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सारंगपुर का हनुमान मंदिर Date :- 01-May-2016

गुजरात के भावनगर के सारंगपुर में विराजने वाले कष्टभंजन हनुमान यहाँ महाराजाधिराज के नाम से राज करते हैं। कहते हैं कि बजरंग बली के इस दर पर आकर भक्तों का हर दुःख, उनकी हर तकलीफ का इलाज हो जाता है, इसलिए उन्हें कष्टभंजन हनुमान कहते हैं। विशाल और भव्य किले की तरह बने एक भवन के बीचों-बीच कष्टभंजन का अतिसुंदर और चमत्कारी मंदिर है।

किसी राज दरबार की तरह सजे इस सुंदर मंदिर के विशाल और भव्य मंडप के बीच 45 किलो सोना और 95 किलो चाँदी से बने एक सुंदर सिंहासन पर हनुमान जी विराजते हैं। उनके शीश पर हीरे जवाहरात का मुकुट है और पास ही एक सोने की गदा भी रखी है। संकटमोचन के चारों ओर प्रिय वानरों की सेना दिखती है और उनके पैरों में श्री शनिदेव महाराज हैं, जो संकटमोचन के इस रूप को खास बना देते हैं।

क्या है इस धम की विशेषता- बजरंग बली के पैरों में विराजमान शनि की मूर्ति, इस धाम को उनके अन्य मंदिरों से अलग विशेष स्थान दिलाती है, क्योंकि यहाँ शनि बजरंग बली के चरणों में स्त्री रूप में दर्शन देते हैं। तभी तो जो शनि प्रकोपों से परेशान होते हैं, वे यहाँ आकर नारियल चढ़ाकर समस्त चिंताओं से मुक्ति पा जाते हैं।

कहा जाता है कि एक समय था जब शनिदेव का पूरे राज्य में भय व्याप्त था, लोग शनिदेव की साढ़ेसाती से त्रस्त थे। आखिरकार भक्तों ने अपनी फरियाद बजरंग बली के दरबार में लगाई। भक्तों की बातें सुनकर हनुमान जी शनिदेव को सबक सिखाने के लिए उनके पीछे पड़ गए. अब शनिदेव के पास जान बचाने का आखिरी विकल्प बाकी था, सो उन्होंने स्त्री रूप धारण कर लिया क्योंकि उन्हें पता था कि हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी हैं और वो किसी स्त्री पर हाथ नहीं उठायेंगे। ऐसा ही हुआ, पवनपुत्र ने शनिदेव को मारने से इंकार कर दिया, लेकिन भगवान राम ने उन्हें आदेश दिया, फिर हनुमानजी ने स्त्री स्वरूप शनिदेव को अपने पैरों तले कुचल दिया और भक्तों को शनिदेव के भय से मुक्त किया।

मान्यता है बजरंग बली के इसी रूप ने शनि के प्रकोप से मुक्त किया, इसलिए यहाँ की गई पूजा से शनि के समस्त प्रकोप तत्काल दूर हो जाते हैं, तभी तो दूर-दूर से भक्त यहाँ आते हैं और शनि की दशा से मुक्ति पाते हैं क्योंकि भक्तों का ऐसा विश्वास है कि केसरीनंदन के इस रूप में 33 कोटि देवी-देवताओं की शक्ति समाहित है। इस हनुमान मंदिर के प्रति लोगों में अगाध श्रद्धा है क्योंकि यहाँ भक्तों को बजरंग बली के साथ शनिदेव का आशीर्वाद भी मिल जाता है। कहते हैं यहाँ अगर कोई भक्त नारियल चढ़ाकर अपनी कामना बोल दे तो उसकी झोली कभी खाली नहीं रहती। शनि दशा से मुक्ति तो मिलती ही है, साथ ही संकटमोचन का रक्षा कवच भी मिल जाता है।

तुलसीश्याम - चमत्कारिक जगह Date :- 01-Apr-2016

अगर आप एशियाटिक लायंस के जंगल ‘गिर’ की सफारी पर आए हैं तो अमरेली जिले के तुलसीश्याम जरूर जाएँ। तुलसीश्याम से मात्र 3 किमी. दूर एक ढलवाँ सड़क है। इसकी खासियत यह है कि अगर ढाल पर आप अपनी गाड़ी बंद कर लुढ़काना शुरू कर दें तो वह नीचे आने की बजाय ऊपर की ओर आने लगेगी। इतना ही नहीं, अगर इस ढाल पर आप पानी गिरा दें तो वह भी नीचे आने की बजाय ऊपर की ओर चढ़ने लगता है। अब यह सड़क इतनी प्रसिद्ध हो चुकी है कि यहाँ सैलानियों का हर समय तांता लगा रहता है।

यह कच्छ जिले का सबसे ऊँचा पहाड़ है। यहाँ से गुजरने वाली सड़क की खासियत यह है कि ढाल से उतरते समय तो रफ्तार बढ़ती ही है, बल्कि चढ़ते समय भी गाड़ी की रफ्तार बढ़ जाती है। आमतौर पर चढ़ाई चढ़ते समय काफी परेशानी होती है, लेकिन इस रहस्यमय जगह का मामला ठीक इससे उलटा है।

अमरेली जिले के तुलसीश्याम में स्थित यह कुंड भी आकर्षण का केंद्र है। इसकी खासियत यह है कि यह कभी नहीं सूखता। इतना ही नहीं, हर समय इसका पानी भी गर्म रहता है। इस तीर्थस्थल से भगवान विष्णु की पौराणिक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं।

कमरुनाग झील- जिसमें छिपा है अरबों का खजाना Date :- 01-Jan-2016

हिमाचल प्रदेश की पहाडि़यों के बीच एक ऐसी झील मौजूद हैं, जहाँ लाखों-करोड़ों नहीं, बल्कि इससे कहीं अधिक मूल्य का खजाना मौजूद है, जिसमें लाखों रुपये ऊपर से देखे जा सकते हैं। ये झील है मंडी जिले से करीब 60 किलोमीटर दूरी पर रोहांडा नामक स्थान पर है, जिसे ‘कमरुनाग झील’ के नाम से माना जाता है। कमरुनाग झील पर लगने वाले मेले में हर साल भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भक्त झील में सोने-चाँदी के गहने और पैसे डालते हैं। सदियों से चली आ रही इस परंपरा के आधार पर माना जाता है कि इस झील के गर्त में अरबों का खजाना दबा है। गर्मी के मौसम में सोना-चाँदी के जेवर साफ नजर आते हैं।

मान्यता है कि इस झील में सोना-चाँदी चढ़ाने से मन्नत पूरी होती है। इसी कारण लोग श्रद्धा से यहाँ अपने शरीर का कोई गहना चढ़ा देते हैं। झील पैसों से भी भरी रहती है। ये सोना-चाँदी कभी भी झील से निकाला नहीं जाता, क्योंकि ये देवताओं का होता है। कोई भी इस खजाने को चुरा नहीं सकता। माना जाता है कि कमरुनाग के खामोश प्रहरी इसकी रक्षा करते हैं।

हर साल 14 और 15 जून को बाबा कमरुनाग का दर्शन भक्तों को प्राप्त होता है। इनके दर्शन के लिए लोग रोहांडा नामक स्थान से 8 किलोमीटर घने जंगल और पहाड़ों की कठिन चढ़ाई पूरी करके आते हैं।

वृन्दावन का गोविन्ददेव मंदिर Date :- 01-Dec-2015

श्रीधाम वृन्दावन मंदिरों की नगरी में रूप में जाना जाता है। श्रीकृष्ण की लीलास्थली होने के कारण इस पावन भूमि पर प्रारम्भ से ही भक्तों, संतों-साधकों का शुभागमन होता रहा है। इन भक्तों के हृदय में वृन्दावन की पुण्यभूमि में श्रीराधाकृष्ण की कृपा से निरन्तर अद्भुत चमत्कारिक साक्षात्कार हुए। वृन्दावन का देवालयी स्वरूप मध्यकाल में अधिक मुखरित हुआ, विभिन्न दूरस्थ क्षेत्रों से श्रीराधाकृष्ण के पावन प्रेम के वशीभूत हो अनेक भक्तगण यहाँ की सुरम्य भूमि में आकर स्वयं को इनकी लीलाओं में आत्मसात् करने लगे। इन्हीं महान भक्तों में बंगाल से पधारे श्री चैतन्य महाप्रभु का नाम अग्रगण्य है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने ब्रज वृन्दावन की रेणुका में, यमुना के सुरम्य तट पर, अवस्थित प्राचीन वृक्षों और लता-पताओं में ही कृष्ण का अद्भुत साक्षात्कार किया। फलस्वरूप वे श्रीराधाकृष्ण के प्रेम में पागल होकर ‘हरिबोल’ के उद्घोष से दिशाओं को गुंजित करने लगे और जब यहाँ से वापस गये तो अपने छह प्रमुख शिष्यों- सर्वश्री सनातन, रूप, जीव, रघुनाथ भट्ट, गोपाल भट्ट एवं रघुनाथ दास गोस्वामियों को श्रीकृष्ण की भक्ति का प्रचार-प्रसार करने हेतु ब्रज भेजा और उन्हें प्रेरणा दी कि वहाँ जाकर अपने आराध्य की सेवा करें।

वैष्णव गौड़ीय साधकों की षड् गोस्वामी परम्परा में रूप गोस्वामी का प्रमुख स्थान है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्री रूप गोस्वामी को ब्रज-भक्ति सिद्धान्तों का ज्ञान देते हुए ब्रज में जाकर लुप्तप्राय तीर्थों एवं लीलास्थलों को प्रकट करने का आदेश दिया। उस समय वृन्दावन करील, पीलू और तुलसी की लता-पताओं से आच्छादित था। यहाँ केशीतीर्थ के सन्निकट निर्जन सुरम्य स्थान पर ये एक वृक्ष के नीचे रहकर श्रीराधा-कृष्ण की ललित-लावण्यमयी लीलाओं का अनुशीलन करने लगे। नीलांचन से आने के बाद श्रीरूप का मन प्रायः श्री महाप्रभु के वियोग में व्यथित रहने लगा। भजन-साधन, लुप्त ब्रजतीर्थ उद्धार एवं लीला ग्रंथ प्रणयन के कार्य में रत रहने पर भी एक दबी-सी चिन्ता श्रीरूप के मन को व्यथित कर रही थी। श्री ब्रजेन्द्रनन्दन से अपने भक्त का यह दुःख भला कैसे देखा जा सकता था? सम्वत् 1590 की माघ शुक्ला द्वितीय की आधी रात के समय स्वप्न में स्वयं श्री गोविन्द एक अद्भुत बालक के रूप में श्रीरूप से आकर कहने लगे- ‘मैं इस गोमा टीला में दबा हूँ, मुझे बाहर निकालो।’ प्रातःकाल वही स्वप्नदृष्ट श्याम बालक आकर बोला- बाबा! सामने यह गोमा-टीला है। मैं नित्य यह देखता हूँ कि एक गाय यहाँ निश्चित स्थान एवं निश्चित समय पर दूध की वर्षा करती है और फिर न जाने कहाँ चली जाती है।

श्री रूप मंत्रमुग्ध हो बालक के पीछे-पीछे गोमा टीला पर गये और गाय की दूध धारा से उस स्थान को प्लावित करते देखा। श्री रूप के आनन्द की सीमा न रही, वह जान गये कि जिस विग्रह की उपासना के लिए श्रीगौरांग देव ने आज्ञा दी थी, वह इसी स्थान पर है। आपने ब्रजवासियों को एकत्र किया और सावधानी से टीले की खुदाई की। दस हाथ नीचे ब्रजनन्दन श्री गोविन्द-विग्रह को सबने देखा और बाहर निकाला। माघ शुक्ला पंचमी सम्वत् 1594 को एक छोटे से मंदिर में शास्त्रोक्त विधि के अनुसार श्रीकृष्ण प्रपौत्र श्री वज्रनाभ द्वारा प्रतिष्ठित उस श्री गोविन्द देव विग्रह की पुनः प्रतिष्ठा हुई।

विक्रम सम्वत् 1647 में इस मंदिर का निर्माण आमेर नरेश मानसिंह के द्वारा कराया गया। मंदिर के शिलालेख से ज्ञात होता है कि इस मंदिर को माणिकचंद चैपड़ नामक शिल्पकार ने मानसिंह के अधीनस्थ राजा कल्याणदास की देखरेख में तैयार कराया था। ब्रिटिश कलेक्टर एफ.एस. ग्राउस ने अपने ऐतिहासिक ग्रंथ मथुरा डिस्ट्रिक्ट मेमोयर में इस मंदिर की विस्तृत जानकारी दी है। ब्रिटिश काल में इस मंदिर का जीर्णोद्धार भी तत्कालीन कलेक्टर एफ.एस. ग्राउस की देखरेख में हुआ। वर्तमान में इस मंदिर की देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की जा रही है। उत्तर मध्यकाल में औरंगजेब के शासनकाल के दौरान अन्य देवालयों की भाँति वृन्दावन के गोविन्द देव मंदिर ने भी तत्कालीन राजनैतिक विभीषिका को झेला, जिसके परिणामस्वरूप जहाँ उस समय इस मंदिर को क्षति पहुँची, वहीं यहाँ के श्रीविग्रह को मानसिंह के राजमहल में प्रतिष्ठित किया गया, जो अद्यावधि आज भी जयपुर में विद्यमान है। सम्वत् 1877 में पुनः बंगाल के भक्त नन्दकुमार वसु ने वृन्दावन में श्रीगोविन्द देव के नये मंदिर का निर्माण कराया और उसमें गोविन्द देव के प्रतिभू श्रीविग्रह को स्थापित किया। ब्रज की एक लोक मान्यता के अनुसार, जहाँ सनातन गोस्वामी के श्रीविग्रह मदन मोहन जी के चरण दर्शन, गोपीनाथ जी के वक्षःस्थल के दर्शनों का विशेष माहात्म्य है, वहीं गोविन्द देव के मुखमण्डल का दर्शन प्राणीमात्र को मोक्ष प्रदान करने वाला है।

- श्री सुकुमार गोस्वामी, श्रीमाध्वगौड़ेश्वर सम्प्रदाय आचार्य
सेवायत अधिकारी, गोविन्द देव मंदिर, वृन्दावन

यहाँ हिंदुओं के साथ मुसलमान भी पढ़ते हैं हनुमान चालीसा Date :- 05-Oct-2015

कहते हैं कि धर्म किसी को दुश्मनी नहीं सिखाता। उसका उद्देश्य तो नेकी और अमन का पैगाम देना है। यह इंसान की गलती है कि वह धर्म पर भी हिंसा का आवरण चढ़ा देता है। गुजरात का एक हनुमान मंदिर न केवल भक्ति बल्कि सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल भी है। यहाँ शनिवार को बड़ी तादाद में लोग हनुमान चालीसा पढ़ने आते हैं। इसमें हिंदुओं के अलावा मुसलमान भी शामिल होते हैं।

वडोदरा के तरसाली स्थित यह हनुमान मंदिर रामभक्त हनुमान के अलावा उन लोगों से भी जाना जाता है जो हनुमानजी के भक्त हैं और उनके लिए धर्म कभी बाधक नहीं बना। यहाँ आने से पहले मुसलमान पास ही स्थित एक मस्जिद में नमाज पढ़ते हैं और फिर वे अपने साथियों के साथ हनुमान मंदिर पहुँचते हैं। श्रद्धालुओं के अनुसार, मुसलमान भक्त हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं तथा भजनों में भी शामिल होते हैं। जब हनुमान जयंती आती है तो हिंदुओं के साथ मुसलमान भी धूमधाम से ये पर्व मनाते हैं। तरसाली के लोगों के लिए सांप्रदायिक सद्भाव जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा है। इसलिए जब मुसलमान नमाज के बाद हनुमान चालीसा पढ़ते हैं तो किसी को इससे आपत्ति नहीं होती।

श्रद्धालुओं के अनुसार, हिंदुओं के साथ मुसलमानों को भी हनुमान चालीसा पढ़ते देखना मन को शांति प्रदान करता है। यहाँ मुस्लिम भक्त हनुमानजी के भजन गाते हैं और लोग उनका साथ देते हैं। करीब 8 साल पहले मंदिर का निर्माण शुरू हुआ था और लोगों ने ‘मारुति मंडल’ नाम से एक धार्मिक संस्था बनाई। मंदिर के लिए न केवल हिंदुओं ने बल्कि मुसलमानों ने भी दिल खोलकर दान दिया। इस संस्था के करीब 500 सदस्य मुसलमान हैं।

मुस्लिम श्रद्धालुओं के अनुसार, अल्लाह की इबादत के साथ हनुमानजी की वंदना करना उनके तन, मन और जीवन को नई ऊर्जा देता है। इससे वे खुद को अल्लाह के ज्यादा समीप महसूस करते हैं। यहाँ के हिंदू भी मुसलमानों के प्रार्थना स्थलों पर जाते हैं।

श्री राधारमण मंदिर का चमत्कारिक इतिहास Date :- 12-Sep-2015

भगवान श्री राधारमण जी का प्राकट्य आज से लगभग 472 वर्ष पूर्व श्री वृन्दावन धाम में हुआ। कलिपावनावतार श्री चैतन्य महाप्रभु जो कि साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप माने जाते हैं, बंगाल के नवद्वीप ग्राम में प्रकट हुए। चैतन्य महाप्रभु ने सम्पूर्ण जीवन श्रीकृष्ण-नाम प्रचार के लिए समर्पित कर दिया। चैतन्य महाप्रभु ने सम्पूर्ण भारत में भ्रमण कर ऐसे व्यक्तियों का चुनाव किया, जो वृन्दावन धाम में रहकर श्रीकृष्ण नाम और भगवद्भक्ति का प्रचार करें, ये ही ‘छः गोस्वामी’ कहे गये- श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, श्री रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी एवं श्री जीव गोस्वामी।

एक बार श्री चैतन्य महाप्रभु जी भारत भ्रमण करते हुए दक्षिण भारत में स्थित श्री रंगम मंदिर में पधारे। चैतन्य महाप्रभु भगवान रंगनाथ के दर्शन कर भाव-विभोर हो गये और उच्च स्वर में हरिनाम कीर्तन करने लगे। इनके संन्यासी वेष और प्रचण्ड तेज को देखकर सब चकित रह गये। मंदिर के प्रधान पुजारी श्री वैंकट भट्ट आपको देखकर आनन्दित हुए और प्रसाद प्रदान किया एवं उनसे घर चलने का आग्रह किया। श्री वैंकट भट्ट जी पास ही बेलगुंडी ग्राम में निवास करते थे। चैतन्य महाप्रभु ने सहर्ष उनका आमंत्रण स्वीकार कर लिया। पुजारी जी ने चैतन्य महाप्रभु की खूब सेवा की तथा महाप्रभु से प्रार्थना की कि आप अपना चातुर्मास (संत इन चार महीने में एक ही स्थान पर भजन करते हैं) हमारे घर पर ही व्यतीत करें, महाप्रभु जी ने उनका आग्रह स्वीकार किया। वैंकट भट्ट समस्त परिवार सहित महाप्रभु जी की सेवा करने लगे।

वैंकट भट्ट का एक 11 वर्षीय पुत्र था, जिसका नाम गोपाल भट्ट था। वह महाप्रभु की खूब सेवा करता था। उसकी सेवा से महाप्रभु जी अत्यन्त प्रसन्न हुए और विचार करने लगे कि इतना छोटा-सा बालक और ऐसे संस्कार, अगर यह धर्म का प्रचार करे तो कितना आनन्द आये। जब चातुर्मास पूर्ण हुआ और महाप्रभु जी जाने लगे, तब वैंकट भट्ट जी पत्र-पुष्प, धन-आभूषण महाप्रभु को भेंट करने लगे। महाप्रभु जी ने कहा, मुझे इन सबकी अपेक्षा नहीं, अगर कुछ देना ही चाहते हो तो लोकहित के लिये अपने पुत्र गोपाल भट्ट को मुझे प्रदान करो। यह सुनते ही वैंकट भट्ट मूर्छित हो गये, लेकिन धर्म-प्रचार के लिये उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र गोपाल भट्ट को दान कर दिया।

महाप्रभु ने कहा, अभी इसकी शिक्षा-दीक्षा कराओ, जब उचित समय आयेगा, मैं इसको अपने पास बुला लूँगा। जाते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्री गोपाल भट्ट को मंत्रदीक्षा प्रदान की और अपना शिष्य बना लिया। चैतन्य महाप्रभु ने गोपाल भट्ट के अतिरिक्त और किसी को मंत्र-दीक्षा प्रदान नहीं की। 25 वर्ष की अवस्था प्राप्त कर गोपाल भट्ट ने महाप्रभु के संदेश वाहक की आज्ञा से वृन्दावन जाने का विचार बनाया।

वृन्दावन आकर श्री गोपाल भट्ट अखण्ड ब्रह्मचारी रहकर भजन करने लगे। यह अत्यन्त प्रतिभाशाली और विद्वान थे। धीरे-धीरे गोपाल भट्ट जी की ख्याति सम्पूर्ण ब्रजमण्डल में फैल गयी। इस समय श्री चैतन्य महाप्रभु जी जगन्नाथ पुरी में निवास कर रहे थे। उन्होंने अपने एक भक्त के द्वारा गोपाल भट्ट जी को अपना दुपट्टा, लंगोटी डोर सहित तथा भजन का पट्टा (चैकी) तथा एक पत्र भिजवाया, जिसको पाकर गोपाल भट्ट जी आनन्दित हो गये, मानो महाप्रभु जी ने अपना अंग वस्त्र भेजकर श्री गोपाल भट्ट का पट्टाभिषेक कर दिया। श्री चैतन्य महाप्रभु जी का दुपट्टा आज भी राधारमण मंदिर में विराजित है, विशेष उत्सवों पर उसके दर्शन कराये जाते हैं।

श्रीचैतन्य महाप्रभु ने पत्र में संदेश भेजा कि हे गोपाल भट्ट! तुम नेपाल में प्रवाहित होने वाली गण्डगी नदी से दामोदर शिला प्राप्त कर लाओ (शालिग्राम शिला) और उनका नित्य पूजन करो। श्री गोपाल भट्ट वृन्दावन से पैदल नेपाल गये और हिमालय की गहन घाटियों को पार कर मुक्तिनाथ धाम से दामोदर शिला लेने गये और जैसे ही उन्होंने कमण्डल को नदी के जल में डाला, स्वतः ही 12 शालिग्राम शिला उनके कमण्डल में आ गईं, जिनको गोपाल भट्ट जी वृन्दावन ले आये तथा नित्यप्रति सेवा करने लगे। श्री गोपाल भट्ट यमुना के तट पर, जहाँ भगवान रास रासेश्वर ने रास क्रीडा की, ऐसे स्थान को परम पवित्र मानकर भजन करते थे।

एक दिन नृसिंह चतुर्दशी का दिन था, गोपाल भट्ट जी भाव-विभोर हो गये कि आज कितना पावन दिन है। आज के दिन भगवान नृसिंह अपने भक्त प्रह्लाद के लिये खम्भे को फाड़कर प्रकट हुए थे। भगवान कितने दयालु हैं, यह दया कब होगी मेरे ऊपर। गोपाल भट्ट जी शालिग्राम जी की नित्य सेवा करते थे, लेकिन मन में भाव रहता कि मेरे ठाकुर का भी सुन्दर स्वरूप होता तो मैं उनका सुन्दर श्रृंगार करता, वस्त्राभूषण धारण कराता, लेकिन मेरे ठाकुर तो गोल हैं और नृसिंह भगवान का चिन्तन हो आया। वे रुदन करने लगे और रुदन करते-करते ही सो गये। अगले दिन जब उठे तो क्या देखते हैं कि एक शालिग्राम शिला के स्थान पर स्वयं श्री राधारमण जी प्रकट हो गये हैं। श्री राधारमण जी के नवीन मंदिर के निर्माण को लगभग 250 वर्ष हुए हैं। उससे पहले ठाकुर जी रसोई में छोटे मंदिर में ही विराजते थे।

ऐसा कहा जाता है कि जब मुगल काल में सभी वृन्दावन के मंदिरों के श्रीविग्रहों को बाहर ले जाया गया तो एकमात्र श्री राधारमण जी ऐसे थे, जो वृन्दावन से बाहर नहीं गये। श्री राधारमण के श्रीविग्रह की उस आपत्तिकाल में मंदिर की रसोई के प्राचीन कुएँ के आले में 6 महीने तक सेवा हुई।

श्री राधारमण मंदिर की गोस्वामी-परम्परा Date :- 11-Sep-2015

श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी जी के शिष्य श्री दामोदर लाल गोस्वामी जी ने ठाकुर जी की सेवा संभाली। श्री गोपालभट्ट जी की आज्ञा से इन्होंने गृहस्थ में प्रवेश किया तथा आगे इनके वंशज ठाकुर जी की सेवा कर रहे हैं। आज श्री राधारमण की सेवा में 50 गोस्वामी परिवार हैं, जिनका लगभग 25 वर्ष में एक बार सेवा करने का समय आता है।

इसी वंश परम्परा की एक धारा में श्री मानीलाल गोस्वामी जी हुए। इनको धर्म-प्रचार के लिये पंजाब एवं सिंध का स्थान प्राप्त हुआ। इनके छोटे भ्राता श्री शोभन लाल गोस्वामी परम विद्वान थे। इन्होंने पंजाब, सिंध, पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान तक जाकर प्रचार किया। इनके भतीजे श्री विजय कृष्ण गोस्वामी जी, अत्यन्त विद्वान तथा प्रखर प्रवक्ता थे। इनको बहुत-सी उपाधियों से विभूषित किया गया, जिसमें विद्याभूषण, वाचस्पति प्रमुख हैं।

श्री विजय कृष्ण गोस्वामी जी के पुत्र श्री मन्माध्व गौड़ेश्वर वैष्णवाचार्य श्री अतुल कृष्ण गोस्वामी जी हुए, जिन्होंने गौड़ीय सम्प्रदाय का मुक्त कण्ठ से प्रचार किया तथा बड़े-बड़े संतों एवं विद्वानों से सम्मान प्राप्त किया। श्री अतुल कृष्ण गोस्वामी जी के ज्येष्ठ पुत्र श्री विभूतिकृष्ण गोस्वामी जी सरल भाव से श्री राधारमण जी की सेवा में समर्पित हैं। श्री विभूति कृष्ण गोस्वामी जी के पुत्र श्री मन्माध्व गौड़ेश्वर वैष्णवाचार्य श्री कार्तिक गोस्वामी जी, जिन्होंने अपने दादाजी से शास्त्र शिक्षा प्राप्त की तथा गुरु दीक्षा ली। इस समय ये सम्पूर्ण विश्व में हरिनाम एवं भक्ति के प्रचार के लिये कार्यरत हैं। आप पंजाब के अमृतसर, पटियाला, चंडीगढ़ और लुधियाना प्रांत में मुख्यतः दीक्षा प्रदान करते हैं और वृन्दावन आकर श्री राधारमण जी की सेवा में समर्पित हो जाते हैं।

अनोखा मंदिर 'अपने राम का निराला धाम' Date :- 31-Jul-2015

इंदौर शहर में एक ऐसा भी मंदिर है, जहाँ पर भगवान राम और हनुमान जी के साथ रावण, कुंभकरण और मेघनाद की भी पूजा होती है। अपने तरह का यह अनोखा मंदिर वैभव नगर, इंदौर में है।

मंदिर का नाम है ‘अपने राम का निराला धाम’। यहाँ पर प्रवेश हेतु एक शर्त है कि आपको मंदिर में दर्शन हेतु 108 बार राम-नाम लिखना होगा। यहाँ नाम लिखने हेतु एक पूर्व निर्धारित पर्चा दिया जाता है, जिस पर 108 बार राम-नाम लिखने के बाद ही मंदिर में प्रवेश मिलता है। इस मंदिर में पूरे परिसर में राम-नाम या तो लाल रंग के पेंट से लिखा गया है या फिर इसे दीवारों पर उभारा गया है।

इस मंदिर में राम भगवान के साथ-साथ रावण की पूजा भी की जाती है व रावण के अतिरिक्त शयनावस्था में कुंभकरण, मेघनाथ और विभीषण की मूर्तियाँ भी हैं। यही सामने त्रिजटा, शबरी, कैकेयी, मंथरा और सूर्पणखा की मूर्तियाँ स्थापित हैं और पास में अहिल्या, मन्दोदरी, कुन्ती, द्रौपदी और तारा की मूर्तियाँ स्थापित की गयी हैं।

मंदिर की स्थापना 1990 में की गई थी और अब भी काम चल रहा है। मंदिर के संस्थापक, संचालक और पुजारी का एक तर्क यह भी है कि रामचरितमानस का हर पात्र पूजनीय है, इसीलिए यहाँ भगवानों के साथ-साथ राक्षसों की मूर्तियाँ भी स्थापित की गई हैं, जिसे हमने कभी देखा नहीं उसकी बुराई करने का हमें कोई अधिकार नहीं है। महापंडित और ज्ञानी होने के नाते रावण हमेशा पूजनीय रहेगा। मंदिर में कई उक्तियाँ लिखी हुई हैं जिनमे रावण की मूर्ति के पास सन्देश लिखा है कि ‘हे कलियुग वासियों मुझे भस्म करना छोड़ दो और अपने भीतर के राग, द्वेष, अहंकार को भस्म करो।’

इस मंदिर में चढ़ावा या प्रसाद की मनाही है। यहाँ न ही दानपेटी है और न ही किसी को अगरबत्ती व जल चढ़ाने की अनुमति। यहाँ के पुजारी के अनुसार, जिनकी कोई मनोकामना है, वे यहाँ आकर बस 108 बार राम-नाम लिखें, इतना ही काफी है।

अदम्य साहसी वीर मेजर शैतान सिंह Date :- 31-Jul-2015

1962 में जिस तरह चीन ने भारत की पीठ में छुरा घोंपा, उसका हम आज तक जवाब नहीं दे पाए हैं। आप कभी उत्तराखंड के रानीखेत जाइए, वहाँ कुमाऊँ रेजिमेंट का म्यूजियम देखिए। आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे।

मेजर शैतान सिंह किस तरह अपने 114 जवानों के साथ रिजांग ला पर 2 हजार से ज्यादा चीनी सैनिकों से लड़े। किस तरह नवम्बर-दिसम्बर की हाड़ गला देने वाली ठंड में भारतीय सैनिकों ने कामचलाऊ जूते और खस्ताहाल जैकेट पहनकर चीनी सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए, उसको सोचकर भी दिल दहल जाता है।

ये वही मेजर शैतान सिंह थे, जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू के रिश्तेदार और सेना की उत्तर पूर्वी ब्रिगेड के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बी.एम. कौल का लड़ाई से पीछे हटने का आदेश ठुकरा दिया था, अंतिम दम तक लड़े और जब गोलियों से छलनी हो गए तब उनके दो साथी जवानों ने कहा- सर आपको मेडकल यूनिट तक भेज देते हैं। मेजर शैतान सिंह ने कहा- मुझे और मेरी मशीनगन को यहीं छोड़ दो, हाथ कट चुके थे, पेट और जांघ में गोली लगी थी। मेजर ने पैर से मशीनगन का ट्रिगर दबाया और दुश्मन का अंतिम दम तक सामना किया, लड़ते-लड़ते प्राण न्यौछावर कर दिए लेकिन उस पोस्ट पर दिन भर चीनी सेना को इंच भर आगे नहीं बढ़ने दिया।

इस अदम्य साहस और वीरता के लिए मेजर शैतान सिंह को परमवीर चक्र मिला। ये वही मेजर शैतान सिंह थे, जिनको लेकर कवि प्रदीप ने अमर गीत लिखा और लता मंगेशकर ने गाया-

थी खून से लथपथ काया, फिर भी बंदूक उठा ली

दस-दस को एक ने मारा, फिर अपनी जान गंवा दी

अद्भुत एवं सत्यः जहाँ हिंदू हो या मुसलमान - सभी बोलते हैं संस्कृत Date :- 03-Jul-2015

क्या आपने कभी किसी ऐसी जगह के बारे में सुना है, जहाँ का बच्चा-बच्चा संस्कृत में बात करता हो? कर्नाटक का मत्तूरु ऐसा ही एक गाँव है। चाहे हिंदू हो या मुसलमान, इस गाँव में रहने वाले सभी लोग संस्कृत में ही बातें करते हैं। यूँ तो आसपास के गाँवों में लोग कन्नड़ भाषा बोलते हैं, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं है।

तुंग नदी के किनारे बसा ये गाँव बेंगलुरु से 300 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 1981-82 तक यहाँ कन्नड़ ही बोली जाती थी। लेकिन 33 साल पहले पेजावर मठ के स्वामी ने इसे संस्कृत भाषी गाँव बनाने का आह्वान किया था और मात्र 10 दिनों तक 2 घंटे के अभ्यास से पूरा गाँव संस्कृत में बात करने लगा। मत्तूरु गाँव में 500 से ज्यादा परिवार रहते हैं, जिनकी संख्या तकरीबन 3500 के आसपास है। वर्तमान में यहाँ के सभी निवासी संस्कृत समझते हैं और अधिकांश निवासी संस्कृत में ही बात करते हैं।

इस गाँव में संस्कृत भाषा के क्रेज का अनुमान आप इसी बात से लगा सकते हैं कि वर्तमान में स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों में से लगभग आधे प्रथम भाषा के रूप में संस्कृत पढ़ रहे हैं। संस्कृतभाषी इस गाँव के युवा बड़ी-बड़ी कम्पनियों में काम कर रहे हैं। कुछ साॅफ्टवेयर इंजीनियर हैं तो कुछ बड़े शिक्षा संस्थानों व विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ा रहे हैं। इतना ही नहीं, विदेशों से भी कई लोग संस्कृत सीखने के लिए इस गाँव में आते हैं। इस गाँव से जुड़ी एक रोचक बात यह भी है कि इस गाँव में आज तक कोई भूमि विवाद नहीं हुआ है।

लाखों की नौकरी छोड़ सुनाते हैं गो-कथा Date :- 31-May-2015

रायपुर छत्तीसगढ़ के मोहम्म्द फैज खान प्रोफेसर की नौकरी छोड़ लोगों को गोकथा सुना रहे हैं। दिन की शुरुआत नमाज से करते हैं और दोपहर में हिंदू समाज के लोगों को गो कथा सुनाते हैं।

इन दिनों खंडवा जिले के बेडि़याखुर्द में गो-कथा कर रहे हैं। गो-कथा के साथ मुस्लिम नाम होने के कारण लोग आश्चर्य कर पहुँच रहे हैं। रमजानुल मुबारक में वह पूरे 30 दिन के रोजे भी रखते हैं। वह पिछले दो साल से गो-कथा कर रहे हैं। फैज खान के माता-पिता शिक्षक हैं। फैज ने खुद राजनीति विज्ञान से डबल एम.ए. किया है। दो साल पहले वह रायपुर में प्रोफेसर थे।

एक उपन्यासकार गिरीश पंकज के उपन्यास एक गाय की आत्मकथा से प्रेरित हो गए। इसमें नायक एक मुस्लिम होता है। यहीं से अपने जीवन में उस किरदार को अपनाने की ठान ली। संत गोपालमणी से हिमालय में मुलाकात हुई। यहाँ उनका धेनु मानस ग्रंथ पड़ा और फिर गो-कथा वाचक बन गए।

मो. फैज खान 15 दिसंबर से सिर्फ गाय के दूध का सेवन कर रहे हैं। 24 घंटे में वह दो लीटर देशी गाय का दूध पीते हैं। वह बताते हैं देशी गाय अब कम ही मिल पाती हैं। 10 नवंबर 2013 में 22 दिन तक सिर्फ गाय के दूध का ही सेवन किया था। गोहत्या पर प्रतिबंध लगाने को लेकर दिल्ली में अनशन भी कर चुके हैं। लोगों को गाय के दूध का सेवन करने के लिए प्रेरित करते हैं। 51 दिन तक गाय के दूध का ही सेवन कर मैं यह बताना चाहता हूँ कि इसे पीकर व्यक्ति किस तरह जीवित रह सकता है।

खान की भारत की सनातन संस्कृति के प्रति निष्ठा है। इसी का एक अंग गाय और गंगा है, जिससे हर धर्म का व्यक्ति लाभ उठाता है।

भारतीय परम्परा में नारी श्रृंगार का रहस्य Date :- 08-May-2015

नारी प्रकृतितः श्रृंगार प्रिय होती है। संस्कृत वांड्गमय में अलंकार शास्त्र, श्रृंगार रस आदि की सर्जना की है। नारी की श्रृंगार प्रियता विश्व जनित है, लेकिन भारतीय नारियों में यह विशेष रूप से अनोखा व अनुपम है।

भारतीय हिन्दू महिलाओं के कलाइयों में चूडि़याँ, पैरों में पायल, सिर में सिन्दूर, माँग में कुमकुम की बिन्दी, नाक में नथ, गले में मंगलसूत्र, पैर की अंगुलियों में बिछुआ तथा कान में बाली उसकी सुन्दरता में चार-चाँद लगा देती है। भारतीय नारी के परिधान ‘साड़ी’ सर्वांगपूर्ण लज्जाभूषण है।

आइये जाने, श्रृंगार हमारा पुराना फैशन नहीं, परम्परा नहीं, इसके पीछे वैज्ञानिक कारण, गूढ़ रहस्य छिपे हैं-

1. सिन्दूर लगाने के पीछे क्या है?- विगत सदियों से विवाहित हिन्दू महिलाएँ माँग में सिंदूर लगाती रही हैं। सिन्दूर लगाने का स्थान अत्यन्त संवेदनशील है। सिन्दूर लगाने से दिमाग सतर्क तथा सक्रिय रहता है। सिन्दूर में मरकरी पाई जाती है, जिससे दिमाग तनावमुक्त रहता है। विवाहोपरान्त महिला की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। अतः यह अत्यन्त आवश्यक है।

2. काँच की चूडि़याँ- विवाहित महिला के लिए यह प्रशस्त चिन्ह है, सर्वविध शुभ माना गया है। नई दुल्हन की कलाइयों में चूडि़यों की खनक के पीछे गूढ़ रहस्य है। काँच में सात्विक, चैतन्य अंश प्रधान होता है। इसके आपस में बजने से जो ध्वनि पैदा होती है, वो नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाती है।

3. मंगलसूत्र- इसके पीछे जुड़ा विज्ञान यह है कि यह रक्तचाप को ठीक रखता है। भारतीय महिलाएँ काफी श्रम करती हैं। बड़े बुजुर्ग सलाह देते हैं कि मंगलसूत्र छिपा रहना चाहिए, ताकि यह शरीर को स्पर्श करता रहे।

4. बिछुआ के पीछे रहस्य- शादीशुदा हिन्दू महिलाएँ पैरों में चाँदी का बिछुआ अवश्य पहनती हैं। पैरों के जिन अंगुलियों में बिछुआ पहना जाता है, उसका सम्बन्ध गर्भाशय और दिल से है। इससे गर्भधारण, संरक्षण में सहायता मिलती है। साथ ही, मासिक धर्म को नियमित रखता है। बिछुआ चाँदी का होती है, जो सिर को ठंडा रखता है।

5. कुमकुम की बिन्दी- भौहों के बीच आज्ञा चक्र में कुमकुम- गुस्सा, क्रोध व तनाव को कम करता है। यह जीवन में सुशान्ति लाने में सहायक है।

6. नाक में लौंग पहनने से श्वास नियमित रहता है।

7. कान में बाली-झुमका पहनने से एक्यूपंक्चर का प्रभाव पड़ता है। कान में छेद कराकर, उसमें धातु ग्रहण करने से मासिक चक्र नियमित रहता है। शरीर ऊर्जावान, स्वास्थ्य की अनेक समस्याओं के समाधान में सहायक होता है।

8. पैरों में चाँदी की पायल- चाँदी की पायल से पीठ, एड़ी, घुटनों में दर्द, हिस्टीरिया आदि रोगों में सहायक होती है तथा पैर को मजबूती देती है।

श्रीरामचरितमानस की महत्ता Date :- 01-Apr-2015

श्रीरामचरितमानस का स्थान हिंदी-साहित्य में ही नहीं, जगत के साहित्य में निराला है। इसके जोड़ का ऐसा ही सर्वांग सुन्दर, उत्तम काव्य के लक्षणों से युक्त, साहित्य के सभी रसों का आस्वादन कराने वाला, काव्य कला की दृष्टि से भी सर्वोच्च कोटि का तथा आदर्श गार्हस्थ्य-जीवन, आदर्श राजधर्म, आदर्श पारिवारिक जीवन, आदर्श पातिव्रत धर्म, आदर्श भ्रातृधर्म के साथ-साथ सर्वोच्च भक्ति, ज्ञान, त्याग, वैराग्य तथा सदाचार की शिक्षा देने वाला, स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध और युवा- सबके लिये समान उपयोगी एवं सर्वोपरि सगुण-साकार।

भगवान् की आदर्श मानवलीला तथा उनके गुण, प्रभाव, रहस्य तथा प्रेम के गहन तत्व को अत्यन्त सरल, रोचक एवं ओजस्वी शब्दों में व्यक्त करने वाला कोई दूसरा ग्रंथ हिंदी-भाषा में ही नहीं, कदाचित् संसार की किसी भी भाषा में आज तक नहीं लिखा गया। यही कारण है कि जितने चाव से गरीब-अमीर, शिक्षित- अशिक्षित, गृहस्थ-संन्यासी, स्त्री-पुरुष, बालक-वृद्ध- सभी श्रेणी के लोग इस ग्रंथ को पढ़ते हैं, उतने चाव से और किसी ग्रंथ को नहीं पढ़ते तथा भक्ति, ज्ञान, नीति, सदाचार का जितना प्रचार जनता में इस ग्रंथ से हुआ है, उतना कदाचित् और किसी ग्रंथ से नहीं हुआ।

इसके अतिरिक्त रामचरितमानस एक आशीर्वादात्मक ग्रंथ है। इसके प्रत्येक पद्य को श्रद्धालु लोग मन्त्रवत् आदर देते हैं और इसके पाठ से लौकिक एवं पारमार्थिक अनेक कार्य सिद्ध करते हैं। यही नहीं, इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करने तथा इसमें आये हुए उपदेशों का विचारपूर्वक मनन करने एवं उनके अनुसार आचरण करने से तथा इसमें वर्णित भगवान की मधुर लीलाओं का चिन्तन एवं कीर्तन करने से मोक्षरूप परम पुरुषार्थ एवं उससे भी बढ़कर भगवत्प्रेम की प्राप्ति आसानी से की जा सकती है।

क्यों न हो, जिस ग्रंथ की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी जैसे अनन्य भगवद्भक्त के द्वारा, जिन्होंने भगवान् श्रीसीताराम जी की कृपा से उनकी दिव्य लीलाओं का प्रत्यक्ष अनुभव करके यथार्थ रूप में वर्णन किया है, साक्षात् भगवान् श्रीगौरीशंकर जी की आज्ञा से हुई तथा जिस पर उन्हीं भगवान ने ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ लिखकर अपने हाथ से सही की, उनका इस प्रकार का अलौकिक प्रभाव कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ऐसी दशा में इस अलौकिक ग्रंथ का जितना भी प्रचार किया जायेगा, जितना अधिक पठन-पाठन एवं मनन-अनुशीलन होगा, उतना ही जगत का मंगल होगा- इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।

वर्तमान समय में तो, जब सर्वत्र हाहाकार मचा हुआ है, सारा संसार दुःख एवं अशान्ति की भीषण ज्वाला से जल रहा है, जगत् के कोने-कोने में मार-काट मची हुई है और प्रतिदिन हजारों मनुष्यों का संहार हो रहा है, करोड़ों-अरबों की सम्पत्ति एक-दूसरे के विनाश के लिये खर्च की जा रही है, विज्ञान की सारी शक्ति पृथ्वी को श्मशान के रूप में परिणत करने में लगी हुई है, संसार के बड़े से बड़े मस्तिष्क (वैज्ञानिक) संहार के नये-नये साधनों को ढूँढ़ निकालने में व्यस्त हैं, जगत में सुख-शांति एवं प्रेम का प्रसार करने तथा भगवत्कृपा का जीवन में अनुभव करने के लिए रामचरितमानस का पाठ एवं अनुशीलन परम आवश्यक है।

हनुमान जी के कुछ विचित्र मंदिर Date :- 01-Apr-2015

बड़ागाँव- मध्य प्रदेश में टीकमगढ़ से लगभग 23 किलोमीटर दूर बड़ागाँव नामक स्थान पर स्वतः प्रकट मारूति प्रतिमा स्थित है। यह प्रतिमा एक विशाल पीपल-वृक्ष के नीचे है। इनका एक चरण ऊपर है एवं दूसरा चरण नीचे पृथ्वी में धंसा हुआ है। जो चरण पृथ्वी में धंसा है, उसका आज तक पता नहीं चल पाया कि वह कितनी गहराई में है। इसकी गहराई का पता चलाने के निमित्त चरण के आसपास खुदाई करनी प्रारम्भ की। लगभग 40-45 फुट की गहराई तक खोदने पर भी उसका पता न चल सका। इस मंदिर की बहुत मान्यता है।

घाटकोटरा- यह झाँसी जिले का एक गाँव है। यहाँ बाहुबीर बजरंग का भव्य मंदिर है। मंदिर में श्री हनुमान जी की 5 फुट ऊँची भव्य मूर्ति है। कहा जाता है कि इस मूर्ति का एक हाथ मस्तक से चिपका हुआ था, किंतु सन् 1953 ई. के लगभग वह अपने आप अलग हो गया और अब तक उसी अवस्था में है। इस चमत्कार के घटित होने पर प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ला पूर्णिमा (हनुमान जयन्ती) को वहाँ बड़े समारोह के साथ उत्सव मनाया जाने लगा और बड़ी संख्या में भक्त लोग यहाँ आते हैं।

गता के बजरंग- यह स्थान घाटकोटरा, जिला झाँसी से दो किलोमीटर दूर धसान नदी के निकट है। यहाँ हनुमान जी की मूर्ति पहले पृथ्ची में दबी हुई थी। दो सौ वर्ष पहले इन्होंने एक पंडित जी को, जो बादलवंश के थे, स्वप्न आदेश दिया कि तुम हमारे लिये मन्दिर बनवा दो। उसी दिन हल जोतते समय हलकी नोक लग जाने से उस स्थान से रुधिर की धारा फूट निकली। यह देखकर गाँव वाले एकत्र हुए, पंडित जी की आज्ञा से वह स्थान खोदा गया। उसमें से हनुमान जी की एक मूर्ति निकली। तभी से महावीर जी के ऊपर औषध रूप में घी का फाहा चढ़ने लगा, जो कई वर्षों तक चलता रहा। आज इस स्थान का ऐसा प्रभाव है कि 1 किलोमीटर के घेरे में कोई कैसा भी निर्भीक शिकारी क्यों न हो, उसके द्वारा जीवघात नहीं होने पाता। इस मंदिर की बहुत मान्यता है।

नव संवत्सर - सम्पूर्ण सृष्टि का पूजनीय दिवस Date :- 03-Mar-2015

विश्व में केवल भारतीय संस्कृति ही एक ऐसी संस्कृति है जो अनादि है क्योंकि उसका मूल वेद है। वेदों में दिये सिद्धांत शाश्वत सत्य और नित्य हैं। प्राचीनतम होने पर भी वे सदैव नवीन हैं। उनमें आज तक कोई भूल निकाली नहीं जा सकी है। यदि कभी विज्ञान से मतभेद हो गया तो भी वैज्ञानिकों को घूम फिरकर पुनः वेदों की ही शरण में आना पड़ा है। वेदों के सिद्धांत अपरिवर्तनीय हैं।

वर्तमान मानव सृष्टि के बारे में विद्वानों में बहुत मतभेद हैं। पश्चिम के खगोलशास्त्री, दार्शनिक, विचारक और उनके धर्मग्रंथ इसे 6-7 हजार वर्ष पुरानी मानते हैं। परंतु भूगर्भीय क्षेत्र में निरंतर हो रहे अनुसंधानों के कारण यह बात अब वैज्ञानिक भी स्वीकार करने लगे हैं कि मानवीय सृष्टि की प्राचीनता मानव की कल्पनाशक्ति से परे है। भारतीय कालतत्व विशेषज्ञ मनीषियों या वेदों में दिये विवरणानुसार यह मानवीय सृष्टि लगभग 2 अरब वर्ष पुरानी है। इससे पाश्चात्य विद्वानों की अवधारणा कि यह विश्व 6-7 हजार वर्ष पूर्व बना था, धराशायी हो जाती है।

ईसवी सन् का प्रारंभ ईसा की मृत्यु पर आधारित है, परंतु उनका जन्म और मृत्यु अभी भी अज्ञात है। ईसवी सन् का मूल रोमन संवत् है। यह 753 ईसा पूर्व रोमन साम्राज्य के समय शुरू किया हुआ था। उस समय उस संवत् में 304 दिन और 10 मास होते थे। उस समय जनवरी और फरवरी के मास नहीं थे। ईसा पूर्व 56 वर्ष में रोमन सम्राट जूलियस सीजर ने वर्ष 455 दिन का माना। बाद में इसे 365 दिन कर दिया। उसने अपने नाम पर जुलाई मास भी बना दिया। बाद में उसके पोते अगस्टस ने अपने नाम पर अगस्त का मास बना दिया। उसने महीनों के बाद दिन संख्या भी तय कर दी। इस प्रकार ईसवी सन् में 365 दिन और 12 मास होने लगे। फिर भी इसमें अंतर बढ़ता गया क्योंकि पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने के लिए 365 दिन 6 घंटे, 9 मिनट और 11 सेकंड लगते हैं। ईसवी सन् 1583 में इसमें 18 दिन का अंतर आ गया। तब ईसाइयों के धर्मगुरू पोप ग्रेगरी ने 4 अक्टूबर को 15 अक्टूबर बना दिया और आगे के लिए आदेश दिया कि 4 की संख्या से विभाजित होने वाले वर्ष में फरवरी मास 29 दिन का होगा। 400 वर्ष बाद इसमें 1 दिन और जोड़कर इसे 30 दिन का बना दिया जाएगा। इसी को ग्रेगरियन कैलेंडर कहा जाता है, जिसे सारे ईसाई जगत ने स्वीकार कर लिया।

ईसाई संवत् के बारे में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पहले इसका आरंभ 25 मार्च से होता था, परंतु 18वीं शताब्दी से इसका आरंभ 1 जनवरी से होने लगा। इस कैलेंडर में जनवरी से जून तक के नाम रोमन देवी-देवताओं के नाम पर हैं। जुलाई, अगस्त का संबंध सम्राट जूलियस सीजर और उसके पाते अगस्टस से है। सितम्बर से दिसंबर तक के मासों के नाम रोमन संवत् के मासों की संख्या के आधार पर हैं, जिसका क्रमशः अर्थ है 7, 8, 9 और 10 है। इससे ईसवी सन् के खोखलेपन की पोल और ईसाई जगत की अवैज्ञानिकता जग जाहिर हो जाती है।

इसके विपरीत भारत में मासों का नामकरण प्रकृति पर आधारित है। यथा- चित्रा नक्षत्र वाली पूर्णिमा के मास का नाम चैत्र है, विशाखा का वैशाख है, ज्येष्ठा का ज्येष्ठ है, श्रवण का श्रावण, उत्तराभाद्रपद का भाद्रपद, अश्विनी का आश्विन, कृतिका का कार्तिक, मृगशिरा का मार्गशीर्ष, पुष्य का पौष, मघा का माघ और उत्तरा फाल्गुनी का फाल्गुन मास होता है। इसी तरह भारत में 354 दिन के चांद्र वर्ष और 365 दिन, 6 घंटे, 9 मिनट, 11 सेकंड के अंतर को दूर करने के लिए हमारे ज्योतिषियों ने 2 वर्ष 8 मास 16 दिन के उपरांत एक अधिक मास या पुरुषोत्तम अथवा मल मास की व्यवस्था करके कालगणना की शुद्धता और वैज्ञानिकता बरकरार रखी है।

उपरोक्त तथ्यों के संदर्भ में यही उचित होगा कि हम सभी भारतवासी पूर्णतः वैज्ञानिकता पर आधारित अपनी युगों की वैज्ञानिक एवं वैश्विक भारतीय कालगणना का प्रयोग करें। इस कालगणना का प्रथम दिवस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा श्री ब्रह्माजी का सृष्टि रचना का दिन होने के कारण यह वर्ष प्रतिपदा केवल हम भारतवंशियों के लिये ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण सृष्टि के लिए भी पूजनीय दिन है।

इधर-उधर से जोड़-तोड़, मनगढ़ंत कल्पनाओं, मिथ्या सिद्धांतों और ‘कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा-भानुमति ने कुनबा जोड़ा’ के नमूने पर बने ईसवी सन् के नववर्ष को ईसाई जगत मनाये, हम इसे क्यों मनायें? यूरोपीय ईसाई साम्राज्य के प्रभाव काल में यह ईसाई कालगणना हम पर थोपी गई थी। उस समय की मानसिक दासता के कारण हम ईसाई वर्ष को मनाते चले आ रहे हैं। यह हमारे लिए लज्जा का विषय है। आईये, हम इसका परित्याग कर अपना भारतीय नववर्ष बनायें।

नवसंवत्सर 2072 की आप सबको हार्दिक शुभकामनायें!

श्रीमद्भगवद्गीता Date :- 02-Mar-2015

गीता व्यवहार में परमार्थ की विलक्षण कला बताती है, जिससे मनुष्य प्रत्येक परिस्थिति में रहते हुए तथा शास्त्रविहित सब तरह का व्यवहार करते हुए भी अपना कल्याण कर सके। अन्य ग्रन्थ तो प्रायः यह कहते हैं कि अगर अपना कल्याण चाहते हो तो सब कुछ त्यागकर साधु हो जाओ, एकान्त में चले जाओ, क्योंकि व्यवहार और परमार्थ- दोनों एक साथ नहीं चल सकते। परन्तु गीता कहती है कि आप जहाँ हैं, जिस मत को मानते हैं, जिस सिद्धान्त को मानते हैं, जिस धर्म, सम्प्रदाय, वर्ण, आश्रम आदि को मानते हैं, उसी को मानते हुए गीता के अनुसार चलो तो कल्याण हो जायेगा। एकान्त में रहकर वर्षों तक साधना करने पर ऋषि-मुनियों को जिस तत्त्व की प्राप्ति होती थी, उसी तत्त्व की प्राप्ति गीता के अनुसार व्यवहार करते हुए हो जायेगी। सिद्धि-असिद्धि में सम रहकर निष्कामभावपूर्वक कर्तव्यकर्म करना ही गीता के अनुसार व्यवहार करना है।

जब युद्ध-जैसी घोर परिस्थिति और प्रवृत्ति में भी मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है, तो फिर और ऐसी कौन-सी परिस्थिति तथा प्रवृत्ति होगी, जिसमें रहते हुए मनुष्य अपना कल्याण न कर सके? गीता के अनुसार एकान्त में आसन लगाकर ध्यान करने से भी कल्याण हो सकता है और युद्ध करने से भी कल्याण हो सकता है।

अर्जुन न तो स्वर्ग चाहते थे और न राज्य चाहते थे। वे केवल युद्ध से होने वाले पाप से बचना चाहते थे। इसलिये भगवान मानो यह कहते हैं कि अगर तू स्वर्ग और राज्य नहीं चाहता, पर पाप से बचना चाहता है तो युद्धरूप कर्तव्य को समतापूर्वक कर, फिर तुझे पाप नहीं लगेगा। युद्ध तो तेरा कर्तव्य है। कर्तव्य न करने से और अकर्तव्य करने से ही पाप लगता है।

जीवन की राह दिखाती श्रीमद्भगवद्गीता Date :- 12-Feb-2015

श्रीमद्भगवद्गीता का जब से प्राकट्य हुआ है, तब से पता नहीं कितनी पीढि़यों ने अपने संशय के क्षणों में इससे जीवन की राह पाई है। ये उपदेश आज ही नहीं, सदा के लिये प्रासंगिक है। जिस प्रकार रणक्षेत्र में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्तव्य-अकर्तव्य से परिचित कराते हैं और ऊहापोह के भ्रमजाल से निकालकर उन्हें नई दृष्टि देते हैं, उसी प्रकार गीता का पाठ भी हमें वर्तमान दुश्चिन्ताओं से मुक्ति दिलाने में सहायक है। गीता मानवमात्र को जीवन में प्रतिक्षण आने वाले छोटे-बड़े संग्रामों के सामने हिम्मत से खड़े रहने की शक्ति देती है। मनुष्य का कर्तव्य क्या है? इसका बोध कराना ही गीता का केन्द्रीय विषय है। गीता का दर्शन जाति या धर्मविशेष के लिये नहीं है, वह सार्वभौम है।

गीता साहित्य के प्रेमियों को साहित्यिक आनन्द देती है, कर्मवीरों को कर्म करने का उत्साह देती है, ज्ञानियों को ज्ञानगंगा में डुबकी लगाने का अवसर देती है और भक्तों को गीता में भक्ति का रहस्य मिलता है। गीता किसी भी स्थिति में श्रद्धा को नष्ट नहीं होने देती। निराशा के अन्धकार में भटकने वाले मानव के जीवन में गीता आशा का प्रकाश बिखेरती है। हतोत्साही मानव को गीता नवीन प्रकाश देती है। भगवान मेरे साथ हैं, ऐसा मानने वाला मानव कभी निराश नहीं होता। आस्थावान मनुष्यों के लिये गीता मातृतुल्य है। मानव असफल होने पर निराश हो जाता है, लेकिन गीता बताती है कि असफलता सफलता के विरुद्ध नहीं है, बल्कि वह सतत प्रयत्न करने की प्रेरणा देती है। इसलिये मनुष्य को अधिक शक्ति से काम में लगना चाहिये। प्रयत्नशील मानव के जीवन में आने वाली असफलताएँ सफलता का सोपान बनती हैं। निराशावादी मनुष्य गुलाब पर काँटे देखता है, किंतु गीता उसको काँटों में गुलाब देखने की दृष्टि प्रदान करती है।

ज्ञान के चक्षु खोलती है गीता Date :- 06-Jan-2015

सर्वप्रथम 5151वीं गीता जयन्ती पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ! दुनिया के अनेकानेक धर्म ग्रन्थों में श्रीमद्भगवत गीता का स्थान सर्वोच्च है। सभी को अपने-अपने ग्रंथ, अपने-अपने गुरु और अपने अपने धर्म अज़ीज और प्यारे होते हैं, लेकिन जब-तक हम अन्य किसी दूसरे धर्म ग्रन्थ के बारे में नहीं जानेंगे, तब-तक हम कुएँ के मेंढक ही कहलाएंगे। धर्म और धर्म-ग्रंथ चाहे कहीं के भी और किसी के भी क्यों ना हों, वो गलत मार्ग की ओर इशारा नहीं करते और अगर वो करते है तो वो धर्म-ग्रंथ नहीं हो सकते। आज अगर दुनिया में आतंकवाद की घटनाएँ बढ़ रही हैं तो उसके पीछे साजिश है या फिर कोई सच्चाई? धर्म की आड़ में भोले-भाले और नादान युवाओं को जन्नत का सपना दिखाकर उनके जीवन में जहर घोलकर, जीते-जी जहन्नुम की आग में झोंक देते है। जब-तक हमें भगवत गीता का ज्ञान नहीं होगा, तब-तक हम अधर्म को धर्म समझकर अपना और अपनों का यूँ ही विनाश करते रहेंगे। सरकारी आँकड़ों की मानें तो पिछले 65 सालों में 33 हजार पुलिस कर्मी आतंकवादी घटनाओं में शहीद हुए और लगभग इतने ही हिंदू मारे गए होंगे। पर पूरी दुनिया के आँकड़े उठाए तो पिछले 50 सालों में 50 लाख से ज्यादा मुसलमान मारे गए होंगे। इन मुसलमानों को मारने वाले भी उनके अपने ही थे। ये खूनी खेल आखिर क्यों? जबकि इस्लाम तो शंाति और भाई-चारे का ही नाम है। स्वार्थ में वशीभूत होकर युवाओं को धर्म की गलत विवेचना कर जन्नत का सपना दिखाना और निर्दोषों को मारने का षड्यंत्र रचना, कितना सही है और कितना गलत, यह एक विचारणीय प्रश्न है? धर्म क्या है, कर्म क्या है, भक्ति क्या है और ज्ञान क्या है, इसकी अनुभूति हमें गीता के अध्ययन के उपरांत ही संभव हो पाएगी।

गीता में भगवान ने कहा है कि तपस्वियों से योगी श्रेष्ठ है, ग्रंथ के ज्ञानियों से भी योगी श्रेष्ठ है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है इसलिए अर्जुन तू योगी बन! योगी का शाब्दिक अर्थ है निष्काम कर्म करने वाले तथा परमात्मा की आज्ञा पर चलने वाले को योगी कहा गया है। अर्जुन तू सभी धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा, अर्थात् ज्ञान की शरण में जाने मात्र से ही जन्मों-जन्म के पाप कर्म समाप्त हो जाते हैं। क्या निर्दोष लोगों को मारना धर्म कहलाता है? भगवान ने अधर्म का नाश करने के लिए गीता का ज्ञान दिया था। आज आतंकवादी कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी से प्रेरणा लेकर निर्दोष लोगों को बंदी बनाकर मार रहे हैं। उसमें धर्म कहाँ है?

गीता में भगवान ने कहा है कि तप, यज्ञ और दान दुनिया के सबसे श्रेष्ठ कर्म हैं। इनको करते रहना चाहिए। तप- भूतकाल में किए गए पाप-कर्म तप से समाप्त होते हैं। यज्ञ- यज्ञ करने से वर्तमान सबल बन जाता है और दान से सुनहरे भविष्य का निर्माण होता है। काम, क्रोध और लोभ नरक के द्वार हैं। रामायण काल में मंथरा ने कैकेयी के मन को अस्थिर किया, जिससे काम रूपी इच्छा कैकेयी के मन में जागी तो राम उनसे विमुख हुए। सूर्पनखा के मन में काम जागा तो उसे लक्ष्मण के हाथों अपनी नाक गँवानी पड़ी। सूर्पनखा की नाक रावण के क्रोध का कारण बनी। वेदों का ज्ञाता, त्रिलोक विजेता रावण काम के अधीन होकर कुल समेत मारा गया। सोने के हिरण को देखकर माता सीता के मन में उसे पकड़ने की इच्छा (लोभ) जागी तो बदले में उन्हें सोने की लंका मिली फिर जीवन भर ना उन्हें राम मिले और ना ही आराम। यही नरक है और यही दुःखों का घर है।

मंगोल हमलावर बाबर के नाम पर भारत में मस्जि़द का नाम कैसे? मस्जि़द होगी तो अल्लाह की और अगर कोई मंदिर होगा तो ईश्वर का। बाबरी मस्जि़द का केस सन् 1949 से आज तक चल रहा है। कहते हैं कानून के हाथ बहुत लम्बे होते है। शायद कहने वालों ने इसे गलत रूप से परिभाषित किया है। कानून के हाथ किसी मुजरिम तक तो पहुँच सकते है, परंतु प्रकृति के नियम में इनका कोई हस्तक्षेप नहीं हो सकता। कानून के हाथ अगर लम्बे होते तो बाबरी मस्जि़द का केस लड़ने वाले हाशमी के पाँव कब्र में ना होते और आज दूध का दूध और पानी का पानी हो चुका होता। प्रकृति के नियम और परमात्मा के न्याय के आगे ना किसी के हाथ काम आते हैं और ना किसी के पाँव। ज्ञान के द्वारा ही हम सच और सही की पहचान कर पाएंगे। अगर हम गुलाम थे तो आज भी गुलाम हैं और अगर हम आजाद थे तो आज भी आजाद हैं। गुलामी और आजादी का सीधा संबंध ज्ञान से है। गीता में भी भगवान ने कहा है कि ज्ञान से पवित्र कुछ और नहीं। जिस दिन हम इस पवित्रता को पा लेंगे, उस दिन हम परमात्मा के हो जाएंगे और परमात्मा हमारे।

– रोशन लाल गोरखपुरिया
DARCL Logistics Limited

दुनिया की पहली मिरर इमेज 'श्रीमद्भगवद्गीता' Date :- 01-Dec-2014

पूरे विश्व में प्रसिद्ध ‘भगवद्गीता’ का अनुवाद दुनिया की हर भाषा में देखने को मिलता है, लेकिन एक ऐसी भगवद्गीता जिसको शीश में देख कर पढ़ा जाए, है ना कमाल। यह काम कर दिखाया है दादरी के पीयूष गोयल ने, पीयूष गोयल ने मिरर इमेज में सारे 18 अध्यायों के 700 श्लोक अनुवाद सहित हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखे हैं। इसके अलावा पीयूष गोयल कई धार्मिक व विश्व प्रसिद्ध पुस्तकें लिख चुके हैंः-

श्रीदुर्गा सप्तसती (संस्कृत भाषा में)
श्रीसाईं सच्चरित्र (लगभग 351 पेज हिन्दी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं में)
सुईं से लिखी मधुशाला
सुंदरकांड (2 बार)
तुलसीदासकृत ‘श्रीरामचरितमानस’ (दोहा, सोरठा व चैपाई)
मेहंदी कोन से लिखी रवीन्द्रनाथ टैगोर कृत ‘गीतांजलि’
कार्बन पेपर से लिखी विष्णु शर्माकृत ‘पंचतंत्र’
पीयूष गोयलकृत ‘पीयूष वाणी’ (कील से अल्यूमिनियम शीट पर व फैब्रिक कोन लाइनर से ट्रांसपेरेंट शीट पर)

अभी और लिखना बाकी है प्रभु की जब तक इच्छा!

सम्पर्क सूत्रः 09654271007 (पीयूष गोयल)

शाहदौला के चूहे Date :- 29-Oct-2014

भारतवर्ष वरदानियों का देश है। हमारे देवी-देवता जिसकी आराधना व तपस्या से प्रसन्न हो जाते हैं, बिना सोचे-समझे उसे मुँह-माँगा वरदान देने में जरा भी नहीं हिचकिचाते। कई बार राक्षसों ने देवताओं से वर पाकर उन्हें ही नष्ट करने की कोशिश की है, तब भयभीत होकर देवता अपनी रक्षा के लिये पतितपावन भगवान विष्णु की शरण में गये, फिर चाहे ‘मोहिनी’ रूप धारण करके या किसी सती का शील भंग करके उन्होंने देवताओं की रक्षा की।

इस देश में अनेक परोपकारी महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने बिना किसी लालच या द्वेष के लोगों का भला किया। ऐसे महापुरुषों में गुरु गोरखनाथ जी, गुरु नानकदेव जी, कबीर, तुलसी आदि का नाम लिया जा सकता है। ऐसे ही एक बहुत पहुँचे गए सूफी फकीर पंजाब के उत्तरी भाग (रावलपिंडी, अब पाकिस्तान) में हुए, जिनका नाम शाहदौला था। स्त्रियाँ उनसे संतान की याचना करती थीं और वह उन्हें आशीर्वाद स्वरूप पुत्र सुख प्रदान करते थे, किंतु यदि इस मन्नत में कोई स्त्री यह कह देती कि शाह जी मैं अपना पहला बच्चा आप को अर्पित करूँगी, तो उसे वह करना ही पड़ता था। समय के साथ शाह जी इस ईह लोक को छोड़कर परलोक सिधार गये, पर उनकी समाधि पर जो स्त्रियाँ यह मन्नत माँगती थीं, उनकी मुराद पूरी होती थी।

एक बार किसी स्त्री ने शाह जी की समाधि पर मन्नत माँगी कि शाह जी मेरी झोली भर दो, पहला बच्चा आपकी नजर करूँगी। समय के साथ वह स्त्री गर्भवती हुई और उसने एक सुन्दर बालक को जन्म दिया। बालक इतना सुन्दर था कि वह स्त्री बच्चे के मोह में पड़ गई। बड़े प्यार से बच्चे का लालन-पालन करने लगी और अपना वचन भूल गई।

एक रात स्वप्न में शाह जी ने उस स्त्री को वचन का याद दिलाया और कहा कि वह बच्चा उनकी दरगाह पर चढ़ा आये किंतु फिर भी उस स्त्री ने इसकी परवाह नहीं की। दूसरी बार फिर शाह जी ने स्वप्न में उससे अपना वादा पूरे करने को कहा, साथ ही उसे चेताया भी कि अब इस के बाद मैं तुम्हें कभी याद नहीं दिलाऊँगा, किंतु अब सजा के लिये मुझे मत दोष देना। फिर भी उस स्त्री ने कोई ध्यान नहीं दिया।

स्त्री दोबारा गर्भवती हुई और फिर उसने एक पुत्र को जन्म दिया किंतु यह क्या? उस बच्चे का शरीर तो मनुष्य का था, किंतु सिर चूहे के आकार का था। बच्चे को देखकर सभी भयभीत हो गये, यह कैसा बच्चा है? कोई डाॅक्टर/सर्जन इसका जवाब नहीं दे सका। एक-एक करके उस स्त्री को कई संतान हुईं, किंतु सभी बच्चे एक जैसे- धड़ मनुष्य का और सिर चूहे का। अब उस स्त्री ने परिवार वालों को शाहदौला जी से किया वादा और अपने स्वप्न की बात परिवार को बताई। अब तो सारा परिवार शाह जी की दरगाह पर पहुँचा और अपनी भूल की क्षमा याचना की। किन्तु अब क्या हो सकता था। उसी रात शाह जी उस स्त्री के स्वप्न में फिर आये और कहा कि पहला बच्चा अपने पास रखकर बाकी बच्चे मेरी दरगाह पर चढ़ा आओ और आज के बाद जो स्त्री मेरी दरगाह से बच्चा माँगकर, पहला बच्चा मेरी दरगाह पर चढ़ाने का वादा करेगी, उसे बच्चा चढ़ाने की ना नहीं करनी पड़ेगी बल्कि वह बच्चा ऐसा होगा कि उसे मेरे पास लाना ही होगा क्योंकि उस बच्चे का शरीर तो मनुष्य का होगा, किंतु सिर चूहे जैसा होगा और लोग उसे ‘शाहदौले का चूहा’ नाम से पुकारेंगे।

आज भी रावलपिंडी में आपको ‘शाहदौला के चूहे’ मिलेंगे। ये वही बालक हैं, जो शाह जी की मन्नत से घरों में पहले जन्मे हैं, बाद की सभी संतानें साधारण मनुष्य जैसी होती हैं। शाहदौला एक चमत्कारी फकीर थे।

आपदा से पहले ही संकेत दे देता है ये कुंड Date :- 04-Sep-2014

छतरपुर, मध्य प्रदेश ... का ये कुंड वैसे तो देखने में एक साधारण कुण्ड लगता है, लेकिन इसकी खासियत है कि जब भी एशियाई महाद्वीप में को प्राकृतिक आपदा घटने वाली होती है तो इस कुण्ड का जलस्तर पहले ही खुद-ब-खुद बढ़ने लगता है। इस कुण्ड का पुराणों में नीलकुण्ड के नाम से जिक्र है, जबकि लोग अब इसे भीमकुण्ड के नाम से जानते हैं।

अब तक मापी नहीं जा सकी है कुंड की गहराई
भीमकुण्ड की गहराई अब तक नहीं मापी जा सकी है। कुण्ड के चमत्कारिक गुणों का पता चलते ही डिस्कवरी चैनल की एक टीम कुण्ड की गहराई मापने के लिए आई थी, लेकिन ये इतना गहरा है कि वे जितना नीचे गए उतना ही अंदर और इसका पानी दिखाई दिया। बाद में टीम वापिस लौट गई।

रोचक है इतिहास ...
कहते हैं अज्ञातवास के दौरान एक बार भीम को प्यास लगी, काफी तलाशने के बाद भी जब पानी नहीं मिला तो भीम ने जमीन में अपनी गदा पूरी शक्ति से मारी, जिससे इस कुण्ड से पानी निकल आया। इसलिए इसे भीमकुण्ड कहा जाता है।

भौगोलिक घटना से पहले देता है संकेत –
जब भी कोई भौगोलिक घटना होने वाली होती है यहां का जलस्तर बढ़ने लगता है, जिससे क्षेत्रीय लोग प्राकृतिक आपदा का पहले ही अनुमान लगा लेते हैं। नोएडा और गुजरात में आए भूकंप के दौरान भी यहां का जलस्तर बढ़ा था। सुनामी के दौरान तो कुण्ड का जल 15 फीट ऊपर तक आ गया था।

पूजन कार्य में धोती क्यों पहनना चाहिए Date :- 05-Jul-2014

किसी भी प्रकार की पूजा-अर्चना के लिए पुरुषों को धोती पहनना चाहिए, यह प्राचीन परंपरा है। आज भी कई स्थानों पर पुरुषों के लिए पूजा के समय धोती पहनना अनिवार्य नियम है। वैसे तो धोती पहनने का चलन बहुत कम हो गया है और पूजन आदि कर्मों में धोती की अनिवार्यता ब्राह्मणों तक ही सीमित रह गई है। प्राचीनकाल में धोती पहने बिना पूजादि कर्मकांड पूर्ण नहीं माने जाते थे। इसी वजह से धोती को पवित्र परिधान माना गया है।

धोती पहनने का वैज्ञानिक महत्व – धोती पहनने की अनिवार्यता के पीछे वैज्ञानिक महत्व भी है। पूजा-अर्चना जैसे कार्यों में काफी देर तक एक विशेष अवस्था में श्रद्धालु को बैठे रहना पड़ता है, उस दशा में धोती से अच्छा कोई और परिधान नहीं हो सकता है। आजकल लोग जींस, पेंट आदि पहनकर ही पूजा कार्य करते हैं, जिससे बैठने-उठने में कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। शरीर के रोमछिद्रों से हमें शुद्ध प्राणवायु मिलती है, तंग कपड़े न सिर्फ इसमें बाधा डालते हैं बल्कि रक्तप्रवाह पर भी बुरा असर डालते हैं। इसलिए स्वास्थ्य की दृष्टि से भी धोती पहनना लाभदायक है। धोती बारिक सूती कपड़े से बनी होती है, जो कि हवादार और सुविधाजनक होती है। इसी वजह से पूजन कर्म के लिए धोती श्रेष्ठ परिधान है।

पीयूष गोयल - पाँच तरीकों से लिखी पाँच पुस्तकें Date :- 29-Jun-2014

1. उल्टे अक्षरों से लिख दी भागवत गीता -
आप इस भाषा को देखेंगे तो एकबारगी भौंचक्का रह जायेंगे। आपको समझ में नहीं
आयेगा कि यह किताब किस भाषा शैली में लिखी हुई है। पर आप जैसे ही दर्पण (शीशे) के सामने पहुँचेंगे तो यह किताब खुद-ब-खुद बोलने लगेगी। सारे अक्षर सीधे नजर आयेंगे। इस मिरर इमेज किताब को दादरी में रहने वाले पीयूष गोयल जी ने लिखा है। मिलनसार पीयूष जी मिरर इमेज की भाषा शैली में कई किताबें लिख चुके हैं।

2. सुई से लिखी मधुशाला -
पीयूष जी ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है कि देखने वालों की आँखें खुली रह जायेंगी और न देखने वालों के लिए एक स्पर्श मात्र ही बहुत है। पीयूष जी से पूछने पर उन्होंने बताया कि उन्हें सुई से पुस्तक लिखने का विचार क्यों आया? तो पीयूष जी ने बताया कि अक्सर मेरे से ये पूछा जाता था कि आपकी पुस्तकों को पढ़ने के लिए शीशे की जरूरत पड़ती है। पढ़ना उसके साथ शीशा, आखिर बहुत सोच-समझने के बाद एक विचार दिमाग में आया कि क्यों न सुई से कुछ लिखा जाये। सो मैंने सुई से स्वर्गीय श्री हरिवंशराय बच्चन जी की विश्वप्रसिद्ध पुस्तक ‘मधुशाला’ को करीब 2 से 2.5 महीने में पूरा किया। यह पुस्तक भी मिरर इमेज में लिखी गई है और इसको पढ़ने के लिए शीशे की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि रिवर्स में पेज पर शब्द इतने प्यारे - जैसे मोतियों से पृष्ठों को गूंथा गया हो - उभरे हुए हैं, जिसको पढ़ने में आसानी रहती है और यह सुई से लिखी ‘मधुशाला’ दुनिया की अब तक की पहली ऐसी पुस्तक है जो मिरर इमेज व सुई से लिखी गई है।

3. मेहंदी से लिखी गीतांजलि -
पीयूष जी ने एक और नया कारनामा कर दिखाया। उन्होंने 1913 के साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता ‘रविन्द्रनाथ टैगोर’ की विश्व प्रसिद्ध कृति ‘गीतांजलि’ को ‘मेहंदी कोन’ से लिखा है। उन्होंने 8 जुलाई 2012 को मेहंदी से गीतांजलि लिखनी शुरू की और सभी 103 अध्याय 5 अगस्त 2012 को पूरे कर दिए। इसको लिखने में 17 कोन व दो नोट बुक प्रयोग में आईं। पीयूष जी श्री दुर्गा सप्तशती, अवधी में सुन्दरकांड, आरती संग्रह, हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं में श्री साईं सत्चरित्र भी लिख चुके हैं और ‘रामचरितमानस’ (दोहे, सोरता और चैपाई) को भी लिख चुके हैं।

4. कील से लिखी ‘पीयूष वाणी’ -
अब पीयूष जी ने अपनी ही लिखी पुस्तक ‘पीयूष वाणी’ को कील से ए-4 साईज की एल्युमिनियम शीट पर लिखा है। पीयूष जी से पूछा गया कि आपने कील से क्यों लिखा है, तो उन्होंने बताया कि वे इससे पहले सुई से स्व. हरिवंशराय बच्चन की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘मधुशाला’ को लिख चुके हैं, जो इस तरह से लिखी गई विश्व की पहली पुस्तक है। तो मुझे विचार आया कि क्यों न कील से भी प्रयास किया जाये, सो इन्होंने पीयूषवाणी को कील से लिख डाला।

5. कार्बन पेपर की मदद से लिखी ‘पंचतंत्र’ -
गहन अध्ययन के बाद पीयूष जी ने कार्बन पेपर की सहायता से आचार्य विष्णु शर्मा द्वारा लिखी ‘पंचतंत्र’ के सभी (पाँच तंत्र, 41 कथा) को लिखा है। पीयूष जी ने कार्बन पेपर को (जिस पर लिखना है) के नीचे उल्टा करके लिखा, जिससे पेपर के दूसरी ओर शब्द सीधे दिखाई देंगे यानि पेज के एक तरफ शब्द मिरर इमेज में और दूसरी तरफ सीधे।

श्री बाँकेबिहारी जी का प्राकट्य Date :- 03-Jun-2014

वृंदावन में बाँकेबिहारी जी का एक भव्य मंदिर है। इस मंदिर में बिहारी जी की काले रंग की एक प्रतिमा है। इस प्रतिमा के विषय में मान्यता है कि इस प्रतिमा में साक्षात् श्रीकृष्ण और राधाजी समाए हुए हैं। इसलिए इनके दर्शन मात्र से राधा-कृष्ण के दर्शन का फल मिल जाता है। इस प्रतिमा के प्रकट होने की कथा और लीला बड़ी ही रोचक और अद्भुत है इसलिए हर वर्ष मार्गशीर्ष मास की पंचमी तिथि को बाँकेबिहारी मंदिर में बाँकेबिहारी प्रकटोत्सव मनाया जाता है।

बाँकेबिहारी जी के प्रकट होने की कथा-

संगीत सम्राट तानसेन के गुरु स्वामी हरिदास जी भगवान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। इन्होंने अपने संगीत को भगवान को समर्पित कर दिया था। वृंदावन में स्थित श्रीकृष्ण की रास-स्थली निधिवन में बैठकर भगवान को अपने संगीत से रिझाया करते थे। भगवान की भक्ति में डूबकर हरिदास जी जब भी गाने बैठते तो प्रभु में ही लीन हो जाते। इनकी भक्ति और गायन से रीझकर भगवान श्रीकृष्ण इनके सामने आ गये। हरिदास जी मंत्रमुग्ध होकर श्रीकृष्ण को दुलार करने लगे। एक दिन इनके एक शिष्य ने कहा कि आप अकेले ही श्रीकृष्ण का दर्शन लाभ पाते हैं, हमें भी साँवरे सलोने का दर्शन करवाइये। इसके बाद हरिदास जी श्रीकृष्ण की भक्ति में डूबकर भजन गाने लगे। राधा-कृष्ण की युगल जोड़ी प्रकट हुई और अचानक हरिदास के स्वर में बदलाव आ गया और गाने लगे-

भाई री सहज जोरी प्रकट भई,
जुरंग की गौर स्याम घन दामिनी जैसे।
प्रथम है हुती अब हूँ आगे हूँ रहि है न टरि है तैसे।
अंग-अंग की उजकाई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे।
श्री हरिदास के स्वामी श्यामा पुंज बिहारी सम वैसे वैसे।

श्रीकृष्ण और राधाजी ने हरिदास के पास रहने की इच्छा प्रकट की। हरिदास जी ने कृष्णजी से कहा कि प्रभु मैं तो संत हूँ। आपको लंगोट पहना दूँगा लेकिन माता को नित्य आभूषण कहाँ से लाकर दूँगा। भक्त की बात सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कराए और राधा-कृष्ण की युगल जोड़ी एकाकार होकर एक विग्रह के रूप में प्रकट हुई। हरिदास जी ने इस विग्रह को ‘बाँकेबिहारी’ नाम दिया। बाँके बिहारी मंदिर में इसी विग्रह के दर्शन होते हैं। बाँके बिहारी के विग्रह में राधा-कृष्ण दोनों ही समाए हुए हैं, जो भी श्रीकृष्ण के इस विग्रह का दर्शन करता है, उसकी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्त के कष्टों को दूर कर देते हैं।

मातेश्वरी तनोट राय मन्दिर Date :- 02-Jun-2014

यह चमत्कारिक घटना उस समय की है, जब सन् 1965 में भारत-पाकिस्तान का युद्ध हुआ था। राजस्थान के पाक सीमावर्ती जिले जैसलमेर से 120 किमी. की दूरी पर एक प्राचीन तनोट मातेश्वरी मन्दिर दोनों देशों (भारत-पाक) की सीमा के बहुत ही निकट स्थित है। यहाँ पर ‘भारतीय सीमा सुरक्षा बल’ की चैकी भी है।

यद्ध में पाकिस्तानी सेना द्वारा इस क्षेत्र में अनेक गोले दागे गए, परन्तु मन्दिर परिसर में गिरने वाले शत्रुओं के गोले कभी फटते ही नहीं थे, जिससे मन्दिर और आसपास के क्षेत्र को कोई भी नुकसान नहीं होता था। यह देवी माता की शक्ति का प्रमाण था। अतः यह क्षेत्र भारतीय जवानों के लिये एक सुरक्षित स्थान बन गया था। पाकिस्तान के ब्रिगेडियर शाह नवाज खान को जब इस बात का पता चला तो उसने मन्दिर को विशेष लक्ष्य बनाकर आसपास के क्षेत्र में लगभग 3000 गोले बरसाये, जिनमें से लगभग 450 गोले मन्दिर परिसर में गिरे परन्तु परिणाम वही हुआ, उनमें से एक भी गोला नहीं फटा। अंततः ब्रिगेडियर शाह नवाज ने मंदिर के पुजारी से माता के दर्शन करने की आज्ञा माँगी और हिन्दू परम्परानुसार चाँदी का एक छत्र भी भेंट चढ़ाया।

सन् 1971 में हुए भारत-पाक के युद्ध में भी पाकिस्तानी सेना ने बड़ी सैन्य शक्ति के साथ इस क्षेत्र पर आक्रमण किया परन्तु भारतीय सेना ने शत्रुसेना को जान बचाकर भागने के लिए विवश कर दिया। भारतीय सेना ने इस विजय को माता का आशीर्वाद माना और मंदिर के द्वार पर ‘विजय स्तम्भ’ का निर्माण कराया।

सन् 1965 में पाकिस्तानी सेना द्वारा युद्ध में दागे गए और माता की कृपा से बेअसर हुए सैकड़ों गोलों में से कुछ गोले आज भी मन्दिर परिसर में रखे हुए हैं जिनकी ओर देखने मात्र से ही उस महान आश्चर्य व सनातन सत्य की याद आ जाती है, जिसका ज्ञान हमारी धार्मिक संस्कृति कराती है। ऐसी संस्कृति और ऐसे सत्य की ओर श्रद्धा से मस्तक झुक जाता है।

कौड़ी का महत्व Date :- 02-Jun-2014

भारत में प्राचीन काल से ही कौड़ी का अपना एक विशेष स्थान रहा है। इसे लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। समुद्र से उत्पन्न जितनी भी वस्तुएँ होती हैं, वे सभी किसी-न-किसी रूप में लक्ष्मी पूजा में अथवा लक्ष्मी के प्रतीक के रूप में उपयोग होती हैं। शंख समुद्र से उत्पन्न है, अतः लक्ष्मी का भाई माना जाता है। शंख की पूजा का विशेष विधान है, वहीं देवताओं के हाथों में शंख सुशोभित होता है। कौड़ी भी समुद्र से उत्पन्न है, अतः इसे लक्ष्मीकारक माना गया है।

मुद्रा के रूप में सिक्कों के स्थान पर एक समय समाज में कौड़ी का ही प्रयोग होता था। जिसके पास कौड़ी नहीं होती थी, वह निर्धन व दरिद्र समझा जाता था। हालांकि आज कौड़ी का मुद्रा के रूप में प्रयोग नहीं होता परन्तु हमारी भाषा में मुहावरों व लोकोक्तियों में इसका बहुत प्रयोग होता है। आज भी किसी को धिक्कारते हुए कहा जाता है कि यह तो ‘दो कौड़ी का भी’ आदमी नहीं है।

कौड़ी हमारे धार्मिक, सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन से जुड़ी हुई है। यह उपासना की वस्तु है तो शृंगार सामग्री भी, सजावट की वस्तु है तो मनोरंजन का साधन भी। जादू-टोना व तांत्रिक कार्यों में कौड़ी का खूब उपयोग होता है। भगवान शिव की बंधी जटाओं की शक्ल कौड़ी से बहुत मिलती-जुलती है, इसी कारण शिव को कपर्दिन कहा गया होगा। शिव के वाहन नन्दी को आज भी कौडि़यों से खूब सजाया जाता है।

शादी से पूर्व वर-वधू को बुरी नजर से बचाने के लिये हाथ में जो कंगन बांधा जाता है, उसमें कौड़ी भी होती है। आन्ध्र प्रदेश एवं उड़ीसा में विवाह के पश्चात् कौडि़याँ देने का रिवाज आज भी प्रचलित है। असम की जनजातियों में दूल्हा अपनी दुल्हन को एक कौड़ी भेंट करता है, दुल्हन उसमें सिंदूर रखती है। कौड़ी बुरी नजर व खतरों से बचाती है और इसी मानसिकता के कारण आज भी बच्चों के गले में कौड़ी में छेद कर पहनाया जाता है।

नए मकानों की चैखट पर काले धागे में बांधकर कौडि़यों को बांधा जाता है। नए खरीदे हुए वाहन पर काले धागे में कौड़ी बांधी जाती है, जिससे उस वाहन पर नजर नहीं लगती एवं दुर्घटनाओं से भी बचाव होता है। कई पुरानी हवेलियों, राजसी ठाठ वाले मकानों के पुनः निर्माण के दौरान उनकी नींव में भी कौडि़याँ निकलीं।

कौडि़यों को केसर या हल्दी से रंगकर पीले कपड़े में बाँधकर रखने से लक्ष्मी आकर्षित होती है। चाँदी के सिक्के व रूपयों के साथ भी कौडि़याँ रखी जाती हैं। दीपावली पूजा के समय कौडि़यों को दूध आदि से स्नान कराकर पूजा की जाती है। गल्ले में व तिजोरी आदि में भी बहुमूल्य सामान के साथ कौड़ी रखने की प्रथा रही है।

कौड़ी भारत के अलावा अन्य देशों में भी धर्म से जुड़ी हुई है। उसे देवी माँ के रूप में देखा गया है। आज विश्व में 160 प्रकार की कौडि़याँ मौजूद हैं। यूनान की प्रसिद्ध देवी वीनस को प्रसन्न रखने के लिए साईप्रस में लोग उस पर कौड़ी भेंट चढ़ाते हैं। सूडान की स्त्रियाँ कौड़ी की करधनी संतान पाने की इच्छा से कमर में पहनती हैं।

अपने को हिन्दू बताते हुए मुझे गर्व का अनुभव होता है - स्वामी विवेकानन्द जी Date :- 19-May-2014

शेर की खाल ओढ़कर गधा कभी शेर नहीं बन सकता। अनुकरण करना, हीन और डरपोक की तरह अनुसरण करना, कभी उन्नति के पथ पर आगे नहीं बढ़ सकता। वह तो मनुष्य के अधःपतन का लक्षण है। जब मनुष्य अपने आप पर घृणा करने लग जाता है, तब समझना चाहिए कि उस पर अंतिम चोट बैठ चुकी है। जब वह अपने पूर्वजों को मानने में लज्जित होता है, तो समझ लो उसका विनाश निकट है। यद्यपि मैं हिन्दू जाति में एक नगण्य व्यक्ति हूँ तथापि अपनी जाति और अपने पूर्वजों के गौरव से मैं अपना गौरव मानता हूँ।

अपने को हिन्दू बताते हुए, हिन्दू कहकर अपना परिचय देते हुए मुझे एक प्रकार का गर्व-सा अनुभव होता है। ... अतएव भाइयों, आत्मविश्वासी बनो। पूर्वजों के नाम से अपने को लज्जित नहीं, गौरवान्वित समझों। याद रहे, किसी का अनुकरण कदापि न करो।

स्वामी विवेकानंद जी के महिलाओं के प्रति विचार Date :- 30-Apr-2014

स्वामी विवेकानंद के शब्दों में- इस देश में महिला व पुरुष के बीच इतना अंतर क्यों है, यह समझना बहुत मुश्किल है। वेदों का स्पष्ट आदेश है कि सभी में एक ही और एक जैसी ही चेतना विद्यमान है। पुरुष हमेशा महिलाओं की आलोचना करते हैं, पर उन्होंने महिलाओं के उत्थान के लिए क्या किया है, सिवाय उन्हें कड़े नियमों में बाँधने के? पुरुषों ने औरतों को बस बच्चा पैदा करने की मशीन में बदल दिया है।

भारत में महिलाओं को शिक्षा का अधिकार दिलाने में स्वामी जी का बहुत बड़ा योगदान है। उन्होंने इस विषय पर कहा था- कौन-से शास्त्र हैं, जिनमें आपको लिखा मिलेगा कि नारी ज्ञान और भक्ति के लायक नहीं है? पतन के दौर में जब धर्माचार्यों ने दूसरी जातियों को वेद पढ़ने से अक्षम घोषित किया, तभी उन्होंने महिलाओं को भी उनके अधिकारों से वंचित कर दिया। नहीं तो आप पाएंगे कि वैदिक काल और उपनिषद काल में मैत्रेयी एवं गार्गी जैसी स्त्रियों ने ऋषि-मुनियों के बराबर स्थान प्राप्त किया था। हजारों ब्राह्मणों के समूह में, गार्गी ने बड़े साहस से याज्ञवल्क्य जी को ब्रह्मज्ञान के उपर शास्त्रार्थ की चुनौती दी थी। स्त्रियाँ यदि उस समय ज्ञान की अधिकारी थीं तो आज के समय में यह अधिकार उन्हें क्यों न मिले?

दुनिया में सबसे पहले तारो , ग्रहों , नक्षत्रो... Date :- 24-Feb-2014

दुनिया में सबसे पहले तारो , ग्रहों , नक्षत्रो आदि को समझने का सफल प्रयास भारत में ही हुआ था , तारो , ग्रहों , नक्षत्रो , चाँद , सूरज,...... आदि की गति को समझने के बाद भारत के महान खगोल शास्त्रीयो ने भारतीय कलेंडर ( विक्रम संवत ) तैयार किया, इसके महत्त्व को उस समय सारी दुनिया ने समझा .

लेकिन यह इतना अधिक व्यापक था कि आम आदमी इसे आसानी से नहीं समझ पाता था , खासकर पश्चिम जगत के अल्पज्ञानी तो बिल्कुल भी नहीं. किसी भी बिशेष दिन, त्यौहार आदि के बारे में जानकारी लेने के लिए विद्वान् ( पंडित ) के पास जाना पड़ता था. अलग अलग देशों के सम्राट और खगोल शास्त्री भी अपने अपने हिसाब से कैलेण्डर बनाने का प्रयास करते रहे .

इसके प्रचलन में आने के 57 बर्ष के बाद सम्राट आगस्तीन के समय में पश्चिमी कैलेण्डर (ईस्वी सन) विकसित हुआ. लेकिन उस में कुछ भी नया खोजने के बजाये, भारतीय कैलेंडर को लेकर सीधा और आसान बनाने का प्रयास किया था. प्रथ्वी द्वरा 365 / 366 में होने बाली सूर्य की परिक्रमा को बर्ष और इस अबधि में चंद्रमा द्वारा प्रथ्वी के लगभग 12 चक्कर को आधार मान कर कैलेण्डर तैयार किया और क्रम संख्या के आधार पर उनके नाम रख दिए गए .

1. - एकाम्बर ( 31 ) , 2. - दुयीआम्बर (30) , 3. - तिरियाम्बर (31) , 4. - चौथाम्बर (30) , 5.- पंचाम्बर (31) , 6.- षष्ठम्बर (30) , 7. - सेप्तम्बर (31) , 8.- ओक्टाम्बर (30) , 9.- नबम्बर (31) , 10.- दिसंबर ( 30 ) , 11.- ग्याराम्बर (31) , 12.- बारम्बर (30 / 29 ), निर्धारित किया गया . (सेप्तम्बर में सप्त अर्थात सात , अक्तूबर में ओक्ट अर्थात आठ , नबम्बर में नव अर्थात नौ , दिसंबर में दस का उच्चारण महज इत्तेफाक नहीं है )

लेकिन फिर सम्राट आगस्तीन ने अपने जन्म माह का नाम अपने नाम पर आगस्त ( षष्ठम्बर को बदलकर) और भूतपूर्व महान सम्राट जुलियस के नाम पर जुलाई (पंचाम्बर) रख दिया. इसी तरह कुछ अन्य महीनों के नाम भी बदल दिए गए. फिर बर्ष की शरुआत ईसा मसीह के जन्म के 6 दिन बाद (जन्म छठी) से प्रारम्भ माना गया. नाम भी बदल इस प्रकार कर दिए गए थे. जनवरी (31) , फरबरी (30 / 29 ), मार्च ( 31 ) , अप्रैल (30) , मई (31) , जून (30) , जुलाई (31) , अगस्त (30) , सेप्तम्बर (31) , अक्तूबर (30) , नबम्बर (31) , दिसंबर ( 30) .

फिर अचानक सम्राट आगस्तीन को ये लगा कि उसके नाम बाला महीना आगस्त छोटा ( 30 दिन ) का हो गया है तो उसने जिद पकड़ ली कि उसके नाम बाला महीना 31 दिन का होना चाहिए. राजहठ को देखते हुए खगोल शास्त्रीयों ने जुलाई के बाद अगस्त को भी 31 दिन का कर दिया और उसके बाद वाले सेप्तम्बर (30) , अक्तूबर (31) , नबम्बर (30) , दिसंबर ( 31) का कर दिया.

एक दिन को एडजस्ट करने के लिए पहले से ही छोटे महीने फरवरी को और छोटा करके ( 28 / 29 ) कर दिया .

शिवपुराण के अनुसार बिल्वपत्र Date :- 23-Feb-2014

शिव पुराण के अनुसार शिवलिंग पर कई प्रकार की सामग्री फूल-पत्तियां चढ़ाई जाती हैं। इन्हीं में से सबसे महत्वपूर्ण है बिल्वपत्र। बिल्वपत्र से जुड़ी खास बातें जानने के बाद आप भी मानेंगे कि बिल्व का पेड बहुत चमत्कारी है-

पुराणों के अनुसार रविवार के दिन और द्वादशी तिथि पर बिल्ववृक्ष का विशेष पूजन करना चाहिए। इस पूजन से व्यक्ति से ब्रह्महत्या जैसे महापाप से भी मुक्त हो जाता है।

क्या आप जानते हैं कि बिल्वपत्र छ: मास तक बासी नहीं माना जाता। इसका मतलब यह है कि लंबे समय शिवलिंग पर एक बिल्वपत्र धोकर पुन: चढ़ाया जा सकता है।

आयुर्वेद के अनुसार बिल्ववृक्ष के सात पत्ते प्रतिदिन खाकर थोड़ा पानी पीने से स्वप्न दोष की बीमारी से छुटकारा मिलता है। इसी प्रकार यह एक औषधि के रूप में काम आता है।

शिवलिंग पर प्रतिदिन बिल्वपत्र चढ़ाने से सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। भक्त को जीवन में कभी भी पैसों की कोई समस्या नहीं रहती है।

शास्त्रों में बताया गया है जिन स्थानों पर बिल्ववृक्ष हैं वह स्थान काशी तीर्थ के समान पूजनीय और पवित्र है। ऐसी जगह जाने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

बिल्वपत्र उत्तम वायुनाशक, कफ-निस्सारक व जठराग्निवर्धक है। ये कृमि व दुर्गन्ध का नाश करते हैं। इनमें निहित उड़नशील तैल व इगेलिन, इगेलेनिन नामक क्षार-तत्त्व आदि औषधीय गुणों से भरपूर हैं। चतुर्मास में उत्पन्न होने वाले रोगों का प्रतिकार करने की क्षमता बिल्वपत्र में है।

ध्यान रखें इन कुछ तिथियों पर बिल्वपत्र नहीं तोडऩा चाहिए। ये तिथियां हैं चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, द्वादशी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा, संक्रान्ति और सोमवार तथा प्रतिदिन दोपहर के बाद बिल्वपत्र नहीं तोडऩा चाहिए। ऐसा करने पर पत्तियां तोडऩे वाला व्यक्ति पाप का भागी बनता है।

शास्त्रों के अनुसार बिल्व का वृक्ष उत्तर-पश्चिम में हो तो यश बढ़ता है, उत्तर-दक्षिण में हो तो सुख शांति बढ़ती है और बीच में हो तो मधुर जीवन बनता है।

घर में बिल्ववृक्ष लगाने से परिवार के सभी सदस्य कई प्रकार के पापों के प्रभाव से मुक्त हो जाते हैं। इस वृक्ष के प्रभाव से सभी सदस्य यशस्वी होते हैं, समाज में मान-सम्मान मिलता है। ऐसा शास्त्रों में वर्णित है।

- बिल्ववृक्ष के नीचे शिवलिंग पूजा से सभी मनोकामना पूरी होती है।

- बिल्व की जड़ का जल अपने सिर पर लगाने से उसे सभी तीर्थों की यात्रा का पुण्य पा जाता है।

- गंध, फूल, धतूरे से जो बिल्ववृक्ष की जड़ की पूजा करता है, उसे संतान और सभी सुख मिल जाते हैं।

- बिल्ववृक्ष के बिल्वपत्रों से पूजा करने पर सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं।

- बिल्व की जड़ के पास किसी शिव भक्त को घी सहित अन्न या खीर दान देता है, वह कभी भी धनहीन या दरिद्र नहीं होता। क्योंकि यह श्रीवृक्ष भी पुकारा जाता है। यानी इसमें देवी लक्ष्मी का भी वास होता है।

आखिर क्यों हम अंग्रेजी के इतना पीछे पड़े हुए हैं? Date :- 21-Feb-2014

अँग्रेजी भाषा के बारे में भ्रम – गुलामी या आवश्यकता

1. अंग्रेजी अंतर्राष्ट्रीय भाषा है?

विश्व में इस समय 10 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थायें (Top 10 Economies) अमेरिका, चीन, जापान, भारत, जर्मनी, रशिया, ब्राजील, ब्रिटेन, फ्रांस एवं इटली है| जिसमे मात्र 2 देश ही अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करते हैं अमेरिका और ब्रिटेन वोह भी एक सी नहीं, दोनों कि अंग्रेजी में भी अंतर है | अब आप ही बताएं कि किस आधार पर अंग्रेजी को वैश्विक भाषा (Global Language) माना जाए| दुनिया में इस समय 204 देश हैं और मात्र 12 देशों में अँग्रेजी बोली, पढ़ी और समझी जाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ जो अमेरिका में है वहां की भाषा अंग्रेजी नहीं है, वहां का सारा काम फ्रेंच में होता है। इन अंग्रेजों की जो बाइबिल है वो भी अंग्रेजी में नहीं थी और ईशा मसीह अंग्रेजी नहीं बोलते थे। ईशा मसीह की भाषा और बाइबिल की भाषा अरमेक थी। अरमेक भाषा की लिपि जो थी वो हमारे बंगला भाषा से मिलती जुलती थी, समय के कालचक्र में वो भाषा विलुप्त हो गयी। पूरी दुनिया में जनसंख्या के हिसाब से सिर्फ 3% लोग अँग्रेजी बोलते हैं जिसमे भारत दूसरे नंबर पर है| इस हिसाब से तो अंतर्राष्ट्रीय भाषा चाइनीज हो सकती है क्यूंकि ये दुनिया में सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली जाती है और दूसरे नंबर पर हिन्दी हो सकती है।

2. अँग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है?

किसी भी भाषा की समृद्धि इस बात से तय होती है की उसमें कितने शब्द हैं और अँग्रेजी में सिर्फ 12,000 मूल शब्द हैं बाकी अँग्रेजी के सारे शब्द चोरी के हैं या तो लैटिन के, या तो  फ्रेंच के, या तो ग्रीक के, या तो दक्षिण पूर्व एशिया के कुछ देशों की भाषाओं के हैं। उदाहरण: अँग्रेजी में चाचा, मामा, फूफा, ताऊ सब UNCLE चाची, ताई, मामी, बुआ सब AUNTY की अँग्रेजी भाषा में शब्द ही नहीं है। जबकि गुजराती में अकेले 40,000 मूल शब्द हैं। मराठी में 48000+ मूल शब्द हैं जबकि हिन्दी में 70000+ मूल शब्द हैं। कैसे माना जाए अँग्रेजी बहुत समृद्ध भाषा है? अँग्रेजी सबसे लाचार, पंगु, रद्दी भाषा है क्योंकि इस भाषा के नियम कभी एक से नहीं होते। दुनिया में सबसे अच्छी भाषा वो मानी जाती है जिसके नियम हमेशा एक जैसे हों, जैसे: संस्कृत। अँग्रेजी में आज से 200 साल पहले This की स्पेलिंग Tis होती थी। अँग्रेजी में 250 साल पहले Nice मतलब बेवकूफ होता था और आज Nice मतलब अच्छा होता है। अँग्रेजी भाषा में Pronunciation कभी एक सा नहीं होता। Today को ऑस्ट्रेलिया में Todie बोला जाता है जबकि ब्रिटेन में Today. अमेरिका और ब्रिटेन में इसी बात का झगड़ा है क्योंकि अमेरीकन अँग्रेजी में Z का ज्यादा प्रयोग करते हैं और ब्रिटिश अँग्रेजी में S का, क्यूंकी कोई नियम ही नहीं है और इसीलिए दोनों ने अपनी अपनी अलग अलग अँग्रेजी मान ली।

3. अँग्रेजी नहीं होगी तो विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई नहीं हो सकती?

दुनिया में 2 देश इसका उदाहरण हैं की बिना अँग्रेजी के भी विज्ञान और तकनीक की पढ़ाई होटी है- जापान और फ़्रांस । पूरे जापान में इंजीन्यरिंग, मेडिकल के जीतने भी कॉलेज और विश्वविद्यालय हैं सबमें पढ़ाई "JAPANESE" में होती है, इसी तरह फ़्रांस में बचपन से लेकर उच्चशिक्षा तक सब फ्रेंच में पढ़ाया जाता है। हमसे छोटे छोटे, हमारे शहरों जितने देशों में हर साल नोबल विजेता पैदा होते हैं लेकिन इतने बड़े भारत में नहीं क्यूंकी हम विदेशी भाषा में काम करते हैं और विदेशी भाषा में कोई भी मौलिक काम नहीं किया जा सकता सिर्फ रटा जा सकता है। ये अँग्रेजी का ही परिणाम है की हमारे देश में नोबल पुरस्कार विजेता पैदा नहीं होते हैं क्यूंकी नोबल पुरस्कार के लिए मौलिक काम करना पड़ता है और कोई भी मौलिक काम कभी भी विदेशी भाषा में नहीं किया जा सकता है। नोबल पुरस्कार के लिए P.hd, B.Tech, M.Tech की जरूरत नहीं होती है। उदाहरण: न्यूटन कक्षा 9 में फ़ेल हो गया था, आइंस्टीन कक्षा 10 के आगे पढे ही नही और E=hv बताने वाला मैक्स प्लांक कभी स्कूल गया ही नहीं। ऐसी ही शेक्सपियर, तुलसीदास, महर्षि वेदव्यास आदि के पास कोई डिग्री नहीं थी, इनहोने सिर्फ अपनी मात्रभाषा में काम किया। जब हम हमारे बच्चों को अँग्रेजी माध्यम से हटकर अपनी मात्रभाषा में पढ़ाना शुरू करेंगे तो इस अंग्रेज़ियत से हमारा रिश्ता टूटेगा। अंग्रेजी पढ़ायें इसमें कोई बुरे नहीं लेकिन हिंदी या मात्रभाषा की कीमत पर नहीं| किसी भी संस्कृति का पुट उसके साहित्य में होता है और साहित्य बिना भाषा के नहीं पढ़ा जा सकता|

सोचिये यदि आज के बालकों को हिंदी का ज्ञान ही नहीं होगा तो वे कैसे रामायण, महाभारत और गीता पढ़ सकेंगे जिसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए हजारों अंग्रेज ऋषिकेश, वाराणसी, वृन्दावन में पड़े रहते हैं और बड़ी लगन से हिंदी एवं संस्कृत का ज्ञान प्राप्त करतें हैं|

क्या आप जानते हैं जापान ने इतनी जल्दी इतनी तरक्की कैसे कर ली? क्यूंकी जापान के लोगों में अपनी मातृभाषा से जितना प्यार है उतना ही अपने देश से प्यार है। जापान के बच्चों में बचपन से कूट-कूट कर राष्ट्रीयता की भावना भरी जाती है। जो लोग अपनी मातृभाषा से प्यार नहीं करते वो अपने देश से प्यार नहीं करते सिर्फ झूठा दिखावा करते हैं।

दुनिया भर के वैज्ञानिकों का मानना है की दुनिया में कम्प्युटर के लिए सबसे अच्छी भाषा 'संस्कृत' है। सबसे ज्यादा संस्कृत पर शोध इस समय जर्मनी और अमेरिका चल रही है। नासा ने 'मिशन संस्कृत' शुरू किया है और अमेरिका में बच्चों के पाठ्यक्रम में संस्कृत को शामिल किया गया है। सोचिए अगर अँग्रेजी अच्छी भाषा होती तो ये अँग्रेजी को क्यूँ छोड़ते और हम अंग्रेज़ियत की गुलामी में घुसे हुए है।

कोई भी बड़े से बड़ा तीस मार खाँ अँग्रेजी बोलते समय सबसे पहले उसको अपनी मातृभाषा में सोचता है और फिर उसको दिमाग में Translate करता है फिर दोगुनी मेहनत करके अँग्रेजी बोलता है। हर व्यक्ति अपने जीवन के अत्यंत निजी क्षणों में मातृभाषा ही बोलता है। जैसे: जब कोई बहुत गुस्सा होता है तो गाली हमेशा मातृभाषा में ही देता हैं। किसी भी व्यक्ति कि अपनी पहचान ३ बातो से होती है, उसकी भाषा, उसका भोजन और उसका भेष (पहनावा). अगर ये तीन बात नहीं हों अपनी संस्कृति की, तो सोचिये अपना परिचय भी कैसे देंगे किसी को? मातृभाषा पर गर्व करो.....अँग्रेजी की गुलामी छोड़ो ॥

जय माँ भारती
जय मातृभाषा हिंदी
 

संस्कृत के बारे में आश्चर्यजनक तथ्य Date :- 16-Feb-2014

1. कंप्यूटर में इस्तेमाल के लिए सबसे अच्छी भाषा। - संदर्भ: फोर्ब्स पत्रिका 1987

2. सबसे अच्छे प्रकार का कैलेंडर जो इस्तेमाल किया जा रहा है, हिंदू कैलेंडर है (जिसमें नया साल सौर प्रणाली के भूवैज्ञानिक परिवर्तन के साथ शुरू होता है) - संदर्भ: जर्मन स्टेट यूनिवर्सिटी.

3. दवा के लिए सबसे उपयोगी भाषा अर्थात संस्कृत में बात करने से व्यक्ति... स्वस्थ और बीपी, मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल आदि जैसे रोग से मुक्त हो जाएगा। संस्कृत में बात करने से मानव शरीर का तंत्रिका तंत्र सक्रिय रहता है जिससे कि व्यक्ति का शरीर सकारात्मक आवेश(Positive Charges) के साथ सक्रिय हो जाता है। - संदर्भ: अमेरीकन हिन्दू यूनिवर्सिटी (शोध के बाद)

4. संस्कृत वह भाषा है जो अपनी पुस्तकों वेद, उपनिषदों, श्रुति, स्मृति, पुराणों, महाभारत, रामायण आदि में सबसे उन्नत प्रौद्योगिकी (Technology) रखती है। - संदर्भ: रशियन स्टेट यूनिवर्सिटी

5. नासा के पास 60,000 ताड़ के पत्ते की पांडुलिपियों है जो वे अध्ययन का उपयोग कर रहे हैं. असत्यापित रिपोर्ट का कहना है कि रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी पवित्र पुस्तकों से नई चीजों पर शोध कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के सामने अपने नाम से रख रहे हैं.

6. दुनिया के 17 देशों में एक या अधिक संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी प्राप्त करने के लिए है, लेकिन संस्कृत को समर्पित उसके वास्तविक अध्ययन के लिए एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय इंडिया (भारत) में नहीं है।

7. दुनिया की सभी भाषाओं की माँ संस्कृत है। सभी भाषाएँ (97%) प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस भाषा से प्रभावित है। - संदर्भ: यूएनओ

8. नासा वैज्ञानिक द्वारा एक रिपोर्ट है कि अमेरिका 6 और 7 वीं पीढ़ी के सुपर कंप्यूटर संस्कृत भाषा पर आधारित बना रहा है जिससे सुपर कंप्यूटर अपनी अधिकतम सीमा तक उपयोग किया जा सके। परियोजना की समय सीमा 2025 (6 पीढ़ी के लिए) और 2034 (7 वीं पीढ़ी के लिए) है, इसके बाद दुनिया भर में संस्कृत सीखने के लिए एक भाषा क्रांति होगी।

9. दुनिया में अनुवाद के उद्देश्य के लिए उपलब्ध सबसे अच्छी भाषा संस्कृत है। - संदर्भ: फोर्ब्स पत्रिका 1985

10. संस्कृत भाषा वर्तमान में "उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी" तकनीक में इस्तेमाल की जा रही है। (वर्तमान में, उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी तकनीक सिर्फ रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका में ही मौजूद हैं। भारत के पास आज "सरल किर्लियन फोटोग्राफी" भी नहीं है )

11. अमेरिका, रूस, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रिया वर्तमान में भरत नाट्यम और नटराज के महत्व के बारे में शोध कर रहे हैं। (नटराज शिव जी का कॉस्मिक नृत्य है। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के सामने शिव या नटराज की एक मूर्ति है )

ॐ - एक अद्भुत एवं चमत्कारिक शक्ति का स्रोत Date :- 16-Feb-2014

जाने ॐ की शक्ति

* मृत कोशिकाएँ जीवित हो जाती है |
* नकारात्मक भाव बदलकर सकारात्मक हो जाते है |
* स्टिरोइड का स्तर कम हो जाता है |
* तनाव से मुक्ति मिलती है |
* चेहरे के भावों (फेसीयल एक्स्प्रेसन) को भी बदल डालता है |
* हमारे आस पासके वातावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है |
* मस्तिष्क में परिवर्तन होता है और स्वस्थ हो जाता है।
* पेट की तकलीफ दूर हो जाती है |
* मस्तिष्क व हृदय की कमजोरी यह सब दूर होता है।

तो मित्रों, समग्रता से ओ3म् का उच्चारण करते जाये और आदि-अनंत रहस्य खोलते जाये |
भारत की दुनिया को देन Date :- 15-Feb-2014

1. अलबर्ट आइन्स्टीन- हम भारत के बहुत ऋणी हैं, जिसने हमें गिनती सिखाई, जिसके बिना कोई भी सार्थक वैज्ञानिक खोज संभव नहीं हो पाती।

2. रोमां रोलां (फ्रांस)- मानव ने आदिकाल से जो सपने देखने शुरू किये, उनके साकार होने का इस धरती पर कोई स्थान है, तो वो है भारत।

3. हू शिह (अमेरिका में चीन राजदूत)- सीमा पर एक भी सैनिक न भेजते हुए भारत ने बीस सदियों तक सांस्कृतिक धरातल पर चीन को जीता और उसे प्रभावित भी किया

4. मैक्स मुलर- यदि मुझसे कोई पूछे की किस आकाश के तले मानव मन अपने अनमोल उपहारों समेत पूर्णतया विकसित हुआ है, जहां जीवन की जटिल समस्याओं का गहन विश्लेषण हुआ और समाधान भी प्रस्तुत किया गया, जो उसके भी प्रसंशा का पात्र हुआ जिन्होंने प्लेटो और कांट का अध्ययन किया, तो मैं भारत का नाम लूँगा।

5. मार्क ट्वेन- मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान और सृजनशील सामग्री है, उसका भंडार अकेले भारत में है।

6. आर्थर शोपेन्हावर- विश्व भर में ऐसा कोई अध्ययन नहीं है जो उपनिषदों जितना उपकारी और उद्दत हो। यही मेरे जीवन को शांति देता रहा है, और वही मृत्यु में भी शांति देगा।

7. हेनरी डेविड थोरो- प्रातः काल मैं अपनी बुद्धिमत्ता को अपूर्व और ब्रह्माण्डव्याप ी गीता के तत्वज्ञान से स्नान करता हूँ, जिसकी तुलना में हमारा आधुनिक विश्व और उसका साहित्य अत्यंत क्षुद्र और तुच्छ जन पड़ता है।

8. राल्फ वाल्डो इमर्सन- मैं भगवत गीता का अत्यंत ऋणी हूँ। यह पहला ग्रन्थ है जिसे पढ़कर मुझे लगा की किसी विराट शक्ति से हमारा संवाद हो रहा है।

9. विल्हन वोन हम्बोल्ट- गीता एक अत्यंत सुन्दर और संभवतः एकमात्र सच्चा दार्शनिक ग्रन्थ है जो किसी अन्य भाषा में नहीं। वह एक ऐसी गहन और उन्नत वस्तु है जैस पर सारी दुनिया गर्व कर सकती है।

10. एनी बेसेंट - विश्व के विभिन्न धर्मों का लगभग ४० वर्ष अध्ययन करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंची हूँ की हिंदुत्व जैसा परिपूर्ण, वैज्ञानिक, दार्शनिक और अध्यात्मिक धर्म और कोई नहीं। इसमें कोई भूल न करे की बिना हिंदुत्व के भारत का कोई भविष्य नहीं है। हिंदुत्व ऐसी भूमि है जिसमे भारत की जड़े गहरे तक पहुंची है, उन्हें यदि उखाड़ा गया तो यह महावृक्ष निश्चय ही अपनी भूमि से उखड जायेगा। हिन्दू ही यदि हिंदुत्व की रक्षा नही करेंगे, तो कौन करेगा? अगर भारत के सपूत हिंदुत्व में विश्वास नहीं करेंगे तो कौन उनकी रक्षा करेगा? भारत ही भारत की रक्षा करेगा। भारत और हिंदुत्व एक ही है।

हिंदू संस्कृति का प्रतीक 'नमस्कार' Date :- 14-Feb-2014

ईश्वरके दर्शन करते समय अथवा ज्येष्ठ या सम्माननीय व्यक्तिसे मिलनेपर हमारे हाथ अनायास ही जुड जाते हैं । हिंदू मनपर अंकित एक सात्त्विक संस्कार है `नमस्कार' । भक्तिभाव, प्रेम, आदर, लीनता जैसे दैवीगुणोंको व्यक्त करनेवाली व ईश्वरीय शक्ति प्रदान करनेवाली यह एक सहज धार्मिक कृति है। नमस्कारकी योग्य पद्धतियां क्या है, नमस्कार करते समय क्या नहीं करना चाहिए, इसका शास्त्रोक्त विवरण यहां दे रहे हैं।

1. नमस्कारके लाभ
मूल धातु `नम:' से `नमस्कार' शब्द बना है। `नम:' का अर्थ है नमस्कार करना, वंदन करना। `नमस्कारका मुख्य उद्देश्य है - जिन्हें हम नमन करते हैं, उनसे हमें आध्यात्मिक व व्यावहारिक लाभ हो।
व्यावहारिक लाभ : देवता अथवा संतोंको नमन करनेसे उनके गुण व कर्तृत्वका आदर्श हमारे समक्ष सहज उभर आता है । उसका अनुसरण करते हुए हम स्वयंको सुधारनेका प्रयास करते हैं।
आध्यात्मिक लाभ :
१. नम्रता बढती है व अहं कम होता है।
२. शरणागिति व कृतज्ञताका भाव बढता है।
३. सात्त्विकता मिलती है व आध्यात्मिक उन्नति शीघ्र होती है।

2. मंदिरमें प्रवेश करते समय सीढियोंको नमस्कार कैसे करें ?
सीढियोंको दाहिने हाथकी उंगलियोंसे स्पर्श कर, उसी हाथको सिरपर फेरें। मंदिरके प्रांगणमें देवताओंकी तरंगोंके संचारके कारण सात्त्विकता अधिक होती है। परिसरमें फैले चैतन्यसे सीढियां भी प्रभावित होती हैं। इसलिए सीढीको दाहिने हाथकी उंगलियोंसे स्पर्श कर, उसी हाथको सिरपर फेरनेकी प्रथा है। इससे ध्यानमें आता है कि सीढ़ियों की धूल भी चैतन्यमय होती है; हमें उसका भी सम्मान करना चाहिए।

3. देवताको नमन करनेकी योग्य पद्धति व उसका आधारभूत शास्त्र क्या है ?
देवताको नमन करते समय, सर्वप्रथम दोनों हथेलियोंको छातीके समक्ष एक-दूसरेसे जोडें। हाथोंको जोडते समय उंगलियां ढीली रखें। हाथोंकी दो उंगलियोंके बीच अंतर न रख, उन्हें सटाए रखें। हाथोंकी उंगलियोंको अंगूठेसे दूर रखें। हथेलियोंको एक-दूसरेसे न सटाएं; उनके बीच रिक्त स्थान छोडें।

हाथ जोडनेके उपरांत, पीठको आगेकी ओर थोडा झुकाएं।

उसी समय सिरको कुछ झुकाकर भ्रूमध्य (भौहोंके मध्यभाग)को दोनों हाथोंके अंगूठोंसे स्पर्श कर, मनको देवताके चरणोंमें एकाग्र करनेका प्रयास करें।

तदुपरांत हाथ सीधे नीचे न लाकर, नम्रतापूर्वक छातीके मध्यभागको कलाईयोंसे कुछ क्षण स्पर्श कर, फिर हाथ नीचे लाएं ।

इस प्रकार नमस्कार करनेपर, अन्य पद्धतियोंकी तुलनामें देवताका चैतन्य शरीरद्वारा अधिक ग्रहण किया जाता है ।
साष्टांग नमस्कार: षड्रिपु, मन व बुद्धि, इन आठों अंगोंसे ईश्वरकी शरणमें जाना अर्थात् साष्टांग नमस्कार ।

4. वयोवृद्धोंको नमस्कार क्यों करना चाहिए ?
घरके वयोवृद्धोंको झुककर लीनभावसे नमस्कार करनेका अर्थ है, एक प्रकारसे उनमें विद्यमान देवत्वकी शरण जाना। वयोवृद्धोंके माध्यमसे, जीवको आवश्यक देवताका तत्त्व ब्रह्मांडसे मिलता है। उनसे प्राप्त सात्त्विक तरंगोंके बलपर, कष्टदायक स्पंदनोंसे अपना रक्षण करना चाहिए। इष्ट देवताका स्मरण कर की गई आशीर्वादात्मक कृतिसे दोनों जीवोंमें ईश्वरीय गुणोंका संचय सरल होता है।

5. किसीसे मिलनेपर हस्तांदोलन (हैंडशेक) न कर, हाथ जोडकर नमस्कार करना इष्ट क्यों है ?
१. जब दो जीव हस्तांदोलन करते हैं, तब उनके हाथोंसे प्रक्षेपित राजसी-तामसी तरंगें हाथोंकी दोनों अंजुलियोंमें संपुष्ट होती हैं । उनके शरीरमें इन कष्टदायक तरंगोंके वहनका परिणाम मनपर होता है।
२. यदि हस्तांदोलन करनेवाला अनिष्ट शक्तिसे पीडित हो, तो दूसरा जीव भी उससे प्रभावित हो सकता है। इसलिए सात्त्विकताका संवर्धन करनेवाली नमस्कार जैसी कृतिको आचरण्में लाएं। इससे जीवको विशिष्ठ कर्म हेतु ईश्वरका चैतन्यमय बल तथा ईश्वरकी आशीर्वादरूपी संकल्प-शक्ति प्राप्त होती है।
३. हस्तांदोलन करना पाश्चात्य संस्कृति है। हस्तांदोलनकी कृति, अर्थात् पाश्चात्य संस्कृतिका पुरस्कार। नमस्कार, अर्थात् भारतीय संस्कृतिका पुरस्कार। स्वयं भारतीय संस्कृतिका पुरस्कार कर, भावी पीढीको भी यह सीख दें।

6. मृत व्यक्तिको नमस्कार क्यों करना चाहिए ?
त्रेता व द्वापर युगोंके जीव कलियुगके जीवोंकी तुलनामें अत्यधिक सात्त्विक थे। इसलिए उस कालमें साधना करनेवाले जीवको देहत्यागके उपरांत दैवगति प्राप्त होती थी। कलियुगमें कर्मकांडके अनुसार, `ईश्वरसे मृतदेहको सद्गति प्राप्त हो', ऐसी प्रार्थना कर मृतदेहको नमस्कार करनेकी प्रथा है

7. विवाहोपरांत पति व पत्नीको एक साथ नमस्कार क्यों करना चाहिए ?
विवाहोपरांत दोनों जीव गृहस्थाश्रममें प्रवेश करते हैं। गृहस्थाश्रमें एक-दूसरेके लिए पूरक बनकर संसारसागर-संबंधी कर्म करना व उनकी पूर्ति हेतु एक साथ बडे-बूढोंके आशीर्वाद प्राप्त करना महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार नमस्कार करनेसे ब्रह्मांडकी शिव-शक्तिरूपी तरंगें कार्यरत होती हैं । गृहस्थाश्रममें परिपूर्ण कर्म होकर, उनसे योग्य फलप्राप्ति होती है। इस कारण लेन-देनका हिसाब कम निर्माण होता है। एकत्रित नमस्कार करते समय पत्नीको पतिके दाहिनी ओर खडे रहना चाहिए।

8. किसीसे भेंट होनेपर नमस्कार कैसे करें ?
किसीसे भेंट हो, तो एक-दूसरेके सामने खडे होकर, दोनों हाथोंकी उंगलियोंको जोडें। अंगूठे छातीसे कुछ अंतरपर हों। इस प्रकार कुछ झुककर नमस्कार करें। इस प्रकार नमस्कार करनेसे जीवमें नम्रभावका संवर्धन होता है व ब्रह्मांडकी सात्त्विक-तरंगें जीवकी उंगलियोंसे शरीरमें संक्रमित होती हैं। एक-दूसरेको इस प्रकार नमस्कार करनेसे दोनोंकी ओर आशीर्वादयुक्त तरंगोंका प्रक्षेपण होता है।

9. नमस्कारमें क्या करें व क्या न करें ?
नमस्कार करते समय नेत्रोंको बंद रखें।
नमस्कार करते समय पादत्राण धारण न करें।
एक हाथसे नमस्कार न करें।
नमस्कार करते समय हाथमें कोई वस्तु न हो।
नमस्कार करते समय पुरुष सिर न ढकें व स्त्रियोंको सिर ढकना चाहिए।

मंदिर में जाने से पहले आखिर क्यों बजाते है घंटी !! Date :- 14-Feb-2014

हिंदू धर्म से जुड़े प्रत्येक मंदिर और धार्मिक स्थलों के बाहर आप सभी ने बड़े-बड़े घंटे या घंटियां लटकी तो अवश्य देखी होंगी जिन्हें मंदिर में प्रवेश करने से पहले भक्त श्रद्धा के साथ बजाते हैं. लेकिन क्या कभी आपने यह सोचा है कि इन घंटियों को मंदिर के बाहर लगाए जाने के पीछे क्या कारण है या फिर धार्मिक दृष्टिकोण से इनका औचित्य क्या है?असल में प्राचीन समय से ही देवालयों और मंदिरों के बाहर इन घंटियों को लगाया जाने की शुरुआत हो गई थी. इसके पीछे यह मान्यता है कि जिन स्थानों पर घंटी की आवाज नियमित तौर पर आती रहती है वहां का वातावरण हमेशा सुखद और पवित्र बना रहता है और नकारात्मक या बुरी शक्तियां पूरी तरह निष्क्रिय रहती हैं.

यही वजह है कि सुबह और शाम जब भी मंदिर में पूजा या आरती होती है तो एक लय और विशेष धुन के साथ घंटियां बजाई जाती हैं जिससे वहां मौजूद लोगों को शांति और दैवीय उपस्थिति की अनुभूति होती है.

लोगों का मानना है कि घंटी बजाने से मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं की मूर्तियों में चेतना जागृत होती है जिसके बाद उनकी पूजा और आराधना अधिक फलदायक और प्रभावशाली बन जाती है.

पुराणों के अनुसार मंदिर में घंटी बजाने से मानव के कई जन्मों के पाप तक नष्ट हो जाते हैं. जब सृष्टि का प्रारंभ हुआ तब जो नाद (आवाज) गूंजी थी वही आवाज घंटी बजाने पर भी आती है. उल्लेखनीय है कि यही नाद ओंकार के उच्चारण से भी जागृत होता है.

मंदिर के बाहर लगी घंटी या घंटे को काल का प्रतीक भी माना गया है. कहीं-कहीं यह भी लिखित है कि जब प्रलय आएगा उस समय भी ऐसा ही नाद गूंजेगा.

अंगेजी भाषा की कहानी Date :- 13-Feb-2014

मित्रोँ, हमारे देश मेँ एक सबसे बड़ा झूठ प्रचारित किया जाता है कि अंग्रेजी के बिना कुछ नहीँ हो सकता क्योँकि यह पूरे विश्व की भाषा है और सबसे समृद्ध है। आइये आपको अंग्रेजी की सच्चाई बताते हैँ-

1. भारत अकेला ऐँसा देश है जहाँ विदेशी भाषा अंगेजी मेँ शिक्षा दी जाती है। बाकि सभी देश अपनी मातृ भाषा मेँ ही अपनी शिक्षा ग्रहण करते है।

2. पूरे विश्व मेँ सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा चीनी है फिर इसके बाद हिन्दी और तीसरे स्थान पर रुसी भाषा है। अंगेजी का बारहवाँ स्थान है। तो फिर अंग्रेजी पूरे विश्व की भाषा कहाँ से हो गयी?

3. हमारा देश ही एकमात्र अकेला ऐँसा देश है जहाँ विदेशी भाषा मेँ समाचार पत्र छपते हैँ। बाकि किसी भी दूसरे देश मेँ विदेशी भाषा मेँ अखबार नहीँ छपते हैँ। और अगर छपते भी हैँ तो बहुत कम मात्रा मेँ।

4. अंगेजी भाषा की डिक्शनरी मेँ मात्र चार लाख शब्द हैँ और अंग्रेजी के मूल शब्द सिर्फ 65 हजार हैँ बाकि दूसरे भाषाओँ से चोरी किये हुये शब्द हैँ। इसके विपरीत हिन्दी मेँ 70 लाख तथा संस्कृत मेँ 100 अरब से भी अधिक शब्द हैँ और जिस भाषा का शब्दकोष जितना अधिक होता है वह भाषा उतनी ही अधिक समृद्ध होती है अर्थात अंग्रेजी का व्याकरण सबसे खराब है।

5. दुनिया का कोई भी धर्मशास्त्र और अन्य पुस्तकेँ कभी अंग्रेजी मेँ नही लिखी गयी। इसके अलावा कोई भी दर्शनशास्त्री, धर्मशास्त्री आजतक अंग्रेजी भाषा बोलने वाला नहीँ हुआ। रुसो, प्लूटो, अरस्तू इत्यादि इनका अंग्रेजी भाषा से कोई लेना-देना नहीँ था। यहाँ तक की ईसा मसीह की अपनी भाषा कभी भी अंग्रेजी नहीँ रही। ईसा मसीह ने जो उपदेश दिये थे वो भी अंग्रेजी भाषा मेँ कभी नहीँ दिये। बल्कि ईसा मसीह ने अरमेक भाषा में अपने उपदेश दिए थे। और बाइबिल भी अंग्रेजी भाषा मेँ नहीँ लिखी गयी थी। बल्कि अरमेक भाषा में लिखी गयी थी। अरमेक भाषा की लिपि बिल्कुल बांग्ला भाषा की लिपि के तरह थी।

6. सयुक्त राष्ट्र महासंघ और नासा की रिपोर्ट के अनुसार संस्कृत भाषा कम्प्यूटर के लिये सबसे उत्तम् है क्योँकि इसका व्याकरण शत् प्रतिशत शुद्ध है। इसके अलावा अंग्रेजों ने दुनिया में सबसे कम वैज्ञानिक शोध कार्य किये।

तो मित्रोँ ये कहानी है अंगेजी भाषा की और हमारे देश मेँ बच्चोँ के ऊपर जबरदस्ती अंग्रेजी थोप दी जाती है। तथा बच्चा बेचारा सारी उम्र अंग्रेजी का मारा फिरता रहता है। और उसके सिर्फ अंग्रेजी सीखने के चक्कर मेँ दूसरे महत्वपूर्ण विषय छूट जाते हैँ। इसके अलावा जब सेना के ऑफिसर की भर्ती होती है तो वहाँ भी अंग्रेजी आना जरुरी होता है। अब अंग्रेजी का फौज से क्या लेना देना। विश्व के ताकतवर देश चीन जापान जर्मनी फ्राँस इत्यादि देश के सैनिक तो अंग्रेजी जानते भी नहीँ हैँ।

तो मित्रोँ हमको इस अंग्रेजियत की गुलामी से बाहर निकलना होगा। क्योँकि किसी भी राष्ट्र का सम्पूर्ण विकास सिर्फ उनकी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा मेँ हो सकता है


।।जय हिन्द । जय भारत।।

चाणक्य की शिक्षा Date :- 13-Feb-2014

जब यूनानी आक्रमणकारी सेल्यूकस चन्द्रगुप्त मौर्य से हार गया और उसकी सेना बंदी बना ली गयी तब उसने अपनी खूबसूरत बेटी हेलेना के विवाह का प्रस्ताव चन्द्रगुप्त के पास भेजा ..

सेल्यूकस की सबसे छोटी बेटी थी हेलेन बेहद खुबसूरत , उसका विवाह आचार्य चाणक्य ने प्रस्ताव मिलने पर सम्राट चन्द्रगुप्त से कराया. पर उन्होंने विवाह से पहले हेलेन और चन्द्रगुप्त से कुछ शर्ते रखी जिस पर उन दोनों का विवाह हुआ.

पहली शर्त यह थी की उन दोनों से उत्पन्न संतान उनके राज्य का उत्तराधिकारी नहीं होगा और कारण बताया की हेलेन एक विदेशी महिला है , भारत के पूर्वजो से उसका कोई नाता नहीं है. भारतीय संस्कृति से हेलेन पूर्णतः अनभिग्य है

दूसरा कारण बताया की हेलेन विदेशी शत्रुओ की बेटी है. उसकी निष्ठा कभी भारत के साथ नहीं हो सकती.

तीसरा कारण बताया की हेलेन का बेटा विदेशी माँ का पुत्र होने के नाते उसके प्रभाव से कभी मुक्त नहीं हो पायेगा और भारतीय माटी, भारतीय लोगो के प्रति पूर्ण निष्ठावान नहीं हो पायेगा.

एक और शर्त चाणक्य ने हेलेन के सामने रखी की वह कभी भी चन्द्रगुप्त के राज्य कार्य में हस्तक्चेप नहीं करेगी और राजनीति और प्रशासनिक अधिकार से पूर्णतया विरत रहेगी. परन्तु गृहस्थ जीवन में हेलेन का पूर्ण अधिकार होगा.

सोचिये... भारत ही नही विश्व भर में चाणक्य जैसा कुटनीतिक और नीतिकार राजनितिक आज तक दूसरा कोई नही पैदा हुआ ..फिर भी आज भारत उनकी सबक को भूल गया

शूरवीर हिंदूओ के महान सत्य Date :- 09-Feb-2014

1. जयमाल मेड़तिया ने एक ही झटके में हाथी का सिर काट डाला था.

2. करौली के जादोन राजा अपने सिंहासन पर बैठते वक़्त अपने दोनो हाथ जिन्दा शेरो पर रखते थे.

3. जोधपुर के यशवंत सिंह के 12 साल के पुत्र पृथ्वी सिंह ने हाथो से औरंगजेब के खूंखार भूखे जंगली शेर का जबड़ा फाड़ डाला था.

4. राणा सांगा के शरीर पर छोटे-बड़े 80 घाव थे, युद्धों में घायल होने के कारण उनके एक हाथ नही था एक पैर नही था, एक आँख नहीं थी उन्होंने अपने जीवन-काल में 100 से भी अधिक युद्ध लड़े थे

5. एक राजपूत वीर जुंझार जो मुगलो से लड़ते वक्त शीश कटने के बाद भी घंटो लड़ते रहे आज उनका सिर बाड़मेर में है, जहा छोटा मंदिर हैं और धड़ पाकिस्तान में है.

6. चित्तोड़ में अकबर से हुए युद्ध में जयमाल राठौड़ पैर जख्मी होने कि वजह से कल्ला जी के कंधे पर बैठ कर युद्ध लड़े थे, ये देखकर सभी युद्ध-रत साथियों को चतुर्भुज भगवान की याद आयी थी, जंग में दोनों के सर काटने के बाद भी धड़ लड़ते रहे और राजपूतो की फौज ने दुश्मन को मार गिराया अंत में अकबर ने उनकी वीरता से प्रभावित हो कर जैमल और पत्ता जी की मुर्तिया आगरा के किलें में लगवायी थी.

7. महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलो था और कवच का वजन 80 किलो था और कवच, भाला, ढाल, और हाथ मे तलवार का वजन मिलाये तो 207 किलो था.

8. सलूम्बर के नवविवाहित रावत रतन सिंह चुण्डावत जी ने युद्ध जाते समय मोह-वश अपनी पत्नी हाड़ा रानी की कोई निशानी मांगी तो रानी ने सोचा ठाकुर युद्ध में मेरे मोह के कारण नही लड़ेंगे तब रानी ने निशानी के तौर पर अपना सर काट के दे दिया था, अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृ भूमि के लिए शहीद हो गये थे.

9. हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की और से 85000 सैनिक थे फिर भी अकबर की मुगल सेना पर राजपूत भारी पड़े थे.

यज्ञ का रहस्य Date :- 01-Feb-2014

वेदानुसार यज्ञ पाँच प्रकार के होते हैं-(1) ब्रह्मयज्ञ (2) देवयज्ञ (3) पितृयज्ञ (4) वैश्वदेव यज्ञ (5) अतिथि यज्ञ।

यज्ञ का अर्थ है- शुभ कर्म। श्रेष्ठ कर्म। सतकर्म। वेदसम्मत कर्म। सकारात्मक भाव से ईश्वर-प्रकृति तत्वों से किए गए आह्‍वान से जीवन की प्रत्येक इच्छा पूरी होती है।

(1) ब्रह्मयज्ञ: जड़ और प्राणी जगत से बढ़कर है मनुष्‍य। मनुष्‍य से बढ़कर है पितर, अर्थात माता-पिता और आचार्य। पितरों से बढ़कर हैं देव, अर्थात प्रकृति की पाँच शक्तियाँ और देव से बढ़कर है- ईश्वर और हमारे ऋषिगण। ईश्‍वर अर्थात ब्रह्म। यह ब्रह्म यज्ञ संपन्न होता है नित्य संध्या वंदन, स्वाध्याय तथा वेदपाठ करने से। इसके करने से ऋषियों का ऋण अर्थात 'ऋषि ऋण' ‍चुकता होता है। इससे ब्रह्मचर्य आश्रम का जीवन भी पुष्‍ट होता है।

(2) देवयज्ञ: देवयज्ञ जो सत्संग तथा अग्निहोत्र कर्म से सम्पन्न होता है। इसके लिए वेदी में अग्नि जलाकर होम किया जाता है यही अग्निहोत्र यज्ञ है। यह भी संधिकाल में गायत्री छंद के साथ किया जाता है। इसे करने के नियम हैं। इससे 'देव ऋण' चुकता होता है। हवन करने को 'देवयज्ञ' कहा जाता है। हवन में सात पेड़ों की समिधाएँ (लकड़ियाँ) सबसे उपयुक्त होतीं हैं- आम, बड़, पीपल, ढाक, जाँटी, जामुन और शमी। हवन से शुद्धता और सकारात्मकता बढ़ती है। रोग और शोक मिटते हैं। इससे गृहस्थ जीवन पुष्ट होता है।

(3) पितृयज्ञ: सत्य और श्रद्धा से किए गए कर्म श्राद्ध और जिस कर्म से माता, पिता और आचार्य तृप्त हो वह तर्पण है। वेदानुसार यह श्राद्ध-तर्पण हमारे पूर्वजों, माता-पिता और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है। यह यज्ञ सम्पन्न होता है सन्तानोत्पत्ति से। इसी से 'पितृ ऋण' भी चुकता होता है।

(4) वैश्वदेवयज्ञ: इसे भूत यज्ञ भी कहते हैं। पंच महाभूत से ही मानव शरीर है। सभी प्राणियों तथा वृक्षों के प्रति करुणा और कर्त्तव्य समझना उन्हें अन्न-जल देना ही भूत यज्ञ या वैश्वदेव यज्ञ कहलाता है। अर्थात जो कुछ भी भोजन कक्ष में भोजनार्थ सिद्ध हो उसका कुछ अंश उसी अग्नि में होम करें जिससे भोजन पकाया गया है। फिर कुछ अंश गाय, कुत्ते और कौवे को दें। ऐसा वेद-पुराण कहते हैं।

(5) अतिथि यज्ञ: अतिथि से अर्थ मेहमानों की सेवा करना उन्हें अन्न-जल देना। अपंग, महिला, विद्यार्थी, संन्यासी, चिकित्सक और धर्म के रक्षकों की सेवा-सहायता करना ही अतिथि यज्ञ है। इससे संन्यास आश्रम पुष्ट होता है। यही पुण्य है। यही सामाजिक कर्त्तव्य है।

उलटे हनुमान का मंदिर Date :- 01-Feb-2014

भारत की धार्मिक नगरी उज्जैन से केवल 30 किमी दूर स्थित है यह धार्मिक स्थान जहाँ भगवान हनुमान जी की उल्टे रूप में पूजा की जाती है. यह मंदिर साँवरे नामक स्थान पर स्थापित है इस मंदिर को कई लोग रामायण काल के समय का बताते हैं. मंदिर में भगवान हनुमान की उलटे मुख वाली सिंदूर से सजी मूर्ति विराजमान है.

सांवेर का हनुमान मंदिर हनुमान भक्तों का महत्वपूर्ण स्थान है यहाँ आकर भक्त भगवान के अटूट भक्ति में लीन होकर सभी चिंताओं से मुक्त हो जाते हैं. यह स्थान ऐसे भक्त का रूप है जो भक्त से भक्ति योग्य हो गया .

उलटे हनुमान कथा

भगवान हनुमान के सभी मंदिरों में से अलग यह मंदिर अपनी विशेषता के कारण ही सभी का ध्यान अपनी ओर खींचता है. साँवेर के हनुमान जी के विषय में एक कथा बहुत लोकप्रिय है. कहा जाता है कि जब रामायण काल में भगवान श्री राम व रावण का युद्ध हो रहा था, तब अहिरावण ने एक चाल चली. उसने रूप बदल कर अपने को राम की सेना में शामिल कर लिया और जब रात्रि समय सभी लोग सो रहे थे,तब अहिरावण ने अपनी जादुई शक्ति से श्री राम एवं लक्ष्मण जी को मूर्छित कर उनका अपहरण कर लिया .

वह उन्हें अपने साथ पाताल लोक में ले जाता है. जब वानर सेना को इस बात का पता चलता है तो चारों ओर हडकंप मच जाता है. सभी इस बात से विचलित हो जाते हैं. इस पर हनुमान जी भगवान राम व लक्ष्मण जी की खोज में पाताल लोक पहुँच जाते हैं और वहां पर अहिरावण से युद्ध करके उसका वध कर देते हैं तथा श्री राम एवं लक्ष्मण जी के प्राँणों की रक्षा करते हैं. उन्हें पाताल से निकाल कर सुरक्षित बाहर ले आते हैं. मान्यता है की यही वह स्थान था जहाँ से हनुमान जी पाताल लोक की और गए थे. उस समय हनुमान जी के पाँव आकाश की ओर तथा सर धरती की ओर था जिस कारण उनके उल्टे रूप की पूजा की जाती है.

उलटे हनुमान मंदिर की मान्यता

इस ऐतिहासिक धार्मिक स्थल के विषय में बहुत सी अन्य दंत कथाएं भी प्रचलित है जो इसकी मान्यता को और भी बढा देती हैं जिस कारण उलटे हनुमान का यह मंदिर क्षेत्र में विख्यात है तथा एक विश्व प्रसिद्ध मंदिर भी है. इस जैसी प्रतिमा और कहीँ नहीँ मिलती. भगवान हनुमान जी का यह मंदिर आस्थाओं व विश्वास का अनुठा संगम है.

साँवेर के उलटे हनुमान मंदिर में एक मुख्य मान्यता यह है कि यदि कोई व्यक्ति तीन मंगलवार या पाँच मंगलवारों तक इस मन्दिर के दर्शनों के लिए लगातार आता है तो उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं तथा उसकी सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है. मंगलवार को हनुमानजी को चोला भी चढ़ाया जाता है।

उलटे हनुमान मंदिर का महत्व

उलटे हनुमान मंदिर के दर्शन मात्र से ही सभी समस्याएं दूर हो जाती है. यहां भक्तों की आस्था का सैलाब उमड़ता दिखाई पड़ता है. मंदिर में श्रीराम, सीता, लक्ष्मणजी, शिव-पार्वती जी की प्रतिमाएं भी विराजमान हैं. मंदिर में स्थित हनुमान जी की प्रतिमा को अत्यंत चमत्कारी माना जाता है. इसके साथ ही उलटे हनुमान मंदिर में वर्षों पुराने दो पारिजात के वृक्ष हैं भी हैं.

अद्भुत महिमा है पीपल की Date :- 31-Jan-2014

पीपल ही एकमात्र ऐसा वृक्ष है जिसमें कीड़े नहीं लगते हैं।

पीपल के पेड़ को धर्मशास्त्रों में सबसे ज्यादा महत्व दिया गया है। इस एक पेड़ को मुक्ति के लाखों, करोड़ों उपायों के समकक्ष निरूपित किया है। गीता में भी श्रीकृष्ण ने पीपल को श्रेष्ठ कहा है। भविष्य पुराण में ऐसे कई पेड़ों का उल्लेख है जो पापनाशक माने गए हैं। वृक्षायुर्वेद में पेड़ों के औषधीय महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी है।

वनस्पति जगत में पीपल ही एकमात्र ऐसा वृक्ष है जिसमें कीड़े नहीं लगते हैं। यह वृक्ष सर्वाधिक ऑक्सीजन छोड़ता है जिसे आज विज्ञान ने स्वीकार किया है। भगवान बुद्ध को जिस वृक्ष के नीचे तपस्या करने के बाद ज्ञान प्राप्त हुआ था, वह पीपल का पेड़ ही है और श्रीमद् भागवत गीता के दसवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि वृक्षों में श्रेष्ठ पीपल है।

सौ वृक्षों का रोपण करना ब्रह्मारूप और हजार वृक्षों का रोपण करने वाला विष्णुरूप बन जाता है। अशोक वृक्ष के बारे में लिखा है कि इसके लगाने से शोक नहीं होता। अशोक वृक्ष को घर में लगाने से अन्य अशुभ वृक्षों का दोष समाप्त हो जाता है। बिल्व वृक्ष को श्रीवृक्ष भी कहते हैं। यह वृक्ष अति शुभ माना गया है। इसमें साक्षात लक्ष्मी का वास होता है तथा दीर्घ आयुष्य प्रदान करता है।

फौजी बाबा का बंकर Date :- 01-Jan-2014

1962 के युद्ध में चीन ने भारत को करारी शिकस्त दी थी, लेकिन उस युद्ध में हमारे देश के कई जांबाजों ने अपने लहू से गौरवगाथा लिखी थी। आज हम एक ऐसे शहीद की बात करेंगें, जिसका नाम आने पर न केवल भारतवासी बल्कि चीनी भी सम्मान से सिर झुका देते हैं। वो मोर्चे पर लड़े और ऐसे लड़े कि दुनिया हैरान रह गई, इससे भी ज्यादा हैरानी आपको ये जानकर होगी कि 1962 युद्ध में शहीद हुआ भारत माता का यह सपूत आज भी ड्यूटी पर तैनात है और हर बार प्रमोशन मिलता है। उनकी सेना की वर्दी हर रोज प्रेस होती है, हर रोज जूते पालिश किए जाते हैं। उनका खाना भी हर रोज भेजा जाता है और वो देश की सीमा की सुरक्षा आज भी करते हैं। सेना के रजिस्टर में उनकी ड्यूटी की हाजिरी आज भी होती है। अब वो कैप्टन बन चुके हैं। इनका नाम है- कैप्टन जसवंत सिंह रावत। महावीर चक्र से सम्मानित इस फौजी को आज बाबा जसवंत सिंह के नाम से जाना जाता है।

अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले के जिस इलाके में जसवंत ने जंग लड़ी थी, उस जगह वे आज भी ड्यूटी करते हैं। बाबा जसवंत सिंह को यह सम्मान सिर्फ भारत में नहीं बल्कि सीमा के उस पार चीन में भी है। पूरे तीन दिन तक चीनियों से अकेले लड़ा था वो जांबाज। 1962 की जंग का आखिरी दौर था। चीनी सेना हर मोर्चे पर हावी हो रही थी। लिहाजा भारतीय सेना ने नूरांग में तैनात गढ़वाल यूनिट की चैथी बटालियन को वापस बुलाने का आदेश दे दिया। पूरी बटालियन लौट गई, लेकिन जसवंत सिंह, लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी और गोपाल सिंह गुसाईं नहीं लौटे। बाबा जसवंत ने पहले त्रिलोक और गोपाल सिंह के साथ और फिर दो स्थानीय लड़कियों की मदद से चीनियों के साथ मोर्चा लेने की रणनीति तैयार की। बाबा जसवंत सिंह ने अलग-अलग जगह पर राईफल तैनात कीं और इस अंदाज में फायरिंग करते गए मानो उनके साथ बहुत सारे सैनिक वहाँ तैनात हैं। उनके साथ केवल दो स्थानीय लड़कियाँ थी, जिनके नाम थे- सेला और नूरा। चीनी परेशान हो गए और 72 घंटे तक वो ये नहीं समझ पाए कि उनके साथ अकेले जसवंत सिंह मोर्चा लड़ रहे हैं। तीन दिन बाद जसवंत सिंह को रसद आपूर्ति करने वाली नूरा को चीनियों ने पकड़ लिया। इसके बाद उनकी मदद कर रही दूसरी लड़की सेला पर चीनियों ने ग्रेनेड से हमला किया और वह शहीद हो गई, लेकिन चीनी जसवंत तक फिर भी नहीं पहुँच पाए। बाबा जसवंत ने खुद को गोली मार ली। भारत माता का ये लाल नूरांग में शहीद हो गया।

शहीद जसवंत का चीनी सैनिकों को जब पता चला कि उनके साथ तीन दिन से अकेले जसवंत सिंह लड़ रहे थे तो वे हैरान रह गए। चीनी सैनिक उनका सिर काटकर अपने देश ले गए। 20 अक्टूबर 1962 को संघर्ष विराम की घोषणा हुई। चीनी कमांडर ने जसवंत की बहादुरी का लोहा माना और सम्मानस्वरूप न केवल उनका कटा हुआ सिर वापस लौटाया बल्कि कांसे की मूर्ति भी भेंट की।

जिस जगह पर बाबा जसवंत ने चीनियों के दाँत खट्टे किए थे, उस जगह पर एक मंदिर बना दिया गया है। इस मंदिर में चीन की ओर से दी गई कांसे की वो मूर्ति भी लगी है। उधर से गुजरने वाला हर जनरल और जवान, वहाँ सिर झुकाने के बाद ही आगे बढ़ता है। स्थानीय नागरिक और नूरांग फाल जाने वाले पर्यटक भी बाबा से आशीर्वाद लेने के लिए जाते हैं। वो जानते हैं बाबा वहाँ हैं और देश की सीमा की सुरक्षा कर रहे हैं। उस शहीद के स्मारक पर चीनी सैनिक भी सिर झुकाते हैं।


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