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महाभारत
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श्रृंखला 74: सावित्री और यमराज का वार्तालाप Date :- 01-May-2016

सावित्री एक-एक दिन गिनती रहती थी और उसके हृदय में नारद जी का वचन सदा ही बना रहता था। अन्त में, वह समय भी आ गया, जिस दिन सत्यवान मरने वाला था। जब सावित्री ने देखा कि अब इन्हें चैथे दिन मरना है तो उसने तीन दिन का व्रत धारण किया और वह रात-दिन स्थिर होकर बैठी रही। चैथे दिन यह सोचकर कि आज ही वह दिन है, उसने सूर्यदेव के चार हाथ ऊपर उठते-उठते अपने सब कार्य समाप्त किए और प्रज्ज्वलित अग्नि में आहुतियाँ दीं। फिर सभी ब्राह्मण, बड़े-बूढ़े, सास-ससुर को क्रमशः प्रणाम कर संयमपूर्वक हाथ जोड़कर खड़ी रही। उस तपोवन में रहने वाले सभी तपस्वियों ने सावित्री को अखण्ड-सौभाग्यवती के सूचक शुभ आशीर्वाद दिए।

उस दिन सवेरे सत्यवान कंधे पर कुल्हाड़ी रखकर वन से समिधा लाने को तैयार हुआ। तब सावित्री ने कहा, ‘आप अकेले न जाएँ, मैं भी आपके साथ चलूँगी।’ सत्यवान ने कहा- ‘प्रिये! तुम उपवास के कारण दुर्बल हो रही हो, फिर इस विकट मार्ग में पैदल ही कैसे चलोगी?’ सावित्री बोली, ‘उपवास के कारण मुझे किसी प्रकार की शिथिलता या थकान नहीं है, चलने के लिए मन में बहुत उत्साह है, इसलिए आप रोकिए मत।’ सत्यवान ने कहा, ‘यदि तुम्हारी ऐसी ही इच्छा है तो तुम माताजी और पिताजी से भी आज्ञा ले लो।’

सास-ससुर की आज्ञा पाकर यशस्विनी सावित्री अपने पतिदेव के साथ चल दी। सत्यवान वन में लकडि़याँ काटने लगा। लकड़ी काटते-काटते परिश्रम के कारण उसे पसीना आ गया और इसी से उसके सिर में दर्द होने लगा। सत्यवान ने सावित्री से कहा, ‘कल्याणी! अब मैं सोना चाहता हूँ, बैठने की मुझ में शक्ति नहीं है।’ यह सुनकर सावित्री अपने पति का सिर गोद में रखकर पृथ्वी पर बैठ गई। इतने में ही उसे वहाँ एक पुरुष दिखाई दिया। वह लाल वस्त्र पहने था, उसके सिर पर मुकुट था और अत्यन्त तेजस्वी होने के कारण वह मूर्तिमान सूर्य के समान जान पड़ता था। उसका शरीर श्याम और सुन्दर था, नेत्र लाल-लाल थे, हाथ में पाश था और देखने में वह बड़ा भयानक जान पड़ता था। वह सत्यवान के पास खड़ा हुआ, उसी की ओर देख रहा था। उसे देखते ही सावित्री ने धीरे से पति का सिर भूमि पर रख दिया और सहसा खड़ी हो गई। उसका हृदय धड़कने लगा और उसने अत्यन्त आर्त होकर उससे हाथ जोड़कर कहा, ‘मैं समझती हूँ आप कोई देवता हैं, क्योंकि आपका शरीर मनुष्य-सा नहीं है। आप कौन हैं और क्या करना चाहते हैं?’ यमराज ने कहा- सावित्री! तू पतिव्रता और तपस्विनी है, इसलिए मैं तुझसे सम्भाषण कर लूँगा। तू मुझे यमराज जान। तेरे पति सत्यवान की आयु समाप्त हो चुकी है, अब मैं इसे पाश में बाँधकर ले जाऊँगा। यही मैं करना चाहता हूँ। सावित्री ने कहा- भगवन्! मैंने तो ऐसा सुना है कि मनुष्यों को लेने के लिए आपके दूत आया करते हैं। यहाँ स्वयं आप ही कैसे पधारे?

यमराज बोले- सत्यवान धर्मात्मा, रूपवान और गुणों का समुद्र है। यह मेरे दूतों द्वारा ले जाये जाने योग्य नहीं है। इसी से मैं स्वयं आया हूँ। इसके बाद यमराज ने सत्यवान के शरीर में से पाश में बंधा हुआ अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला जीव निकाला। उसे लेकर वे दक्षिण की ओर चल दिए। तब दुःखातुर सावित्री भी यमराज के पीछे ही चल दी। यह देखकर यमराज ने कहा- ‘सावित्री! तू लौट जा और इसका दैहिक संस्कार कर। तू पतिसेवा के ऋण से मुक्त हो गई है। पति के पीछे भी तुझे जहाँ तक आना था, वहाँ तक आ चुकी है।’

सावित्री बोली- मेरे पतिदेव को जहाँ भी ले जाया जायेगा अथवा जहाँ वे स्वयं जाएंगे, वहीं मुझे भी जाना चाहिए। यही सनातन धर्म है। तपस्या, गुरुभक्ति, पतिप्रेम, व्रताचरण और आपकी कृपा से मेरी गति कहीं भी रूक नहीं सकती।

श्रृंखला 73: सावित्री चरित्र - सावित्री का जन्म और विवाह Date :- 01-Apr-2016

जयद्रथ को जीतकर उसके हाथों से द्रौपदी को छुड़ा लेने के पश्चात् धर्मराज युधिष्ठिर मुनिमण्डली के साथ बैठे थे। मार्कण्डेय जी को लक्ष्य करके युधिष्ठिर ने कहा- ‘सौभाग्यशालिनी द्रुपदकुमारी द्रौपदी यज्ञ की वेदी से प्रकट हुई है, इसे गर्भवास का कष्ट नहीं सहना पड़ा है। महात्मा पाण्डु की पुत्रवधू होने का भी गौरव इसे मिला है। इसने कभी भी पाप या निन्दित कर्म नहीं किया है। यह धर्म का तत्त्व जानती है और उसका पालन करती है। ऐसी स्त्री का भी पापी जयद्रथ ने अपहरण किया। यह अपमान हमें देखना पड़ा। सगे-सम्बन्धियों से दूर जंगल में रहकर हम तरह-तरह के कष्ट भोग रहे हैं। अतः यह बताओ, आपने हमारे समान मन्दभाग्य पुरुष इस जगत में कोई और भी देखा या सुना है।

इस पर मार्कण्डेय जी बोले- ‘राजन्! श्रीरामचन्द्रजी को भी वनवास और स्त्री वियोग का महान कष्ट भोगना पड़ा था। राक्षसराज दुरात्मा रावण मायाजाल बिछाकर आश्रम पर से श्रीरामचन्द्रजी पत्नी सीता को हर कर ले गया था। पक्षीराज जटायु ने रावण के कार्य में विघ्न खड़ा किया तो उसने उसको मार डाला। फिर श्रीरामचन्द्र जी सुग्रीव की सहायता से समुद्र पर पुल बाँधकर लंका में गए और अपने तीखे बाणों से लंका को भस्म कर सीता को वापस लाए।

युधिष्ठिर ने मार्कण्डेय जी से पूछा- ‘मुनिवर! इस द्रौपदी के लिए मुझे जैसा शोक होता है, वैसा न तो अपने लिए होता है, न इन भाइयों के लिए और न राज्य छीन जाने के लिए। यह जैसी पतिव्रता है, वैसी कोई दूसरी भाग्यवती नारी आपने पहले देखी या सुनी है। मार्कण्डेय जी ने कहा- राजन्! राजकन्या सावित्री ने जिस प्रकार यह कुलकामिनियों का परम सौभाग्यरूप पातिव्रत्य का सुयश प्राप्त किया था, वह मैं कहता हूँ।

मद्रदेश में अश्वपति नाम का एक बड़ा ही धार्मिक और सत्यनिष्ठ राजा था। उस राजा की धर्मशील ज्येष्ठा पत्नी को गर्भ रहा और यथासमय उसके एक कमलनयनी कन्या उत्पन्न हुई। वह कन्या सावित्री के मंत्र द्वारा हवन करने पर सावित्री देवी ने ही प्रसन्न होकर दी थी, इसलिए ब्राह्मणों ने और राजा ने उसका नाम सावित्री रखा। यथासमय कन्या ने युवावस्था में प्रवेश किया। महाराज अश्वपति ने सावित्री से कहा कि बेटी अब तू विवाह योग्य हो गई है, इसलिए स्वयं ही अपने योग्य कोई वर खोज ले। ऐसा कहकर राजा ने अपने मंत्रियों को आज्ञा दी कि आप लोग सवारी लेकर सावित्री के साथ जाएँ। सावित्री मंत्रियों के साथ चली गई।

एक दिन मद्रराज अश्वपति अपनी सभा में बैठे हुए देवर्षि नारद से बातें कर रहे थे। उसी समय मंत्रियों के साथ सावित्री तीर्थों में विचरकर अपने पिता के घर पहुँची। पिता के पूछने पर सावित्री ने अपने द्वारा ढूँढ़े गए वर का वृत्तान्त बताया। शाल्वदेश में द्युमत्सेन नाम से विख्यात एक बड़े धर्मात्मा राजा थे। पीछे वे अन्धे हो गए। इस प्रकार आँखें चली जाने से पुत्र की बाल्यावस्था होने से अवसर पाकर उनके पूर्वशत्रु एक पड़ोसी राजा ने उनका राज्य हर लिया। तब अपने बालक पुत्र और भार्या के सहित वे वन में चले आए और तपस्या करने लगे। उनके कुमार सत्यवान, जो अब वन में रहते हुए बड़े हो गए हैं, मेरे अनुरूप हैं और मैंने मन से उन्हीं को अपने पतिरूप से वरण किया है।

यह सुनकर नारदजी ने कहा- ‘राजन्! बड़े खेद की बात है। सावित्री से तो बड़ी भूल हो गई, जो इसने बिना जाने ही गुणवान समझकर सत्यवान को वर लिया। उसमें दोष है कि आज से एक वर्ष बाद सत्यवान की आयु समाप्त हो जायेगी और वह देह त्याग देगा। तब राजा ने सावित्री से कहा- ‘तू फिर जा और किसी दूसरे वर की खोज कर।’ इस पर सावित्री ने कहा- ‘अब तो जिसे मैंने एक बार वरण कर लिया, वह दीर्घायु हो अथवा अल्पायु तथा गुणवान हो या गुणहीन- वही मेरा पति होगा, किसी अन्य पुरुष को मैं नहीं वर सकती।’

सावित्री के संकल्प को देखकर अश्वपति ने वन में जाकर राजा द्युमत्सेन से कहा कि आप मेरी पुत्री को अपनी पुत्रवधू बना लो। राजा द्युमत्सेन ने कहा कि हम राज्य से विमुख हो चुके हैं और यहाँ वन में रहकर तपस्वियों का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। आपकी कन्या यह सब कष्ट सहन नहीं कर पाएगी। तब राजा अश्वपति ने कहा कि सुख-दुःख आने-जाने वाले होते हैं। सर्वसम्मति से सत्यवान का सावित्री के साथ विवाह सम्पन्न हो गया। सावित्री भी तपस्वी के वेश में अपने सास-ससुर और पति की मन से सेवा करने लगी।

श्रृंखला 72: जयद्रथ के द्वारा द्रौपदी का हरण, जयद्रथ की दुर्गति एवं उसका शिवजी से वर प्राप्त करना Date :- 01-Mar-2016

एक समय की बात है, पाण्डव लोग द्रौपदी को अपने आश्रम पर अकेली छोड़कर पुरोहित धौम्य से आज्ञा लेकर ब्राह्मणों के लिए आहार का प्रबन्ध करने वन में चले गए थे। उसी समय सिन्धु देश का राजा जयद्रथ, जो वद्धक्षत्र का पुत्र था, विवाह की इच्छा से शाल्व देश की ओर जा रहा था। वह अपने साथियों के साथ काम्यक वन में आया। वहाँ निर्जन वन में अपने आश्रम के दरवाजे पर पाण्डवों की प्यारी पत्नी द्रौपदी खड़ी थी, जयद्रथ की दृष्टि उस पर पड़ी। द्रौपदी का श्याम शरीर एक दिव्य तेज से दमक रहा था। जयद्रथ के साथियों ने उस अनुपम सुन्दरी की ओर देखकर हाथ जोड़ लिए और मन-ही-मन तर्क-वितर्क करने लगे- यह कोई अप्सरा है या देवकन्या है।

सिन्धुराज जयद्रथ उस सुन्दरी को देखकर चकित रह गया। उसके मन में बुरे विचार उठे और वह काम से मोहित हो गया। वह पाण्डवों के आश्रम में घुस आया और द्रौपदी से बोला, सुन्दरी! तुम कुशल से तो हो? द्रौपदी ने कहा, राजकुमार जयद्रथ! तुम स्वयं सकुशल तो हो। मेरे पति कुरूवंशी राजा युधिष्ठिर सकुशल हैं तथा उनके सब भाई भी कुशल से हैं। राजन्, मैं तुम सब लोगों के जलपान के लिए अभी प्रबन्ध करती हूँ। जयद्रथ बोला- अब तुमसे यही कहना है कि पाण्डवों के पास अब धन नहीं रहा, वे राज्य से निकाल दिए गए। अब इनकी सेवा करना व्यर्थ है। इतनी भक्ति से जो तुम इनकी सेवा करती हो, उसका फल तो केवल क्लेश ही होगा। तुम इन पाण्डवों को छोड़ दो और मेरी पत्नी होकर सुख भोगो। मेरे साथ ही सम्पूर्ण सिन्धु राज्य तुम्हें प्राप्त होगा- रानी बनोगी।

जयद्रथ की यह बात सुनकर द्रौपदी का हृदय काँप उठा, उसके इस प्रस्ताव का तिरस्कार करके द्रौपदी ने बहुत कड़ी बातें सुनाईं और बोली- मेरे पति महान यशस्वी हैं, सदा धर्म में स्थित रहने वाले हैं, युद्ध में यक्षों और राक्षसों का भी मुकाबला कर सकते हैं, तुझे ऐसी बातें कहते लज्जा नहीं आई। अरे मूर्ख! जैसे बाँस और केला- यह दोनों वृक्ष फल देकर अपना नाश कर लेते हैं, केंकड़े की मादा अपनी मृत्यु के लिए ही गर्भधारण करती है, उसी प्रकार तू भी अपनी मौत के लिए ही मेरा अपहरण करना चाहता है।

इतना कहने के बाद भी जयद्रथ जबरदस्ती द्रौपदी को अपने रथ पर बैठा कर ले गया। जब पाण्डव वापस आश्रम पर आए तो द्रौपदी की दासी धात्रेयिका रो रही थी, उसने बताया कि जयद्रथ पाण्डवों का अपमान कर द्रौपदी को हर कर ले गया। पाण्डव उसी समय रथ का पीछा करते हुए जयद्रथ के पास पहुँचे और उसे ललकारा और उसकी सेना का संहार करने लगे। जयद्रथ डर कर भाग गया, अर्जुन और भीमसेन उसका पीछा करने लगे। युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव द्रौपदी को लेकर आश्रम वापस आए।

वेगपूर्वक दौड़ कर भीमसेन ने जयद्रथ को पकड़कर जमीन पर दे मारा। भीमसेन, उसकी छाती पर चढ़कर घूँसों से मारने लगे। तब अर्जुन ने उन्हें रोका और कहा- ‘दुःशला (दुर्योधन की बहन) के वैधव्य का ख्याल कर, इसे छोड़ दो। तब भीम ने जयद्रथ के लम्बे-लम्बे बालों को मूँडकर पाँच चोटियाँ रख दीं और कहा- आज से तू राजाओं की सभा में सदा अपने को दास बताया कर, यह शर्त स्वीकार हो तो तुझे जीवनदान दे सकता हूँ। जयद्रथ ने यह शर्त स्वीकार कर ली। भीमसेन ने जयद्रथ को उसी अवस्था में धर्मराज के सामने पेश किया। उस समय द्रौपदी ने युधिष्ठिर की ओर देखकर भीमसेन से कहा- आपने इसका सिर मूँडकर पाँच चोटियाँ रख दी हैं तथा यह महाराज की दासता भी स्वीकार कर चुका है, अतः अब इसे छोड़ देना चाहिए।

जयद्रथ को बंधन से मुक्त कर दिया गया तथा उसे दासभाव से भी मुक्त कर दिया। युधिष्ठिर के ऐसा कहने पर जयद्रथ बहुत लज्जित हुआ, वह चुपचाप नीचा मुँह किए चला गया। पाण्डवों से पराजित और अपमानित होने के कारण उसे बहुत दुःख हुआ, अतः अपने नगर को न जाकर वह हरिद्वार चला गया। वहाँ भगवान शंकर की शरण होकर उसने बहुत कड़ी तपस्या की। शिवजी उस पर प्रसन्न हुए और वर माँगने को कहा। जयद्रथ ने कहा- ‘मैं युद्ध में पाँचों पाण्डवों को जीत लूँ, यही वरदान दीजिए।’ शिवजी ने कहा- ‘ऐसा नहीं हो सकता।’ पाण्डवों को तो युद्ध में न कोई जीत सकता है और न मार ही सकता है। केवल एक दिन तुम अर्जुन को छोड़ शेष चार पाण्डवों को युद्ध में पीछे हटा सकते हो। अर्जुन पर तुम्हारा वश इसलिए नहीं चलेगा कि वे देवताओं के स्वामी नर के अवतार हैं। उन्हें तो सारा विश्व भी नहीं जीत सकता। मैंने उन्हें पाशुपत नामक दिव्य बाण दिया है। इस दुष्टों का नाश और धर्म की रक्षा करने के लिए भगवान विष्णु ने यदुवंश में श्रीकृष्ण नाम से अवतार लिया है, वे सदा अर्जुन की रक्षा करते हैं। ऐसा कहकर भगवान शंकर अंतध्र्यान हो गए।

श्रृंखला 71: युधिष्ठिर के आश्रम पर दुर्वासा का आतिथ्य, भगवान के द्वारा पाण्डवों की रक्षा Date :- 01-Feb-2016

एक दिन दुर्वासा मुनि इस बात का पता लगाकर कि पाण्डव और द्रौपदी सभी लोग भोजन से निवृत्त हो आराम कर रहे हैं, दस हजार शिष्यों को साथ लेकर वन में युधिष्ठिर के पास पहुँचे। युधिष्ठिर ने विधिवत् पूजन करके उन्हें आतिथ्य के लिए निमंत्रण देते हुए कहा- ‘भगवन्! आप नित्यकर्म से निवृत्त होकर शीघ्र आइये और भोजन कीजिये।’ मुनि शिष्यों के साथ स्नान करने चले गए।

इधर, पतिव्रता द्रौपदी को अन्न के लिए बड़ी चिन्ता हुई। उसने बहुत सोचा-विचारा, किन्तु उस समय अन्न मिलने का कोई उपाय उसके ध्यान में नहीं आया। तब वह मन-ही-मन भगवान श्रीकृष्ण का इस प्रकार स्मरण करने लगी- ‘हे देवेश! यदि तुम मेरे रक्षक हो तो मुझ पर सारी विपत्तियाँ टूट पड़ें तो भी भय नहीं है। आज से पहले सभा में दुःशासन के हाथ से जैसे तुमने मुझे बचाया था, उसी प्रकार इस वर्तमान संकट से भी मेरा उद्धार करो।’

द्रौपदी की पुकार सुनकर भगवान तुरन्त वहाँ आ पहुँचे। भगवान को आया देख द्रौपदी के आनन्द का पार न रहा, उन्हें प्रणाम करके द्रौपदी ने दुर्वासा मुनि के आने का सारा समाचार कह सुनाया। भगवान बोले- ‘कृष्णे! इस समय मैं बहुत थका हुआ हूँ, बहुत भूख लगी है, पहले शीघ्र मुझे कुछ खाने को दे, फिर सारा प्रबन्ध करती रहना।’ उनकी बात सुनकर द्रौपदी को बड़ी लज्जा हुई, बोली- ‘भगवन्! सूर्यनारायण की दी हुई बटलोई से तो तभी तक अन्न मिलता है, जब तक मैं भोजन न कर लूँ।’ आज तो मैं भी भोजन कर चुकी हूँ, अतः अब कुछ भी नहीं है, कहाँ से लाऊँ?’

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- ‘द्रौपदी! मैं तो भूख और थकावट से कष्ट पा रहा हूँ और तुझे हँसी सूझती है। यह हँसी का समय नहीं है, जल्दी जा और बटलोई लाकर मुझे दिखा। इस प्रकार हठ करके भगवान ने द्रौपदी से बटलोई मँगवाई। देखा तो उसके अन्दर जरा-सा साग लगा हुआ है, उसे ही लेकर उन्होंने खा लिया और बोले- ‘इस साग के द्वारा सम्पूर्ण जगत के आत्मा यज्ञभोक्ता परमेश्वर तृप्त एवं संतुष्ट हों।’ फिर श्रीकृष्ण ने सहदेव से कहा- ‘अब शीघ्र ही मुनियों को भोजन के लिए बुला लाओ।’ सहदेव दुर्वासा आदि मुनियों को बुलाने गए। मुनि लोग उस समय जल में स्नान कर रहे थे। उन्हें सहसा पूर्ण तृष्टि मालूम हुई, मानो भोजन कर चुके हों, उनको बार-बार अन्न के रस से युक्त डकारें आने लगीं। सबकी एक ही जैसी अवस्था हो रही थी। फिर सब लोग दुर्वासा से कहने लगे, ब्रह्मर्षि! इस समय तो इतनी तृष्टि हो गई है कि कण्ठ तक अन्न भरा हुआ जान पड़ता है। कैसे भोजन करेंगे? हमने जो राजा युधिष्ठिर के यहाँ रसोई तैयार कराई है, वह व्यर्थ होगी। अब हमें क्या करना चाहिए।

यह सुनकर दुर्वासा बोले, ‘सचमुच ही व्यर्थ भोजन बनवाकर हम लोगों ने राजर्षि युधिष्ठिर का महान अपराध किया है। पाण्डव महात्मा हैं, ये धार्मिक, शूरवीर, विद्वान, व्रतधारी, तपस्वी, सदाचारी तथा नित्य भगवान वासुदेव के भजन में ही लगे रहने वाले हैं। जैसे आग रूई की ढ़ेरी को जला डालती है, उसी प्रकार क्रोधित होने पर पांडव हमें जला सकते हैं। इसलिए अब कल्याण इसी में है कि पाण्डवों से बिना पूछे ही तुरंत भाग चलो।’

अपने गुरुदेव दुर्वासा मुनि की बात सुनकर भला शिष्य लोग कैसे ठहर सकते थे। पाण्डवों के भय से भागकर सबने दसों दिशाओं की शरण ली। सहदेव आसपास के घाटों पर घूमकर मुनि को ढूँढ़ने लगे। सहदेव वापस आ गए। फिर भी पाण्डव चिंतित थे कि कहीं दुर्वासा मुनि आधी रात को न आ धमकें। पाण्डवों की यह दशा देखकर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- परम क्रोधी दुर्वासा मुनि से आप लोगों पर बहुत बड़ी विपत्ति आने वाली है, यह जानकर द्रौपदी ने मेरा स्मरण किया था, इससे मैं तुरंत यहाँ आ गया। अब आप लोगों को दुर्वासा से तनिक भी भय नहीं है, वे आपके तेज से डरकर पहले ही भाग गए हैं।

श्रृंखला 70: दुर्योधन के द्वारा दुर्वासा का अतिथि-सत्कार और वरदान पाना Date :- 01-Jan-2016

जब दुर्योधन ने यह सुना कि पाण्डव लोग तो वन में भी उसी प्रकार आनन्द से रहते हैं, जैसे नगर के निवासी रहा करते हैं, तो उनकी बुराई करने का विचार किया। फिर तो छल-कपट की विद्या में प्रवीण कर्ण और दुःशासन आदि की मण्डली एकत्रित हुई और पाण्डवों को हानि पहुँचाने के अनेकों उपायों पर विचार होने लगा। इसी बीच में महान यशस्वी महर्षि दुर्वासाजी अपने दस हजार शिष्यों को साथ लिये हुए वहाँ आ गये। परम क्रोधी दुर्वासा मुनि को घर पर पधारा देख दुर्योधन बहुत विनय दिखाता हुआ भाइयों सहित उनके पास गया और नम्रतापूर्वक उन्हें अतिथि-सत्कार के लिये निमंत्रित किया। बड़ी विधि से उनकी पूजा की ओर स्वयं दास की भाँति उनकी सेवा में खड़ा रहा।

दुर्वासा जी कई दिन वहाँ ठहरे रहे। दुर्योधन आलस्य छोड़कर रात-दिन उनकी सेवा करता रहा। भक्ति-भाव के कारण नहीं, उनके शाप से डरकर वह सेवा करता था। मुनि का भी स्वभाव विचित्र था। कभी कहते- ‘मुझे बड़ी भूख लगी है, राजन्! शीघ्र भोजन तैयार कराओ।’ ऐसा कहकर नहाने चले जाते और वहाँ से लौटते खूब देर करके। आने पर कहते ‘आज तो भूख बिल्कुल नहीं है, नहीं खाऊँगा।’ यह कहकर दृष्टि से ओझल हो जाते। इस प्रकार का बर्ताव उन्होंने बारम्बार किया, तो भी दुर्योधन के मन में न तो कोई विकार हुआ और न क्रोध ही। इससे दुर्वासा जी प्रसन्न हो गये और बोले- ‘मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ, जो इच्छा हो, माँग लो।’

दुर्वासा की यह बात सुनकर दुर्योधन ने मन-ही-मन ऐसा समझा, मानो उसका नया जन्म हुआ है। मुनि संतुष्ट हो तो उनसे क्या माँगना चाहिए- इस बात के लिए कर्ण, दुःशासन आदि के साथ पहले से ही सलाह हो चुकी थी। जब मुनि ने वर माँगने को कहा तो उसने बड़े प्रसन्न होकर यह वरदान माँगा, ‘ब्रह्मन्! हमारे कुल में सबसे बड़े हैं युधिष्ठिर। वे इस समय अपने भाइयों के साथ वन में निवास करते हैं। बड़े गुणवान और सुशील हैं। जैसे अपने शिष्यों के साथ आप आज हमारे अतिथि हुए हैं, उसी प्रकार उनके भी अतिथि होइये। यदि आपकी मुझ पर कृपा हो तो मेरी एक और प्रार्थना ध्यान रखकर जाइयेगा। जिस समय राजकुमारी द्रौपदी सब ब्राह्मणों और अपने पतियों को भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करने के पश्चात् विश्राम कर रही हो, उस समय आप वहाँ पधारें।’

‘तुम पर प्रेम होने के कारण मैं ऐसा ही करूँगा।’ यही कहकर दुर्वासा जी जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। दुर्योाध्न ने समझा, अब ‘मैंने बाजी मार ली।’ उसने प्रसन्न होकर कर्ण से हाथ मिलाया। कर्ण ने भी कहा- बड़े सौभाग्य की बात है। अब तो काम बन गया। राजन्! तुम्हारी इच्छा पूरी हुई और तुम्हारे शत्रु दुःख के महासागर में डूब गये- यह सब कितने आनन्द की बात है।

श्रृंखला 69: पाण्डवों का दुर्योधन को मुक्त कराना Date :- 01-Dec-2015

कौरवों को बचाने के लिए पाण्डवों ने अभेद्य कवच और तरह-तरह के दिव्य आयुध धारण किए और गंधर्वों पर हमला बोल दिया। दोनों ओर से भीषण युद्ध हुआ, पाण्डवों ने गन्धर्वों को पराजित कर कौरवों को छुड़ा लिया। कौरवों ने पाण्डवों का सत्कार किया। युधिष्ठिर ने बड़े प्रेम से दुर्योधन से कहा- ‘भइया, ऐसा कार्य फिर कभी नहीं करना। इस घटना से मन में किसी प्रकार का खेद मत मानना।’ दुर्योधन धर्मराज को प्रणाम कर हृदय में अत्यन्त लज्जित होकर अपने नगर को चला गया।

मार्ग में दुर्योधन को कर्ण मिला और कहने लगा- ‘राजन्! बड़े सौभाग्य की बात है कि आपका जीवन बच गया, मुझे तो गन्धर्वों ने ऐसा तंग किया कि मैं उनसे अपनी सेना की भी रक्षा नहीं कर सका और मुझे वहाँ से भागना पड़ा। परन्तु आपने उन गन्धर्वों को इतनी आसानी से हरा दिया, यह बड़े पौरुष्य की बात है। ऐसा करने वाला संसार में दूसरा पुरुष दिखाई नहीं पड़ता।’ यह सुनकर दुर्योधन ने कहा- ‘तुम्हें असली भेद का पता नहीं है। गन्धर्वों ने हमारी पूरी सेना को परास्त कर हम सभी को बन्दी बना लिया था। हमारे कुछ सैनिकों की प्रार्थना करने पर धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने भाइयों को भेजकर हमें बन्धन से मुक्त कराया। अब मेरा जो विचार है, वह सुनो। मैं यहाँ अन्न-जल छोड़कर प्राण त्याग दूँगा। मैं हस्तिनापुर जाकर महाराज के आगे क्या उत्तर दूँगा। इस जीने से तो मरना ही अच्छा है।’ अन्त में शकुनि आदि के समझाने से दुर्योधन हस्तिनापुर चलने को तैयार हुआ।

दुर्योधन के लौट आने पर पितामह भीष्म ने उससे कहा- ‘मैंने तुमसे द्वेतवन जाने को मना किया था। तुम्हें वहाँ शत्रुओं के बन्धन में पड़ना पड़ा और फिर पाण्डवों ने तुम्हें उनसे छुड़ाया, यह कितनी लज्जा की बात है। देखो, उस समय सारी सेना और तुम्हारे सामने यह सूतपुत्र कर्ण गन्धर्वों से डरकर भाग गया। उस समय तुमने पाण्डवों का पराक्रम भी देखा होगा। यह कर्ण तो पाण्डवों के सामने चैथाई भाग भी नहीं है। अतः तुम पाण्डवों से संधि कर लो।’ दुर्योधन पितामह की बात न सुनकर उठकर चला गया।

पराजय से विचलित कर्ण कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे सब उसे महान योद्धा समझें। कर्ण ने दुर्योधन के सामने प्रस्ताव रखा कि वह दिग्विजय पर जाना चाहता है और सभी राजाओं को अपने अधीन कर उनसे कर प्राप्त कर अपना पराक्रम दिखाना चाहता है। दुर्योधन ने प्रसन्न होकर एक बड़ी सेना कर्ण के सुपुर्द कर दी। कर्ण ने चारों दिशाओं को जीत लिया। जब वह वापस आया तो दुर्योधन ने उसका विधिवत सत्कार किया और उसकी दिग्विजय की घोषणा कराई। दुर्योधन ने पाण्डवों का बड़ा भारी राजसूय यज्ञ देखा था, अतः उसकी इच्छा हुई कि मैं भी ऐसा ही एक विशाल यज्ञ करूँ।

जब दुर्योधन ने ब्राह्मणों के समक्ष राजसूय यज्ञ का विचार रखा तो ब्राह्मणों ने कहा कि महाराज युधिष्ठिर के रहते तुम यह यज्ञ नहीं कर सकते, परन्तु इसके समकक्ष आप ‘वैष्णव यज्ञ’ कीजिए। उससे आपका हित होगा और वह बिना किसी विघ्न-बाधा के सम्पन्न हो जायेगा। इस महायज्ञ की तैयारी शुरू हुई, सभी राजाओं को निमंत्रण दिया गया, साथ ही द्वेतवन में पाण्डवों को भी यज्ञ का न्यौता भेजा गया।

श्रृंखला 68: अर्जुन का शस्त्रविद्या प्राप्त कर स्वर्ग से वापस लौटना Date :- 01-Nov-2015

अर्जुन अस्त्रविद्या सीखने के लिए इन्द्र के पास गए थे। वे पाँच वर्ष तक इन्द्र के भवन में रहे और देवताओं आदि से अस्त्र प्राप्त किए। फिर इन्द्र ने उन्हें घर जाने की आज्ञा दे दी। महावीर अर्जुन इन्द्र के रथ में बैठकर गन्धमादन पर्वत पर लौट गए। जहाँ पाण्डव द्रौपदी सहित उनकी पहले से ही प्रतीक्षा कर रहे थे। अर्जुन ने रथ से उतरकर पहले मुनिवर धौम्य के फिर महाराज युधिष्ठिर और भीमसेन के चरणों में प्रणाम किया। इसके बाद नकुल और सहदेव ने उनका अभिवादन किया। फिर द्रौपदी से मिलकर उसे धीरज बँधाया।

पाण्डवों ने इन्द्र के रथ के पास जाकर उसकी परिक्रमा की और इन्द्र के सारथि मातलि का इन्द्र के समान ही सत्कार कर उसे विदा किया। अर्जुन ने इन्द्र द्वारा दिए हुए बहुमूल्य आभूषण द्रौपदी को दे दिए। अर्जुन ने संक्षेप में अपने स्वर्ग के प्रवासकाल की बहुत-सी बातें बताईं।

वन में रहकर सर्दी-गर्मी, वायु, धूप सहते हुए नरश्रेष्ठ पाण्डव द्वैतवन में पवित्र सरोवर के समीप कुटी बनाकर रहने लगे। इन्हीं दिनों वहाँ एक ब्राह्मण आया, वह पाण्डवों से मिलकर धृतराष्ट्र के पास पहुँचा। ब्राह्मण से पाण्डवों का हाल सुनकर, धृतराष्ट्र ने कहा कि दुर्योधन, शकुनि, कर्ण और दुःशासन की बुद्धि मारी गई थी। इन्होंने जो राज्य जुए के द्वारा छीना है, उसे ये मधु-सा मीठा समझते हैं, इनको अपने सर्वनाश की ओर दृष्टि नहीं जाती। शकुनि ने कपट चालें चलकर अच्छा नहीं किया, फिर भी पाण्डवों ने इतनी साधुता की कि उसी समय इन्हें नहीं मारा। किंतु कुपुत्र दुर्योधन के मोह में फँसकर मैंने तो वह काम कर डाला, जिसके कारण कौरवों का अन्तकाल समीप दिखाई दे रहा है।

कौरवों की गौओं के पालन करने वाले ग्वाले गायों सहित द्वैतवन में एकत्रित हुए थे, अतः गौओं की गिनती करने के बहाने एक विशाल सेना को लेकर दुर्योधन पाण्डवों को अपना वैभव दिखाकर उन्हें ईष्र्यावश जलाने के उद्देश्य द्वैतवन में उसी सरोवर के निकट जा पहुँचा। दुर्योधन ने वहाँ एक विशाल क्रीडा भवन बनाने की आज्ञा दी। उसी समय वहाँ गन्धर्वराज चित्ररथ जलक्रीडा करने के विचार से अपने सेवकों और अप्सराओं के सहित आया हुआ था और उसने उस सरोवर को घेर रखा था। चित्ररथ ने दुर्योधन के सैनिकों को वहाँ से भगा दिया। क्रोध में भरकर दुर्योधन ने अपनी सेना को आज्ञा दी कि चित्ररथ पर आक्रमण कर उसे पकड़ लाओ। भयानक युद्ध हुआ, दुर्योधन, कर्ण, शकुनि, दुःशासन आदि भी युद्ध में परास्त हो गए। चित्ररथ दुर्योधन को पकड़कर ले जाने लगा। तब दुर्योधन के सैनिकों ने महाराज युधिष्ठिर की कुटी में पहुँचकर अपने राजा दुर्योधन की रक्षा करने की प्रार्थना की।

युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से कहा कि ‘गन्धर्व लोग बलात्कार से दुर्योधन को पकड़कर ले गए हैं और आज वह बाहरी लोगों के अधिकार में है। इस प्रकार यह हमारे कुल का ही तिरस्कार है। अतः शरणागतों की रक्षा करने और अपने कुल की लाज रखने के लिए शीघ्र अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों सहित जाकर दुर्योध्न को छुड़ा लाओ।’ धर्मराज की यह बात सुनकर अर्जुन ने प्रतिज्ञा की कि ‘यदि गन्धर्व लोग समझाने-बुझाने से कौरवों को नहीं छोड़ेंगे तो आज पृथ्वी गन्धर्वराज का रक्तपान करेगी।’ सत्यवादी अर्जुन की ऐसी प्रतिज्ञा सुनकर कौरवों के जी-में-जी आया।

श्रृंखला 67: अर्जुन का स्वर्ग में आगमन और उर्वशी का अर्जुन को शाप Date :- 06-Oct-2015

अर्जुन ने स्वर्गलोक में पहुँचकर देखा कि वहाँ की शोभा, सुगन्धि, दिव्यता, अभिजन और दृश्य अनूठा ही था। यह लोक बड़े-बड़े पुण्यात्मा पुरुषों को प्राप्त होता है। जिसने तप नहीं किया, अग्निहोत्र नहीं किया, जो युद्ध से पीठ दिखाकर भाग गया, वह इस लोक का दर्शन नहीं कर सकता। जो यज्ञ नहीं करते, व्रत नहीं करते, वेदमंत्र नहीं जानते, तीर्थों में स्नान नहीं करते, यज्ञ और दान से बचे रहते हैं, यज्ञ में विघ्न डालते हैं, शराबी, गुरु, स्त्रीगामी, मांसाहारी और दुरात्मा हैं, उन्हें किसी प्रकार स्वर्ग का दर्शन नहीं हो सकता।

जब अप्सरा और गन्धर्वों ने देखा कि अर्जुन स्वर्ग में आ गये हैं, तब वे उनकी स्तुति-सेवा करने लगे। सभी प्रसन्न होकर उदारचरित्त अर्जुन की पूजा में लग गए। रथ से उतरकर अर्जुन ने देवराज इन्द्र के पास जा, सिर झुकाकर उनके चरणों में प्रणाम किया, इन्द्र ने अर्जुन को प्रेम से अपने पवित्र देवासन पर बैठाया। विभिन्न प्रकार के अस्त्रों का अभ्यास करते हुए अर्जुन पाँच वर्ष तक स्वर्ग में ही रहे।

एक दिन देवराज इन्द्र ने अस्त्र-विद्या के मर्मज्ञ अर्जुन से कहा कि ‘प्रिय अर्जुन! अब तुम चित्रसेन गन्धर्व से नाचना और गाना सीख लो।’ कुछ समय पश्चात् अर्जुन इस विद्या में प्रवीण हो गए। स्वर्ग में अर्जुन के दिव्य गुणों से उर्वशी नामक देव अप्सरा अर्जुन पर मोहित हो चुकी थी और मन-ही-मन उसको वर लिया था। एक दिन अवसर पाकर उर्वशी ने कहा कि ‘मैं आपके गुणों का वर्णन सुन आपको पाने की प्रेरणा से आई हूँ। मेरा मन आप पर लग गया है। मैं काम के वश में हूँ। बहुत दिनों से मैं लालसा कर रही थी। आप मुझे स्वीकार कीजिए।’ उर्वशी की बात सुनकर अर्जुन संकोच के मारे धरती में गड़-से गए। उन्होंने अपने हाथों से कान बंद कर लिए और बोले- ‘हरे हरे, कहीं यह बात मेरे कान में प्रवेश न कर जाए। देवि! निःसंदेह तुम मेरी गुरुपत्नी के समान हो, मैं यही सोच रहा था कि पुरूवंश की यही आनन्दमयी माता हैं। तुम्हें पहचानते ही मेरी आँखें आनन्द से खिल उठीं। देवि! मेरे संबंध में और कोई बात सोचनी नहीं चाहिए। तुम मेरे लिए बड़ों की भी बड़ी और मेरे पूर्वजों की जननी हो। जैसे कुन्ती, माद्री और इन्द्रपत्नी शचि मेरी माताएँ हैं, वैसे ही तुम भी पुरूवंश की जननी होने के कारण मेरी पूजनीय माता हो। मैं तुम्हारे चरणों में झुककर प्रणाम करता हूँ, मैं तुम्हारा पुत्र के समान रक्षणीय हूँ।’

अर्जुन की बात सुनकर उर्वशी क्रोध के मारे काँपने लगी। उसने भौंहे टेढ़ी करके अर्जुन को शाप दिया- ‘अर्जुन! मैं तुम्हारे पिता इन्द्र की आज्ञा से कामातुर होकर तुम्हारे पास आई हूँ, फिर भी तुम मेरी इच्छा पूर्ण नहीं कर रहे हो। इसलिए जाओ, तुम्हें स्त्रियों में नर्तक होकर रहना पड़ेगा और सम्मानरहित होकर तुम नपुंसक के नाम से प्रसिद्ध होओगे।’ उस समय उर्वशी के ओठ फड़क रहे थे, साँसें लम्बी चल रही थीं। अर्जुन शीघ्रता से चित्रसेन के पास गए और उर्वशी ने जो कुछ कहा था, वह सब कह सुनाया। चित्रसेन ने सारी बात इन्द्र से कही। इन्द्र ने अर्जुन को एकान्त में बुलाकर बहुत कुछ समझाया-बुझाया और तनिक हँसते हुए कहा- ‘प्रिय अर्जुन! तुम्हारे-जैसा पुत्र पाकर कुन्ती सचमुच पुत्रवती हुई। उर्वशी ने तुम्हें जो शाप दिया है, उससे तुम्हारा बहुत काम बनेगा। जिस समय तुम 13वें वर्ष में गुप्तवास करोगे, उस समय तुम नपुंसक के रूप में एक वर्ष तक छिपकर यह शाप भोगेगे। फिर तुम्हें पुरुषत्व की प्राप्ति हो जाएगी।’ यह सुनकर अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए। उनकी चिन्ता मिट गई।

श्रृंखला 66: अर्जुन को देवताओं से दिव्यास्त्रों की प्राप्ति Date :- 12-Sep-2015

अर्जुन की मानसिक स्थिति बड़ी विलक्षण हो रही थी। वे सोच रहे थे कि आज मुझे भगवान शंकर के दर्शन मिले। उन्होंने मेरे शरीर पर अपना वरद हस्त फेरा। मैं धन्य हूँ। आज मेरा काम पूर्ण हो गया। अर्जुन यही सब सोच रहे थे कि उनके सामने वैदूर्यमणि के समान कान्तिमान जलचरों से घिरे जलाधीर वरूण, सुवर्ण के समान दमकते हुए शरीर वाले धनाधीश कुबेर, सूर्य के पुत्र यमराज और बहुत-से गन्धर्व आदि मन्दराचल के तेजस्वी शिखर पर आकर उतरे। कुछ ही क्षण बाद देवराज इन्द्र भी इन्द्राणि के साथ ऐरावत पर बैठकर देवगणों सहित मन्दराचल पर आए। तब धर्म के मर्मज्ञ यमराज ने मधुर वाणी से कहा- ‘अर्जुन! देखो, सब लोकपाल तुम्हारे पास आए हैं। आज तुम हम लोगों के दर्शन के अधिकारी हो गए हो। इसलिए दिव्य दृष्टि लो। हमारा दर्शन करो। तुम सनातन ऋषि नर हो। तुमने मनुष्यरूप में अवतार ग्रहण किया है। अब तुम भगवान श्रीकृष्ण के साथ रहकर पृथ्वी का भार मिटाओ। मैं तुम्हें अपना वह दण्ड देता हूँ, जिसका कोई निवारण नहीं कर सकता। अर्जुन ने आदर के साथ वह दण्ड स्वीकार कर लिया। उसका मंत्र, पूजा का विधान तथा प्रयोग-उपसंहार की विधि भी सीख ली।

वरूण ने कहा- ‘मैं जलाधीश वरूण हूँ। मेरा वारूण पाश युद्ध में कभी निष्फल नहीं होता। तुम इसे ग्रहण करो और छोड़ने-लौटाने की गुप्त विधि भी सीख लो। तारकासुर के घोर संग्राम में इसी पाश से मैंने हजारों दैत्यों को पकड़कर कैद कर लिया था। तुम इसके द्वारा चाहे जिसको कैद कर सकते हो।’ अर्जुन के पाश स्वीकार कर लेने पर धनाधीश कुबेर ने कहा- ‘अर्जुन! तुम भगवान के नररूप हो। पहले कल्प में तुमने हमारे साथ बड़ा परिश्रम किया है। इसलिए तुम मुझसे अन्तर्धान नामक अनुपम अस्त्र ग्रहण करो। यह बल, पराक्रम एवं तेज देने वाला अस्त्र मुझे बहुत ही प्यारा है। इससे शत्रु सोये-से होकर नष्ट हो जाते हैं। भगवान शंकर ने त्रिपुरासुर को नष्ट करते समय इसका प्रयोग करके असुरों को भस्म कर डाला था। यह तुम्हारे लिये ही है, तुम इसे धारण करो।’

अर्जुन द्वारा इन अस्त्रों को स्वीकार कर लेने पर देवराज इन्द्र ने मेघगम्भीर वाणी से कहा- ‘प्रिय अर्जुन! तुम भगवान के नररूप हो। तुम्हें परम सिद्धि, देवताओं की परम गति प्राप्त हो गई हैं। तुम्हें देवताओं के बड़े-बड़े काम करने हैं और स्वर्ग में भी चलना है। इसके लिए तुम तैयार हो जाओ। मातलि सारथी तुम्हारे लिए रथ लेकर आएगा। उसी समय मैं तुम्हें दिव्य अस्त्र भी दूँगा।’ इस प्रकार सभी लोकपालों ने प्रत्यक्ष प्रकट होकर अर्जुन को दर्शन और वरदान दिये। अर्जुन ने प्रसन्नता से सबकी स्तुति एवं फल-फूलादि से पूजा की। सभी देवता अपने-अपने धाम को चले गए। अर्जुन वहीं रूककर देवराज इन्द्र के रथ की प्रतीक्षा करने लगे।

थोड़ी ही देर में इन्द्र का सारथि मातलि दिव्य रथ लेकर वहाँ उपस्थित हुआ। उस रथ की उज्ज्वल कान्ति से आकाश का अंधेरा मिट रहा था। उस दिव्य रथ में दस हजार वायुगामी घोड़े जुते हुए थे। उस मायामय दिव्य रथ में सोने के दण्ड में कमल के समान श्यामवर्ण की वैजयन्ती नामक ध्वजा फहरा रही थी। मातलि सारथि ने अर्जुन के पास आकर प्रणाम करके कहा- ‘इन्द्रनन्दन! श्रीमान् देवराज इन्द्र आपसे मिलना चाहते हैं। आप उनके इस प्यारे रथ में सवार होकर शीघ्र चलिये।’ मन्दराचल से आज्ञा माँगकर अर्जुन इन्द्र के दिव्य रथ पर आ बैठे। क्षणभर में ही वह रथ ओझल हो गया। अर्जुन ने देखा कि वहाँ सूर्य का, चन्द्रमा का अथवा अग्नि का प्रकाश नहीं था। हजारों विमान वहाँ अद्भुत रूप में चमक रहे थे। वे अपनी पुण्य प्राप्त कान्ति से चमकते रहते हैं और पृथ्वी से तारों के रूप में दीपक के समान दीखते हैं। जब अर्जुन ने इस विषय में मातलि से प्रश्न किया, तब मातलि ने कहा कि ‘वीर! पृथ्वी पर से जिन्हें आप तारों के रूप में देखते हैं, वे पुण्यात्मा पुरूषों के निवास स्थान हैं।’ इसके बाद वह दिव्य रथ इन्द्र की दिव्य पुरी अमरावती पहुँच गया।

श्रृंखला 65: व्यास जी का उपदेश, अर्जुन का शंकर जी के साथ युद्ध Date :- 01-Aug-2015

पाण्डवों को वन में रहते हुए एक वर्ष एक माह बीत चुका था। व्यास जी पाण्डवों से मिलने वन में आए। पाण्डवों ने आगे बढ़कर व्यास जी का स्वागत-सत्कार किया। व्यासजी युधिष्ठिर को एकान्त में ले गये और बोले- ‘युधिष्ठिर! तुम मेरे शरणागत शिष्य हो, इसलिए मैं तुम्हें मूर्तिमान सिद्धि के समान प्रतिस्मृति नाम की विद्या देता हूँ। तुम यह विद्या अर्जुन को सिखा देना, इसके बल से वह तुम्हारा राज्य शत्रुओं के हाथ से छीन लेगा। अर्जुन तपस्या तथा पराक्रम के द्वारा देवताओं के दर्शन की योग्यता रखता है। यह नारायण का सहचर महातपस्वी ऋषि नर है। इसे कोई जीत नहीं सकता। इसलिए तुम इसको अस्त्रविद्या प्राप्त करने के लिए भगवान शंकर, देवराज इन्द्र, वरूण, कुबेर और धर्मराज के पास भेजो। यह उनसे अस्त्र प्राप्त करके बड़े पराक्रम का काम करेगा। अब तुम लोगों को किसी दूसरे वन में जाकर रहना चाहिये, क्योंकि तपस्वियों को चिरकाल तक एक स्थान पर रहना दुःखदायी हो जाता है।’ ऐसा कहकर व्यासजी ने राजा युधिष्ठिर को प्रतिस्मृति विद्या का उपदेश किया और उनसे अनुमति लेकर वे वहीं अन्तर्धान हो गए।

व्यासजी की आज्ञानुसार, धर्मात्मा युधिष्ठिर वन से चलकर सरस्वती तटवर्ती काम्यक वन में आए। वेदज्ञ और तपस्वी ब्राह्मण भी उनके पीछे-पीछे वहाँ आ पहुँचे। युधिष्ठिर ने एक दिन अर्जुन को एकान्त में बुलाया और बोले- ‘अर्जुन! भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा आदि अस्त्र-शस्त्रों के बड़े मर्मज्ञ हैं। इन पर विजय प्राप्त करने के लिए व्यासजी ने मुझे एक गुप्त विद्या का उपदेश किया है। उसका प्रयोग करने पर सब जगत भली-भाँति दीखने लगता है। तुम सावधानी के साथ मुझसे वह मंत्रविद्या सीख लो और समय पर देवताओं का कृपाप्रसाद प्राप्त कर लो। वृत्रासुर से भयभीत होकर देवताओं ने अपने सब अस्त्रों का बल इन्द्र को सौंप दिया था, इसलिए सारे अस्त्र-शस्त्र इन्द्र के ही पास हैं। तुम आज ही मुझसे मंत्र की दीक्षा लेकर इन्द्रदेव के दर्शन के लिए जाओ।’

धर्मराज युधिष्ठिर ने संयमी अर्जुन को शास्त्र-विधि के अनुसार व्रत कराकर गुप्त मंत्र सिखला दिया। अर्जुन ने गाण्डवी धनुष्य, अक्षय तरकस और कवच से सुसज्जित होकर इन्द्रलोक के लिए प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर इन्द्र ने अर्जुन को समझाकर कहा, ‘वीर! जब तुम्हें भगवान शंकर का दर्शन होगा, तब तुम्हें मैं सब दिव्य अस्त्र दे दूँगा। तुम उनके दर्शन के लिए प्रयत्न करो।’

भगवान शंकर के दर्शन प्राप्त करने के लिए अर्जुन ने घोर तपस्या आरम्भ की। अर्जुन की तपस्या से प्रसन्न होकर शंकर जी ने सोने की तरह दमकता हुआ भील का रूप धारण किया। सुन्दर धनुष, सर्पाकार बाण लेकर पार्वती के साथ वे अर्जुन के पास आए। बहुत से भूत-प्रेत भी वेष बदलकर उनके साथ हो लिए।

भीलवेषधारी शंकर ने अर्जुन के पास आकर देखा कि एक मूक दानव जंगली सुअर का रूप धारण कर तपस्वी अर्जुन को मारने की घात लगा रहा है। अर्जुन ने भी सुअर को देख लिया। उन्होंने गाण्डीव धनुष पर सर्पाकार बाण चढ़ाकर धनुष टंकारते हुए दानव से कहा कि दुष्ट तू मुझे मारना चाहता है, इसलिए मैं ही तुझे पहले मार देता हूँ। ज्यों ही अर्जुन ने अपना बाण छोड़ना चाहा, भीलवेषधारी शिवजी ने रोककर कहा कि ‘मैं पहले ही इसे मारने का निश्चय कर चुका हूँ, इसलिए तुम इसे मत मारो।’ अर्जुन ने भील की बातों की कुछ परवाह न करके सुअर पर बाण छोड़ दिया। शिवजी ने भी उसी समय अपना वज्र-सा बाण चलाया। दोनों के बाण दानव के शरीर पर जाकर टकराए, बड़ी भयंकर आवाज हुई। वह सुअर दानव के रूप में प्रकट होकर मर गया। अब अर्जुन ने भील की ओर देखा और कहा- ‘तू कौन है? इस मण्डली के साथ निर्जन वन में क्यों घूम रहा है? इस सुअर को मैंने मारना था, तो भी तूने क्यों धनुष-बाण इस पर चलाया।’ इसी बात को लेकर अर्जुन और भीलवेषधारी शिवजी के बीच भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया। अर्जुन के प्रहारों से भील का बाल भी बांका न हुआ। तब अर्जुन ने मिट्टी का शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा आरम्भ की। जो फूल अर्जुन शिवलिंग पर चढ़ाता, वे फूल भील के सिर पर नजर आते, यह देखकर अर्जुन भील के चरणों में गिर गया। भगवान शंकर ने पार्वती के साथ अर्जुन को दर्शन दिए।

शंकर जी ने अर्जुन से कहा- ‘अर्जुन! तुम्हारे जैसा शूर और धीर क्षत्रिय दूसरा नहीं है। तुम्हारा तेज और बल मेरे समान है। मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। तुम सनातन ऋषि हो। तुम्हें मैं दिव्य ज्ञान देता हूँ। इसके प्रभाव से तुम शत्रुओं और देवताओं को भी जीत सकोगे।’ अर्जुन ने कहा- ‘भगवन्! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हो तो अपना दिव्य ‘पाशुपतास्त्र’ मुझे प्रदान कीजिए। वह ब्रह्मशिर अस्त्र प्रलय के समान जगत का नाश करता है, उस अस्त्र से मैं युद्ध में सबको जीत सकूँगा।’ भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर अर्जुन को अपना प्रिय पाशुपतास्त्र प्रदान किया और कहा कि इसे कभी भी भूल से निर्बल के ऊपर प्रयोग नहीं करना। महादेव जी ने अर्जुन को इस अस्त्र का प्रयोग से लेकर उपसंहार तक का तत्त्व रहस्य समझा दिया। अब पाशुपतास्त्र मूर्तिमान काल के समान अर्जुन के पास आया। अन्त में, भगवान शिव ने अर्जुन को स्वर्ग जाने की आज्ञा दी।

श्रृंखला 64: दुर्योधन को महर्षि मैत्रेय जी का शाप Date :- 03-Jul-2015

पाण्डव वन से वापस ही ना आएँ, इसके लिए कर्ण ने दुर्योधन से कहा- ‘हम सब पूरी तैयारी से सेना लेकर वन में ही पाण्डवों को मार डालें। इस प्रकार पाण्डवों की मृत्यु की बात लोगों को मालूम भी नहीं होगी और हमारा कलह भी सदा के लिए समाप्त हो जाएगा।’ यह बात सभी ने एक स्वर से स्वीकार कर ली, वे सब पाण्डवों का अनिष्ट करने के लिए चल पड़े।

जिस समय कौरव पाण्डवों का अनिष्ट करने के लिए यात्रा कर रहे थे, उसी समय महर्षि व्यास वहाँ आ पहुँचे। उन्हें अपनी दिव्य दृष्टि से कौरवों की दुर्बुद्धि का पता चल गया था। उन्होंने स्पष्ट रूप से आज्ञा देकर कौरवों को वैसा करने से रोक दिया। इसके उपरांत व्यासजी धृतराष्ट्र के पास जाकर बोले- ‘दुर्योधन ने कपटपूर्वक पाण्डवों को हरा दिया और उन्हें वन में भेज दिया, यह बात मुझे अच्छी नहीं लगी है। आज से 13 वर्ष बाद पाण्डव बड़ा उग्र रूप धारण करेंगे और तुम्हारे सभी पुत्रों का ध्वंस कर डालेंगे। तुम अपने पुत्रा की द्वेष-बुद्धि मिटाने का यत्न करो, वरना बड़ा अन्याय होगा। मेरी सम्मति तो यह है कि दुर्योधन अकेला ही वन में जाकर पाण्डवों के पास रहे। सम्भव है पाण्डवों के सत्संग से दुर्योधन का द्वेषभाव दूर होकर प्रेमभाव जागृत हो जाए। राजन्! थोड़ी ही देर में महर्षि मैत्रेय पाण्डवों से वन में मिल यहाँ आ रहे हैं। वे तुम्हारे पुत्र को मेल-मिलाप का उपदेश करेंगे। परन्तु इस बात का अवश्य ध्यान रखना कि वे जो कुछ कहें, बिना सोच-विचार के कर लेना। यदि उनकी आज्ञा का उल्लंघन होगा तो वे क्रोध से शाप दे देंगे।’ इतना कहकर महर्षि वेदव्यास दुर्योधन के दरबार से रवाना हो गए।

महर्षि मैत्रेय के पधारते ही धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों के सहित उनका सत्कार किया। तत्पश्चात् मैत्रेय जी ने कहा- ‘काम्यक वन में संयोगवश धर्मराज युधिष्ठिर से भेंट हो गई। वे आजकल भाइयों सहित जटा और मृगछाला धारण किए तपोवन में निवास कर रहे हैं। उनके दर्शन के लिए बड़े-बड़े ऋषि-मुनि आते हैं। धृतराष्ट्र, मैंने वहाँ यह सुना कि तुम्हारे पुत्रों ने अज्ञानवश जुआ खेलकर उनके साथ अन्याय किया है। राजन्! यह किसी प्रकार उचित नहीं है कि तुम्हारे और भीष्म के जीवित रहते तुम्हारे पुत्र एक-दूसरे से विरोध करके मर मिटें।’ इसके बाद महर्षि मैत्रेय ने दुर्योधन की ओर मुँह फेरकर कहा- ‘बेटा दुर्योधन! मैं तुम्हारे हित की बात कर रहा हूँ। तुम तनिक समझदारी से काम लो, पाण्डवों से द्रोह मत करो। वे सब-के-सब वीर, योद्धा, बलवान एवं नर श्रेष्ठ हैं। पाण्डव बड़े सत्य प्रतिज्ञ, आत्माभिमानी और राक्षसों व दुष्टों के शत्रु हैं। तुम जानते हो कि दिग्विजय के समय भीमसेन ने दस हजार हाथियों के समान बली जरासंध को नष्ट कर दिया। भगवान कृष्ण उनके सम्बन्धी हैं। द्रुपद के पुत्र उनके साले हैं। पाण्डवों के साथ युद्ध में टक्कर लेने वाला इस समय कोई नहीं है। इसलिए तुम्हें उनके साथ मेल कर लेना चाहिए। तुम क्रोधवश होकर अनर्थ मत करो।’

जिस समय महर्षि मैत्रेय इस प्रकार कह रहे थे, उस समय दुर्योधन मुस्कराकर पैर से जमीन कुरेदने और अपनी जाँघ पर हाथ से ताल ठोंकने लगा। दुर्योधन की यह उद्दण्डता देखकर मैत्रेय जी ने जलस्पर्श करके दुरात्मा दुर्योधन को शाप दिया- ‘मूर्ख दुर्योधन! तू मेरा तिरस्कार करता है और मेरी बात नहीं मानता, तेरे इस द्रोह के कारण कौरवों और पाण्डवों में घोर युद्ध होगा। उसमें भीमसेन गदा की चोट से तेरी जाँघ तोड़ डालेंगे।’ मैत्रेय जी के ऐसा कहने पर धृतराष्ट्र उनके चरणों में गिरकर अनुनय-विनय करने लगे कि ऐसी कृपा कीजिए, जिससे दुर्योधन को शाप ना लगे। तब मैत्रेय जी ने कहा- ‘राजन्! यदि तुम्हारा पुत्र पाण्डवों से मेल कर लेगा, तब तो मेरा शाप नहीं लगेगा, नहीं तो अवश्य लगेगा।’ ऐसा कहकर मैत्रेय जी ने वहाँ से प्रस्थान किया। दुर्योधन भी उदास मुँह से वहाँ से चला गया।

श्रृंखला 63: युधिष्ठिर द्वारा सूर्योपासना एवं अक्षय पात्र की प्राप्ति Date :- 01-Jun-2015

पुरोहित धौम्य द्वारा बताए गए भगवान सूर्य के 108 नामों का उच्चारण करने के उपरांत युधिष्ठिर ने सूर्य नारायण की इस प्रकार स्तुति की- ‘सूर्यदेव! आप सारे जगत के नेत्र हैं। समस्त प्राणियों की आत्मा हैं। आप ही समस्त प्राणियों के मूल कारण और कर्मनिष्ठों के सदाचार हैं। आप मोक्ष के खुले द्वार हैं और मुमुक्षुओं के परम आश्रय हैं। आप ही समस्त लोकों को धारण करते हैं, प्रकाशित करते हैं, पवित्र करते हैं तथा बिना किसी स्वार्थ के पालन करते हैं। अब तक के सभी बड़े-बड़े ऋषियों ने आपकी पूजा की है। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, यक्ष आदि आपसे वर प्राप्त करने की अभिलाषा से आपके दिव्य रथ के पीछे-पीछे चलते हैं। तैंतीस करोड़ देवता, विश्वेदेव आदि देवगण, उपेन्द्र और महेन्द्र भी आपकी आराधना से ही सिद्ध हुए हैं। विद्याधर कल्पवृक्ष के पुष्पों से आपकी पूजा करके अपना मनोरथ सफल करते हैं। गुह्यक, पितर, देवता, मनुष्य- सभी आपकी पूजा करके गौरवान्वित होते हैं। आठ वसु, उन्चास मरूदगण, ग्यारह रुद्र, साध्यगण और बालखिल्य आदि सभी आपकी आराधना से श्रेष्ठता को प्राप्त हुए हैं। ब्रह्मलोक से लेकर पृथ्वीपर्यन्त समस्त लोकों में ऐसा कोई भी प्राणि नहीं, जो आपसे बढ़कर हो। यों तो बहुत बड़े-बड़े शक्तिशाली जगत में निवास करते हैं, परन्तु आपके प्रभाव और कान्ति के सामने वे नहीं ठहर सकते। जितने भी ज्योतिर्मय पदार्थ हैं, वे सब आपके अन्तर्गत हैं। आप समस्त ज्योतियों के स्वामी हैं। सत्य, सत्त्व और सभी सात्त्विक भाव आप में ही प्रतिष्ठित हैं। भगवान विष्णु जिस चक्र के द्वारा असुरों का घमण्ड चूर करते हैं, वह आपके ही अंश से बना हुआ है। आप ग्रीष्म ऋतु में अपनी किरणों से समस्त औषधि, रस और प्राणियों का तेज खींच लेते हैं और वर्षा ऋतु में लौटा देते हैं। जाड़े से ठिठुरते हुए पुरुष को अग्नि से और ओढ़ने से कम्बलों में वैसा सुख नहीं मिलता, जैसा आपकी किरणों से मिलता है। आप अपनी रश्मियों से तेरह द्वीप वाली पृथ्वी को प्रकाशित करते हैं। आप बिना किसी की सहायता की अपेक्षा के तीनों लोकों के हित में लगे रहते हैं। यदि आपका उदय न हो तो सारा जगत् अन्धा हो जाए। ब्रह्मादि द्विजाति-संस्कार, यज्ञ, मंत्र, तपस्या और वर्ण आश्रमों के कर्म आपकी कृपा से ही करते हैं। ब्रह्माजी के आदि-अन्त भी आप ही हैं। मनु, मनुपुत्र, जगत, मनुष्य, मन्वन्तर और ब्रह्मादि समर्थों के भी स्वामी आप ही हैं। प्रलय का समय आने पर आपके क्रोध से ही संवर्तक-अग्नि प्रकट होता है और तीनों लोकों को जलाकर आप में स्थित हो जाता है। आपकी किरणों से ही रंग-बिरंगे ऐरावत आदि मेघ और बिजलियाँ पैदा होती हैं तथा प्रलय करती हैं। प्रलय के समय सारे समुद्र का जल आप अपनी किरणों से सुखा लेते हैं। आप ही बारह रूप बनकर द्वादश आदित्यों के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन्द्र, विष्णु, रुद्र, प्रजापति, अग्नि, सूक्ष्म मन, प्रभु, शाश्वत ब्रह्मा आदि आपके ही नाम हैं। आप ही हंस, सविता, भानु, अंशुभाली, वृषाकपि, विवस्मान्, मिहिर, पूषा, मित्र तथा धर्म हैं। आप ही सहस्र रश्मि, आदित्य, तपन, गोपति, मार्तण्ड, अर्क, रवि, सूर्य, शरण्य एवं दिनकर हैं। आप ही दिवाकर, सप्तसप्ति, धामकेशी, विरोचन, आशुगामी, तमोघ्न और हरिताश्व कहलाते हैं। जो षष्ठी अथवा सप्ती के दिन प्रसन्नता और भक्ति से आपकी पूजा करता है तथा अहंकार नहीं करता, उसे लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। जो अनन्य चित्त से आपकी पूजा और नमस्कार करते हैं, उन्हें आधि, व्याधि तथा आपत्तियाँ नहीं सतातीं। आपके भक्त समस्त रोगों से रहित, पापों से मुक्त, सुखी और चिरंजीवी होते हैं।

हे अन्नपते! मैं श्रद्धापूर्वक सबको अन्न देना और सबका आतिथ्य करना चाहता हूँ। मुझे अन्न की कामना है। आप कृपा करके मेरी अभिलाषा पूर्ण कीजिये। आपके चरणों में रहने वाले माठर, अरूण, दण्ड आदि उन अनुचरों को मैं प्रणाम करता हूँ जो वज्र, बिजली आदि के प्रवर्तक हैं। क्षुभा, मैत्री आदि अन्य भूतमाताओं को भी मैं प्रणाम करता हूँ। वे मुझ शरणागत की रक्षा करें।’

धर्मराज युधिष्ठिर की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य नारायण ने अपने अग्नि के समान देदीप्यमान श्रीविग्रह से उनको दर्शन दिया और कहा- युधिष्ठिर! तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण हो। मैं बारह वर्ष तक तुम्हें अन्नदान करूँगा। यह ताँबे का बर्तन मैं तुम्हें देता हूँ। तुम्हारे रसोई घर में जो कुछ भोजन सामग्री तैयार होगी, वह तब तक अक्षय रहेगी, जब तक द्रौपदी परोसती रहेगी। आज से चैदहवें वर्ष में तुम्हें अपना राज्य मिल जाएगा। इतना कहकर भगवान सूर्य अन्तध्र्यान हो गए। युधिष्ठिर ने वह ‘अक्षय पात्र’ द्रौपदी को दे दिया।

विशेषः जो पुरुष संयम और एकाग्रता के साथ किसी अभिलाषा से इस स्तोत्र का पाठ करता है, भगवान सूर्य उसकी इच्छा पूर्ण करते हैं। स्त्री, पुरुष- कोई भी दोनों समय इसका पाठ करें तो घोर-से-घोर संकट से भी छूट जाते हैं। यह स्तुति ब्रह्मा से इन्द्र को, इन्द्र से नारद को, नारद से धौम्य को और धौम्य से युधिष्ठिर को प्राप्त हुई थी। इससे युधिष्ठिर की सारी अभिलाषाएँ पूर्ण हो गईं। इस स्तोत्र के पाठ से संग्राम में विजय और धन की प्राप्ति होती है, सारे पाप छूट जाते हैं और अन्त में सूर्यलोक की प्राप्ति होती है।

आपको सूर्य के 108 नामों का उच्चारण करके युधिष्ठिर द्वारा की गई स्तुति का पाठ करना चाहिए।

श्रृंखला 62: पाण्डवों के प्रति प्रजा का प्रेम Date :- 07-May-2015

जब पाण्डव वनयात्रा के लिए निकल गए और हस्तिनापुर की जनता को यह बात मालूम हुई तो उनके दुःख का पाराबार न रहा। सब शोक से व्याकुल होकर आपस में कहने लगे कि दुर्योधन के राज्य में हम, हमारा वंश, प्राचीन सदाचार और घर-द्वार सुरक्षित नहीं रह सकते क्योंकि जब राजा पापी हो और उसके सहायक भी पापी हों तो भला कुल-मर्यादा, आचार, धर्म और अर्थ कैसे सुरक्षित रह सकते हैं? वैसे अर्थ-लोलुप, घमण्डी और क्रूर के शासन में इस पृथ्वी का सर्वनाश निश्चित है। अतः आओ, हम सब वहीं चलकर रहें, जहाँ हमारे दयालु, यशस्वी और धर्मनिष्ठ महात्मा पाण्डव गए हैं।

हस्तिनापुर की जनता इस प्रकार आपस में विचार करके पाण्डवों के पास वन में पहुँचकर बड़ी नम्रता से हाथ जोड़कर कहने लगी- ‘पाण्डवों! आप लोग हमें हस्तिनापुर में दुःख भोगने के लिए छोड़कर स्वयं कहाँ जा रहे हैं? आप जहाँ जाएंगे, हम भी वहीं जाएंगे। जबसे हमें यह मालूम हुआ है कि दुर्योधन आदि ने बड़ी निर्दयता से कपट-द्युत में हराकर आप लोगों को वनवासी बना दिया है, तब से हम लोग बहुत भयभीत हो गए हैं। हम आपके सेवक, प्रेमी और हितैषी हैं। कहीं दुरात्मा दुर्योधन के कुराज्य में हमारा सर्वनाश न हो जाए। आप जानते हैं कि दुष्ट पुरुषों के साथ रहने में क्या-क्या हानियाँ हैं और सत्पुरुषों के साथ रहने में क्या-क्या लाभ हैं। बुद्धिमान पुरुषों को चाहिए कि ज्ञानी, दयालु, शांत, जितेन्द्रिय और तपस्वी पुरुषों का ही संग करें। कुलीन, विद्वान एवं धर्मपरायण पुरुषों की सेवा और उनका सत्संग शास्त्रों के स्वाध्याय से भी बढ़कर है। मनुष्यों के अभ्युदय के लिए जिन गुणों की आवश्यकता बतलाई है, लोक-व्यवहार में जिन वेदोक्त आचरणों की आवश्यकता है। वे सब-के-सब आप लोगों में विद्यमान हैं। इसलिए आप लोगों के साथ ही हम रहना चाहते हैं।’

प्रजा की बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा- ‘मैं अपने भाइयों के साथ आप लोगों से प्रार्थना करता हूँ, आप प्रेम और कृपा से हमारी बात स्वीकार करें। इस समय हस्तिनापुर में पितामह भीष्म, धृतराष्ट्र, विदुर, हमारी माता कुन्ती और गान्धारी तथा हमारे सभी सगे-सम्बन्धी निवास कर रहे हैं। उनके हृदय में भी हमारे लिए बड़ी वेदना है। आप लोग हमारी प्रसन्नता के लिए वापस लौट जाइये और उनकी देखरेख कीजिए। अगर आप ऐसा करते हैं तो मुझे बहुत संतोष होगा और मैं उसे अपना सत्कार समझँूगा।’

पाण्डवों की बात सुनकर प्रजा की आकुलता की सीमा न रही और वे इच्छा न रहने पर भी वापस हस्तिनापुर लौट आए, परन्तु बहुत-से ब्राह्मण पाण्डवों के साथ ही वन में चलने लगे।

धर्मराज युधिष्ठिर अपने पुरोहित धौम्य से कहने लगे- ‘भगवन्! वेदों के बड़े-बड़े पारदर्शी ब्राह्मण मेरे साथ-साथ वन में चल रहे हैं। उनके पालन-पोषण की मुझ में इस समय सामथ्र्य नहीं है, इससे मैं दुःखी हूँ।’ पुरोहित धौम्य ने कहा- ‘सूर्य की कृपा से अन्न उत्पन्न होता है। सूर्य ही समस्त प्राणियों की रक्षा करते हैं। वही सबके पिता हैं। इसलिए तुम भगवान सूर्य की आराधना इन 108 नामों से करो- सूर्य, अर्यमा, भग, त्वष्टा, पूषा, अर्क, सविता, रवि, गभस्तिमान्, अज, काल, मृत्यु, धाता, प्रभाकर, पृथ्वी-जल-तेज-वायु-आकाश स्वरूप, सोम, बृहस्पति, शुक्र, बुध, मंगल, इन्द्र, विवस्वान्, दीप्तांशु, शुचि, सौरि, शनैश्चर, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, स्कन्द, यम, वैद्युत, अग्नि, जाठरअग्नि, ऐन्धन अग्नि, तेजस्पति, धर्मध्वज, वेदकर्ता, वेदांग, वेदवाहन, सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि, कला, काष्ठा, मुहूर्त, क्षपा, याम, क्षण, संवत्सरकर, अश्वत्थ, कालचक्र, विभावसु, शाश्वत पुरुष, योगी, व्यक्त, अव्यक्त, सनातन कालाध्यक्ष, प्रजाध्यक्ष, विश्वकर्मा, तमोनुद, वरूण, सागर, अंश, जीमूत, जीवन, अरिहा, भूताश्रेय, भूतपति, सर्वलोकनमस्कृत, स्रष्टा, संवर्तक वह्नि, सर्वादि, अलोलुप, अनन्त, कपिल, भानु, कामद, सर्वतोमुख, शय, विशाल, वरद, सर्वधातुनिषेचिता, मन, सुपर्ण, भूतादि, शीघ्रग, प्राणधारक, धन्वन्तरि, धूमकेतु, आदिदेव, अदितिपुत्र, द्वादशात्मा, अरविन्दाक्ष, माता-पिता-पितामह स्वरूप, स्वर्गद्वार, प्रजाद्वार, मोक्षद्वार, त्रिविष्टप, देहकर्ता, प्रशान्तात्मा, विश्वात्मा, विश्वतोमुख, चराचरात्मा, सूक्ष्मात्मा, मैत्रेय और करूणान्वित धर्मराजा, अमित, तेजस्वी एवं कीर्तन करने योग्य भगवान सूर्य के ये 108 नाम हैं। स्वयं ब्रह्माजी ने इनका वर्णन किया है।

धौम्य ने कहा- ‘इन नामों का उच्चारण करके भगवान सूर्य को इस प्रकार नमस्कार करना चाहिए- समस्त देवता, पितर और यक्ष जिनकी सेवा करते हैं, असुर, राक्षस और सिद्ध- जिनकी वन्दना करते हैं, तपाये हुए सोने और अग्नि के समान जिनकी कान्ति है, उन भगवान भास्कर को मैं अपने हित के लिए प्रणाम करता हूँ। जो मनुष्य सूर्योदय के समय एकाग्र होकर इसका पाठ करता है उसे स्त्री, पुत्र, धन, रत्नों की राशि, धैर्य और श्रेष्ठ बुद्धि की प्राप्ति होती है। जो मनुष्य पवित्र होकर शुद्ध और एकान्त मन से भगवान सूर्य की इस स्तुति का पाठ करता है, वह समस्त शोकों से मुक्त होकर अभीष्ट वस्तु प्राप्त करता है।

श्रृंखला 61: विदुर और कुन्ती का आशीर्वाद Date :- 01-Apr-2015

जुए में हारने के बाद पाण्डव वनयात्रा की तैयारी कर रहे थे। तभी विदुर ने उनसे कहा- ‘कुन्ती का शरीर कोमल और वृद्ध है। अब वे सर्वथा आराम करने योग्य हैं। इसलिए उनका वन में जाना उचित नहीं है। अतः कुन्ती सत्कारपूर्वक मेरे घर रहें। ऐसा करना सबके लिए उचित है। युधिष्ठिर आप धर्म के मर्मज्ञ हैं। अर्जुन विजयशील हैं, भीम शत्रुनाशक हैं, नकुल धनसंग्रह कुशल हैं और सहदेव शत्रुओं को वश में करने वाले हैं। धौम्य ऋषि वेदज्ञ हैं, पतिव्रता द्रौपदी धर्म और अर्थ के संग्रह में निपुण हैं। आप सभी भाई परस्पर प्रेम-भाव से रहते हैं, आप बड़े निर्मल और संतोषी हैं। मैं आशीर्वाद देता हूँ कि आप पृथ्वी से क्षमा, सूर्यमण्डल से तेज, वायु से बल और समस्त प्राणियों से आत्मधन प्राप्त करें। कोई भी काम करना हो तो पहले ठीक-ठीक विचार कर लीजिएगा। आप अवश्य ही आनन्द से यहाँ लौटेंगे। अब आप जाइये, आपका कल्याण हो।’

युधिष्ठिर विदुर जी की बातों को सिर-आँखों चढ़ाकर भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य को प्रणाम करके वनवास के लिए चल पड़े। द्रौपदी ने अपनी सास कुन्ती व अन्य नारियों से विदा ली। माता कुन्ती ने शोकाकुल वाणी से द्रौपदी से कहा- ‘तुम स्वयंशील और सदाचार से सम्पन्न हो, इसलिए पतियों के प्रति तुम्हारे कत्र्तव्य के सम्बन्ध में शिक्षा देने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम परम साध्वी, गुणवती और दोनों कुलों की भूषण हो। निद्रोष द्रौपदी! तुमने कौरवों को शाप देकर भस्म नहीं किया, यह उनका सौभाग्य और तुम्हारा सौजन्य है। तुम्हारा मार्ग निष्कण्टक हो। सुहाग अचल रहे। कुलीन स्त्रियाँ अचानक दुःख पड़ने पर घबराती नहीं। पातिव्रत-धर्म सर्वदा तुम्हारी रक्षा करेगा और सब प्रकार से तुम्हारा मंगल होगा।’ कुन्ती को विदुरजी अपने घर ले गए।

राजा धृतराष्ट्र अपने पुत्रों का अन्याय सोचते-सोचते शोकाकुल हो गए। उन्होंने विदुर को अपने पास बुलवाया। विदुर जी के आने पर उन्होंने पूछा- ‘पाँचों पाण्डव, पुरोहित धौम्य और यशस्विनी द्रौपदी- ये सब वन में किस प्रकार हैं, मैं सुनना चाहता हूँ।’ विदुर ने कहा- ‘महाराज! यह तो स्पष्ट ही है कि आपके पुत्रों ने छल-छन्द से धर्मराज का राज्य और वैभव छीन लिया है, फिर भी विचारशील धर्मराज की बुद्धि धर्म से विचलित नहीं हुई है। कपटपूर्वक राज्य से विमुख किए जाने पर भी आपके पुत्रों के प्रति दया का भाव रखते हैं। वे अपने क्रोधपूर्ण नेत्रों को बंद किये हुए हैं, ऐसा इसलिए कि कहीं उनकी लाल-लाल आँखों के  सामने पड़कर कौरव भस्म न हो जाएँ। इसी से धर्मराज युधिष्ठिर अपना मुँह वस्त्र से ढककर रास्ते में चल रहे हैं। भीमसेन अपने बाहुबल को दिखा-दिखाकर चल रहे हैं।

श्रृंखला 60: दोबारा कपट-द्द्युत और पाण्डवों की वन यात्रा Date :- 03-Mar-2015

धृतराष्ट्र ने पाण्डवों को धन-सम्पत्ति के साथ जाने की अनुमति दे दी, यह सुनते ही दुःशासन अपने बड़े भाई दुर्योधन के पास गया और बड़े दुःख के साथ कहा कि ‘भैया! बूढ़े राजा ने हमारे बड़े कष्ट से प्राप्त धन को खो दिया। अभी कुछ सोच-विचार कर लो।’ यह सुनते ही दुर्योधन, कर्ण और शकुनि ने आपस में सलाह की और सब एक साथ ही धृतराष्ट्र के पास आए। उन्होंने बड़े विनय से कहा- ‘राजन्! यदि इस समय हम लोग पाण्डवों से प्राप्त धन के द्वारा ही राजाओं को प्रसन्न करके युद्ध के लिए तैयार कर लेते तो हमारी क्या हानि थी? देखिये, डँसने को तैयार, क्रोध में भरे साँपों को गले में लटकाकर कौन बच सकता है? इस समय पाण्डव भी सर्पों के समान ही हैं। अगर अब वे हम पर धावा बोल देंगे तो हममें से किसी को जिंदा न छोड़ेंगे। हमने एक बार उनसे बिगाड़ कर लिया है, अब वे हमें क्षमा नहीं करेंगे। द्रौपदी को जो क्लेश पहुँचा है, उसे उनमें से कोई भी क्षमा नहीं कर सकता। इसलिए हम वनवास की शर्त पर पाण्डवों के साथ फिर से जुआ खेलेंगे। जुए में जो भी हार जाए, हम या वे, बारह वर्ष तक मृगचर्म पहनकर वन में रहें और तेरहवें वर्ष किसी नगर में इस प्रकार छिपकर रहें कि किसी को पता न चले। यदि पता चल जाए कि ये कौरव या पाण्डव हैं तो फिर बारह वर्ष तक वन में रहें। इस शर्त पर आप फिर जुआ खेलने की आज्ञा दे दीजिए। यह काम बहुत आवश्यक है। यदि पाण्डव कदाचित् यह शर्त पूरी कर लेंगे तो भी हम इतने समय में बहुत-से राजाओं को अपना मित्र बना लेंगे और दुर्जय सेना इकट्ठी कर लेंगे। उस समय हम युद्ध में भी पाण्डवों को जीत सकेंगे। इसलिए आप यह बात अवश्य मान लीजिए।’

धृतराष्ट्र ने हामी भर दी। उन्होंने कहा- ‘बेटा! यदि ऐसी बात है तो अभी पाण्डवों को दूत भेजकर बुलवा लो। वे आ जाएँ तो फिर इसी शर्त पर जुए का खेल हो।’ धृतराष्ट्र की बात सुनकर द्रोणाचार्य, सोमदत्त, बाह्रलीक, कृपाचार्य, विदुर, अश्वत्थामा, युयुत्सु, भूरिश्रवा, भीष्मपितामह और विकर्ण- सभी ने एक स्वर से कहा कि ‘अब जुआ मत खेलो, शांति धारण करो।’ परन्तु पुत्रस्नेहवश धृतराष्ट्र ने अपने सभी दूरदर्शी मित्रों की सलाह ठुकरा दी। यह सब देख-सुनकर धर्मपरायणा गान्धारी अत्यन्त शोक-सन्तप्त हो रही थी। उसने अपने पति धृतराष्ट्र से कहा- ‘स्वामी! दुर्योधन जन्मते ही गीदड़ के समान रोने-चिल्लाने लगा था, इसलिए उसी समय परम ज्ञानी विदुर ने कहा था कि इस पुत्र का परित्याग कर दो। यह कुरूवंश का नाश करके छोड़ेगा। कुलकलंक दुर्योधन को त्यागना ही श्रेयस्कर है। मैंने उस समय मोहवश विदुर की बात नहीं मानी थी, यह सब उसी का फल है। याद रखिए, राजलक्ष्मी क्रूर के हाथ में पड़कर उसी का सत्यानाश कर देती है। सरल पुरुष के पास रहकर ही वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है।’

गान्धारी की बात सुनकर धृतराष्ट्र ने कहा- ‘प्रिये! यदि कुल का नाश होना ही है तो होने दो। मैं उसे रोक नहीं सकता। अब तो दुर्योधन और दुःशासन जो चाहें, वही होना चाहिए। पाण्डवों को लौट आने दो। मेरे प्रिय पुत्र फिर उनके साथ जुआ खेलेंगे।’

राजा धृतराष्ट्र के दूत प्रातिकामी ने पाण्डवों से कहा कि फिर सभा जोड़ी गई है। अतः वापस चलकर द्वारा जुआ खेलिये। शकुनि छली हैं- यह जानकर भी पाण्डव फिर से हुआ खेलने को तैयार हो गए। शकुनि ने युधिष्ठिर से कहा- हमारे महाराज ने आपकी धनराशि वापस कर दी। अब हम एक दाव और लगाना चाहते हैं। यदि आप जुए में हार गए तो मृगचर्म धारण करके बारह वर्ष तक वन में रहें और तेरहवें वर्ष किसी नगर में अज्ञातरूप से रहें। यदि उस समय कोई आपको पहचान ले तो बारह वर्ष और भी वन में रहें। अगर हम हार गए तो हम भी ऐसा ही करेंगे। इस प्रकार तेरह वर्ष पूरे होने पर आप या हम उचित रीति से अपना-अपना राज्य ले लेंगे।’ शकुनि की बात सुनकर सभी सभासद खिन्न हो गए। दुष्ट शकुनि ने महाराज धृतराष्ट्र की आज्ञा पाते ही अपने छली पासे फेंके और युधिष्ठिर से कहा कि ‘लो, मैंने यह दाव जीत लिया।’

जुए में हारकर पाण्डवों ने कृष्णमृगचर्म धारण किया और वन में जाने के लिए तैयार हो गए। दुष्ट दुःशासन ने द्रौपदी को बहुत कटु वचन बोले तथा भरी सभा में भीमसेन को ‘बैल’ कहकर निर्लज्ज की तरह नाचने-कूदने लगा। यह देख-सुनकर भीमसेन ने कहा- ‘मैं सब धनुर्धरों के सामने ही धृतराष्ट्र के सारे-के-सारे पुत्रों का संहार करके शांति प्राप्त करूँगा। यह मेरी सत्य शपथ है।’ पाण्डव राजसभा से बाहर निकले तो दुर्योधन उनको चिढ़ाने लगा। तब भीमसेन ने भरी सभा में फिर कहा- ‘मैं दुर्योधन का, अर्जुन कर्ण का और सहदेव शकुनि का नाश करेंगे। देवता हमारी बात अवश्य पूरी करेंगे। मैं गदा से दुर्योधन की जाँघ तोड़कर उसके सिर पर अपना पाँव रखूँगा और दुःशासन के कलेजे का गर्म-गर्म खून पीऊँगा।’

श्रृंखला 59: पाण्डवों को राज-सम्पदा वापस मिली Date :- 11-Feb-2015

विदुरजी ने कौरव सभा में कहा कि आप सबको द्रौपदी के प्रश्न का उत्तर अवश्य देना चाहिए। परन्तु फिर भी दुर्योधन के भयवश कोई एक शब्द भी नहीं बोला। तब द्रौपदी ने फिर कहा- ‘आज राजाओं का धर्म कहाँ गया? धर्मपरायणा स्त्री को इस प्रकार सभा में लाकर कौरवों ने अपना सनातन-धर्म नष्ट किया है। मैं पाण्डवों की सहधर्मिणी, धृष्टद्युम्न की बहन और श्रीकृष्ण की कृपापात्र हूँ। तुम लोग मुझे जीती हुई समझते हो या नहीं? स्पष्ट बतला दो, मैं वैसा ही करूँगी।’ यह सुनकर भीष्मपितामह ने कहा- ‘कल्याणी! धर्म की गति बड़ी गहन है। बड़े-बड़े विद्वान, बुद्धिमान भी उसका रहस्य समझने में भूल कर जाते हैं। जो धर्म सबसे बलवान और सर्वोपरि है, वही अधर्म के उत्थान के समय दब जाता है। तुम्हारा प्रश्न बड़ा सूक्ष्म, गहन और गौरवपूर्ण है। कोई भी निश्चयपूर्वक इसका निर्णय नहीं दे सकता। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि धर्मराज युधिष्ठिर इस प्रश्न का जैसा उत्तर दें, उसे ही प्रमाण माना जाये।’

इस प्रकार प्रश्नोत्तर हो ही रहे थे कि धृतराष्ट्र की यज्ञशाला में बहुत से गीदड़ इकट्ठे होकर ‘हुआँ-हुआँ’ करने लगे, गधे रेंकने लगे। यह भयानक कोलाहल सुनकर गान्धारी डर गई। विदुर और गान्धारी ने घबराकर राजा धृतराष्ट्र को इसकी सूचना दी। धृतराष्ट्र ने दुर्योधन से कहा- ‘हे दुर्बुद्धि! तेरा तो एकबारगी सत्यानाश हो गया। तू कुरूकुल की महिला और पाण्डवों की राजरानी को सभा में लाकर बातें बना रहा है? धृतराष्ट्र ने द्रौपदी को समझाते हुए कहा- ‘बहू! तुम परम पतिव्रता और मेरी पुत्र-वधुओं में सर्वश्रेष्ठ हो। तुम्हारी जो इच्छा हो, मुझसे माँग लो।’ द्रौपदी ने कहा- ‘राजन्! मैं यह वर माँगती हूँ कि धर्मात्मा सम्राट युधिष्ठिर दासत्व से मुक्त हो जाएँ, जिससे मेरे पुत्र प्रतिविन्ध्य को अज्ञानवश कोई दासपुत्र न कहे।’ धृतराष्ट्र ने कहा- कल्याणी! तुम्हारी इच्छा पूर्ण हुई। अब तुम और वर माँगो क्योंकि तुम एक ही वर पाने योग्य नहीं हो।’ द्रौपदी ने कहा- ‘मैं दूसरा यह वर माँगती हूँ कि रथ और धनुष के साथ भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव भी दासत्व से छूटकर स्वाधीन हो जाएँ।’ धृतराष्ट्र ने कहा- ‘सौभाग्यवती बहू! तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो। परन्तु इतने से भी तुम्हारा सत्कार नहीं हुआ। तुम और भी वर माँग लो।’ द्रौपदी ने कहा- ‘महाराज! अधिक लोभ से धर्म का नाश हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार, वैश्य को एक, क्षत्रिय-स्त्री को दो, क्षत्रिय को तीन और ब्राह्मण को सौ वर लेने का अधिकार है। इस समय मेरे पति दासता की दलदल में फँसकर भी छूट गए हैं, अब वे स्वयं सत्कर्म से शुभ पदार्थ प्राप्त कर लेंगे।’ द्रौपदी की बुद्धिमानी की सबने प्रशंसा की।

धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर से कहा- ‘हे अजातशत्राु! तुम्हारा कल्याण हो। आनन्द से रहो। तुम अपना सब धन लेकर लौट जाओ और अपने राज्य का पालन करो। युधिष्ठिर तुम बुद्धि और क्षमा का मेल हो। तुम क्षमा करो। अतः तुम धृतराष्ट्र और माता गान्धारी की ओर देखकर दुर्योधन का दुव्र्यवहार भूल जाओ। मैंने पहले तो जुए का निषेध ही किया था। तुम्हारे जैसा शासक और विदुर-जैसा मंत्री पाकर कुरूवंश धन्य हो गया है। तुम में धर्म है, अर्जुन में धीरता है, भीमसेन में पराक्रम है और नकुल व सहदेव में विशुद्ध गुरू-सेवा भाव है। धर्मराज! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम खाण्डवप्रस्थ जाओ।’

धर्मराज युधिष्ठिर बड़ी नम्रता से शिष्टाचार के साथ प्रज्ञाचक्षु धृतराष्ट्र की अनुमति प्राप्त करके अपने भाई-बन्धु एवं इष्ट-मित्रों के साथ इन्द्रप्रस्थ के लिए रवाना हुए।

श्रृंखला 58: कौरव सभा में द्रौपदी Date :- 01-Jan-2015

दुर्योधन ने छोटे भाई दुःशासन को आज्ञा दी कि तुम अभी भरी सभा में द्रौपदी को ले आओ। वह द्रौपदी से बोला कि कृष्णे! चल दुर्योधन ने तुझे जुए में जीत लिया है, अब कौरवों की दासी बनकर रह। यह सुनकर द्रौपदी का हृदय दुःख से भर आया। वह आर्तभाव से मुँह ढ़ककर राजा धृतराष्ट्र के रनिवास की ओर दौड़ी। पापी दुःशासन ने दौड़कर द्रौपदी के केश पकड़ लिए और खींचकर सभा में लाने लगा। द्रौपदी ने फिर उससे कहा- ‘अरे मूढ़ दुरात्मा दुःशासन! मैं रजस्वला हूँ, एक ही वस्त्र पहने हूँ, अतः मुझे ऐसी अवस्था में राजसभा ले जाना अनुचित है। सभा में मेरे गुरूजन व अन्य सभासद भी उपस्थित हैं, इसलिए मुझे वहाँ ले जाना किसी भी तरह से उचित नहीं है।’ इन सब बातों का दुःशासन पर कोई असर नहीं हुआ और वह द्रौपदी को केशों से खींचता हुआ दरबार में ले आया।

द्रौपदी की ऐसी विकट दशा देखकर उस समय पाण्डवों को जैसा दुःख हुआ, वैसा सम्पूर्ण राज्य और श्रेष्ठ रतनों के छिन जाने पर भी नहीं हुआ था। भरी सभा में सबको सम्बोधित करते हुए द्रौपदी ने कहा- ‘इन छली कौरवों ने धूर्तता से युधिष्ठिर को जुआ खेलने के लिए तैयार कर लिया और छल से उन्हें और उनके सर्वस्व को जीत लिया। उन्होंने अपने को हार कर मुझे दाँव पर लगाया है। क्या यह धर्म के अनुसार सही था? यहाँ सभा में अनेकों कुरूवंशी बैठे हैं, वे मेरे प्रश्न पर विचार कर ठीक-ठीक उत्तर दें।’

पाण्डवों का दुःख और द्रौपदी की कातरता देखकर धृतराष्ट्र पुत्र विकर्ण ने कहा- ‘सभासदों! द्रौपदी के प्रश्न के सम्बन्ध में हम सभी लोगों को सोच-विचार कर उत्तर देना चाहिये। इसमें त्रुटि होने पर हमें नरकगामी होना पड़ेगा।’ विकर्ण के बार-बार पूछने पर भी किसी ने कुछ नहीं कहा, तब विकर्ण ने कहा- ‘युधिष्ठिर दुर्योधन के बुलाने पर जुआ खेलने आए थे। आसक्तिवश उन्होंने शकुनि के उकसाने से स्वयं को और द्रौपदी को दाँव पर लगा दिया। द्रौपदी पाँचों पाण्डवों की पत्नी है। स्वयं हार जाने वाला व्यक्ति कभी किसी और को दाँव पर नहीं लगा सकता। अतः मैं इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि द्रौपदी जुए में नहीं हारी।’ विकर्ण की बात सुनकर सभी दरबारी उसकी प्रशंसा करने लगे।

कर्ण ने दुःशासन की ओर देखकर कहा- ‘दुःशासन! विकर्ण बालक होकर बड़े-बूढ़ों की-सी बातें कर रहा है। इस पर ध्यान मत दो और द्रौपदी व पाण्डवों के सारे वस्त्र उतार लो।’ कर्ण की बात सुनकर पाण्डवों ने अपने ऊपर के वस्त्र उतार डाले और दुःशासन बलपूर्वक द्रौपदी के वस्त्र उतारने का प्रयत्न करने लगा। जिस समय दुःशासन द्रौपदी के वस्त्र खींचने लगा, द्रौपदी भगवान कृष्ण का स्मरण करके मन-ही-मन प्रार्थना करने लगी- ‘हे गोविन्द! हे द्वारकावासी! हे सच्चिदानन्द प्रेमघन! हे गोपीजनवल्लभ! हे सर्वशक्तिमान् प्रभो! कौरव मुझे अपमानित कर रहे हैं। क्या यह बात आपको मालूम नहीं है? हे नाथ! हे रमानाथ! हे ब्रजनाथ! मैं कौरवों के समुद्र में डूब रही हूँ। आप मेरी रक्षा कीजिए।’

द्रौपदी त्रिभुवनपति भगवान श्रीकृष्ण के स्मरण में तन्मय हो मुँह ढककर रोने लगी। उसकी आर्त पुकार श्रीकृष्ण के पास पहुँची, उनका हृदय करूणा से भर आया। भक्तवत्सल प्रभु प्रेमपरवश होकर द्वारका की सेज, भोजन और लक्ष्मी को भी भूल गये और दौड़े-दौड़े द्रौपदी के पास पहुँचे। उस समय द्रौपदी अपनी रक्षा के लिए हे कृष्ण! हे विष्णो! हे हरे! इस प्रकार पुकार-पुकार कर छटपटा रही थी। धर्मस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण ने गुप्तरूप से वहाँ आकर बहुत-से सुन्दर वस्त्रों से द्रौपदी को सुरक्षित कर दिया। दुरात्मा दुःशासन जितना भी द्रौपदी के वस्त्रों को खंींचता, उतना ही वस्त्र बढ़ता जाता था। इस प्रकार दरबार में वस्त्रों का पहाड़-सा लग गया। श्रीकृष्ण की कृपा अनिवर्चनीय है। चारों ओर सभा में हलचल मच गई। सभी सभासद द्रौपदी की प्रशंसा करने लगे।

उस समय भीमसेन के होंठ क्रोध से काँप रहे थे। उन्होंने भरी सभा में हाथ-से-हाथ मलकर गरजते हुए शपथ ली- ‘देश-देशान्तर के नृपतिगण! मैं शपथ खाकर कहता हूँ कि मैं रणभूमि में भरतकुल कलंक पापी दुरात्मा दुःशासन की छाती फाड़ डालूँगा और उसका गरम-गरम खून पीऊँगा।’ भीमसेन की भीषण प्रतिज्ञा सुनकर सभी के रौंगटे खड़े हो गए। अब तक दुःशासन द्रौपदी का वस्त्र खींचते-खींचते थक गया था। वह अपनी असमर्थता पर खींझ कर लज्जा के मारे बैठ गया। चारों ओर तहलका मच गया। लोग कहने लगे कि ‘कौरव द्रौपदी के प्रश्न का उत्तर क्यों नहीं देते?’

श्रृंखला 57: जुए का आरम्भ और पाण्डवों का सर्वस्व हारना Date :- 30-Nov-2014

राजसूय यज्ञ की समाप्ति के बाद दुर्योधन हस्तिनापुर लौट आया। उसने पिता धृतराष्ट्र से कहा कि ‘मैं युधिष्ठिर की सौभाग्य-लक्ष्मी और उनके अधीन सारी पृथ्वी देखकर बेचैन हो रहा हूँ। युधिष्ठिर के यहाँ हीरों, रत्नों और मणि-माणिक्यों की इतनी राशि इकट्ठी हो गयी है कि उसके ओर-छोर का पता तक नहीं चलता।’ यह कहकर दुर्योधन ने अन्त में कहा कि अब मेरे लिए केवल दो ही मार्ग हैं- पाण्डवों की सम्पत्ति ले लेना अथवा मृत्यु। पाण्डवों की सम्पत्ति हड़पने के लिये विदुर जी के विरोध करने पर भी धृतराष्ट्र ने दुर्योधन की बात मान ली और विदुर जी को आज्ञा दी कि तुम मेरी आज्ञा से इन्द्रप्रस्थ जाओ और पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर को भाइयों सहित द्युत-क्रीड़ा के लिए शीघ्र बुला लाओ।

द्रौपदी और भाइयों सहित युधिष्ठिर हस्तिनापुर पहुँचे। वहाँ उनका यथोचित स्वागत-सत्कार हुआ। तब मामा शकुनि ने प्रस्ताव किया, ‘धर्मराज! यह सभा आपकी ही प्रतीक्षा कर रही थी। अब हमें पासे डालकर खेल शुरू करना चाहिये।’ युधिष्ठिर ने कहा- राजन्! जुआ खेलना तो छलरूप और पाप का मूल है। इसमें न तो क्षत्रियोचित्त वीरता प्रदर्शन का अवसर है और न ही कोई निश्चित नीति होती है। जुए में सदा ही कपटपूर्ण आचरण का बोलबाला रहता है।

जुआ प्रारम्भ हुआ, उस समय धृतराष्ट्र के साथ बहुत-से राजा वहाँ आकर बैठ गये, सभा में भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और विदुर आदि भी थे, पर उनके मन में बड़ा खेद था। दुर्योधन ने कहा- ‘दाँव लगाने के लिए धन और रत्न तो मैं दूँगा, परन्तु मेरी ओर से खेलेंगे मेरे मामा शकुनि।’ धीरे-धीरे जुआ आगे बढ़ा। अपनी चालाकी से शकुनि हर दाँव जीतता गया। यह अन्याय विदुर जी से नहीं देखा गया।

विदुर जी ने कहा- यह पापी दुर्योधन जिस समय गर्भ से बाहर आया था, गीदड़ के समान चिल्लाने लगा था। यह कुलभक्षण कुरूवंश के नाश का कारण बनेगा। दुर्योधन जुए के नशे में इतना उन्मत्त हो रहा है कि इसे इस बात का भी पता नहीं है कि पाण्डवों से वैर-विरोध मोल लेने का फल इसकी घोर दुर्दशा होगी। यह कुरूवंश के हित में है कि पापी दुर्योधन को दण्ड देकर ठीक किया जाए। शास्त्रों में स्पष्ट रूप में कहा गया है कि ‘कुल की रक्षा के लिए एक पुरुष का, गाँव की रक्षा के लिए एक कुल का, देश की रक्षा के लिए एक गाँव का और आत्मा की रक्षा के लिए देश को भी छोड़ दें।’ जुआ खेलना कलह का मूल है। जुए से आपस का प्रेमभाव नष्ट हो जाता है। अभी आप दुर्योधन की जीत देखकर प्रसन्न हो रहे हैं, परन्तु इसी के कारण शीघ्र ही युद्ध का आरम्भ होगा, जिसमें बहुत-से वीर मारे जाएंगे। यदि आप पाण्डवों का धन जीत भी लें, तो इससे आपका क्या भला हो जाएगा? आप पाण्डवों का धन नहीं, पाण्डवों को ही जीतिए। फिर तो उनकी सारी सम्पत्ति अपने-आप आपकी हो जाएगी। यह शकुनि छल करना खूब जानता है। बस, अब बहुत हो चुका, शकुनि को यहाँ से वापस भेज दीजिए।

विदुर जी की हितकार बातों का दुर्योधन पर कोई असर नहीं हुआ, उसने जुआ खेलना जारी रखा। धीरे-धीरे युधिष्ठिर सब धन, सारा राज्य, अपने चारों भाइयों सहित स्वयं को और अन्त में द्रौपदी को भी हार गये। यह सब देखकर सारे राजा शोकाकुल हो गये। भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य आदि महात्माओं के शरीर पसीने से लथपथ हो गये। विदुर जी सिर पकड़कर लम्बी साँस लेते हुए मुँह लटकाकर चिन्ताग्रस्त हो गये। धृतराष्ट्र हर्षिैत हो रहे थे। वे बार-बार पूछते, ‘क्या हमारी जीत हो गई।’

विजयी होने के बाद दुर्योधन ने विदुर जी को पुकारकर कहा, ‘तुम जाकर पाण्डवों की प्रियतमा द्रौपदी को शीघ्र ले आओ। वह अभागिनी यहाँ आकर हमारे महल में झाडू लगावे और दासियों के साथ रहे।’ विदुर जी ने कहा- ‘मूर्ख दुर्योधन! तुझे पता नहीं है कि तू फाँसी पर लटक रहा है और मरने वाला है। तू पाण्डवों से छेड़खानी करके यमपुरी मत जा। देख, द्रौपदी कभी दासी नहीं हो सकती। युधिष्ठिर ने अनाधिकार उसे दाँव पर लगाया है। सभासदों! जब बाँस का नाश होने वाला होता है तो उसमें फल लगते हैं। वास्तव में, मतवाले दुर्योधन ने समूल नष्ट होने के लिए ही जुए के खेल से घोर वैर और महाभय की सृष्टि की है।’

श्रृंखला 56: राजसूय यज्ञ की समाप्ति व दुर्योधन की जलन Date :- 29-Oct-2014

परम प्रतापी युधिष्ठिर यज्ञ समस्त ऐश्वर्यों से परिपूर्ण था। सारे कर्म सुखपूर्वक हुए। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण इस यज्ञ के संरक्षक थे। धर्मराज युधिष्ठिर ने बड़ी प्रसन्नता से यज्ञ पूर्ण किया। आए हुए सभी राजाओं को विदा करने के उपरांत श्रीकृष्ण धर्मराज को साथ लेकर अपनी बुआ कुन्ती के पास गए और बड़ी प्रसन्नता से बोले- ‘बुआजी! आपके पुत्रों ने सम्राट का पद प्राप्त कर लिया। इनका मनोरथ पूरा हो गया। अब आप प्रसन्नता से रहिये। मैं आपकी आज्ञा लेकर द्वारका जाना चाहता हूँ।’ इस प्रकार सुभद्रा और द्रौपदी को भी प्रसन्न कर भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका के लिए प्रस्थान किया। कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण ने क्षणभर रथ रोककर धर्मराज से कहा- ‘राजेन्द्र! जैसे मेघ समस्त प्राणियों की रक्षा करता है, जैसे विशाल वृक्ष सभी पक्षियों को आश्रय देता है, वैसे ही आप बड़ी सावधानी से प्रजा का पालन कीजिये।’

राजसूय यज्ञ समाप्त होने के पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण द्वैपायन (वेद व्यास) अपने शिष्यों के साथ युधिष्ठिर के पास आए। उन्होंने कहा कि- ‘कुन्तीनन्दन! तुमने परम दुर्लभ सम्राटपद प्राप्त करके इस देश की बड़ी उन्नति की है। यह बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम्हारे जैसे सत्पुत्र से कुरूवंश की कीर्ति बढ़ गई।’ युधिष्ठिर ने व्यास जी से पूछा- ‘मेरे मन में एक संशय है, देवर्षि नारद ने कहा था कि वज्रपात आदि दैविक, धूमकेतु आदि अन्तरिक्ष और भूकम्प आदि पार्थिव उत्पात हो रहे हैं। आप कृपा करके यह बतलाइये कि शिशुपाल की मृत्यु से उनकी समाप्ति हो गई या वे अभी बाकी हैं।’ धर्मराज युधिष्ठिर का प्रश्न सुनकर भगवान वेदव्यास ने कहा- ‘राजन्! इन उत्पातों का फल तेरह वर्ष के बाद होगा और वह होगा समस्त क्षत्रियों का संहार। उस समय दुर्योधन के अपराध से तुम्हीं निमित्त बनोगे और सब क्षत्रिय इकट्ठे होकर भीमसेन और अर्जुन के बल से मर मिटेंगे।’ यह सुनकर युधिष्ठिर ने निर्णय लिया कि मैं पुत्र और शत्रु के प्रति एक-सा बर्ताव करूँगा, क्योंकि भेदभाव ही तो लड़ाई की जड़ है।

दुर्योधन की जलन- राजसूय यज्ञ समाप्त होने के बाद दुर्योधन और शकुनि युधिष्ठिर के पास इन्द्रप्रस्थ में ही रहे। राजा दुर्योधन ने शकुनि के साथ इन्द्रप्रस्थ में ठहरकर धीरे-धीरे सारी सभा का निरीक्षण किया। उसने वहाँ ऐसा कला-कौशल देखा, जो हस्तिनापुर में कभी नहीं देखा। एक दिन सभा में घूमते समय दुर्योधन किसी स्फटिक के चैक में पहुँच गया और उसे जल समझकर उसने अपना वस्त्र उठा लिया। एक स्थान पर वह जल को स्थल समझकर गिर पड़ा और लज्जित हुआ। वह वहाँ से अभी कुछ ही आगे बढ़ा था कि स्थल के धोखे स्फटिक के समान निर्मल जल एवं कमलों से सुशोभित बावली में गिर पड़ा। उसकी यह दशा देखकर सब हँसने लगे। इसके बाद जब वह दरवाजे के आकार की स्फटिक निर्मित भीत को फाटक समझकर घुसने लगा, तब ऐसी टक्कर लगी कि उसे चक्कर आ गया। एक स्थान पर बड़े-बड़े किवाड़ धक्का देकर खोलने लगा तो दूसरी ओर गिर पड़ा। एक बार सही दरवाजे पर पहुँचकर भी धोखा समझकर उधर से लौट गया।

इस प्रकार बार-बार धोखा खाने से और यज्ञ की अद्भुत विभूति देखने से दुर्योधन के मन में बड़ी जलन एवं पीड़ा हुई। वह युधिष्ठिर से अनुमति लेकर हस्तिनापुर के लिए चल पड़ा। दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि से कहा कि पाण्डवों का यह ऐश्वर्य देखकर मेरा शरीर दिन-रात जलता रहता है। श्रीकृष्ण ने सबके सामने ही शिशुपाल को मार गिराया, किसी की विरोध करने की हिम्मत तक नहीं हुई। मैंने पहले पाण्डवों के नाश का बहुत प्रयत्न किया, परन्तु वे सभी विपत्तियों से बच गये और अब दिनोंदिन उन्नत होते जा रहे हैं। शकुनि ने कहा कि पाण्डव भाग्यानुसार प्राप्त भाग का भोग कर रहे हैं, उनसे द्वेष नहीं करना चाहिए। पाण्डवों को आज देवता भी नहीं जीत सकते, अगर तुम युधिष्ठिर के वैभव को प्राप्त करना चाहते हो तो किसी तरह पाण्डवों को द्युत-क्रीड़ा (जुआ) के लिए हस्तिनापुर में आमंत्रित कर लो क्योंकि युधिष्ठिर को जुए का बहुत शौक है, परंतु उसे जुआ खेलना नहीं आता। मैं जुए में ऐसा निपुण हूँ कि भूमण्डल में तो क्या! त्रिलोकी में भी मेरे समान कोई नहीं है। इसलिए तुम किसी तरह पाण्डवों को बुलाओ, मैं चतुराई से उनका सारा राज्य और वैभव जुए में जीतकर ले लूँगा।

श्रृंखला 55: राजसूय-यज्ञ का प्रारम्भ Date :- 01-Oct-2014

युधिष्ठिर द्वारा राजसूय-यज्ञ के लिए सभी देशों के राजाओं को आमंत्रित किया गया। पाण्डवों के सभी मित्र और रिश्तेदार भी यज्ञ में उपस्थित हुए। धर्मराज युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से पूछा कि समस्त उपस्थित राजाओं में सर्वप्रथम किसकी पूजा करें? आप किसे सर्वश्रेष्ठ और पूजा के योग्य समझते हैं? तब पितामह ने कहा कि इस समय पृथ्वी पर यदुवंश शिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण ही सबसे बढ़कर पूजा के पात्र हैं। पितामह की आज्ञा मिलते ही प्रतापी सहदेव ने विधिपूर्वक श्रीकृष्ण को अघ्र्यदान किया, चारों ओर आनन्द मनाया जाने लगा।

चेदिराज शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण की अग्रपूजा देखकर चिढ़ गया। उसने भरी सभा में भीष्म पितामह और युधिष्ठिर को धिक्कारते हुए श्रीकृष्ण को फटकारना शुरू किया। यह कृष्ण न ऋत्विज् है, न राजा है और न ही आचार्य ही है। फिर तुम पाण्डवों ने किस कामना से इसकी पूजा की है? यदि तुम्हें कृष्ण की ही अग्रपूजा करनी थी तो इन राजाओं, हम लोगों को बुलाकर इस प्रकार अपमान तो नहीं करना चाहिये था। शिशुपाल की दुष्टवाणी सुनकर सहदेव ने कहा, ‘भगवान् श्रीकृष्ण परम पराक्रमी हैं तथा जगत के समस्त प्राणियों के लिए सुखकारी हैं। इसलिए मैंने उनकी पूजा की है, जिन्हें यह बात सहन नहीं हो रही है, उनके सिर पर मैं लात मारता हूँ, जो अब विरोध करेगा मैं उसका वध कर दूँगा।’ सहदेव ने इस प्रकार कहकर जोर से लात पटकी। परन्तु उन मानी और बलवान राजाओं में से किसी की जीभ तक न हिली। आकाश से सहदेव के सिर पर पुष्पों की वर्षा होने लगी।

शिशुपाल क्रोध के मारे आग-बबूला हो गया। उसने भरी सभा में कहा कि तुम सब इस ग्वाले को क्यों मूर्खतावश पूज रहे हो? यदि इसने बचपन में किसी पक्षी (बकासुर), घोड़े (केशी) अथवा बैल (वृषभासुर) को मार ही डाला तो क्या हुआ? वे कोई युद्ध के उस्ताद तो नहीं थे। यदि इसने चेतनाहीन छकड़े (शकटासुर) को पैर मारकर उलट दिया तो क्या चमत्कार हुआ? यदि इसने गोवर्द्धन पर्वत को सात दिन तक उठा रखा तो कौन-सी अलौकिक घटना घट गई? अरे, वह पर्वत तो दीमकों की बाँबी मात्र है। जिस महाबली कंस का नमक खाकर यह पला था, उसी को इसने मार डाला। है न कृतघ्नता की हद? जिसने जन्मते ही स्त्री (पूतना) को मार डाला, उसे ही तुम जगत्पति बतलाते हो।

शिशुपाल की रूखी और कठोर बातें सुनकर प्रतापी भीमसेन क्रोध से तिलमिला उठे। सबने देखा कि भीमसेन प्रलयकालीन काल के समान दाँत पीस रहे हैं। वे क्रोध में आकर शिशुपाल पर टूटना ही चाहते थे कि भीष्म ने उन्हें रोक लिया।

शिशुपाल की जन्म कथा और वध- क्रोधित भीम को शांत करने के लिए भीष्म ने कहा कि, यह शिशुपाल जब चेदिराज के वंश में पैदा हुआ, तब इसके तीन नेत्र थे और चार भुजाएँ थीं। पैदा होते ही यह गधों के समान रेंकने-चिल्लाने लगा था। यह सब देखकर सब भयभीत थे, तभी आकाशवाणी हुई कि डरो मत, यह बड़ा बलशाली होगा, इसका पालन करो। वाणी सुनकर शिशुपाल की माता ने कहा कि मैं यह जानना चाहती हूँ कि मेरे पुत्र की मृत्यु किसके हाथों होगी। आकाशवाणी ने दोबारा कहा कि जिसकी गोद में जाने पर तुम्हारे पुत्र की दो भुजाएँ गिर पड़ें और जिसे देखने मात्र से तीसरा नेत्र लुप्त हो जाए, उसी के हाथों इसकी मृत्यु होगी।

उस समय इस विचित्र शिशु का समाचार सुनकर पृथ्वी के अधिकांश राजा इसे देखने के लिए आए थे। चेदिराज ने सबका यथोचित्त सत्कार करके बालक शिशुपाल को सबकी गोद में रखा, परंतु न तो अधिक भुजाएँ गिरीं और न तीसरा नेत्र लुप्त हुआ। भगवान श्रीकृष्ण और महाबली बलराज भी अपनी बुआ से मिलने और उनके लड़के को देखने के लिए चेदिपुरी में आए। बुआ ने अपने भतीजे श्रीकृष्ण की गोद में प्रेम से अपना बालक रख दिया। उसी समय उसकी अधिक दो भुजाएँ गिर गईं और तीसरा नेत्र गायब हो गया। शिशुपाल की माता भयभीत होकर श्रीकृष्ण से कहने लगीं कि मुझे एक वर दो कि तुम शिशुपाल के सारे अपराध क्षमा कर दोगे। तब श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ को आश्वासन दिया कि तुम चिंता ना करो, मैं इसके एक नहीं सौ अपराध भी क्षमा कर दूँगा। इसी वरदान के कारण शिशुपाल श्रीकृष्ण का भरे दरबार में अपमान कर रहा है।

शिशुपाल जोश में आकर श्रीकृष्ण की ओर रूख करके बोला, ‘कृष्ण! मैं तुम्हें ललकारता हूँ। आओ, मुझसे भिड़ जाओ। मैं पाण्डवों के साथ तुम्हें यमपुरी भेज दूँगा। पाण्डवों ने मूर्खतावश तुम्हारे जैसे ग्वाले, मूर्ख और अयोग्य की पूजा की है। अब तुम लोगों का वध ही उचित है। ये बातें सुनकर श्रीकृष्ण भरी सभा में खड़े हुए और चक्र का स्मरण किया। स्मरण करते ही चक्र उनके हाथ में चमकने लगा। श्रीकृष्ण ने उच्च स्वर से कहा- ‘नरपतियों! मैंने इसे अब तक जो क्षमा किया था, इसका कारण यह था कि मैंने इसकी माता की प्रार्थना से इसके सौ अपराध क्षमा करने की बात स्वीकार की थी। अब मेरे दिये गये वचन के अनुसार वह संख्या पूरी हो गई है। इसलिए आप लोगों के सामने ही इसका सिर धड़ से अलग किये देता हूँ।

श्रीकृष्ण ने यह कहकर उसी चक्र से शिशुपाल का सिर काट डाला, उसी समय उसके शरीर से सूर्य के समान प्रकाशमान एक श्रेष्ठ ज्योति निकली, उसने श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और सबके देखते-देखते ही वह श्रीकृष्ण के अन्दर समा गई। यह अद्भुत घटना देखकर उपस्थित जनता आश्चर्यचकित हो गई।

श्रृंखला 54: जरासन्ध-वध और बंदी राजाओं की मुक्ति Date :- 01-Sep-2014

जब जरासन्ध युद्ध करने के लिए उद्यत हो गया, तब श्रीकृष्ण ने पूछा- ‘बताओ, तुम हम में से किसके साथ युद्ध करना पसन्द करोगे।’ घमंडी जरासन्ध ने भीमसेन के साथ कुश्ती लड़ना स्वीकार किया।

बलवान भीमसेन ने श्रीकृष्ण से परामर्श लेकर ब्राह्मणों से स्वस्तिवाचन कराया और जरासन्ध से भिड़ने के लिए अखाड़े में उतर गए। दोनों खम और ताल ठोंकते हुए परस्पर गुथ गए। उन्होंने तृणपीड, पूर्णयोग, समुष्टिक आदि अनेकों दाव-पेंच किये। उनकी कुश्ती अपूर्व थी। उनका मल्ल युद्ध देखने के लिए हजारों नगरवासी इकट्ठे हो गये। उनके प्रहार और छीना-झपटी से बड़ी कर्कश ध्वनि होने लगी। कभी वे हुंकार करते हुए घूँसों का प्रहार करते। वे जिधर जाते, उधर की जनता भाग खड़ी होती।

यह युद्ध कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर लगातार तेरह दिन बिना रूके चलता रहा। चैदहवें दिन रात के समय जरासन्ध थककर कुछ ढीला पड़ गया। उसी समय भीमसेन ने जरासन्ध को उठा लिया और बड़े जोर से उसे आकाश में घुमाया, सौ बार घुमाकर उसे जमीन पर पटका और घुटनों के चोट से उसकी पीठ की रीढ़ तोड़कर पीस दिया। इतना करने के पश्चात् भी जरासन्ध पराजित नहीं हुआ। भीमसेन उसे लगातार लात-घूँसों से मारे जा रहा था, तब निराश होकर भीमसेन ने भगवान श्रीकृष्ण की ओर देखा। श्रीकृष्ण ने इशारे से भीमसेन से कहा कि इसके चीर कर दो टुकड़े कर दो। अगले क्षण भीम ने हुँकार करके उसका एक पैर पकड़ा और दूसरे पैर पर अपना पैर रखकर उसे दो खण्डों में चीर डाला। जरासन्ध की इस दुर्दशा और भीमसेन की गर्जना से उपस्थित जन-समुदाय भयभीत हो गया। भीमसेन ने जरासन्ध के प्राणहीन शरीर को रनिवास की ड्यौढ़ी पर डाल दिया।

तत्पश्चात् श्रीकृष्ण ने जरासन्ध के ध्वजमण्डित दिव्य रथ को जोता, उस पर भीमसेन और अर्जुन को बैठाया और वहाँ से चलकर कैदी राजाओं को पहाड़ी किले से बाहर निकाला। उस दिव्य रथ का नाम सोदर्यवान् था। दो महारथी उस पर बैठकर एक साथ युद्धकर सकते थे। सभी बंदी राजाओं ने श्रीकृष्ण की विधिपूर्वक पूजा की। सभी राजाओं ने नम्रता से झुककर कहा- ‘हमें कुछ आज्ञा दीजिये, हम आपका कठिन-से-कठिन काम भी करेंगे।’ भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा- ‘धर्मराज युधिष्ठिर चक्रवर्तीपद प्राप्त करने के लिए राजसूय यज्ञ करना चाहते हैं। आप लोग उनकी सहायता कीजिये।’ राजाओं की प्रसन्नता की सीमा न रही। उन्होंने हृदय से यह प्रस्ताव स्वीकार किया।

भगवान श्रीकृष्ण भीमसेन और अर्जुन के साथ इन्द्रप्रस्थ वापस लौटे। महाराज युधिष्ठिर को जरासन्ध-वध का समाचार सविस्तार बताया। जरासन्ध की मृत्यु से सभी पाण्डव आनन्दित हुए। उन्होंने सभी बन्धनमुक्त राजाओं से मिल भेंटकर उनका यथोचित्त आदर-सत्कार किया और समय पर उन्हें विदा किया। सब राजा धर्मराज से अनुमति लेकर बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने-अपने देश चले गये।

परम प्रवीण भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज से अनुमति प्राप्त कर उसी रथ पर, जो जरासन्ध के यहाँ से ले आए थे, सवार होकर द्वारका की यात्रा की। इस ऐतिहासिक विजय एवं राजाओं को छुड़ाकर अभय देने के कारण पाण्डवों का यश चारों दिशाओं में फैल गया। धर्मराज युधिष्ठिर समय के अनुसार धर्म पर दृढ़ रहकर प्रजा-पालन करने लगे।

एक दिन अर्जुन ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा कि- ‘यदि आप आज्ञा दें तो मैं दिग्विजय के लिए जाउँ और पृथ्वी के सभी राजाओं से आपके लिए कर वसूल करूँ।’ युधिष्ठिर ने अर्जुन को उत्साहित करते हुए कहा- ‘अवश्य, तुम्हारी विजय निश्चित है।’ युधिष्ठिर की आज्ञा प्राप्त करके चारों भाइयों ने दिग्विजय-यात्रा की। अर्जुन ने उत्तर दिशा की विजय का भार लिया। भीमसेन बहुत बड़ी सेना लेकर पूर्व दिशा पर विजय के लिए चल पड़े। सहदेव ने भी बड़ी सेना के साथ दक्षिण दिशा की विजय के लिए प्रस्थान किया तथा नकुल ने उसी समय सेना लेकर पश्चिम दिशा की विजय यात्रा की। ये सभी चारों भाई सुन्दर-सुन्दर वस्तुओं की भेंट लेकर समस्त राजाओं को अपने अधीन कर इन्द्रप्रस्थ लौट आये।

श्रृंखला 53: जरासन्ध की उत्पत्ति और शक्ति का वर्णन Date :- 01-Aug-2014

धर्मराज युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा कि यह जरासन्ध कौन है? इसे इतनी शक्ति और पराक्रम कहाँ से प्राप्त हुआ? भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- कुछ समय पहले मगध देश में बृहद्रथ नाम का राजा राज्य करता था। उसने काशिराज की दो सुन्दर कन्याओं से विवाह किया, परन्तु काफी समय होने के उपरांत भी उसे पुत्र-रत्न की प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन राजा बृहद्रथ ने सुना कि गौतम कक्षीवान् के पुत्र महात्मा चण्डकौशिक तपस्या से उपराम होकर इधर आये हैं और वे एक वृक्ष के नीचे ठहरे हुए हैं। राजा अपनी दोनों रानियों के साथ उनके पास गये और कहा कि मैं संतानहीन हूँ। मुझ पर कृपा करो। महर्षि ने एक आम का फल अभिमंत्रित कर राजा को दे दिया। राजा ने महल पहुँचकर वह फल अपनी दोनों रानियों को दे दिया। उन्होंने उस फल के दो टुकड़े कर आधा-आधा खा लिया।

संयोग की बात, दोनों रानियों को गर्भ रह गया। राजा की प्रसन्नता की सीमा न रही। समय आने पर दोनों के गर्भ से एक-एक टुकड़ा पैदा हुआ। प्रत्येक में एक आँख, एक बाँह, एक पैर, आधा पेट, आधा मुँह और आधी कमर थी। उन्हें देखकर दोनों रानियाँ काँप उठीं। उन्होंने दुःख से घबराकर यही सलाह की कि इन दोनों टुकड़ों को फेंक दिया जाये। दोनों की दासियों ने आज्ञा पाते ही दोनों सजीव टुकड़ों को भलीभाँति ढ़ककर महल के बाहर डाल दिया।

वहाँ एक राक्षसी रहती थी। उसका नाम जरा था, वह खून पीती और माँस खाती थी। उसने उन टुकड़ों को उठाया और संयोगवश सुविधा से ले जाने के लिए एक साथ जोड़ दिया। बस, अब क्या! दोनों टुकड़े मिलकर एक महाबली और परम पराक्रमी राजकुमार बन गया। जरा राक्षसी आश्चर्यचकित हो गई। जरा राक्षसी राजपरिवार की स्थिति, ममता, लालसा और व्याकुलता तथा बालक का मुँह देखकर सोचने लगी कि ‘मैं इस राजा के देश में रहती हूँ। इसे संतान की बड़ी अभिलाषा है, इसलिए नवजात राजकुमार को नष्ट करना अनुचित है।’ अब जरा मनुष्यरूप धारणकर बालक को गोद में लिए राजा के पास आकर बोली- ‘राजन्! यह लीजिये अपना पुत्र। महर्षि के आशीर्वाद से आपको यह प्राप्त हुआ है। मैंने इसकी रक्षा की है, आप इसे स्वीकार कीजिए।’ राक्षसी के इस प्रकार कहते ही रानियों ने उसे अपनी गोद में ले लिया।

राजा बृहद्रथ यह सब देख-सुनकर आनन्द से फूल उठे। उन्होंने मनुष्यरूपधारी राक्षसी से पूछा- ‘मुझे पुत्र देने वाली तुम कौन हो?’ जरा ने कहा- ‘मैं जरा नाम की राक्षसी हूँ। मैं आदरपूर्वक आराम से आपके महल में रहती हूँ। मैं आपके घर में सर्वदा सत्कार पाती हूँ, आपसे प्रसन्न हूँ। इसलिए आपका पुत्र आपको सौंप रही हूँ।’ यह कहकर राक्षसी जरा अन्तध्र्यान हो गई। बृहद्रथ ने अपने पुत्र का नामकरण करते हुए कहा कि इस बालक को जरा ने सन्धित किया है (जोड़ा है), इसलिए इसका नाम ‘जरासंध’ होगा।

कुछ समय के बाद महर्षि चण्ड कौशिक पुनः मगध देश में आये। राजा ने उनकी बड़ी आवभगत की। महर्षि ने कहा कि जरासन्ध के जन्म की सारी बातें मुझे दिव्य दृष्टि से मालूम हो गईं थीं। तुम्हारा पुत्र बड़ा तेजस्वी, ओजस्वी, बलवान और रूपवान होगा। कोई भी इसका मुकाबला नहीं कर सकेगा। देवताओं के अस्त्र-शस्त्र भी इसे चोट नहीं पहुँचा सकेंगे। इतना कहकर महर्षि चण्डकौशिक चले गये। राजा बृहद्रथ ने जरासन्ध का राज्याभिषेक कर स्वयं अपनी रानियों सहित वन में चले गये।

जरासन्ध का वध करने के लिए महाराज युधिष्ठिर से आज्ञा लेकर भगवान श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुन ने मगध देश के लिए प्रस्थान किया। वहाँ पहुँचकर श्रीकृष्ण ने जरासन्ध से भेंट करने के बाद कहा कि ‘तुम इस घमण्ड में फूले रहते हो कि मेरे समान कोई योद्धा क्षत्रिय नहीं है, यह तुम्हारा भ्रम है। इस विशाल पृथ्वी पर तुमसे भी अधिक वीर हैं। तुम या तो समस्त कैदी राजाओं को छोड़ दो अथवा हमारे साथ युद्ध करके परलोक सिधारो। अभिमानवश जरासन्ध उनसे युद्ध करने के लिये तैयार हो गया।

श्रृंखला 52: सभा-भवन का निर्माण व राजसूय यज्ञ के लिये श्रीकृष्ण से मंत्रणा Date :- 01-Jul-2014

मयासुर ने अर्जुन से कहा कि आपने मेरे प्राणों की रक्षा की है, अतः मैं बड़े प्रेम से आपकी कुछ सेवा करना चाहता हूँ। मैं दानवों का विश्वकर्मा हूँ। मन-ही-मन विचार कर भगवान श्रीकृष्ण ने मयासुर से कहा कि तुम धर्मराज युधिष्ठिर के लिए अपनी रूचि के अनुसार एक सभा बना दो। वह सभा ऐसी हो कि चतुर-से-चतुर शिल्पी भी देखकर उसकी नकल न कर सके। मयासुर ने महाराज युधिष्ठिर की सलाह के अनुसार सभा बनाने के सम्बन्ध में विचार किया और फिर शुभ मुहूर्त में मंगल-अनुष्ठान आदि करके सर्वगुणसम्पन्न एवं दिव्य सभा का निर्माण करने के लिए दस हजार हाथ चैड़ी जमीन नाप ली। तत्पश्चात् भगवान श्रीकृष्ण बुआ कुन्ती और पाण्डवों से विदा लेकर तथा अपनी बहन सुभद्रा से मिलकर द्वारका नगरी लौट गए।

अर्जुन से आज्ञा लेकर मयासुर बिन्दुसर पर पहुँचा, वहाँ दैत्यराज वृषपर्वा की एक बड़ी विचित्र रत्नमण्डित एवं मजबूत गदा है। वह लाखों गदाओं की तुलना में अद्वितीय है। वह अर्जुन गाण्डीव के धनुष के समान भीमसेन के योग्य है। देवदत्त नाम का शंख भी वही है, जिसे लाकर मयासुर ने अर्जुन को दिया और भीमसेन को वह अद्भुत गदा प्रदान की। इस शंख की गम्भीर ध्वनि से तीनों लोक काँप उठते थे।

मयासुर ने महाराज युधिष्ठिर के लिए मणिमय दिव्य सभा का निर्माण किया। वह ऐसी जान पड़ती, मानो सूर्य, अग्नि अथवा चन्द्रमा की सभा हो। उस सभा-भवन में एक दिव्य सरोवर भी था। बड़े-बड़े समझदार भी जल को स्थल समझकर धोखा खा जाते थे, मयासुर ने केवल चैदह महीने में इस अद्भुत सभा का निर्माण करके धर्मराज युधिष्ठिर को सौंपा।

नवनिर्मित सभा में देवर्षि नारद जी पधारे। महाराज युधिष्ठिर ने उनका बहुत ही स्वागत-सत्कार किया तथा उन्हें विधिपूर्वक योग्य आसन पर बैठाया। नारद जी ने पाँचों पाण्डवों को प्रश्न-रूप में अद्भुत और कल्याणकारी उपदेश दिया। इसके उपरांत नारद जी ने युधिष्ठिर को यमराज, वरूण, इन्द्र, कुबेर एवं ब्रह्मा की सभाओं का विवरण सुनाया। युधिष्ठिर ने नारद जी से पूछा कि पितृलोक में आपने मेरे पिताश्री पाण्डु को किस प्रकार देखा था? तथा उन्होंने हमारे लिए क्या आदेश दिया था? आप कृपा करके उनका आदेश हमें अवश्य सुनाइये।

नारद जी ने बताया कि आपके पिता पाण्डु स्वर्गीय हरिश्चन्द्र का ऐश्वर्य देखकर विस्मित हो गए। वे एकछत्र सम्राट थे। उन्होंने अकेले ही सब पर दिग्विजय प्राप्त की थी तथा महान यज्ञ राजसूय का अनुष्ठान किया था। इसी कारण देवराज इन्द्र की सभा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। ये सब देखकर आपके पिताश्री पाण्डु ने मेरे हाथों यह संदेश आपको भिजवाया है कि तुम राजसूय यज्ञ करोगे तो मैं भी देवराज इन्द्र की सभा में हरिश्चन्द्र के समान चिरकालपर्यन्त आनन्द भोगूँगा। यह समाचार देकर नारद जी ने वहाँ से प्रस्थान किया।

देवर्षि नारद की बात सुनकर धर्मराज राजसूय यज्ञ की चिंता में बेचैन हो गए। सभा के सभी प्रमुख सभासदों से विचार-विमर्श करने पर सबने महाराज को राजसूय यज्ञ करने की सलाह दी, परन्तु महाराज युधिष्ठिर का मन भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा के अनुसार कार्य करने का था। अतः उन्होंने शीघ्र ही अपने विश्वस्त दूतों के द्वारा कृष्ण जी को द्वारका से बुलाने के लिए शीघ्रगामी रथ से भेजा।

इन्द्रप्रस्थ पहुँचकर कृष्णजी ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा कि आप सभी गुणों में सम्पन्न होने के नाते राजसूय यज्ञ के वास्तव में अधिकारी हैं। फिर भी इस समय राजा जरासन्ध ने अपने बाहुबल से सब राजाओं को हराकर अपनी राजधानी में कैद कर रखा है। इस समय वही सबसे प्रबल राजा है। प्रतापी शिशुपाल उसी का आश्रय लेकर सेनापति का काम कर रहा है। कितने ही राजा जरासन्ध से भयभीत होकर भाग गये हैं। दानवराज कंस जाति-भाइयों को बहुत सताकर राजा बन बैठा था। जब उसकी अनीति बहुत बढ़ गई, तब मैंने सबके कल्याण के लिए बलराम को साथ लेकर उसका वध किया। ऐसा करने से कंस का भय तो जाता रहा, परन्तु जरासंध और भी प्रबल हो उठा। जरासंध अपनी शक्ति से राजाओं को जीतकर अपने पहाड़ी किले में बंद कर देता है। इसलिए हे युधिष्ठिर! और राजाओं पर विजय प्राप्त करने की चिंता छोड़कर सबसे पहले उन कैदी राजाओं को छुड़ाना चाहिए। अतः यदि आप राजसूय यज्ञ करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम आपका कत्र्तव्य है कि कैदी राजाओं की मुक्ति और जरासंध का वध। यह काम किये बिना राजसूय यज्ञ नहीं हो सकेगा।

भगवान कृष्ण की बात सुनकर भीमसेन ने कहा- ‘सावधान, उद्योगी और नीति-निपुण राजा कम शक्ति होने पर भी बलवान शत्रु को जीत लेता है। श्रीकृष्ण में नीति है, मुझ में बल है और अर्जुन में विजय पाने की योग्यता है, इसलिए हम तीनों मिलकर जरासंध के वध का काम पूरा कर लेंगे।’ भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, ‘हम लोग उसे युद्ध के लिए बाध्य करके जीत सकते हैं। छियासी राजाओं को वह कैद कर चुका है, चैदह और बाकी हैं। फिर वह सबका वध करना चाहता है, जो उसके इस क्रूर कर्म को रोकेगा, वह बड़ा यशस्वी होगा और जो जरासंध पर विजय प्राप्त करेगा, निश्चय ही वह सम्राट होगा।’

श्रृंखला 51: खाण्डव-दाह की कथा Date :- 01-Jun-2014

एक बार भगवान कृष्ण और अर्जुन महाराज युधिष्ठिर की आज्ञा से जल-विहार करने यमुना तट पर गए। तभी एक तेजस्वी ब्राह्मण के रूप में अग्निदेव उपस्थित हुए। उन्होंने कहा कि मैं इस खाण्डव-वन को जलाना चाहता हूँ, पर वन में तक्षक नाग अपने परिवार और मित्रों के साथ रहता है, इसलिए सर्वदा देवराज इन्द्र मुझ पर जल की धारा उड़ेल देता है और मैं खाण्डव वन नहीं जला पाता।

अर्जुन ने पूछा कि हे अग्निदेव! आप अनेकों प्राणियों से भरे एवं इन्द्र के द्वारा सुरक्षित खाण्डव वन को ही क्यों जलाना चाहते हो? तब अग्निदेव ने कहा कि श्वेतार्क नामक राजा ने बहुत बड़े-बड़े यज्ञ किए। एक बार उन्होंने लगातार बारह वर्ष तक यज्ञ किया। उस यज्ञ में मैंने (अग्निदेव) घी की अखण्ड धाराएँ पी थीं, इससे मेरी पाचनशक्ति क्षीण हो गयी तथा अजीर्ण के कारण अंग-अंग ढीला पड़ गया। तब ब्रह्माजी ने मुझे उपचार बताया था कि यदि मैं इस खाण्डव वन को जला दूँ तो इसकी वनस्पति व जड़ी-बूटी से मेरा अजीर्ण रोग दूर हो जाएगा। अतः ब्रह्माजी के कहने पर ही मैं आपकी सहायता लेने आया हूँ।

अग्निदेव की बात सुनकर अर्जुन ने कहा कि मेरे पास दिव्यास्त्रों की कमी नहीं है, परंतु मेरे बाहुबल को सम्भाल सकने वाला धनुष मेरे पास नहीं है। रथ भी ऐसा नहीं है जो यथेष्ट बाणों का बोझ ढो सके। बल और कौशल हमारे पास है, सामग्री आप दीजिए। अर्जुन की वाणी सुनकर अग्निदेव ने जलाधिपति लोकपाल वरूण का स्मरण किया। तुरंत वरूण देव प्रकट हो गए। अग्निदेव ने कहा, ‘आपको राजा सोम ने जो अक्षय तरकस, गाण्डीव धनुष और वानरचिन्ह युक्त ध्वजा से मंडित दिव्य रथ दिया है, वह शीघ्र मुझे दीजिए तथा चक्र भी दीजिए। वरूण ने अग्निदेव की प्रार्थना स्वीकार की। उन्होंने अर्जुन को वह अक्षय तरकस और गाण्डीव धनुष दे दिया।

गाण्डीव धनुष की महिमा अद्भुत है। वह किसी भी शस्त्र से कट नहीं सकता और सभी शस्त्रों को काट सकता है। वह अकेले ही लाखों धनुषों के समान, तीनों लोकों में पूजित तथा प्रशंसित है। समस्त सामग्रियों से युक्त सबके लिए अजेय, सूर्य के समान देदीप्यमान और रत्नजडि़त एक दिव्य रथ भी दिया। उस रथ में मन और पवन के समान तेज चलने वाले सफेद चमकीले गन्धर्व देश के घोड़े जुते हुए थे। रथ पर सुवर्ण के डंडे में भयंकर वानर के चिन्ह से चिन्हित ध्वजा फहरा रही थी। यह सब पाकर अर्जुन के आनन्द की सीमा न रही।

अग्निदेव ने भगवान श्रीकृष्ण को दिव्य चक्र और आग्नेयशास्त्र देते हुए कहा कि हे मधुसूदन! इस चक्र के द्वारा आप जिसे चाहेंगे, उसे मार डालेंगे। इस चक्र के प्रभाव के सामने समस्त देवता, दानव, राक्षस, पिशाच, नाग और मनुष्यों की शक्ति कुछ भी नहीं है। यह चक्र हर बार चलाने पर शत्रु का नाश करके फिर लौट आया करेगा। वरूण देव ने भगवान श्रीकृष्ण की सेवा में दैत्यनाशिनी एवं वज्रध्वनि के समान शब्द से शत्रुओं का दिल दहला देने वाली कौमोद की गदा अर्पित की। अब श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अग्निदेव की सहायता करना स्वीकार कर लिया और उन्हें खाण्डव वन जलाने की अनुमति दी।

भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन की अनुमति पाकर अग्निदेव ने तेजोमय दावानल का प्रदीप्त रूप धारण किया। अपनी सातों ज्वालाओं से खाण्डव-वन को घेर कर प्रलय-सा उपस्थित करते हुए उसे भस्मसात् करना प्रारम्भ किया। इन्द्र ने इस अग्नि को शांत करने की बहुत चेष्टा की, पर अर्जुन के बाण और श्रीकृष्ण के चक्र के आगे उसे पराजित होना पड़ा। तभी भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि मय दानव यकायक तक्षक के निवास-स्थान से निकल कर भागा जा रहा है और अग्नि उसे जलाने के लिए तत्पर है। उन्होंने मय को मारने के लिए चक्र उठाया। आगे चक्र और पीछे धधकती आग को देखकर उसने अर्जुन को पुकारा कि मेरी रक्षा करो, मैं आपकी शरण हूँ। यह सुनकर श्रीकृष्ण ने अपना चक्र वापस बुला लिया व अग्नि ने भी उसे भस्म नहीं किया।

अग्निदेव ने खाण्डव-वन को लगातार पंद्रह दिनों तक जलाकर राख कर दिया। उसी समय देवराज इन्द्र भी देवताओं के साथ अंतरिक्ष से वहाँ उतरे। उन्होंने कहा कि मैं आप लोगों से प्रसन्न हूँ, अतः आप दुर्लभ-से-दुर्लभ वस्तु भी मुझसे माँग सकते हो। तब अर्जुन ने इन्द्र से सब प्रकार के अस्त्र माँगे। इन्द्र ने कहा, अर्जुन, जिस समय देवाधिदेव महादेव तुम पर प्रसन्न होंगे, उस समय तुम्हारे तप के प्रभाव से मैं तुम्हें अपने सारे अस्त्र दे दूँगा। मैं जानता हूँ कि वह समय कब आयेगा। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- देवराज, आप मुझे यह वर दीजिये कि मेरी और अर्जुन की मित्रता क्षण-क्षण बढ़ती जाये और कभी न टूटे। इन्द्र ने प्रसन्न होकर कहा- ‘एवमस्तु’।

श्रृंखला 50: सुभद्राहरण और अभिमन्यु आदि कुमारों का जन्म Date :- 01-May-2014

तीर्थयात्रा करते हुए अर्जुन प्रभासक्षेत्र पहुँचे, वहाँ पर श्रीकृष्ण अर्जुन से मिलने आए। वहाँ से रथ पर सवार होकर दोनों मित्र द्वारका पहुँचे। एक बार रैवतक पर्वत पर यादवों ने बड़ा उत्सव मनाया। सभी प्रधान यादवों के साथ कृष्णजी की बहन सुभद्रा भी उपस्थित थी। इसी रूप-राशि से मोहित होकर अर्जुन एकटक उसकी ओर देखने लगे। श्रीकृष्ण ने अर्जुन का अभिप्राय जानकर कहा कि क्षत्रियों में बलपूर्वक हरण कर विवाह करने की भी नीति है। तुम्हारे लिए यही मार्ग प्रशस्त (उत्तम) है।

एक दिन सुभद्रा रैवतक पर्वत पर देवपूजा करके लौट रही थी, तब अवसर पाकर अर्जुन ने बलपूर्वक उसे उठाकर रथ में बिठा लिया। सैनिकों ने सुभद्राहरण का समाचार राजसभा में पहुँचाया। सभी यादव अर्जुन से युद्ध करने के लिए तैयारी करने लगे। तभी बलराम जी ने सबको रोका और कृष्ण जी से कहा कि जनार्दन! तुम्हारी इस चुप्पी का क्या अभिप्राय है? तुम्हारा मित्र समझकर सबने अर्जुन का इतना सम्मान किया, परन्तु उसने जिस पत्तल में खाया, उसी में छेद किया। ऐसा करके अर्जुन ने हमारा अपमान किया है। यह सुनकर श्रीकृष्ण बोले कि अर्जुन ने हमारा अपमान नहीं सम्मान किया है। उसने हमारे वंश की महत्ता समझकर ही हमारी बहन का हरण किया है। सुभद्रा और अर्जुन की जोड़ी बहुत ही सुन्दर होगी। यह सुनकर सब लोगों ने श्रीकृष्ण की बात मान ली।

सम्मान के साथ अर्जुन लौटा लाये गये। द्वारका में सुभद्रा के साथ उनका विधिपूर्वक विवाह संस्कार सम्पन्न हुआ। एक वर्ष द्वारका में रहकर शेष समय पुष्कर क्षेत्र में व्यतीत करके बारह वर्ष पूरे होने पर वे सुभद्रा के साथ इन्द्रपस्थ लौट आए। माता कुन्ती और युधिष्ठिर के चरणों में उन दोनों ने प्रणाम किया। सुभद्रा ने द्रौपदी के चरण छूकर कहा कि बहन मैं आपकी दासी हूँ, द्रौपदी ने उसे गले लगा लिया।

समय आने पर सुभद्रा के गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न हुआ, उसका नाम अभिमन्यु रखा गया। अभिमन्यु ने वेदाध्ययन के बाद अर्जुन से ही धनुर्वेद की शिक्षा ग्रहण की। अभिमन्यु का अस्त्र कौशल देखकर अर्जुन को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे बहुत-से गुणों में तो भगवान श्रीकृष्ण के तुल्य थे।

द्रौपदी के गर्भ से भी पाँचों पाण्डवों के द्वारा एक-एक वर्ष के अन्तर पर पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। ब्राह्मणों ने युधिष्ठिर से कहा, ‘महाराज! आपका पुत्र शत्रुओं का प्रहार सहन करने में विन्ध्याचल के समान होगा, इसलिये उसका नाम ‘प्रतिविन्ध्य’ होगा। भीमसेन ने एक सहस्र सोमयाग करके पुत्र उत्पन्न किया है, इसलिये उनके पुत्र का नाम ‘सुतसोम’ होगा। अर्जुन ने बहुत-से प्रसिद्ध कर्म करने के अनन्तर लौटकर पुत्र उत्पन्न किया है, इसलिये इस बालक का नाम होगा ‘श्रुतकर्मा’। कुरुवंश में पहले शतानीक नाम के एक बड़े प्रतापी राजा हो गये हैं। नकुल अपने पुत्र का नाम उन्हीं के नाम पर रखना चाहते हैं, इसलिये इस पुत्र का नाम ‘शतानीक’ होगा। सहदेव का पुत्र कृत्तिका नक्षत्र में उत्पन्न हुआ है, इसलिये उसका नाम ‘श्रुतसेन’ होगा। धौम्य ने इन बालकों के संस्कार विधिपूर्वक कराये। बालकों ने वेदपाठ समाप्त करके अर्जुन से दिव्य और मानुष युद्ध की अस्त्रशिक्षा प्राप्त की। इन सब बातों से पाण्डवों को बड़ी प्रसन्नता हुई।

श्रृंखला 49: नियम भंग के कारण अर्जुन का वनवास एवं उलूपी और चित्रांगदा के साथ विवाह Date :- 01-Apr-2014

पाण्डवों ने अपने शारीरिक बल और अस्त्रकौशल से एक-एक करके राजाओं को वश में कर लिया। द्रौपदी सभी पाण्डवों के अनुकूल रहती। पाण्डव भी उसे पाकर बहुत संतुष्ट और सुखी हुए। वे धर्मानुसार प्रजा का पालन करते थे।

एक दिन की बात है। लुटेरों ने किसी ब्राह्मण की गौएँ लूट लीं। ब्राह्मण इन्द्रप्रस्थ आकर पाण्डवों के सामने करूण-क्रन्दन करने लगा। उसने कहा, ‘जो राजा प्रजा से कर लेकर भी उसकी रक्षा का प्रबंध नहीं करता, वह निस्संदेह पापी है। अतः तुम्हें उचित है कि पूरी शक्ति से मेरी गौओं की रक्षा करो। अर्जुन ने ब्राह्मण को ढाँढ़स बंधाया। परन्तु उसके सामने अड़चन यह थी कि जिस घर में राजा युधिष्ठिर द्रौपदी के साथ बैठे हुए थे, उसी घर में उनके अस्त्र-शस्त्र रखे थे। नियमानुसार अर्जुन उस घर में नहीं जा सकते थे। एक ओर कौटुम्बिक नियम, दूसरी ओर ब्राह्मण की करूण पुकार। अर्जुन बड़े असमंजस में पड़ गए। यदि मैं ब्राह्मण की उपेक्षा कर दूँगा तो राजा को अधर्म होगा और पाप भी लगेगा। दूसरी ओर प्रतिज्ञा-भंग करने से भी पाप लगेगा और वन में जाना पड़ेगा। अन्त में, अर्जुन ने निर्णय लिया कि मैं ब्राह्मण के गोधन की रक्षा करूँगा, यह मेरे जीवन की रक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण है। यह निर्णय कर अर्जुन राजा युधिष्ठिर के घर में निस्संकोच चले गए। राजा से अनुमति लेकर धनुष उठाया और आकर ब्राह्मण के साथ जाकर लुटेरों को परास्त कर सारा गोधन वापस ले लिया। नागरिकों ने अर्जुन की बड़ी प्रशंसा की।

अर्जुन ने युधिष्ठिर के पास जाकर कहा, ‘भाई जी! मैंने आपके एकान्तगृह में जाकर प्रतिज्ञा तोड़ी है। इसलिए मुझे बारह वर्ष तक वनवास करने की आज्ञा दीजिए क्योंकि हम लोगों में सहमति से ऐसा नियम बन चुका है।’ यकायक अर्जुन के मुख से ऐसी बात सुनकर युधिष्ठिर शोक में पड़ गए। युधिष्ठिर ने व्याकुल होकर कहा कि यदि तुमने नियम-भंग किया भी है तो उसे मैं क्षमा करता हूँ। मेरे अन्तःकरण में उससे तनिक भी दुःख नहीं हुआ, तुमने तो बहुत अच्छा काम किया। बड़ा भाई स्त्री के साथ बैठा हो तो वहाँ छोटे भाई का जाना अपराध नहीं है। छोटा भाई स्त्री के साथ बैठा हो तो वहाँ बड़े भाई को नहीं जाना चाहिए। अतः तुम वनवास का विचार छोड़ दो। इसमें न तो तुम्हारे धर्म का लोप हुआ है और न मेरा अपमान।

अर्जुन ने कहा कि भईया आप ही कहते हैं कि धर्म-पालन में बहानेबाजी नहीं करनी चाहिए। मैं शस्त्र छूकर सच-सच कहता हूँ कि अपनी सत्य प्रतिज्ञा को कभी नहीं तोडूँगा। अर्जुन ने वनवास की दीक्षा ली और बारह वर्ष तक वनवास के लिए चल पड़े। अर्जुन के साथ बहुत-से वेद-वेदान्त के मर्मज्ञ, अध्यात्म-चिंतक, भगवद्भक्त, त्यागी ब्राह्मण, कथावाचक, वानप्रस्थ और भिक्षाजीवी भी चले। सैकड़ों वन, सरोवर, नदी, पुण्यतीर्थ, देश एवं समुद्र के दर्शन करते हुए अंत में हरिद्वार पहुँचकर वे कुछ दिनों के लिए ठहर गये।

एक दिन अर्जुन स्नान करने के लिए गंगाजी में उतरे। वे स्नान-तर्पण करके हवन करने के लिए बाहर निकलने ही वाले थे कि नागकन्या उलूपी ने कामासक्त होकर उन्हें जल के भीतर खींच लिया और अपने भवन को ले गई। अर्जुन ने उलूपी से पूछा कि तुम कौन हो? तुम ऐसा साहस करके मुझे किस देश में ले आई हो? उलूपी ने कहा, ‘मैं ऐरावत वंश के कौरण्य नाग की कन्या उलूपी हूँ। मैं आपसे प्रेम करती हूँ। आपके अतिरिक्त मेरी दूसरी गति नहीं है। आप मेरी अभिलाषा पूर्ण कीजिए, मुझे स्वीकार कीजिए। अर्जुन ने कहा कि देवि! मैंने धर्मराज युधिष्ठिर की आज्ञा से बारह वर्ष के ब्रह्मचर्य का नियम ले रखा है। मेरे धर्म का लोप न हो, मुझे पाप न लगे, ऐसा ही काम तुम्हें करना चाहिए। उलूपी ने कहा, ‘आप लोगों ने द्रौपदी के लिए जो मर्यादा बनाई थी, उसे मैं जानती हूँ। परन्तु वह नियम द्रौपदी के साथ धर्म-पालन करने के लिये ही है, इस लोक में मेरे साथ उस धर्म का लोप नहीं होता। साथ ही आर्त-रक्षा भी तो परम धर्म है। यदि आप मेरी इच्छा पूर्ण नहीं करेंगे तो मैं मर जाउँगी। आप मुझे प्राण-दान देकर धर्म उपार्जन कीजिए।’

अर्जुन ने उलूपी की प्राणरक्षा को धर्म समझकर उसकी इच्छा पूर्ण की और दूसरे दिन वे वहाँ से निकलकर हरिद्वार में आ गये। चलते समय नागकन्या उलूपी ने अर्जुन को वर दिया कि किसी भी जलचर प्राणी से आपको भय नहीं होगा। सब जलचर आपके अधीन रहेंगे। अर्जुन ने वहाँ की सब घटना ब्राह्मणों से कही। तदनन्तर वे हिमालय की तराई में चले गए। जो कुछ ब्राह्मण अर्जुन के साथ थे, वे कलिंग देश की सीमा से उनकी अनुमति लेकर लौट पड़े।

अर्जुन महेन्द्र पर्वत पर होकर मणिपुर पहुँचे। वहाँ के राजा चित्रवाहन बड़े धर्मात्मा थे। उनकी सर्वांगसुन्दरी कन्या का नाम चित्रांगदा था। एक दिन अर्जुन की दृष्टि उस पर पड़ गई और वहाँ के राजा चित्रवाहन के पास जाकर कहा, ‘राजन्! मैं कुलीन क्षत्रिय हूँ। आप मुझसे अपनी कन्या का विवाह कर दीजिए।’ चित्रवाहन के पूछने पर अर्जुन ने बतलाया कि मैं पाण्डुपुत्र अर्जुन हूँ। चित्रवाहन ने कहा कि वीरवर! मेरे पूर्वजों में प्रभंजन नाम के राजा हो गये हैं। उन्होंने संतान न होने पर उग्र तपस्या करके देवाधिदेव महादेव को प्रसन्न किया। उन्होंने वरदान दिया कि तुम्हारे वंश में सबके एक-एक संतान होती जायेगी। वीर! तब से हमारे वंश में वैसा ही होता आया है। मेरे यह एक ही कन्या है, इसे मैं पुत्र ही समझता हूँ। इसका मैं पुत्रिका-धर्म के अनुसार विवाह करूँगा, जिससे इसका पुत्र मेरा दत्तक पुत्र हो जाये और मेरा वंशप्रवर्तक बने। अर्जुन ने राजा की शर्त मान ली। पुत्र होने पर अर्जुन राजा से अनुमति लेकर फिर तीर्थयात्रा के लिए चल पड़े।

श्रृंखला 48: सुन्द-उपसुन्द की कथा Date :- 01-Mar-2014

युधिष्ठिर के विस्तार से पूछने पर देवर्षि नारद ने सुन्द और उपसुन्द की कथा प्रारम्भ की। हिरण्यकशिपु के वंश में निकुम्भ नाम का एक महाबली और प्रतापी दैत्य था। उसके दो पुत्र थे- सुन्द और उपसुन्द। दोनों बड़े शक्तिशाली, पराक्रमी, क्रूर और दैत्यों के सरदार थे। एक के बिना दूसरा न तो कहीं जाता और न ही कुछ खाता-पीता था। अधिक तो क्या- वे दोनों एक प्राण, दो देह थे। उन्होंने त्रिलोकी को जीतने की इच्छा से विधिपूर्वक दीक्षा ग्रहण करके विंध्याचल पर्वत पर घोर तपस्या की। उनकी तपस्या का फल देने के लिए स्वयं ब्रह्माजी प्रकट हुए और उनको वर माँगने को कहा। दोनों ने हाथ जोड़कर कहा कि हम दोनों श्रेष्ठ मायावी, अस्त्र-शस्त्रों के जानकर, स्वेच्छानुसार रूप बदलने वाले, बलवान एवं अमर हो जायें। ब्रह्माजी ने कहा कि अमर होना तो देवताओं की विशेषता है, इसलिए अमर होने के सिवाय और जो कुछ तुमने माँगा है, वह तुम्हें प्राप्त होगा। दोनों भाइयों ने कहा- ‘पितामह, तब आप हमें ऐसा वर दीजिए कि हम संसार के किसी भी प्राणी या पदार्थ के द्वारा ना मरें। हमारी मृत्यु कभी हो तो एक-दूसरे के हाथ से ही हो।’ ब्रह्माजी ने यह वर उन्हें दे दिया और अपने लोक को चले गए।

वर प्राप्त करने के पश्चात् सुन्द और उपसुन्द ने दिग्विजय के लिए यात्रा की। उन्होंने इन्द्रलोक, यक्ष, राक्षस, नाग, मलेच्छ आदि सब पर विजय प्राप्त करके सारी पृथ्वी अपने वश में ली। दोनों भाइयों की आज्ञा से असुरगण घूम-घूमकर ब्रह्मर्षि और राजऋषियों का सत्यानाश करने लगे। परेशान होकर जब ऋषिलोग दुर्गम स्थानों में जा-जाकर छिपने लगे तब वे दोनों असुर हाथी, सिंह और बाघ बनकर उनकी हत्या करने लगे। ब्राह्मण और क्षत्रियों का विध्वंस होने लगा। यज्ञ, स्वाध्याय और उत्सवों के बन्द होने से चारों ओर हाहाकार मच गया।

ऐसी भयानक स्थिति को देखकर ऋषि-मुनि और महात्माओं को बड़ा कष्ट हुआ। वे सब मिलकर ब्रह्मलोक में गए। उस समय ब्रह्माजी के पास महादेव, इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र आदि देवता विद्यमान थे। महर्षियों और देवताओं ने बड़ी नम्रता के साथ ब्रह्माजी के सामने यह निवेदन किया कि सुन्द और उपसुन्द ने समस्त प्रजा को किस प्रकार चैपट किया है और कितने निष्ठुर कर्म किए हैं। ब्रह्माजी ने कुछ क्षण सोचकर विश्वकर्मा को बुलाया और कहा कि तुम एक ऐसी अद्भुत रूपवती स्त्री बनाओ, जो सभी को लुभा ले। विश्वकर्मा ने बहुत सोच-विचार कर एक त्रिलोक सुन्दरी अप्सरा का निर्माण किया। संसार के श्रेष्ठ रत्नों का तिल-तिल भर अंश लेकर उसका एक-एक अंग बनाया गया। इसलिए ब्रह्माजी ने उस सुन्दरी का नाम ‘तिलोत्तमा’ रखा। तिलोत्तमा ने ब्रह्माजी से पूछा कि ‘भगवन्, मुझे क्या आज्ञा है?’ ब्रह्माजी ने कहा- ‘तिलोत्तमे! तुम सुन्द और उपसुन्द के पास जाओ, अपने मनोहर रूप से उन्हें लुभा लो, जिससे तुम्हारी सुन्दरता और कौशल से उनमें फूट पड़ जाये। तिलोत्तमा ने ब्रह्माजी की आज्ञा स्वीकार करके प्रणाम किया और सब देवताओं की प्रदक्षिणा की। उसके रूप की शोभा देखकर देवताओं और ऋषियों ने समझ लिया कि अब काम बनने में अधिक विलम्ब नहीं है।

इधर दोनों दैत्य पृथ्वी पर विजय प्राप्त करके निश्चिंत भाव से निष्कण्टक राज्य करने लगे। उनका सामना करने वाला तो कोई था नहीं, इसलिए वे आलसी और विलासी हो गये। एक दिन दोनों भाई विन्ध्याचल में रंग-बिरंगे पुष्पों से लदे लता-वृक्षों की झुरमुट में आमोद-प्रमोद कर रहे थे। उसी समय तिलोत्तमा नाज-नखरों के साथ पुष्पों को चुनती हुई उनके सामने आ निकली। वे दोनों शराब पीकर नशे में बेहोश हो रहे थे। तिलोत्तमा पर दृष्टि पड़ते ही वे काममोहित हो गए। वे इतने कामान्ध हो गये थे कि उन्होंने तिलोत्तमा के हाथ पकड़ लिये। वे कामातुर होकर आपस में ही तनातनी करने लगे। सुन्द ने कहा, ‘अरे! यह तो मेरी पत्नी है, तेरी भाभी लगती है।’ उपसुन्द ने कहा- ‘यह तो मेरी पत्नी है, तुम्हारी पुत्रवधू के समान है।’ दोनों ही अपनी-अपनी बात पर अकड़ गये और ‘तेरी नहीं, मेरी’ कहकर झगड़ा करने लगे। काम और क्रोध के आवेग में दोनों अपने स्नेह और सौहार्द को भूल गए। दोनों अस्त्र लेकर एक-दूसरे पर टूट पड़े। दोनों के शरीर खूने से लथपथ हो गए। कुछ ही क्षणों में दोनों भयंकर असुर पृथ्वी पर गिरकर मृत्यु को प्राप्त हुए। देवता, महर्षि और स्वयं ब्रह्माजी ने तिलोत्तमा की प्रशंसा की। इन्द्र को राज्य मिला, संसार की व्यवस्था ठीक हो गई।

नारद जी ने कहा- पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर! सुन्द और उपसुन्द एक-दूसरे से अत्यन्त हिले-मिले और एक प्राण, दो देह थे। परन्तु एक स्त्री उन दोनों की फूट और विनाश का कारण बनी। मेरा तुम लोगों पर अतिशय अनुराग और स्नेह है। इसलिए मैं तुम सब भाइयों से यह बात कह रहा हूँ कि तुम ऐसा नियम बना लो, जिससे द्रौपदी के कारण तुम लोगों में झगड़ा होने का अवसर ही न आए। देवर्षि नारद की बात सुनकर पाण्डवों ने उसका अनुमोदन किया और उनके सामने ही यह प्रतिज्ञा की कि एक नियमित समय तक हर एक भाई के पास द्रौपदी रहेगी। जब एक भाई द्रौपदी के साथ एकान्त में होगा, तब दूसरा भाई वहाँ न जायेगा। यदि कोई भाई वहाँ जाकर द्रौपदी के एकान्तवास को देख लेगा तो उसे ब्रह्मचारी होकर बारह वर्ष तक वन में रहना पड़ेगा। पाण्डवों के नियम कर लेने पर नारद जी प्रसन्नता के साथ वहाँ से चले गये। यही कारण था कि पाण्डवों में द्रौपदी के कारण किसी प्रकार की फूट नहीं पड़ी।

श्रृंखला 47: विदुर का पाण्डवों को हस्तिनापुर लाना और इन्द्रप्रस्थ में राज्य की स्थापना Date :- 01-Feb-2014

धृतराष्ट्र की सहमति से महात्मा विदुर रथ पर सवार होकर पाण्डवों के पास राजा द्रुपद की राजधानी में गए। वहाँ विदुर जी राजा द्रुपद, भगवान श्रीकृष्ण और पाण्डवों से मिले। कुशल-क्षेम जानने के पश्चात् विदुर जी ने कहा कि राजा द्रुपद अब आप पाण्डवों को हस्तिनापुर भेजने की तैयारी कीजिये। द्रुपद ने बड़ी मात्रा में उपहार देकर पाण्डवों को विदा किया। महात्मा विदुर, कुन्ती तथा द्रौपदी के साथ सकुशल हस्तिनापुर पहुँच गये।

हस्तिनापुर पहुँचने पर धृतराष्ट्र ने द्रोणाचार्य और कृपाचार्य को पाण्डवों की अगवानी के लिए नगर द्वार पर भेजा। पाण्डवों के दर्शन मात्र से प्रजा के दुःख और दर्द दूर हो गए। स्वागत-सत्कार के पश्चात् धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर से कहा कि तुम लोगों का दुर्योधन आदि के साथ किसी तरह का झगड़ा और मनमुटाव न हो, इसलिए तुम आधा राज्य लेकर खाण्डवप्रस्थ में अपनी राजधानी बना लो और वहीं रहो। पाण्डवों ने राजा धृतराष्ट्र की यह बात स्वीकार की और उनके चरणों में प्रणाम करके खाण्डवप्रस्थ में रहने लगे।

व्यास आदि महर्षियों ने शुभ मुहूर्त में धरती नापकर शास्त्रविधि के अनुसार राजभवन की नींव डलवाई। थोड़े ही दिनों में वह तैयार होकर स्वर्ग के समान दिखाई देने लगी। युधिष्ठिर ने अपने बसाये हुए नगर का नाम इन्द्रप्रस्थ रखा। नगर के चारों ओर समुद्र के समान गहरी खाई और आकाश को छूने वाली चहारदीवारी बनाई गई। बड़े-बड़े फाटक, फँचे-फँचे महल और गोपुर दूर से ही दीख पड़ते थे। पाण्डव बेखटके होकर राज्य भोग करने लगे।

इन्द्रप्रस्थ में देवर्षि नारद का आगमन- सत्यवादी धर्मराज युधिष्ठिर अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ इन्द्रप्रस्थ में सुखपूर्वक रहकर भाइयों की सहायता से सम्पूर्ण प्रजा का पालन करने लगे। सारे शत्रु उनके वश में हो गये। एक दिन देवर्षि नारद वहाँ आ पहुँचे। नारद जी की विधिपूर्वक अघ्र्य, पाद्य आदि से पूजा की गई। युधिष्ठिर ने बड़ी विनम्रता से उन्हें अपने राज्य की सब बातें निवेदन कीं। द्रौपदी को देवर्षि नारद के शुभागमन का समाचार भेज दिया गया। शीलवती द्रौपदी बड़ी पवित्रता और सावधानी के साथ देवर्षि नारद के पास आई और प्रणाम करके बड़ी मर्यादा के साथ हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। नारद जी ने आशीर्वाद देकर द्रौपदी को रनिवास में जाने की आज्ञा दे दी।

द्रौपदी के चले जाने पर नारद जी ने पाण्डवों को एकान्त में बुलाकर कहा कि वीर पाण्डवों, यशस्विनी द्रौपदी तुम पाँचों भाइयों की एकमात्र धर्मपत्नी है, इसलिए तुम लोगों को कुछ ऐसा नियम बना लेना चाहिए, जिससे आपस में किसी प्रकार का झगड़ा-बखेड़ा न खड़ा हो।

प्राचीन समय की बात है, असुर वंश में सुन्द और उपसुन्द नाम के दो भाई हो गये हैं। उनमें इतनी घनिष्ठा थी कि उन पर कोई हमला नहीं कर सकता था। वे एक साथ राज्य करते, एक साथ सोते-जागते और एक साथ खाते-पीते थे। परन्तु वे दोनों निलोत्तमा नाम की एक ही स्त्री पर रीझ गये और एक-दूसरे के प्राणों के ग्राहक बन गये। इसलिए तुम लोग ऐसा नियम बनाओ, जिससे आपस का हेल-मेल और अनुराग कभी कम न हो और न कभी आपस में फूट ही पड़े।

युधिष्ठिर के विस्तार से पूछने पर नारद जी ने सुन्द और उपसुन्द नामक राक्षसों की कक्षा विस्तार से कह सुनाई।

श्रृंखला 46: पाण्डवों को राज्य देने के सम्बन्ध में कौरवों का विचार Date :- 01-Jan-2014

द्रुपद के यहाँ हुए स्वयंवर में उपस्थित सभी राजाओं को अपने गुप्तचरों से शीघ्र ही मालूम हो गया कि द्रौपदी का विवाह पाण्डवों के साथ हुआ है। लक्ष्यवेध करने वाले और कोई नहीं, स्वयं वीरवर अर्जुन थे तथा उनका साथी, जिसने शल्य को पटक दिया था और पेड़ उखाड़कर बड़े-बड़े राजाओं के छक्के छुड़ा दिये थे, भीमसैन था। सभी ने पाण्डवों के बच जाने से प्रसन्नता प्रकट की और कौरवों के दुव्र्यवहार से खिन्न होकर उन्हें धिक्कारा।

दुर्योधन को यह समाचार सुनकर बड़ा दुःख हुआ। वह अपने साथी अश्वत्थामा, शकुनि, कर्ण आदि के साथ द्रुपद की राजधानी से हस्तिनापुर के लिए लौट पड़ा। सभी कौरव दीन और निराश हो रहे थे। कौरवों के हस्तिनापुर पहुँचने पर वहाँ का सब समाचार जानकर विदुर जी को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उसी समय धृतराष्ट्र के पास जाकर बोले- ‘महाराज, धन्य है, कुरूवंशियों की अभिवृद्धि हो रही है।’ धृतराष्ट्र प्रसन्न होकर ऐसा समझने लगे कि द्रौपदी मेरे पुत्र दुर्योधन को मिल गई। इसलिए उन्होंने तरह-तरह के गहने भेजने की आज्ञा देते हुए कहा कि वर-वधू को मेरे पास लाओ। तब विदुर ने बतलाया कि द्रौपदी का विवाह पाण्डवों के साथ हुआ और वे सब बड़े आनन्द से द्रुपद की राजधानी में निवास कर रहे हैं। धृतराष्ट्रने कहा कि पाण्डवों को तो मैं अपने पुत्रों से भी अधिक प्यार करता हूँ।

जब विदुर वहाँ से चले गये, तब दुर्योधन और कर्ण ने धृतराष्ट्र के पास आकर कहा कि हमें अभी से कोई ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे पाण्डव आगे चलकर हमारी राज्य सम्पत्ति को न हथिया सकें। दुर्योधन ने आगे कहा कि हमें कुछ विश्वासी गुप्तचर एवं चतुर ब्राह्मणों को भेजकर कुन्ती और माद्री के पुत्रों में मन-मुटाव उत्पन्न कराना चाहिए एवं राजा द्रुपद, उनके पुत्र और मंत्रियों को लोभ के फंदे में फँसाकर वश में कर लेना चाहिए और उनके द्वारा पाण्डवों को वहाँ से निकलवा देना चाहिए, जिससे शायद द्रौपदी उन्हें छोड़ दे। यदि किसी तरह धोखा देकर भीमसैन को मारा जा सके, तब तो सारा काम ही बन जाएगा, क्योंकि भीम के बिना अर्जुन हमारे कर्ण के चैथाई के बराबर भी नहीं है।

दुर्योधन की सारी बातें सुनकर कर्ण ने कहा कि तुम्हारी राय मुझे पसंद नहीं है। पाण्डवों में आपस में इतना भाईचारा है कि उनमें मनमुटाव नहीं हो सकता तथा द्रुपद को लोभ से जीता नहीं जा सकता। इसलिए मेरी सम्मति तो यह है कि हम एक बहुत बड़ी सेना लेकर अभी चढ़ाई कर दें और द्रुपद को हराकर पाण्डवों को पराक्रम से ही मार डालें क्योंकि वीरों को तो केवल वीरता से ही मारा जा सकता है। इस पर धृतराष्ट्र ने कहा कि मेरा विचार है कि हमें मिलकर आचार्य द्रोण, भीष्म पितामह, विदुर आदि से सलाह लेकर आगे का उपाय करना चाहिये।

धृतराष्ट्र के बुलाए जाने पर भीष्म पितामह ने कहा कि पाण्डवों से वैर-विरोध मुझे पसंद नहीं। मेरे लिए धृतराष्ट्र और पाण्डु के पुत्र समानरूप से प्रिय हैं। दोनों की रक्षा करना मेरा धर्म है। तुम सब पाण्डवों के साथ मेल-मिलाप करो और उन्हें आधा राज्य दे दो। जैसे तुम इस राज्य को अपने बाप-दादों का समझते हो, वैसे ही यह उनके भी बाप-दादों का है। दुर्योधन यह जो तुम अभी राजा बने बैठे हो, वह धर्म के विपरीत है। वास्तव में, तुमसे भी पहले वे राज्य के अधिकारी हैं। पाण्डवों के वारणावत में भस्म होने का जितना दोष तुम पर लगा, उतना पुरोचन पर नहीं। अब पाण्डव जीवित हैं, उन्हें उनका राज्य वापस कर अपने उपर का कलंक मिटा दो। आचार्य द्रोण ने भी भीष्म पितामह के वचनों पर अपनी सहमति जताई। अतः शीघ्र ही किसी प्रियवादी पुरुष को द्रुपद के यहाँ भेजकर द्रौपदी सहित पाण्डवों को सम्मान के साथ हस्तिनापुर बुलवाना चाहिए।

विदुर ने धृतराष्ट्र से कहा कि पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण ने बहुत ही प्रिय और हितकर बात कही है। ये दोनों महापुरुष अवस्था, बुद्धि और शास्त्रज्ञान आदि सभी बातों में सबसे बढ़े-चढ़े हैं। इनके हृदय में आपके और पाण्डु पुत्रों के प्रति समान स्नेह-भाव है। बायें हाथ से भी बाण चलाने वाले अर्जुन को और तो क्या, स्वयं इन्द्र भी युद्ध में नहीं जीत सकता। आप सबको समझ लेना चाहिये कि पाण्डवों के पक्ष में स्वयं बलराम जी और सात्यकि हैं। भगवान श्रीकृष्ण उनके सलाहकार हैं। यदि युद्ध हुआ तो पाण्डवों की विजय निश्चित है। जबसे प्रजा को यह बात मालूम हुई है कि पाण्डव जीवित हैं, तबसे सभी उनके दर्शन के लिए उत्सुक हैं। दुर्योधन, कर्ण और शकुनि आदि अधर्मी और दुष्ट हैं। मैंने पहले ही सूचित कर दिया था कि दुर्योधन के अपराध से सारी प्रजा का सत्यानाश हो जाएगा। अतः आप पहले आदरसहित पाण्डवों को हस्तिनापुर बुलाकर अपनी प्रजा को प्रसन्न करें।

धृतराष्ट्र ने कहा कि विदुर, भीष्म पितामह एवं आचार्य द्रोण बड़े ही बुद्धिमान और ऋषितुल्य हैं। इनकी सलाह मेरे परम हित की है। तुमने जो भी कहा है, उसे मैं स्वीकारता हूँ। पाण्डव जैसे पाण्डु के पुत्र हैं, वैसे ही मेरे भी हैं। मेरे पुत्रों की तरह ही राज्य पर उनका भी अधिकार है।

श्रृंखला 7: गरूड़ का अमृत लाना और विनता को दासी भाव से छुड़ाना Date :- 01-Oct-2010

एक दिन विनता अपने पुत्र गरूड़ के पास बैठी हुई थी, तभी कद्रू ने उसे बुलाकर कहा कि मुझे समुद्र के भीतर नागों का एक दर्शनीय स्थान देखना है। वहाँ तू मुझे ले चल। विनता ने कद्रू को और गरूड़ जी ने माता की आज्ञा से सर्पों को अपने कंधों पर बैठा लिया और उनके अभीष्ट स्थान को चल पड़े। गरूड़ जी ने अपनी माता से पूछा कि हम सर्पों का कहा क्यों मानते हैं, तब विनता ने कहा कि मैं इन सर्पों के छल से बाजी हार गई और दुर्भाग्यवश अपनी सौत कद्रू की दासी बन गई। तब गरूड़ जी ने सर्पों से कहा कि सर्पगण! ठीक-ठीक बताओ कि मैं तुम्हें कौन-सी वस्तु ला दूँ या आपका कौन-सा उपकार कर दूँ जिससे मैं और मेरी माता दासत्व से मुक्त हो जाए। सर्पों ने कहा- गरूड़! यदि अपने पराक्रम से तुम हमारे लिए अमृत ला दो तो हम तुम्हें और तुम्हारी माता को दासत्व से मुक्त कर देंगे।

गरूड़ जी बड़े वेग से उड़कर देवलोक पहुँचे और देवताओं को परास्त कर अमृत कलश लेकर आकाश मार्ग से सर्पों के पास चले। आकाश में उन्हें भगवान विष्णु के दर्शन हुए। गरूड़ के मन में अमृत पीने का लोभ नहीं है, यह जानकर भगवान विष्णु उन पर बहुत प्रसन्न हुए और बोले- गरूड़! मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ, अतः मनचाही वस्तु माँग लो। तब गरूड़ ने कहा, ‘प्रभु! एक तो आप मुझे अपनी ध्वजा में रखिए, दूसरे मैं अमृत पिए बिना ही अजर-अमर हो जाउँ। भगवान ने कहा, ‘तथास्तु! गरूड़ ने कहा- मैं भी आपको वर देना चाहता हूँ, मुझसे कुछ माँग लीजिए। भगवान ने कहा- तुम मेरे वाहन बन जाओ। तब से गरूड़ जी भगवान विष्णु के वाहन बन गए। उनसे अनुमति लेकर गरूड़ ने अपनी यात्रा आगे शुरू की।

गरूड़ को अमृत ले जाते देख देवराज इन्द्र ने गरूड़ से मित्रतावश कहा कि आप जिनको अमृत ले जाकर दोगे, वे हमें बहुत दुःख देंगे। गरूड़ जी ने कहा- देवराज! अमृत को ले जाने का एक कारण है। मैं इसे किसी को पिलाना नहीं चाहता। मैं इसे जहाँ रखूँ, वहाँ से आप उठा लाइये। तब इन्द्र ने संतुष्ट होकर कहा कि तुम मुझसे कोई वर माँग लो। गरूड़ को सर्पों की दुष्टता और उनके छल के कारण माता को हुए दुःख का स्मरण हो आया। उन्होंने वर माँगा कि ये बलवान सर्प ही मेरे भोजन की सामग्री हों। देवराज इन्द्र ने कहा- ‘तथास्तु’।इन्द्र से विदा होकर गरूड़ सर्पों के स्थान पर आए, वहाँ उनकी माता विनता भी थीं। उन्होंने प्रसन्नता प्रकट करते हुए सर्पों से कहा- यह लो अमृत, पर इसे पीने में जल्दी मत करना, मैं इसे कुशा पर रख देता हूँ, स्नान करके पवित्र हो लो, फिर इसे पीना। अब मैंने अपनी बात अमृत लाकर पूरी कर दी, अतः मेरी माता अब दासत्व से मुक्त हो गई। सर्पों ने यह स्वीकार कर लिया। जब सर्प कुशा पर अमृत रखा छोड़कर नदी में स्नान करने गए, तो पीछे से इन्द्र अमृत को उठाकर स्वर्ग में ले गए। सर्प स्नान करके वापस आए और अमृत कलश दिखाई नहीं दिया तो वे समझ गए कि हमने विनता को दासी बनाने में जो छल-कपट किया था, यह उसी का फल है। फिर सर्पों ने सोचा कि इस कुशा पर अमृत रखा था, अतः उसका कुछ अंश इस पर भी आ गया होगा, सर्पों ने अपनी जीभ से कुशा को चाटना आरम्भ कर दिया। ऐसा करते ही कुशा की धार से उनकी जीभ के दो टुकड़े हो गए। अमृत का स्पर्श होने से कुशा पवित्र माना जाने लगा। आज भी कुशा के आसन पर किया गया जप-तप अनेक गुणा फलदायी होता है। कुशा का आसन सोने के सिंहासन से भी उँचा माना गया है।

शेषनाग द्वारा पृथ्वी को अपने सिर पर धारण करना- कद्रू के पुत्र सर्पों में एक शेषनाग भी थे, उन्होंने कद्रू और अन्य सर्पों का साथ छोड़कर कठिन तपस्या प्रारम्भ की। वे केवल हवा पीकर रहते और अपने व्रत का पूर्ण पालन करते थे। प्रसन्न होकर व शेषनाग का सच्चा धैर्य और तपस्या देखकर ब्रह्माजी उनके पास आए और बोले, तुम्हारी तपस्या का उद्देश्य क्या है? शेष जी ने कहा- भगवन्! मेरे सब भाई मूर्ख हैं इसलिए मैं उनके साथ नहीं रहना चाहता। वे परस्पर एक-दूसरे के साथ डाह करते हैं, विनता तथा उनके पुत्र गरूड़ व अरूण से द्वेष करते हैं। ब्रह्माजी ने कहा कि तुम्हारे भाइयों की करतूत मुझसे छिपी नहीं है और माता की आज्ञा का उल्लंघन करने के कारण वे स्वयं बड़ी विपत्ति में फंस गए हैं। अब तुम उनकी चिंता छोड़कर अपने लिए जो चाहो, वर माँग लो। शेष जी ने कहा, मेरी बुद्धि सदा धर्म, तपस्या और शांति में संलग्न रहे। ब्रह्माजी ने कहा, शेष मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, मेरी आज्ञा से तुम प्रजा के हित के लिए एक काम करो। यह सारी पृथ्वी, पर्वत, वन, सागर हिलते-डोलते रहते हैं, तुम इसे इस प्रकार धारण करो, जिससे यह अचल हो जाए। शेष जी ने कहा, पितामह! मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। मैं पृथ्वी को इस प्रकार धारण करूँगा, जिससे यह हिले-डुले नहीं, आप इसको मेरे सिर पर रख दीजिए। ब्रह्माजी ने कहा, शेष! पृथ्वी तुम्हें मार्ग देगी, तुम उसके भीतर घुस जाओ। तुम पृथ्वी को धारण कर मेरा बड़ा प्रिय कार्य करोगे। ब्रह्माजी की आज्ञा सुनकर शेषनाग भू-विवर में प्रवेश करके नीचे चले गए और समुद्र से घिरी पृथ्वी को चारों ओर से पकड़ कर सिर पर उठा लिया। शेषनाग तभी से स्थिर भाव से स्थित हैं।

श्रृंखला 6: कद्रू और विनता की कथा तथा गरुड़ की उत्पत्ति Date :- 01-Sep-2010

भगवान के इतना कहते ही देवता और असुरों का बल बढ़ गया। वे बड़े वेग से मथने लगे। सारा समुद्र क्षुब्ध हो उठा। उस समय समुद्र से अगणित किरणों वाला, शीतल प्रकाश से युक्त, श्वेतवर्ण का चन्द्रमा प्रकट हुआ। चन्द्रमा के बाद भगवती लक्ष्मी और सुरा देवी निकलीं। उसी समय श्वेतवर्ण का उच्चैःश्रवा घोड़ा भी पैदा हुआ। भगवान नारायण के वक्षःस्थल पर सुशोभित होने वाली दिव्य किरणों से उज्जवल कौस्तुभमणि तथा वांछित फल देने वाले कल्पवृक्ष और कामधेनु भी उसी समय निकले। लक्ष्मी, सुरा, चन्द्रमा, उच्चैःश्रवा- ये सब आकाश मार्ग से देवताओं के लोक में चले गये। इसके बाद दिव्य शरीर धारी धन्वन्तरि देव प्रकट हुए। वे अपने हाथ में अमृत से भरा श्वेत कमण्डल लिये हुए थे। यह अद्भुत चमत्कार देखकर दानवों में ‘यह मेरा है, यह मेरा है’- ऐसा कोलाहल मच गया। तदनन्तर चार श्वेत दाँतों से युक्त विशाल ऐरावत हाथी निकला। उसे इन्द्र ने ले लिया। जब समुद्र का बहुत मन्थन किया गया, तब उसमें से कालकूट विष निकला। उसकी गन्ध से ही लोगों की चेतना जाती रही। ब्रह्मा की प्रार्थना से भगवान शंकर ने उसे अपने कण्ठ में धारण कर लिया। तभी से वे ‘नीलकण्ठ’ नाम से प्रसिद्ध हुए। यह सब देखकर दानवों की आशा टूट गई। अमृत और लक्ष्मी के लिये उनमें बड़ा वैर-विरोध और फूट हो गई। उसी समय भगवान विष्णु मोहिनी स्त्री का वेष धारण करके दानवों के पास आये। दानवों ने उनकी माया न जानकर मोहिनीरूपधारी भगवान को अमृत पात्र दे दिया। उस समय वे सभी मोहिनी के रूप पर लट्टू हो रहे थे।

इस प्रकार विष्णु भगवान ने मोहिनी रूप धारण करके दैत्य और दानवों से अमृत छीन लिया और देवताओं ने उनके पास जाकर उसे पी लिया। उसी समय राहु दानव भी देवताओं का रूप धारण करके अमृत पीने लगा। अभी अमृत उसके कण्ठ तक ही पहुँचा था कि चन्द्रमा और सूर्य ने उसका भेद बतला दिया। भगवान विष्णु ने तुरंत ही अपने चक्र से उसका सिर काट डाला। राहु का पर्वत-शिखर के समान सिर आकाश में उड़कर गरजने लगा और उसका धड़ पृथ्वी पर गिरकर सबको कँपाता हुआ तड़फड़ाने लगा। तभी से राहु के साथ चन्द्रमा और सूर्य का वैमनस्य स्थायी हो गया। भयभीत होकर असुरगण पृथ्वी और समुद्र में छिप गये। देवताओं की जीत हुई। मन्दराचल को सम्मानपूर्वक यथास्थान पहुँचा दिया गया। यही समुद्र-मन्थन की कथा है।

कद्रू और विनता की कथा तथा गरुड़ की उत्पत्ति- समुद्र-मन्थन के समय उच्चैःश्रवा नामक घोड़े की उत्पत्ति हुई थी। इसी घोड़े को देखकर कद्रू ने विनता से कहा- ‘बहन! जल्दी से बताओ तो यह घोड़ा किस रंग का है?’ विनता ने कहा- ‘बहन! यह अश्वराज श्वेतवर्ण का है। तुम इसे किस रंग का समझती हो?’ कद्रू ने कहा- ‘अवश्य ही इस घोड़े का रंग सफेद है, परन्तु पूँछ काली है। आओ, हम दोनों इस विषय में बाजी लगावें। यदि तुम्हारी बात ठीक हो तो मैं तुम्हारी दासी रहूँ और मेरी बात ठीक हो तो तुम मेरी दासी रहना।’ इस प्रकार दोनों बहनें आपस में बाजी लगाकर और दूसरे दिन घोड़ा देखने का निश्चय करके घर चली गईं। कद्रू ने विनता को धोखा देने के विचार से अपने हजार सर्प पुत्रों को यह आज्ञा दी कि ‘पुत्रों! तुम लोग शीघ्र ही काले बाल बनकर उच्चैःश्रवा की पूँछ ढक लो, जिससे मुझे दासी न बनना पड़े।’ जिन सर्पों ने उसकी आज्ञा न मानी, उन्हें उसने शाप दिया कि ‘जाओ, तुम लोगों को अग्नि जनमेजय के सर्प-यज्ञ में जलाकर भस्म कर देगी।’ यह दैवसंयोग की बात है कि कद्रू ने अपने पुत्रों को ही ऐसा शाप दे दिया। उन दिनों पराक्रमी और विषैले सर्प बहुत प्रबल हो गये थे। वे दूसरों को बड़ी पीड़ा पहुँचाते थे। प्रजा के हित की दृष्टि से यह उचित ही हुआ। ‘जो लोग दूसरे जीवों का अहित करते हैं, उन्हें विधाता की ओर से ही प्राणान्त दण्ड मिल जाता है।’ ऐसा कहकर ब्रह्माजी ने कद्रू की प्रशंसा की।

दूसरे दिन प्रातः काल होते ही निकट से घोड़े को देखने के लिये दोनों चल पड़ीं। सर्पों ने परस्पर विचार करके यह निश्चय किया कि ‘हमें माता की आज्ञा का पालन करना चाहिए। यदि उसका मनोरथ पूरा न होगा तो वह प्रेमभाव छोड़कर रोषपूर्वक हमें जला देगी। यदि इच्छा पूरी हो जायेगी तो प्रसन्न होकर हमें अपने शाप से मुक्त कर देगी। इसलिये चलो, हम लोग घोड़े की पूँछ काली कर दें।’ ऐसा निश्चय करके वे उच्चैःश्रवा की पूँछ से बाल बनकर लिपट गये, जिससे वह काली जान पड़ने लगी। इधर कद्रू और विनता बाजी लगाकर आकाशमार्ग से समुद्र को देखते-देखते दूसरे पार जाने लगीं। दोनों ही घोड़े के पास पहुँचकर नीचे उतर पड़ी। उन्होंने देखा कि घोड़े का सारा शरीर तो चन्द्रमा की किरणों के समान उज्ज्वल है, परन्तु पूँछ काली है। यह देखकर विनता उदास हो गयी, कद्रू ने उसे अपनी दासी बना लिया।

समय पूरा होने पर महातेजस्वी गरूड़, माता की सहायता के बिना ही अण्डा फोड़कर उससे बाहर निकल आये। उनके तेज से दिशाएँ प्रकाशित हो गयीं। उनकी शक्ति, गति, दीप्ति और वृद्धि विलक्षण थी। नेत्र बिजली के समान पीले और शरीर अग्नि के समान तेजस्वी। वे जन्मते ही आकाश में बहुत उपर उड़ गये। उस समय वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो दूसरा बड़नावल ही हो।

श्रृंखला 5: सर्पों के जन्म की कथा Date :- 01-Aug-2010

सत्ययुग में दक्षप्रजापति की दो कन्याएँ थीं- कद्रू और विनता। उनका विवाह कश्यप ऋषि से हुआ था। कश्यप अपनी धर्मपत्नी से प्रसन्न होकर बोले, ‘तुम्हारी जो इच्छा हो, वर माँग लो।’ कद्रू ने कहा, ‘एक हजार समान तेजस्वी नाग मेरे पुत्र हों।’ विनता बोली, ‘तेज, शरीर और बल-विक्रम में कद्रू के पुत्रों से श्रेष्ठ केवल दो ही पुत्र मुझे प्राप्त हों।’ कश्यप जी ने ‘एवमस्तु’ कहा। दोनों प्रसन्न हो गयीं। सावधानी से गर्भ-रक्षा करने की आज्ञा देकर कश्यप जी वन में चले गए।

समय आने पर कद्रू ने एक हजार और विनता ने दो अंडे दिये। दासियों ने प्रसन्न होकर गरम बर्तनी में उन्हें रख दिया। पाँच सौ वर्ष पूरे होने पर कद्रू के तो हजार पुत्र निकल आये, परन्तु विनता के दो बच्चे नहीं निकले। विनता ने अपने हाथों एक अंडा फोड़ डाला। उस अंडे का शिशु आधे शरीर से तो पुष्ट हो गया था, परन्तु उसका नीचे का आधा शरीर अभी कच्चा था। नवजात शिशु ने क्रोधित होकर अपनी माता को शाप दिया, ‘माँ! तूने लोभवश मेरे अधूरे शरीर को ही निकाल लिया है। इसलिये तू अपनी उसी सौत की पाँच सौ वर्ष तक दासी रहेगी। यदि मेरी तरह तूने दूसरे अंडे को भी फोड़कर उसके बालक को अंगहीन या विकृतांग ना किया तो वही तुझे इस शाप से मुक्त करेगा। यदि तेरी ऐसी इच्छा है कि मेरा दूसरा बालक बलवान हो तो धैर्य के साथ पाँच सौ वर्ष तक और प्रतीक्षा कर।’ इस प्रकार शाप देकर वह बालक आकाश में उड़ गया और सूर्य का सारथि बना। प्रातःकालीन लालिमा उसी की झलक है। उस बालक का नाम अरूण हुआ।

एक बार कद्रू और विनता दोनों बहनें एक साथ ही घूम रही थीं कि उन्हें पास ही उच्चैःश्रवा नाम का घोड़ा दिखायी दिया। यह अश्व-रत्न अमृत-मंथन के समय उत्पन्न हुआ था और समस्त अश्वों में श्रेष्ठ, बलवान, विजयी, सुन्दर, अजर, दिव्य एवं सब शुभ लक्षणों से युक्त था। उसे देखकर वे दोनों आपस में उसका वर्णन करने लगीं।

समुद्र-मन्थन और अमृत आदि की प्राप्ति की कथा- मेरु नाम का एक पर्वत है। वह इतना चमकीला है मानो तेज की राशि हो। उसकी सुनहली चोटियों की चमक के सामने सूर्य की प्रभा फीकी पड़ जाती है। वे गगनचुम्बी चोटियाँ रत्नों से खचित हैं। उन्हीं में से एक पर देवता लोग इकट्ठे होकर अमृत प्राप्ति के लिए सलाह करने लगे। उनमें भगवान नारायण और ब्रह्माजी भी थे। नारायण ने देवताओं से कहा, ‘देवता और असुर मिलकर समुद्र-मन्थन करें। इस मन्थन के फलस्वरूप अमृत की प्राप्ति होगी।’ देवताओं के भगवान नारायण के परामर्श से मन्दराचल को उखाड़ने की चेष्टा की। वह पर्वत मेघों के समान फँची चोटियों से युक्त, ग्यारह हजार योजन फँचा और उतना ही नीचे धँसा हुआ था। जब सब देवता पूरी शक्ति लगाकर भी उसे नहीं उखाड़ सके, तब उन्होंने विष्णु भगवान और ब्रह्माजी के पास जाकर प्रार्थना की, ‘भगवन्! आप दोनों हम लोगों के कल्याण के लिये मन्दराचल को उखाड़ने का उपाय कीजिये और हमें कल्याणकारी ज्ञान दीजिये।’ देवताओं की प्रार्थना सुनकर श्रीनारायण और ब्रह्माजी ने शेषनाग को मन्दराचल उखाड़ने के लिये प्रेरित किया। महाबली शेषनाग ने वन और वनवासियों के साथ मन्दराचल को उखाड़ लिया। अब मन्दराचल के साथ देवगण समुद्रतट पर पहुँचे और समुद्र से कहा कि ‘हम लोग अमृत के लिये तुम्हारा जल मथेंगे।’ समुद्र ने कहा, ‘यदि आप लोग अमृत में मेरा भी हिस्सा रखें तो मैं मन्दराचल को घुमाने से जो कष्ट होगा, वह सह लूँगा।’ देवता और असुरों ने समुद्र की बात स्वीकार करके कच्छपराज से कहा, ‘आप इस पर्वत के आधार बनिये।’ कच्छपराज ने ‘ठीक है’ कहकर मन्दराचल को अपनी पीठ पर ले लिया। अब देवराज इन्द्र यंत्र के द्वारा मन्दराचल को घुमाने लगे।

इस प्रकार देवता और असुरों ने मन्दराचल की मथानी और वासुकि नाग की डोरी बनाकर समुद्र-मन्थन प्रारम्भ किया। वासुकि नाग के मुँह की ओर असुर और पूँछ ही ओर देवता लगे थे। बार-बार खींचे जाने के कारण वासुकि नाग के मुख से धुएँ और अग्निज्वाला के साथ साँस निकलने लगी। वह साँस थोड़ी ही देर में मेघ बन जाती और वह मेघ थके-माँदे देवताओं पर जल बरसाने लगता। पर्वत के शिखर से पुष्पों की झड़ी लग गयी। महामेघ के समान गम्भीर शब्द होने लगा। पहाड़ के वृक्ष आपसे में टकराकर गिरने लगे। उनकी रगड़ से आग लग गयी। इन्द्र ने मेघों के द्वारा जल बरसाकर उसे शांत किया। वृक्षों के दूध और औषधियों के रस चू-चूकर समुद्र में आने लगे। औषधियों के अमृत के समान प्रभावशाली रस और दूध तथा सुवर्णमय मन्दराचल की अनेकों दिव्य प्रभावशाली मणियों से चूने वाले जल के स्पर्श से ही देवता अमरत्व को प्राप्त होने लगे। उन उत्तम रसों के सम्मिश्रण से समुद्र का जल दूध बन गया और दूध से घी बनने लगा। देवताओं ने मथते-मथते थककर ब्रह्माजी से कहा, ‘भगवान् नारायण के अतिरिक्त सभी देवता और असुर थक गये हैं। समुद्र मथते-मथते इतना समय बीत गया, परन्तु अब तक अमृत नहीं निकला।’ ब्रह्माजी ने भगवान विष्णु से कहा, ‘भगवन्! आप इन्हें बल दीजिये। आप ही इनके एकमात्र आश्रय हैं।’ विष्णुभगवान ने कहा, ‘जो लोग इस कार्य में लगे हुए हैं, मैं उन्हें बल दे रहा हूँ। सब लोग पूरी शक्ति लगाकर मन्दराचल को घुमावें और समुद्र को क्षुब्ध कर दें।’

श्रृंखला 4: गुरू सेवा की महिमा Date :- 01-Jul-2010

आयोद धौम्य का तीसरा शिष्य था वेद। आचार्य ने उससे कहा, ‘बेटा! तुम कुछ दिनों तक मेरे घर रहो। सेवा-शुश्रूषा करो, तुम्हारा कल्याण होगा।’ उसने बहुत दिनों तक वहाँ रहकर गुरू-सेवा की। आचार्य प्रतिदिन उस पर बैल की तरह भार लाद देते और वह गर्मी-सर्दी, भूख-प्यास का दुःख सहकर उनकी सेवा करता। कभी उनकी आज्ञा के विपरीत न चलता। बहुत दिनों में आचार्य प्रसन्न हुए और उन्होंने उसके कल्याण और सर्वज्ञता का वर दिया। ब्रह्मचर्याश्रम से लौटकर वह गृहस्थाश्रम में आया। वेद के भी तीन शिष्य थे, परन्तु वे उन्हें कभी किसी काम या गुरू-सेवा का आदेश नहीं करते थे। वे गुरूगृह के दुःखों को जानते थे और शिष्यों को दुःख देना नहीं चाहते थे।

एक बार राजा जनमेजय और पौष्य ने आचार्य वेद को पुरोहित के रूप में वरण किया। वेद कभी पुरोहिती के काम से बाहर जाते तो घर की देखरेख के लिये अपने शिष्य उत्तंक को नियुक्त कर जाते थे। एक बार आचार्य वेद ने बाहर से लौटकर अपने शिष्य उत्तंक के सदाचार-पालन की बड़ी प्रशंसा सुनी। उन्होंने कहा- बेटा! तुमने धर्म पर दृढ़ रहकर मेरी बड़ी सेवा की है। मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। तुम्हारी सारी कामनाएँ पूर्ण होंगी। अब जाओ।’ उत्तंक ने प्रार्थना की, ‘आचार्य! मैं आपको कौन-सी प्रिय वस्तु भेंट में दूँ?’ आचार्य ने पहले तो अस्वीकार किया, पीछे कहा कि ‘अपनी गुरूआनी से पूछ लो।’ जब उत्तंक ने गुरूआनी से पूछा तो उन्होंने कहा, ‘तुम राजा पौष्य के पास जाओ और उनकी रानी के कानों के कुण्डल माँग लाओ। मैं आज से चैथे दिन उन्हें पहनकर ब्राह्मणों को भोजन परोसना चाहती हूँ। ऐसा करने से तुम्हारा कल्याण होगा, अन्यथा नहीं।’

उत्तंक ने वहाँ से चलकर देखा कि एक बहुत लंबा-चैड़ा पुरुष बड़े भारी बैल पर चढ़ा हुआ है। उसने उत्तंक को सम्बोधन करके कहा कि ‘तुम इस बैल का गोबर खा लो।’ उत्तंक ने मना कर दिया। वह पुरुष फिर बोला, ‘उत्तंक! तुम्हारे आचार्य ने पहले इसे खाया है। सोच-विचार मत करो। खा जाओ।’ उत्तंक ने बैल का गोबर और मूत्र खा लिया और शीघ्रता के कारण बिना रूके वहाँ से चल पड़ा। उत्तंक ने राजा पौष्य के पास जाकर उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि ‘मैं आपके पास कुछ माँगने के लिये आया हूँ।’ पौष्य ने उत्तंक का अभिप्राय जानकर उसे अन्तःपुर में रानी के पास भेज दिया। परन्तु उत्तंक को रनिवास में कहीं भी रानी दिखायी नहीं दी। वहाँ से लौटकर उसने पौष्य को उलाहना दिया कि ‘अन्तःपुर में रानी नहीं है।’ पौष्य ने कहा- ‘भगवन्! मेरी रानी पतिव्रता है। उसे उच्छिष्ट या अपवित्र मनुष्य नहीं देख सकता।’ उत्तंक ने स्मरण करके कहा कि ‘हाँ, मैंने चलते-चलते आचमन कर लिया था।’ पौष्य ने कहा- ‘ठीक है, चलते-चलते आचमन करना निषिद्ध है। इसलिये आप झूठे हैं।’ अब उत्तंक ने पूर्वाभिमुख बैठकर, हाथ-पैर-मुँह धोकर शब्द, फेन और उष्णता से रहित एवं हृदय पहुँचने योग्य जल से तीन बार आचमन किया और दो बार मुँह धोया। इस बार अन्तःपुर में जाने पर रानी दीख पड़ी और उसने उत्तंक को सत्पात्र समझकर अपने कुण्डल दे दिये। साथ ही, यह कहकर सावधान भी कर दिया कि ‘नागराज तक्षक ये कुण्डल चाहता है। कहीं तुम्हारी असावधानी से लाभ उठाकर वह ले न जाये।’

मार्ग में चलते समय उत्तंक ने देखा कि उसके पीछे-पीछे एक नग्न क्षपणक चल रहा है, कभी प्रकट होता है और कभी छिप जाता है। एक बार उत्तंक ने कुण्डल रखकर जल लेने की चेष्टा की। इतने में ही वह क्षपणक कुण्डल लेकर अदृश्य हो गया। नागराज तक्षक ही उस वेष में आया था। उत्तंक ने इन्द्र के वज्र की सहायता से नागलोक तक उसका पीछा किया। अन्त में, भयभीत होकर तक्षक ने उसे कुण्डल दे दिये। उत्तंक ठीक समय पर अपनी गुरूआनी के पास पहुँचा और उसे कुण्डल देकर आशीर्वाद प्राप्त किया।

आचार्य से आज्ञा प्राप्त करके उत्तंक हस्तिनापुर आया। वह तक्षक पर अत्यन्त क्रोधित था और उससे बदला लेना चाहता था। उस समय तक हस्तिनापुर के सम्राट जनमेजय तक्षशिला पर विजय प्राप्त करके लौट चुके थे। उत्तंक ने कहा, ‘राजन्! तक्षक ने आपके पिता को डँसा है। आप उससे बदला लेने के लिए यज्ञ कीजिये। काश्यप आपके पिता की रक्षा करने के लिए आ रहे थे परन्तु उन्हें उसने लौटा दिया। अब आप सर्प-सत्र कीजिये और उसकी प्रज्ज्वलित अग्नि में उस पापी को जलाकर भस्म कर डालिये। उस दुरात्मा ने मेरा भी कम अनिष्ट नहीं किया है। आप सर्प-यज्ञ करेंगे तो आपके पिता की मृत्यु का बदला चुकेगा और मुझे भी प्रसन्नता होगी।’

श्रृंखला 3: जनमेजय के भाइयों को शाप Date :- 01-Jun-2010

आयोदधौम्य के दूसरे शिष्य का नाम था- ‘उपमन्यु’। आचार्य ने उसे यह कहकर भेजा कि ‘बेटा! तुम गौओं की रक्षा करो।’ आचार्य की आज्ञा से वह गाय चराने लगा। दिनभर गाय चराने के बाद सायंकाल आचार्य के आश्रम पर आया और उन्हें नमस्कार किया। आचार्य ने कहा, ‘बेटा! तुम मोटे और बलवान दिख रहे हो। खाते-पीते क्या हो? उसने कहा, ‘आचार्य! मैं भिक्षा माँगकर खा-पी लेता हूँ।’ आचार्य ने कहा, ‘बेटा! मुझे निवेदन किये बिना भिक्षा नहीं खानी चाहिये।’ उसने आचार्य की बात मान ली। अब वह भिक्षा माँगकर उन्हें निवेदित कर देता और आचार्य सारी भिक्षा लेकर रख लेते। वह फिर दिन भर गाय चराकर सन्ध्या के समय गुरूगृह में लौट आता और आचार्य को नमस्कार करता। एक दिन आचार्य ने कहा, ‘बेटा! मैं तुम्हारी सारी भिक्षा ले लेता हूँ। अब तुम क्या खाते-पीते हो?’ उपमन्यु ने कहा, ‘भगवन्! मैं पहली भिक्षा आपको निवेदित करके फिर दूसरी माँगकर खा-पी लेता हूँ।’ आचार्य ने कहा, ‘ऐसा करना गुरू के समीप रहने वाले ब्रह्मचारी के लिए अनुचित है। तुम दूसरे भिक्षार्थियों की जीविका में अड़चन डालते हो और इससे तुम्हारा लोभ भी सिद्ध होता है।’ उपमन्यु ने आचार्य की आज्ञा स्वीकार कर ली और वह फिर गाय चराने चला गया। सन्ध्या समय वह पुनः गुरूजी के पास आया और उनके चरणों में नमस्कार किया। आचार्य ने कहा, ‘बेटा उपमन्यु! मैं तुम्हारी सारी भिक्षा ले लेता हूँ, दूसरी बार तुम माँगते नहीं, फिर भी तुम खूब हट्टे-कट्टे हो, अब क्या खाते-पीते हो।?’ उपमन्यु ने कहा, ‘भगवन्! मैं इन गौओं के दूध से अपना जीवन-निर्वाह कर लेता हूँ।’ आचार्य ने कहा, ‘बेटा! मेरी आज्ञा के बिना गौओं का दूध पी लेना उचित नहीं है।’ उसने उनकी वह आज्ञा भी स्वीकार की और फिर गौएँ चराकर शाम को उनकी सेवा में उपस्थित होकर नमस्कार किया। आचार्य ने पूछा- ‘बेटा! तुमने मेरी आज्ञा से दूध पीना भी छोड़ दिया, फिर क्या खाते-पीते हो?’ उपमन्यु ने कहा- भगवन्! ये बछड़े अपनी माँ के थन से दूध पीते समय जो फेन उगल देते हैं, वही मैं पी लेता हूँ।’ आचार्य ने कहा, ‘राम-राम! ये दयालु बछड़े तुम पर कृपा करके बहुत-सा फेन उगल देते होंगे, इस प्रकार तो तुम इनकी जीविका में अड़चन डालते हो। तुम्हें वह भी नहीं पीना चाहिए।’ उसने आचार्य की आज्ञा शिरोधार्य की।

अब खाने-पीने के सभी दरवाजे बंद हो जाने के कारण भूख से व्याकुल होकर उसने एक दिन आक के पत्ते खा लिये। उन खारे, तीखे, कड़वे, रूखे और पचने पर तीक्ष्ण रस पैदा करने वाले पत्तों को खाकर वह अपनी आँखों की ज्योति खो बैठा। अंधा होकर वनों में भटकता रहा और एक कूएँ में गिर पड़ा। सूर्यास्त हो गया, परन्तु उपमन्यु आचार्य के आश्रम पर नहीं आया। आचार्य ने शिष्यों से पूछा- ‘उपमन्यु नहीं आया?’ शिष्यों ने कहा- भगवन्! वह तो गाय चराने गया है। आचार्य ने कहा- मैंने उपमन्यु के खाने-पीने के सभी दरवाजे बंद कर दिये हैं। इससे उसे क्रोध आ गया होगा। तभी तो अब तक नहीं लौटा। चलो, उसे ढूँढ़ें। आचार्य शिष्यों के साथ वन में गये और जोर से पुकारा, ‘उपमन्यु! तुम कहाँ हो! आओ बेटा।’ आचार्य की आवाज पहचानकर वह जोर से बोला, ‘मैं इस कुएँ में गिर पड़ा हूँ।’ आचार्य ने पूछा कि ‘तुम कुएँ में कैसे गिरे?’ उसने कहा, ‘आक के पत्ते खाकर मैं अंधा हो गया और इस कुएँ में गिर पड़ा।’ आचार्य ने कहा, ‘तुम देवताओं के चिकित्सक अश्विनीकुमार की स्तुति करो। वे तुम्हारी आँखें ठीक कर देंगे।’ तब उपमन्यु ने वेद की ऋचाओं से अश्विनीकुमार की स्तुति की।

उपमन्यु की स्तुति से प्रसन्न होकर अश्विनीकुमार उसके पास आये और बोले, ‘तुम यह पूआ खा लो।’ उपमन्यु ने कहा, ‘देववर! आपका कहना ठीक है। परन्तु आचार्य को निवेदन किये बिना मैं आपकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकता।’ अश्विनीकुमारों ने कहा, ‘पहले तुम्हारे आचार्य ने भी हमारी स्तुति की थी और हमने उन्हें पूआ दिया था। उन्होंने तो उसे अपने गुरू को निवेदन किये बिना ही खा लिया था। सो जैसा उपाध्याय ने किया, वैसा ही तुम भी करो।’ उपमन्यु ने कहा- ‘मैं आप लोगों से हाथ जोड़कर विनती करता हूँ। आचार्य को निवेदन किये बिना मैं पूआ नहीं खा सकता।’ अश्विनीकुमारों ने कहा, ‘हम तुम्हारी इस गुरूभक्ति से प्रसन्न हैं। तुम्हारे दाँत सोने के हो जायेंगे? तुम्हारी आँखें ठीक हो जायेंगी और तुम्हारा सब प्रकार कल्याण होगा।’ अश्विनीकुमारों की आज्ञा के अनुसार उपमन्यु आचार्य के पास आया और सब घटना सुनाई। आचार्य ने प्रसन्न होकर कहा, ‘अश्विनीकुमार के कथनानुसार तुम्हारा कल्याण होगा और सारे वेद और सारे धर्मशास्त्र तुम्हारी बुद्धि में अपने-आप ही स्फुरित हो जायेंगे।’

श्रृंखला 2: जनमेजय के भाइयों को शाप Date :- 01-May-2010

परिक्षित्-नन्दन जनमेजय अपने भाइयों के साथ कुरुक्षेत्र में एक बड़ा यज्ञ कर रहे थे। उनके तीन भाई थे- श्रुतसेन, उग्रसेन और भीमसेन। उस यज्ञ के अवसर पर वहाँ एक कुत्ता आया। जनमेजय के भाइयों ने उसे पीटा और वह रोता-चिल्लाता अपनी माँ के पास गया। रोते-चिल्लाते कुत्ते से माँ ने पूछा- ‘बेटा! तू क्यों रो रहा है? किसने तुझे मारा है? उसने कहा, ‘माँ! मुझे जनमेजय के भाइयों ने पीटा है।’ माँ बोली- ‘बेटा! तुमने उनका कुछ-न-कुछ अपराध किया होगा।’ कुत्ते ने कहा, ‘माँ! न मैंने हविष्य की ओर देखा और न ही किसी वस्तु को चाटा। मैंने तो कोई अपराध नहीं किया।’ यह सुनकर माता को बड़ा दुःख हुआ और वह जनमेजय के यज्ञ में गई। उसने क्रोध से कहा- ‘मेरे पुत्र ने हविष्य को देखा तक नहीं, कुछ चाटा भी नहीं और भी उसने कोई अपराध नहीं किया। फिर इसे पीटने का कारण? जनमेजय और उनके भाइयों ने इसका कोई उत्तर नहीं दिया। कुतिया ने कहा, ‘तुमने बिना अपराध मेरे पुत्र को मारा है, इसलिए तुम पर अचानक ही कोई महान भय आयेगा।’ देवताओं की कुतिया सरमा का यह शाप सुनकर जनमेजय बड़े दुःखी हुए और घबराये भी। यज्ञ समाप्त होने पर वे हस्तिनापुर आये और एक योग्य पुरोहित ढूँढ़ने लगे, जो इस अनिष्ट को शान्त कर सके।

एक दिन वे शिकार खेलने गये। घूमते-घूमते अपने राज्य में ही उन्हें एक आश्रम मिला। उस आश्रम में श्रुतश्रवा नाम के एक ऋषि रहते थे। उनके तपस्वी पुत्र का नाम था सोमश्रवा। जनमेजय ने उस ऋषि-पुत्र को ही पुरोहित बनाने का निश्चय किया। उन्होंने श्रुतश्रवा ऋषि को नमस्कार करके कहा, ‘भगवन्! आपके पुत्र मेरे पुरोहित बनें।’ ऋषि ने कहा, ‘मेरा पुत्र बड़ा तपस्वी और स्वाध्यायसम्पन्न है। यह आपके सारे अनिष्टों को शान्त कर सकता है। केवल महादेव के शाप को मिटाने में इसकी गति नहीं है। परन्तु इसका एक गुप्त व्रत है। वह यह कि यदि कोई ब्राह्मण इससे कोई चीज माँगेगा तो यह उसे अवश्य दे देगा। यदि तुम ऐसा कर सको तो इसे ले जाओ।’ जनमेजय ने ऋषि की आज्ञा स्वीकार कर ली। वे सोमश्रवा को लेकर हस्तिनापुर आये और अपने भाइयों से बोले- ‘मैंने इन्हें अपना पुरोहित बनाया है। तुम लोग बिना विचार के ही इनकी आज्ञा का पालन करना।’ भाइयों ने उनकी आज्ञा स्वीकार की। उन्होंने तक्षशिला पर चढ़ाई की और उसे जीत लिया।

गुरू सेवा की महिमा- उन्हीं दिनों उस देश में आयोदधौम्य नाम के एक ऋषि रहा करते थे। उनके तीन प्रधान शिष्य थे- आरूणि, उपमन्यु और वेद। इनमें आरूणि पांचालदेश का रहने वाला था। उसे उन्होंने एक दिन खेत की मेड़ बाँधने के लिये भेजा। गुरू की आज्ञा से आरूणि खेत पर गया और प्रयत्न करते-करते हार गया तो भी उससे बाँध न बँधा। जब वह तंग आ गया तो उसे एक उपाय सूझा। वह मेड़ की जगह स्वयं लेट गया। इससे पानी का बहना बंद हो गया। कुछ समय बीतने पर आयोदधौम्य ने अपने शिष्यों से पूछा कि ‘आरूणि कहाँ गया? शिष्यों ने कहा, ‘आपने ही तो उसे खेत की मेड़ बाँधने के लिये भेजा था।’ आचार्य ने शिष्यों से कहा कि चलो, हम लोग भी जहाँ वह गया है, वहीं चलें। वहाँ जाकर आचार्य पुकारने लगे, ‘आरूणि! तुम कहाँ हो? आओ बेटा!’ आचार्य की आवाज पहचानकर आरूणि उठ खड़ा हुआ और उनके पास आकर बोला, ‘भगवन्! मैं यहीं हूँ। खेत से जल बहा जा रहा था। जब उसे मैं किसी प्रकार नहीं रोक सका तो स्वयं ही मेड़ के स्थान पर लेट गया। अब यकायक आपकी आवाज सुनकर मेड़ तोड़कर आपकी सेवा में आया हूँ। आपके चरणों में मेरा प्रणाम है। आज्ञा कीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ?’ आचार्य ने कहा, ‘बेटा! तुम मेड़ के बाँध को उद्दलन (तोड़-ताड़) करके उठ खड़े हुए हो, इसलिये तुम्हारा नाम ‘उद्दालक’ होगा।’ फिर कृपादृष्टि से देखते हुए आचार्य ने और भी कहा, ‘बेटा! तुमने मेरी आज्ञा का पालन किया है। इसलिये तुम्हारा और भी कल्याण होगा। सारे वेद और धर्मशास्त्र तुम्हें ज्ञात हो जायेंगे।’ अपने आचार्य का वरदान पाकर वह अपने अभीष्ट स्थान पर चला गया।

श्रृंखला 1: महाभारत- एक आदर्श ग्रन्थ Date :- 01-Apr-2010

समूचे भारतवर्ष की संस्कृति, सभ्यता अथवा आदर्श का प्राचीन चित्र देखना हो तो वह सब महाभारत में ही उपलब्ध है। वास्तव में महाभारत एक अगाध महासागर के समान है, इसके अन्दर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थों से सम्बन्ध रखने वाले अनन्त उपदेशरूपी रत्न भरे पड़े हैं। संसार की एकमात्र सर्वमान्य पुस्तक श्रीमद्भगवद् गीता भी इसी रत्नाकर का एक जाज्वल्यमान रत्न है। इसकी सार्वभौमिक उपयोगिता को देखते हुए इसे विद्वानों ने पंचम् वेद की उपाधि दी है। यह विश्व का विशालतम ग्रन्थ है, इसमें एक लाख से अधिक श्लोक हैं। एक बार यदि महाभारत नामक पुस्तक को पढ़ लिया तो फिर किसी अन्य ग्रन्थ को पढ़ने की आवश्यकता नहीं रह जाती, इसीलिये इसे एक सम्पूर्ण ग्रंथ की संज्ञा दी गई है।

आईये, इन्हीं उपरोक्त बातों का आश्रय लेकर हम सब इस ग्रंथ के अध्ययन का संकल्प लें और प्रयासपूर्वक अपने बच्चों, परिवारजनों, मित्रों एवं अपने प्रभाव क्षेत्र में सभी को महाभारत पढ़ने-पढ़ाने के लिए प्रेरित करें। यहाँ एक बात विचारणीय है कि अगर हम हिन्दू धर्म वाले ही इस विलक्षण ग्रंथ को नहीं पढ़ेंगे तो और कौन इसे पढ़ेगा, अतः हमें अपने धार्मिक ग्रंथ पढ़ने चाहिएं, यह हमारा धार्मिक और सामाजिक दायित्व भी है।

आजकल पाश्चात्य जगत ने टी.वी. और इंटरनेट के माध्यम से भारतीय संस्कृति पर आक्रमण कर रखा है, पहले जो बच्चे बचपन में दादा-दादी से महाभारत, रामायण और पुराणों की रोचक कथाएँ सुनते थे, जिनसे बालकों के कोमल चित्त पर महान आत्माओं के प्रेरित करने वाले आख्यानों की अमिट छाप पड़ जाती थी, जिससे वे बालक जीवन भर पथ-भ्रष्ट नहीं होते थे और अपनी संस्कृति को सुदृढ़ बनाते थे। परन्तु अब तो बच्चा टी.वी. को देखता हुआ बड़ा होता है और होश संभालने से पहले कम्प्यूटर पर बैठ जाता है, कारणवश उसे जीवनभर भारतीयता क्या है, इसका ज्ञान ही नहीं हो पाता क्योंकि स्कूलों में तो जो विधर्मी चाहते हैं, वही पढ़ाया जाता है। अतः अब भी समय है, सभी हिन्दू भाइयों से प्रार्थना है कि प्रयासपूर्वक अपने बच्चों को देश की पुरातन संस्कृति से अवगत कराएं जिससे उनमें मानवता उत्पन्न हो क्योंकि पाश्चात्य संस्कृति से पाश्विकता दृष्टिगोचर होती है।

महाभारत के बारे में अनेक पाश्चात्य अन्वेषक विद्वानों द्वारा दिए गए कुछ विचार निम्नलिखित हैं-
1. महाभारत से यह मालूम होता है कि महाभारतकार प्रकृति के पूर्ण मर्मज्ञ हैं।
2. महाभारत बुद्धि, सत्य व सत्य-प्रेम और जानकारी की आश्चर्यजनक पुस्तक है।
3. महाभारत आदर्शवाद की अक्षय खान है।
4. महाभारत आर्य-जाति के आदर्श चरित्र व बौद्धिक योग्यता की सुन्दर तस्वीर है।
5. महाभारत आर्य-जाति के सदाचार और बुद्धि के द्वारा समस्त संसार की आँखें खोलने वाला है।
6. महाभारत मानवीय प्रतिभा का सुन्दर और पवित्र उत्पादन है।
7. महाभारत न केवल भारत बल्कि संसार के दूसरे देशों के लिए भी महान उपदेश है

सृष्टि की रचना- जिस समय यह जगत ज्ञान और प्रकाश से शून्य तथा अंधकार से परिपूर्ण था, उस समय एक बहुत बड़ा अण्डा उत्पन्न हुआ और वही समस्त प्रजा की उत्पत्ति का कारण बना। वह बड़ा ही दिव्य और ज्योतिर्मय था। उसी अण्डे से लोकपितामह प्रजापति ब्रह्माजी प्रकट हुए। उसके पश्चात् दस प्रचेता, दक्ष, उनके सात पुत्र, सात ऋषि और चैदह मनु उत्पन्न हुए। विश्वदेवा, आदित्य, वसु, अश्विनीकुमार, यक्ष, पिशाच, पितर, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, जल, आकाश, पृथ्वी, वायु, दिशाएँ, संवत्सर, ऋतु, मास, पक्ष, दिन-रात तथा जगत में और जितनी भी वस्तुएँ हैं, वे सब उसी अण्डे से उत्पन्न हुईं।

विवस्वान के बारह पुत्र हैं- दिवःपुत्र, बृहदभानु, चक्षु, आत्मा, विभावसु, सविता, ऋचीक, अर्क, भानु, आशावह, रवि और मनु। मनु के दो पुत्र- देवभ्राट और सुभ्राट। सुभ्राट के तीन पुत्र- दशज्योति, शतज्योति और सहड्डज्योति। दशज्योति के दस हजार, शतज्योति के एक लाख व सहड्डज्योति के दस लाख पुत्र उत्पन्न हुए। इन्हीं से करू, यदु, भरत, ययाति और इक्ष्वाकु आदि राजर्षियों के वंश चले।

कथा आरम्भ- भगवान व्यास जी ने अपने मन में महाभारत नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें वैदिक और लौकिक सभी विषयों का समावेश था, पर उन्हें पृथ्वी पर इसको लिखने वाला नहीं मिलता था, अतः उन्होंने ब्रह्माजी को अपनी चिन्ता से अवगत कराया। ब्रह्माजी ने कहा कि गणेश जी का स्मरण करो। गणेश जी स्मरण से व्यास जी के सामने उपस्थित हो गए, भली-भांति पूजा करके उन्हें बैठाया और उनसे प्रार्थना की, भगवन् मैंने मन-ही-मन महाभारत की रचना की है, मैं बोलता हूँ, आप उसे लिखते जाइये। गणेश जी ने कहा, यदि मेरी कलम एक क्षण के लिए भी न रूके तो मैं लिखने का काम कर सकता हूँ। व्यास जी ने कहा, ठीक है, किन्तु आप बिना समझे न लिखियेगा। गणेश जी ने तथास्तु कहकर लिखना स्वीकार कर लिया। भगवान व्यास ने कौतूहलवश ऐसे श्लोकों की रचना की कि गणेश जी को उन्हें समझने में जितनी देर लगती थी, उतनी ही देर में व्यास जी अनेकों नए श्लोक रच डालते थे।
 


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