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समान मुद्रा Date :- 01-May-2016

विधि- पाँचों अंगुलियों के अग्रभागों को मिलायें, हाथ सीधे व अंगुलियों  के अग्रभाग को आकाश की ओर रखें। इसे समान मुद्रा कहते हैं। इस मुद्रा को समन्वय मुद्रा भी कहते हैं क्योंकि इस मुद्रा में पाँचों तत्त्वों का समन्वय होता है।

स्थान- समान वायु दूसरे वायुओं के साथ पूरे शरीर में रहता है।

लाभ- इस मुद्रा से सात्विकता का विकास होता है। इससे अनिष्ट का निवारण होता है। इस मुद्रा के करने से पाँचों तत्त्वों का संतुलन हो जाता है। इस मुद्रा के अभ्यास से समान वायु व्यवस्थित रूप से काम करता है। वात, पित्त और कफ दोष का संतुलन होता है। इससे शरीर में शक्ति का विकास होता है।

-वैद्य गोपाल कृष्ण सोलंकी, 9899182158
(रेकी मास्टर, सुजोक एक्यूप्रेशरिस्ट एवं मुद्रा एक्सपर्ट)

मूत्राशय मुद्रा Date :- 01-Apr-2016

विधि- अनामिका अंगुली (रिंग फिंगर) और कनिष्ठिका अंगुली के अग्रभागों को अंगूठे के मूल भाग पर लगाएँ, शेष दोनों अंगुलियाँ सीधी रखें। इस मुद्रा में बंदूक जैसी आकृति बनती है।

लाभ- इस मुद्रा से हाथ, पैर, मुँह पर सूजन हो तो उसमें लाभ मिलता है। जलोदर नाशक मुद्रा के लाभ इस मुद्रा में मिलते हैं। किडनी (गुर्दे) के रोगों में लाभ मिलता है।

समयसीमा- जब तक बीमारी ठीक न हो, तब तक इस मुद्रा का अभ्यास नियमित रूप से करना चाहिए। रोग समाप्ति के बाद इस मुद्रा का प्रयोग बंद कर देना चाहिए।

- वैद्य गोपाल कृष्ण सोलंकी, 9899182158
(रेकी मास्टर, सुजोक एक्यूप्रेशरिस्ट एवं मुद्रा एक्सपर्ट)

मेयो मुद्रा Date :- 01-Feb-2016

विधि- इस मुद्रा में मध्यमा एवं अनामिका के अग्रभाग को हथेली में गड़ाकर रखते हुए अंगूठा, तर्जनी एवं कनिष्ठा को सीधा तानकर रखें।

लाभ- उच्च रक्तचाप या निम्न रक्तचाप को सामान्य स्तर पर लाने में यह मुद्रा लाभकारी है। इस मुद्रा के निरन्तर प्रयोग से रक्तचाप को सामान्य रखने में मदद मिलती है।

विशेष- इस मुद्रा का प्रयोग प्रतिदिन कम से कम 20 से 30 मिनट के लिये दो-तीन बार करना चाहिए। मुद्राभ्यास का सर्वोत्तम समय भोर का है। यदि इस मुद्रा की साधना की जायेगी, तो समय के साथ यह रक्तचाप की बीमारी में आराम पहुँचायेगी।

- वैद्य गोपाल कृष्ण सोलंकी
9899182158

(रेकी मास्टर, सुजोक एक्यूप्रेशरिस्ट एवं मुद्रा एक्सपर्ट)

सहज शंख मुद्रा Date :- 01-Jan-2016

विधि- दोनों हाथों की अंगुलियों को आपस में फँसाकर हथेलियाँ दबाकर तथा दोनों अंगूठों को बराबर में सटाकर रखने से यह मुद्रा बनती है।

लाभ- इस मुद्रा के अभ्यास से हकलाना, तुतलाना आदि वाणी सम्बन्धी रोग दूर होते हैं। इससे वाणी में मधुरता आती है। इसका प्रयोग वज्रासन में करने से पाचन क्रिया ठीक होती है, भोजन शीघ्र पचता है। गैस की बीमारी से छुटकारा मिलता है।
विशेष- इसे वज्रासन या सुखासन में करना चाहिए। अधिक लाभ के लिये इसे मूलबंध (गुदा के स्नायुओं को भीतर की ओर खींचना) और प्राणायाम के साथ भी किया जा सकता है। मूलबन्ध के प्रयोग से वृद्ध भी युवा जैसे बन जाते हैं। गुदा के स्नायुओं की तकलीफ में यह मुद्रा लाभदायक है।

- वैद्य गोपाल कृष्ण सोलंकी
9899182158

(रेकी मास्टर, सुजोक एक्यूप्रेशरिस्ट एवं मुद्रा एक्सपर्ट)

लिंग मुद्रा Date :- 01-Dec-2015

विधिः दोनों हाथों की अंगुलियों को एक-दूसरे में ऐसे फँसाए कि एक हाथ की एक अंगुली के बाद दूसरे हाथ की अंगुली आये। अंगुलियों को फँसाने के बाद बायीं कनिष्का सबसे नीचे होनी चाहिए और दाहिना अंगूठा सबसे ऊपर। बायें अंगूठे को जितना खड़े रख सकते हैं, करें और दाहिने अंगूठे से इसकी जड़ को घेर कर पकड़ें। दोनों हाथों को दबाकर रखें। जो व्यक्ति ज्यादातर काम दाहिने हाथ से करते हैं, उन्हें बायां अंगूठा सीधा रखना चाहिए। जो व्यक्ति ज्यादातर काम बायें हाथ से करते हैं, उन्हें दायां अंगूठा सीधा रखना चाहिए।

समयसीमाः इस मुद्रा का अभ्यास आवश्यकतानुसार करना चाहिए। रोग ठीक हो जाने पर इस मुद्रा का प्रयोग बंद कर देना चाहिए।

लाभः ठंड से और जुकाम से बचने के लिए ‘लिंग’ मुद्रा बहुत सहायक हो सकती है। लिंग मुद्रा शरीर में गर्मी पैदा करती है। जब शरीर ठंडा हो या ठंड लग रही हो तो इस मुद्रा को करने से शरीर में गर्मी आ जाती है। गर्मी उत्पन्न होने के कारण कफ के सभी दोष दूर हो जाते हैं। गर्मी के कारण संचित कफ का नाश हो जाता है। इसलिए कफ के सभी दोष जैसे खाँसी, जुकाम, सायनस, दमा, अस्थमा, निमोनिया आदि रोग दूर हो सकते हैं। इस मुद्रा से अनावश्यक चर्बी का नाश होता है तथा मोटापा कम होता है। मौसम परिवर्तन से जो तकलीफें बढ़ती हैं, उनसे मुकाबला करने में मदद मिलती है।

सावधानीः जिनके पेट में अल्सर, एसिडिटी हो, उन्हें यह मुद्रा नहीं करनी चाहिए। इस मुद्रा को करने के दिनों में पानी अधिक पीना चाहिए अथवा फलों का रस, दूध, घी का सेवन करना चाहिए। बिना आवश्यकता यह मुद्रा अधिक समय के लिए नहीं की जानी चाहिए।

- वैद्य गोपाल कृष्ण सोलंकी
9899182158

(रेकी मास्टर, सुजोक एक्यूप्रेशरिस्ट एवं मुद्रा एक्सपर्ट)

अपानवायु मुद्रा Date :- 01-Nov-2015

विधिः तर्जनी (अंगूठे के पास वाली) अंगुली को अंगूठे की जड़ में लगाकर अंगूठे के अग्रभाग को मध्यमा और अनामिका (Middle & Ring Finger) (बीच की दोनों अंगुलियों) के अगले सिरे से मिला दें। छोटी अंगुली कनिष्ठिका सहज रूप से सीधी रखें।

समयसीमाः आवश्यकता पड़ने पर इस मुद्रा का प्रयोग एक दिन में आप कई बार कर सकते हैं। अपानवायु मुद्रा दिल के दौरे के लिए रामबाण मुद्रा है और इंजेक्शन की तरह अपना असर करती है। इसलिए जब भी दिल के दौरे का आभास हो, अपानवायु मुद्रा का प्रयोग करना चाहिए। जिन व्यक्तियों को हृदय रोग या उच्च रक्तचाप हो या जिन्हें दिल का दौरा पड़ चुका हो, उन्हें नित्य पन्द्रह मिनट सुबह-शाम अपानवायु मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए।

लाभः अपानवायु मुद्रा हृदय रोगियों के लिए एक वरदान है। यह तुरन्त प्रभाव दिखाने वाली मुद्रा है। अचानक हृदय के भयंकर हमले के वक्त अर्थात् दिल का दौरा रोकने में तत्काल अपानवायु मुद्रा का प्रयोग करने से कुछ ही क्षणों में प्रभावशाली इंजेक्शन या सोरबिट्रेट गोली की तरह जादुई काम करती है और रोगी की मृत्यु से रक्षा हो जाती है। तभी अपानवायु मुद्रा को ‘मृतसंजीवनी मुद्रा’ भी कहा गया है, फिर तुरन्त डाॅक्टरी इलाज करवाना चाहिए।

इस मुद्रा के नियमित प्रयोग से हृदय को बहुत बल मिलता है। हाथ में सूर्य पर्वत अतिविकसित और चन्द्र पर्वत अविकसित होने तथा हृदय रेखा दोषपूर्ण होने पर इस मुद्रा का प्रतिदिन अभ्यास करने से लाभ मिलता है। अपानवायु मुद्रा में दो मुद्राएँ हैं- (1) अपान मुद्रा तथा (2) वायु मुद्रा। इस मुद्रा में दोनों मुद्राएँ एक साथ की जाती हैं। अतः इस मुद्रा के प्रयोग से दोनों मुद्राओं का सम्मिलित और उसी क्षण प्रभाव एक साथ पड़ता है, जैसे- पेट की गैस और शारीरिक वायु- दोनों का शमन होता है। वात के रोग जो वायु मुद्रा से ठीक नहीं होते, इस मुद्रा के प्रयोग से ठीक हो जाते हैं।


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