सकता है।

‘अद्वैतिक सिद्धान्त’ के प्रतिपादन में श्री शंकर ने अत्यन्त ज्ञान व विद्वत्तापूर्ण ग्रंथों की रचना की। इनमें से यहाँ ‘प्रस्थान-त्रय’ का उल्लेख करना जरूरी समझता हूँ क्योंकि यह कई मायनों में ‘शंकर-दर्शन’ का एक महत्वपूर्ण सोपान है। इसमें शंकर ने अद्वैत की तीन महान मीमांसाओं के विषय में अत्यन्त सुन्दर विवेचना की है। ये तीन हैं- ब्रह्मसूत्र, दशोयनिषद् एवं गीता। इसमें शंकर ने अद्वैत को ‘ब्रह्म-विद्या’ की परिभाषा देते हुए धु्रव सत्य यानि आत्मा (जोकि अवर्णनीय और अपरिभाषित है) के विषय में बतलाने की कोशिश की है।

हालांकि भारत के प्राचीन ऋषियों ने भी आत्म-तत्व को अनुभवों के आधार पर समझाने की कोशिश की है। यहाँ पर शंकर ने इस पहेली को अपने ढंग से सुलझाने की कोशिश की है जो इस सत्य को एकीकृत ढंग से दर्शाने का प्रयास है ताकि संधानकत्र्ता को आसानी रहे।

- सीए. ओ.पी. पारीक

श्रृंखला 27: आदि शंकराचार्य - एक विलक्षण विभूति Date :- 01-Apr-2014

इस श्रृंखला में अब तक प्रकाशित सभी कडि़यों में हमने श्री शंकर की यात्राओं और उनके द्वारा स्थापित मठों, विशेषकर चार धामों (चार मुख्य पीठों) की विस्तृत चर्चा की। शंकर की इन यात्राओं का वृत्तांत विशुद्ध इतिहास पर आधारित न होकर विभिन्न मौखिक श्रोतों एवं अन्य प्रमाणों या ग्रंथों पर आधारित है। अब हम यात्रा वृत्तांतों की परिसमािप्त पर पहुँच चुके हैं और उनके ‘अद्वैतानुभव’ की चर्चा करेंगे। इसके पहले कि हम शंकर द्वारा प्रतिपादित अद्वैत के विषय में आपको बताएं, यह आवश्यक हो जाता है कि हम इसकी पृष्ठभूमि पर भी प्रकाश डालें।

जैसा कि हम पहले भी बता चुके हैं श्री शंकर, स्वामी अनन्तनारायण शास्त्रीगल के शिष्य थे। वे इस महान शास्त्रज्ञ के शिष्यत्व में काफी अल्पायु में आए थे। उन्हीं की देखरेख में उन्होंने ‘कायक’, ‘नादक’, ‘तर्क’, ‘व्याकरण-, ‘वेद-शास्त्र’, ‘उपनिषद’ आदि का ज्ञान प्राप्त किया। स्पष्ट है कि ऐसे ज्ञानी गुरु के संरक्षण में इस प्रतिभाशाली शिष्य ने इन सभी विषयों में दक्षता हासिल की। इससे पहले मात्र आठ साल की उम्र में जब उनके प्रथम गुरु गोविन्द भागवदपाद ने शिष्यत्व प्रदान करने की शर्त-स्वरूप उनसे यह प्रश्न किया कि बताओ तुम आखिर क्या हो? (यानि तुम्हारे इस अस्तित्व का क्या मतलब है) इसके जवाब में उस आठ साल के बालक शंकर ने 10 पंक्तियों की कविता में जवाब दिया कि -

ना भूमिर ना थोयम, ना तेजा न च वायुर
न काम न इन्द्रियाम्, वा ना थेसम समूहा
अनाएकान्ति कथवाथ, सुषुप्तिऐका सिद्ध
स्ताहै चैका अवशिता, शिवा केवलोहम

(न मैं भूमि हूँ, न जल और ना ही अग्नि, वायु, आकाश व इन्द्रियाँ। ना ही मैं इन सब तत्व-समूहों का परिणामस्वरूप हूँ। मैं वो हूँ जो अत्यन्त गहरी निद्रा में अनुभव किया जाता हूँ। वहाँ पर मैं ध्रुव-शांति में स्थिर होता हूँ। जब आंतरिक व बाह्य मनसा भौतिक पदार्थ चिन्तन से पूर्णतः मुक्त होती है, तो ही मैं अपनी तेजोमयता से प्रदीप्त होता हूँ। मैं तो वो ‘शिव’ हूँ जो सभी उपादानों से रहित है।)


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