Hindu Sanskriti
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भाई का आदर्श Date :- 01-May-2016

गंगाधर के दो लड़के थे- जगन्नाथ और बिलासीराम। उनकी पहली पत्नी से जगन्नाथ नामक पुत्र था और उसका देहान्त हो जाने पर जो दूसरा विवाह किया था, उससे बिलासीराम नामक पुत्र था। बिलासीराम की माँ का भी कुछ दिनों बाद ही देहान्त हो गया। फिर गंगाधर ने विवाह नहीं किया। लड़के दोनों विवाहित थे और उनके संतान भी थीं। जगन्नाथ और बिलासीराम में परस्पर बहुत ही सद्भाव था। आश्चर्य की बात तो यह कि दोनों की पत्नियों में आपस में बड़ा प्रेम था। बिलासीराम की पत्नी तो अपनी जेठानी का माँ से बढ़कर आदर करती थी। इतना होने पर भी गंगाधर जी ने यह सोचकर कि ‘दोनों लड़के दो माताओं के हैं, आगे चलकर लड़ें नहीं,’ इसलिये इनका बँटवारा कर देना चाहा। पर जगन्नाथ, बिलासीराम और दोनों की पत्नियाँ गोदावरी बाई तथा मोहरी बाई अलग होना नहीं चाहते थे। आखिर पिता के बहुत कहने-सुनने पर दुकान का कारोबार तो साथ बराबर के हिस्से में रखा, पर जगह-जमीन, गहना, नगद रुपये आदि का बँटवारा बड़े प्रेम से कर लिया गया। दोनों ने ही अलग-अलग मकानों में रहना स्वीकार नहीं किया, तब गंगाधर जी ने यह निश्चय कर दिया कि ‘रहें तो एक ही मकान में, पर रसोई अलग-अलग।’ घर का तथा बच्चों के विवाह-शादी का खर्च अपना-अपना अलग-अलग लगे। दोनों भाइयों ने पिता की आज्ञा समझकर स्वीकार कर लिया। इससे सबसे अधिक दुःख हुआ बिलासीराम की पत्नी मोहरी बाई को। कुछ समय बाद गंगाधर जी भी चल बसे।

इनका आसाम में व्यापार था। आमदनी भी उस जमाने के अनुसार अच्छी थी। दुकान का काम अधिकांश में बिलासीराम ही सँभालते थे। वे अपने भाई का बड़ा आदर करते और उन्हें परिश्रम का काम नहीं करने देते। घर में भी अलग-अलग रसोई होने पर भी मोहरी अपनी जेठानी की पाँचों लड़कियों तथा तीनों लड़कों को अपने एकमात्र पुत्र से भी बढ़कर स्नेह करती और उनकी सार-सँभाल रखती।

जगन्नाथ का बड़ा परिवार होने से घर-खर्च भी अधिक लगा और एक लड़की के विवाह में दस हजार और दूसरी के विवाह में चैदह हजार- इस प्रकार चैबीस हजार दो विवाहों में खर्च हो गये। उधर खर्च सीमित होने से बिलासीराम की पूँजी बढ़ती गई। एक साल व्यापार में इतनी मंदी आई कि कारोबार में कुछ आमदनी तो हुई ही नहीं, बल्कि चावल खरीदकर रखे थे, बाजार मन्दा होने से उनमें पर्याप्त घाटा लग गया। परिणामस्वरूप घाटे तथा खर्च की रकमें मिलाकर जगन्नाथ की जमा की सारी पूँजी व्यय हो गई, पर बारह हजार रुपये उनके नाम पड़ने लगे और बिलासीराम के लगभग सवा लाख रुपये जमा हो गये।

इस बात का पता लगने पर मोहरी बाई बहुत दुःखी रहने लगी। वह बार-बार अपने स्वामी बिलासीराम के सामने अपना दुःख प्रकट करके कहती कि ‘हम दोनों घर फिर से एक हो जायें। सारी पूँजी दोनों की बराबर रहे, रसोई एक साथ हो और घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, विवाह आदि का खर्च भी सब बराबर के हिस्से में ही लगे। उनके बच्चे आपके ही तो बच्चे हैं। बिलासीराम तो इस मत के थे ही, पत्नी की इन बातों से उन्हें बहुत सुख-सांत्वना मिलती।

इधर रुपये नाम पड़ने तथा घर के खर्च एवं लड़कियों के विवाह की चिंता से जगन्नाथ उदास रहने लगे और उनको हल्का-सा ज्वर रहने लगा। अब तो बिलासीराम और उनकी पत्नी की चिन्ता बहुत ही बढ़ गई। पत्नी ने बार-बार कहा और बिलासीराम से भी नहीं रहा गया। वे अपना बहुत दिनों का संकल्प पूरा करने पर तुल गये और एक दिन वकील के यहाँ जाकर सब दस्तावेज बना लाये और तदनुसार ही बही-खातों में भी जमा-खर्च कर लिया। तदनन्तर बिलासीराम आकर भाई जगन्नाथ के पास बैठ गये। उनकी पत्नी मोहरी बाई भी अपनी जेठानी गोदावरी के समीप जा बैठी। बिलासीराम ने बड़े भाई जगन्नाथ जी के पैर पकड़ लिये और वे रोने लगे। उनकी आँखों से आँसू बहते देखकर जगन्नाथ को बड़ा खेद हुआ और उन्होंने बड़े स्नेह से इसका कारण पूछा।

बिलासीराम ने रोते हुए बड़े ही विनीत शब्दों में कहा- ‘भाईजी! आप बड़े हैं, मुझ पर आपका अत्यन्त स्नेह है, इसी से मैं आपके सामने बोलने का साहस करता हूँ। मेरी धृष्टता क्षमा करें और मुझे कृपापूर्वक वचन दें कि आप मेरी प्रार्थना को स्वीकार कर लेंगे।’ जगन्नाथ स्नेह-गद्गद् थे। उन्होंने कहा- ‘भैया! तुम रोओ मत। जो कुछ कहोगे, मुझे स्वीकार है।’ बिलासीराम ने उत्फुल्ल हृदय से दस्तावेज सामने रखकर हस्ताक्षर करने की प्रार्थना की। जगन्नाथ ने बिना ही कुछ पूछे उस पर हस्ताक्षर कर दिये। अब तो बिलासीराम के आनन्द का ठिकाना न रहा। वे बोले- भाईजी! आपने बिना ही जाने-पूछे मेरी प्रार्थना पर अपने हस्ताक्षर करके मुझ पर जो अपार विश्वास तथा कृपा की है, इसकी कहीं तुलना नहीं है। भाईजी! बात यह है कि पूज्य पिताजी बँटवारा कर गये थे। उस समय भी हम लोग इसके विरुद्ध थे। पिताजी के चले जाने के बाद तो मुझे इससे बड़ी बेचैनी रहने लगी। आपकी बहू तो मुझसे भी ज्यादा दुःखी रही और मुझे बार-बार कहती रही। मेरा आपसे पूछने का साहस नहीं होता। आप चिन्ता से बीमार हो गये- तब तो हम दोनों की चिंता और भी बढ़ गई। मुझसे रहा नहीं गया। तब आपसे पूछे बिना ही मैंने ये दस्तावेज बनवा लिये। इनमें यही लिखवाया गया है कि हम दोनों भाई अलग-अलग न रहकर पुनः पूर्ववत एक साथ हो गये हैं। आपके नाम बारह हजार रुपये पड़ते थे, मेरे नाम से एक लाख पच्चीस हजार जमा थे। अतः उनमें से बारह हजार देकर हमारी पूँजी एक लाख तेरह हजार दोनों की हो गई है। रसोई आज से एक साथ ही होगी। आपकी बहू ने उसकी सारी व्यवस्था कर ली है। रसोई का तथा सब खर्च एक साथ ही घर में लगेगा। लड़कियों तथा लड़कों की विवाह-शादी का खर्च भी सब घर में ही लिखा जायेगा। आपने दस्तावेज पर मुझ पर कृपा करके हस्ताक्षर तो कर ही दिये हैं। अब आप मेरे सिर पर हाथ फेरकर अपनी स्वीकृति दे दीजिये। यों कहकर वे भाई जगन्नाथ के चरणों पर गिर आँसू बहाने लगे। जगन्नाथ क्या बोलते, उन्होंने बिलासीराम के सिर पर हाथ फेरकर उठाकर अपने हृदय से लगा लिया। दोनों के नेत्रों से अश्रुधारा बह चली। उधर जेठानी के पैर पकड़कर मोहरी बाई रोने लगी। जेठानी ने उसे उठाकर हृदय से लगा लिया। उसी समय से जगन्नाथ का ज्वर जाता रहा। घर में आनन्द छा गया।

माता-पिता की सेवा - प्रभु प्राप्ति का सबसे श्रेष्ठ साधन Date :- 01-Apr-2016

कुरुक्षेत्र में कुण्डल नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। वे वेद-वेदांग आदि शास्त्रों के पारंगत विद्वान थे। उनकी पत्नी भी सद्गुणी थी। उनके पुत्र का नाम सुकर्मा था। माँ शैशव से ही सुकर्मा को लोरियाँ सुना-सुनाकर भगवान में रुचि उत्पन्न करती रहती थी। जैसे-जैसे सुकर्मा की अवस्था बढ़ रही थी, वैसे-वैसे उसकी भगवान के प्रति जिज्ञासा भी बढ़ती गई।

एक दिन उसने माँ से पूछा- माँ! मेरा मन तुमको और पिताजी को छोड़ना नहीं चाहता, फिर मैं परमात्मा को कैसे प्राप्त कर सकूँगा? बच्चे के इस अद्भुत प्रश्न को सुनकर माँ चकित हो गई। उसने प्यार से बच्चे के माथे पर हाथ रखकर कहा- मैं सोचती हूँ, इस प्रश्न का तुम्हारे पिताजी अच्छा समाधान कर सकते हैं। चलो, हम लोग उनके पास चलते हैं। सुकर्मा के पिताजी एकान्त में ब्रह्मचिन्तन में लीन थे। माता-पुत्र दोनों उनके पास पहुँचे और दोनों ने उनके चरणों को छूकर प्रणाम किया। पिता ने कहा- सुकर्मा! तुम क्या पूछना चाहते हो? सुकर्मा ने कहा- ‘मैंने माँ से पूछा था कि मैं तुम्हारे और पिताजी के बिना एक क्षण भी चैन से नहीं रह पाता, तो फिर आप दोनों को छोड़कर मैं भगवान को कैसे पाऊँगा?’

प्रश्न सुनकर कुण्डल गम्भीर हो गये, बोले- बेटा सुकर्मा! तुम्हारी माता ने दूध पिलाने के साथ लोरियाँ सुनाकर भगवान को पाने की तुम में लालसा जगा दी है। मैं तुम दोनों को साधुवाद देता हूँ। परमात्मा दया के सागर हैं, उन्होंने एक ऐसा विधान बताया है, जिससे माता-पिता को छोड़ना भी नहीं पड़ता और भगवान भी मिल जाते हैं। उस साधन का नाम है, माता-पिता को भगवान की मूर्ति समझकर उनकी सेवा करना। इस साधन से पुत्रों को माता-पिता से विरह भी नहीं होता और भगवान की पूरी पूजा भी हो जाती है। बेटा! भगवान को पाने के लिये और भी बहुत-से साधन हैं, जैसे- कठोर तपस्या, तीर्थयात्रा और यज्ञ-याग करना आदि।

बचपन के थोड़े समय में माता-पिता की सेवारूप साधन से जो फल प्राप्त होता है, वह सैकड़ों यज्ञों, तीर्थयात्राओं और तपस्या करने से भी नहीं मिलता। अतः बेटा! तुम्हें हम दोनों को छोड़कर कहीं जाने की आवश्यकता नहीं। हम दोनों को भगवान का स्वरूप समझकर हम लोगों की सेवा करो। सुकर्मा सब कुछ छोड़कर माता-पिता की सेवा करने लगा।

उन्हीं दिनों कश्यप कुल में उत्पन्न पिप्पल नामक एक ब्राह्मण थे। वे सदा धर्म-कर्म में लगे रहते थे। एक दिन वे ज्ञान और शांति की प्राप्ति के लिये तपस्या करने दशारण्य में चले गये। तपस्या करते हुए उन्हें एक हजार वर्ष बीत गये। देवताओं ने प्रसन्न होकर उनसे वर माँगने को कहा। पिप्पल ने कहा- ‘मैं विद्याधर हो जाऊँ और विश्व के समस्त प्राणी मेरे वश में हो जायें।’ देवताओं ने पिप्पल को मुँह-माँगा वरदान दे दिया। तब से पिप्पल विद्याधर हो गये। वे जिसको चाहते, वही उनके वश में हो जाता। यह देखकर उन्हें अहंकार हो गया।

वे अहंकार के वश में होकर कहने लगे- मेरे समान संसार में कोई भी श्रेष्ठ पुरुष नहीं है। उनके इस अहंकार से पितामह ब्रह्मा दया के वशीभूत हो गये। उन्होंने सोचा कि पिप्पल ने इतना कठोर तप करके जो पुण्य संचित किया है, वह इसके अहंकार से नष्ट होने जा रहा है। अतः वे सारस का रूप धारण कर उनसे पास आये। सारसरूपी ब्रह्माजी बोले- कुण्डल का सुकर्मा नाम का पुत्र ज्ञानी है। सुकर्मा जैसा ज्ञानी वर्तमान समय में कोई नहीं है, यद्यपि सुकर्मा ने न तो दान किया, न यज्ञ, न होम और न ही तीर्थ-सेवन किया है। सुकर्मा यद्यपि बालक है तो भी उसके जैसा ज्ञान तुम्हें नहीं है। इन्द्र आदि देवताओं की कौन कहे, उसके वश में तो साक्षात् नारायण ही हैं।

सारस की बात सुनकर पिप्पल कुण्डल के आश्रम की ओर चले, वहाँ उन्होंने देखा कि बालक सुकर्मा अपने माता-पिता की सेवा मंे संलग्न है। सुकर्मा ने देखा कि तपस्वी पिप्पल उसके द्वार पर खड़े हैं, तब उसने माता-पिता की आज्ञा लेकर पिप्पल को पात्र, आसन आदि समर्पित कर पूछा- ‘भगवन्! आप कुशल से तो हैं, मार्ग में कोई कष्ट तो नहीं हुआ। आप महान तपस्वी हैं, हजारों वर्षों की तपस्या से आपने देवताओं को प्रसन्न करके दुर्लभ वरदान प्राप्त किये हैं, परंतु आप में अहंभाव हो आया है, इसलिये सारस ने आपको मेरे पास भेजा है।’

पिप्पल ने पूछा- ब्रह्मन्! वह सारस कौन था? सुकर्मा ने कहा- भगवन्! सारस के रूप में स्वयं पितामह ब्रह्माजी थे। उन्होंने ही आपको मेरे पास भेजा है। पिप्पल ने सुकर्मा से कहा- सारस ने बताया था कि देवता आदि सारा जगत तुम्हारे अधीन है। इस बात को देखने की मेरी उत्कण्ठा है। तुम अपनी शक्ति दिखाओ। अब सुकर्मा ने पिप्पल को विश्वास दिलाने के लिये देवताओं का स्मरण किया। स्मरण करते ही देवताओं से सारा आकाश भर गया। देवताओं ने कहा- सुकर्मा! तुमने हमें क्यों याद किया है? सुकर्मा ने कहा- मेरे महान अतिथि विद्याधर पिप्पल इस बात का प्रमाण चाहते हैं कि सम्पूर्ण विश्व मेरे वश में कैसे है? इन अतिथि के सत्कार के लिये ही मैंने आप लोगों का आवाहन किया है। अब आप लोग अपने-अपने धाम पधारें। देवताओं ने कहा- सुकर्मा! हमारा दर्शन व्यर्थ नहीं जाता। अतः तुम अपनी इच्छा के अनुसार कोई वरदान माँगो।

सुकर्मा ने कहा- हे देवेश्वरों! माता-पिता के चरणों में मेरी भक्ति बनी रहे तथा मेरे माता-पिता श्रीहरि के धाम को प्राप्त करें। देवताओं ने ‘तथास्तु’ कहा और अपने-अपने धाम को चले गये। यह देख महान तपस्वी पिप्पल बहुत चकित हुए और बोले- तुम्हारी अवस्था बताती है कि तुमने तपस्या नहीं की है, फिर सब देवता और ईश्वर तुम्हारे वश में कैसे हो गये? तुम अपना साधन बताओ। वह कौन-सा साधन है, जिससे तुम घर बैठे जान जाते हो कि कहाँ क्या हो रहा है। किस साधन से तुम्हें ब्रह्म का प्राचीन-अर्वाचीन ज्ञान हुआ? मैं भी उसे करूँगा। इस पर सुकर्मा ने हाथ जोड़कर अतिथिदेव से कहा- यह सच है कि मैंने कोई तपस्या नहीं की है, परन्तु मैंने केवल माता-पिता की सेवा की है और यही मेरा साधन है।

देशभक्ति सर्वोपरि है Date :- 01-Mar-2016

जनरल गगनदीप बक्शी भावुक हो उठे, (जब कुछ वामपंथियों और देशद्रोही तत्त्वों ने सरकार की केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में तिरंगा फहराने की योजना पर सवाल उठाया) दुःख हो रहा है हम फौजी अकेले रह गए रोने के लिए। जिस तिरंगे की रक्षा के लिए हम जान की बाजी लगा देते हैं, आज उसी देश में तिरंगा फहराने के लिए विरोध हो रहा है।

यहाँ हमारे देश में देशद्रोहियों की हिम्मत इतनी बढ़ गई है कि वोटों की खातिर कुछ वर्ग विशेष के लोगों को खुश करने के लिए देश-विरोधी नारे लगाने वालों की खुलेआम टी.वी. चैनलों पर बैठकर पैरवी कर रहे हैं। जे.एन.यू. में छात्र खुलेआम आतंकवादियों को शहीद का दर्जा दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति की सहमति से लगाई गई फाँसियों पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं। देश के हजारों टुकड़े करने की बात कर रहे हैं।

पहले देश के गद्दार किसी से आँख नहीं मिला पाते थे, अब तो हद हो गई है कि विभिन्न चैनलों पर बैठकर बड़ी बेशर्मी से हक के साथ देश को बर्बाद करने वालों का समर्थन कर रहे हैं। देशभक्तों को गुंडा और दकियानूसी सोच वाला बताया जा रहा है। इनकी देशभक्ति को एक पागलपन सिद्ध करने की कोशिश की जा रही है। उट-पटांग चैनलों पर होने वाली बहस से आम आदमी इतना भ्रमित हो गया है कि उसे यह नहीं सूझ रहा कि कौन अच्छा है और कौन बुरा है। आज सभी दल धर्म-जाति को आगे कर एक हो गये हैं और देशहित की हर बात का विरोध कर रहे हैं।

आज देशद्रोहियों की जिस प्रकार हिम्मत बढ़ गई है, उससे ऐसा लगता है कि भविष्य में देशभक्ति की बात करना साम्प्रदायिक कहलाएगा। जैसा कि अब हिन्दू धर्म का नाम लेना साम्प्रदायिक हो गया है। वोटों के लालच में राजनैतिक पार्टियों ने जरूरत से ज्यादा आजादी का गलत इस्तेमाल करना आरम्भ कर दिया है, जो अब एक अराजकता का रूप लेने लगा है। देश का दुर्भाग्य देखिये, कुछ चैनल हमेशा देश-विरोधी तत्त्वों की पैरवी करते रहते हैं और आम जनता को ऐसे तथ्य दिखाते हैं कि वे यह समझ ही नहीं पाते कि सच्चाई क्या है। आम आदमी यही सोचता है कि टी.वी. वाले कोई गलत बात नहीं बताते। अवश्य ही ऐसे चैनलों को विदेशों से बड़ी मात्रा में देश में अराजकता फैलाने के लिए बड़े-बड़े चंदे मिलते हैं, ताकि देश प्रगति न कर सके। हमें ऐसे चैनलों का बहिष्कार करना चाहिए, भूले से भी इनका मुख नहीं देखना चाहिए।

समय की आवश्यकता है कि सभी देशवासी आज जाति-धर्म से ऊपर उठकर निर्मल मन से विचार करें कि कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही? पहले देश है, बाद में जाति और धर्म है। देश रहेगा तो हम, जाति और धर्म बने रहेंगे। अगर हमने आज इस कार्य के लिए उदासीनता दिखा दी तो देश फिर से गलत हाथों में चला जाएगा और देखने वाली बात यह भी है कि हम हजारों वर्षों की गुलामी के बाद अभी आजाद हुए हैं, देश ने अभी कोई विशेष तरक्की भी नहीं की है, देश में बेरोजगारी और भुखमरी फैली हुई है और हम फिर से गुलामी की ओर बढ़ते जा रहे हैं। समय है सब पिछली बातों को भूलकर अपने राष्ट्रीय ध्वज के नीचे एकजुट होकर एकत्रित होकर एक स्वर में ‘वन्देमातरम्’ बोलकर संसार में देशभक्ति की अद्वितीय मिसाल कायम करें, जिसके लिए हम जाने जाते हैं।

सहिष्णुता- एक आदर्श धर्म Date :- 01-Feb-2016

मनु महाराज ने दस धर्म बताये हैं। उनमें क्षमा को दूसरा धर्म माना गया है। समर्थ होते हुए भी अपना अनिष्ट-अहित करने वाले के प्रति क्रोध न होना ‘अक्रोध’ कहलाता है, परन्तु इसमें प्रतिशोध की भावना मन में रह सकती है, लेकिन क्षमा और सहिष्णुता में प्रतिशोध की कल्पना तो रहती ही नहीं, अपराधी का उपकार किया जाता है अथवा उसे उल्टा महत्व दिया जाता है।

मानव अपने अहंकारवश होकर दूसरे की तनिक-सी भूल में ही अपनी सहनशीलता खोकर भयानक बदला लेने का संकल्प करने लगता है और इस अमंगल-संकल्प के साथ ही अनिष्ट की आशंका आरम्भ हो जाती है। मन में उत्पन्न हुई इस वैर-भावना से सामने वाले का अमंगल तो उसके प्रारब्ध में होने पर ही होता है, पर अपना अनिष्ट अवश्य होता है। रात-दिन द्वेष की अग्नि में हृदय जला करता है, सारी शान्ति समाप्त हो जाती है और येन-केन-प्रकारेण अपना अनिष्ट करके भी विपक्षी का अमंगल कर डालने को मन व्यग्र हो उठता है। इस अमंगल भावना में ही बड़े-बड़े राष्ट्र और जातियाँ समाप्त हो जाती हैं।

इस प्रतिशोध के स्थान पर जब मन में सहिष्णुता आ जाती है, तब क्रोध, वैर, द्वेष, प्रतिहिंसा आदि दुर्गुणों के सूखे रेगिस्तान में भी मंगलमय स्नेह की एक अमृतधारा फूट पड़ती है। शांति का साम्राज्य छा जाता है और सर्वत्र सुख-ही-सुख आ पहुँचता है।

स्वयं भगवान विष्णु का जगत के इतिहास में क्षमा और सहिष्णुता के लिये बड़ा ही ऊँचा स्थान है। एक बार महर्षि भृगु शिवलोक, ब्रह्मलोक आदि से घूमते-घूमते और बड़े-बड़े देवताओं के क्रोध का परीक्षण करते-करते विष्णुलोक में पहुँचे। उस समय भगवान विष्णु लक्ष्मी जी की गोद में मस्तक रखकर लेटे हुए थे। भृगु जी ने पहुँचते ही उनके वक्षःस्थल पर खूब जोर से एक लात मार दी। लात लगते ही विष्णु भगवान उठकर बैठ गये और महर्षि के चरण अपने करकमलों में लेकर सहलाने लगे। सहलाते हुए बड़ी नम्रता से बोले- ‘नाथ! मेरा वक्षःस्थल तो बड़ा कठोर है और आपके चरण अत्यन्त सुकोमल हैं, कहीं चोट तो नहीं लग गयी? आप मुझे क्षमा कर दें, आज से मैं सदा के लिये आपका चरण-चिन्ह अपने वक्षःस्थल पर आभूषण की भाँति सुसज्जित रखूँगा।’ भगवान के वक्षःस्थल पर नित्य विराजित इस चिन्ह का नाम ही ‘भृगुलता’ है।

भृगु तो उनकी क्षमाशीलता की परीक्षा करने आये थे, पर भगवान विष्णु का यह व्यवहार देखकर वे आश्चर्यचकित हो गये और गद्गद् होकर भगवान के चरणों में लोटकर प्रार्थना करने लगे- ‘हे नाथ! आप चाहते तो मुझे कड़े-से-कड़ा दण्ड दे सकते थे। उसके स्थान पर आपने कैसा विलक्षण व्यवहार किया। धन्य है आपकी यह महानता, यह क्षमा और सहिष्णुता का उच्च आदर्श’। इस पर भगवान विष्णु ने भृगुजी के चरण पकड़कर उनके हृदय पर ही क्या, सम्पूर्ण विश्व में एक ऐसी अमिट छाप छोड़ दी, जो सहिष्णुता को सदा-सर्वदा बहुत ऊँचा स्थान देती रहेगी तथा समभाव में सदा स्थित रहने की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी।

भारतवर्ष तो स्वयं में सहिष्णुता की एक परिभाषा है।

निरहंकारिता और दीनता का संगम है 'विनम्रता' Date :- 01-Jan-2016

विनम्रता एक सहज मानवीय वृत्ति है। यह एक ऐसा गुण है, जो न केवल मनुष्य की शारीरिक सुन्दरता के अभाव को सम्पूर्णता प्रदान करता है, वरन् उसके व्यक्तित्व को निखारकर नई ऊँचाइयों पर आरूढ़ कर देता है। वस्तुतः विनम्रता और महानता एक-दूसरे के पर्याय हैं। एक महान व्यक्ति के चरित्र की सबसे प्रथम विशेषता उसकी विनम्रता होती है।

विनम्रता एक विलक्षण मानवीय मूल्य है, जो मनुष्य को देवदूत बनाने की अद्भुत क्षमता रखती है। महान व्यक्ति अनिवार्यतः विनम्र होता है। ऐसा सम्भव ही नहीं है कि कोई व्यक्ति विनम्र भी हो और गुणविहीन भी। विनम्रता एक ऐसा चमत्कारिक गुण है, जो व्यक्ति की कुरूपता को ढक देता है। महान चिन्तक और ‘मेघदूत’ तथा ‘शाकुन्तलम्’ जैसे कालजयी ग्रंथों के रचयिता संत कालिदास रूपवान नहीं थे, लेकिन अपनी अद्भुत विद्वत्ता और विनम्रता के गुण के कारण उन्होंने राजा विक्रमादित्य का दिल जीत लिया और वे सम्राट के सबसे अधिक प्रिय और विश्वस्त सभासद् होने का गौरव प्राप्त करने में सफल हुए थे।

विनम्रता जिन्दादिली का नाम है और अकड़ना मुर्दे की पहचान। कहा भी है, झुकता वही है, जिसमें जान है। जो केवल अकड़ना जानता है, प्रकृति उसे उखाड़ फेंकती है। विनम्रता से हम बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं, जबकि कठोरता से हम खोने के अतिरिक्त कुछ नहीं पा सकते।

विनम्रता जीवनशैली के लचीलेपन का ही दूसरा नाम है। यही लचीलापन हमें दूसरों के प्रति उदार और शिष्ट बनाता है। विनम्रता दूसरों के दिलों को चुरा लेने की कला और आत्मविश्वास की पराकष्ठा है। विनम्रता हमारा स्वयं से परिचय कराती है, हमें आत्म-मूल्यांकन का अवसर प्रदान करती है।

हमारी विनयशीलता विपरीत अवसरों पर अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों में अपनी कसौटी पर खरी उतरती है। अपने प्रतिद्वन्द्वी की सफलता और अपनी विफलता पर असहज स्थिति को सहज रूप से लेने का गुण हमें विनम्रता से ही प्राप्त होता है। यदि हम स्वयं पराजित होकर विजेता को सच्चे मन से बधाई दे रहे हैं तो यह सचमुच हमारी विनम्रता की ऊँचाई ही मानी जायेगी। विनम्रता हमें सहज और न्यायसंगत होना भी सिखाती है। व्यक्ति का कद बढ़ने के साथ-साथ उसकी विनयशीलता का बढ़ना एक स्वस्थ वृत्ति का द्योतक है। ऐसा न हो कि सफलता व्यक्ति को दम्भी और अहंकारी बनाकर छोड़ दे। यदि दुर्भाग्यवश ऐसा हुआ तो वह सफलता को ही लील जायेगी और व्यक्ति बौना होकर रह जाएगा। विनम्रता एक ऐसा विलक्षण गुण है, जिसके रहते अन्य सारे मानवीय मूल्य स्वतः मुखरित होते जाते हैं।

विनम्रता का अर्थ झुकना नहीं है, अपितु यह धैर्य और संतोष का संतुलन है। ऐसा व्यक्ति अहंकार विहीन होता है। जिस व्यक्ति को अहंकार नहीं होता, वह अवश्य ही जीवन में उन्नति करता है क्योंकि अहंकार ही मनुष्य को डुबोता है। विनम्र व्यक्ति हमेशा लाभ में रहता है और सर्वत्र सम्मान पाता है। विनम्र व्यक्ति के सभी मित्र होते हैं। वास्तव में, विनम्र व्यक्ति समाज और राष्ट्र की एक धरोहर होता है।

विनम्र व्यक्ति स्वस्थ व दीर्घायु होता है, क्योंकि वह बात-बात पर अपना धीरज नहीं खोता तथा वह किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता, इससे उसका मानसिक संतुलन बना रहता है। विनम्रता मनुष्य का सनातन एवं वैदिक गुण है।

गाय की रक्षा हेतु मधुसूदन नामजप करें Date :- 01-Dec-2015

इस समय पृथ्वी पर सबसे ज्यादा कुठाराघात गो-वंश पर हो रहा है। गायों को विभिन्न तरीकों से सताया जा रहा है। गो-रक्षकों को प्रताडि़त किया जा रहा है। हिन्दुओं को चिड़ाने के लिए सार्वजनिक तौर पर गो-माँस को बाँटकर खाया जा रहा है। हमें इन हालातों से विचलित होकर घुटने नहीं टेकने हैं और स्वयं ही गाय की रक्षा हेतु सामूहिक प्रयास करने हैं। हमारे धर्म-ग्रंथों में गाय का स्वरूप भगवान से भी ऊपर माना गया है, तभी गाय के अन्दर सभी देवी-देवता निवास करते हैं। यह हमारी पुरकाल से धार्मिक मान्यता, आस्था और वास्तविकता रही है कि जब-जब पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ते हैं, गाय और सन्तजनों को पीडि़त किया गया है, तब-तब प्रभु विभिन्न शरीर धारण करके अवतार लेते हैं और आततायियों का विनाश करके फिर से धर्म की स्थापना करते हैं।

गाय की रक्षा हेतु हम अपने स्तर पर कुछ अति महत्वपूर्ण कदम उठा सकते हैं, जिससे हमें दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। अब हमें गाय की रक्षा के लिए प्रार्थना सरकार से नहीं, बल्कि सबसे बड़ी सरकार (नारायण श्रीकृष्ण) से करनी है। महान संत सीतारामदास ओंकारनाथ जी ने सभी हिन्दुओं से अपील की थी कि गाय की रक्षार्थ प्रतिदिन 1000 बार ‘मधुसूदन’ का नाम जप करें। इस कार्य में मात्र 15-16 मिनट लगते हैं। इसका अनुसरण करते हुए हमें आज ही संकल्प लेना है कि राष्ट्रहित और समाजहित में गाय को बचाने के लिए प्रतिदिन 1000 बार ‘मधुसूदन’ नामजप करना है। साथ ही, प्रतिमाह कम-से-कम 5 अन्य लोगों को भी ‘मधुसूदन’ नाम जप का संकल्प कराना है। यदि हमने यह कार्य कर लिया तो वो दिन दूर नहीं, जब भारत के बच्चे-बच्चे के मुख से ‘मधुसूदन-मधुसूदन’ का उच्चारण हो रहा होगा, अगर इतना व्यापक नामजप होगा तो वो दिन भी दूर नहीं, जब भगवान को गो-रक्षार्थ अवतार लेना पड़े। हमें तो बस ‘मधुसूदन’ नामजप की क्रांति लानी है। प्रभु की दया से यह एक ऐसा सात्विक कार्य है कि इस नामजप से अपना भी कल्याण होगा और गाय का भी कल्याण होगा। गाय बचेगी तो धर्म बचेगा, धर्म बचेगा तो देश बचेगा, देश बचेगा तो हम बचेंगे।

यह तो हम सब देख रहे हैं कि हिन्दुओं से सम्बन्धित किसी भी प्रकार का कार्य यदि कोई सरकार करती है तो वह साम्प्रदायिक कहलाती है। हालात यहाँ तक बिगड़ चुके हैं कि गो-माँस खाने की मनाही या गो-वध रोकने के बयानों पर धर्मनिरपेक्षता आड़े आ रही है, जबकि अन्य धर्मों में भी गाय की गुणवत्ता को देखते हुए गोवध को अनुचित ठहराया गया है। आज स्थिति यहाँ तक पहुँच चुकी है कि गो-माँस भक्षण धर्मनिरपेक्षता है, इसका विरोध करना साम्प्रदायिकता है। यह सब हिन्दुओं के अलग-अलग बँट जाने के कारण हो रहा है, अगर देश का समस्त हिन्दू एकजुट हो जाए तो किसी की भी हिम्मत नहीं हो सकती कि वो गाय की ओर आँख उठाकर भी देखे।

आईये, हम आज ही दृढ़ निश्चय कर लें कि राष्ट्रीय एकता, अखण्डता और गाय की रक्षा के लिये प्रतिदिन 1000 बार ‘मधुसूदन’ नाम का जप अवश्य करेंगे।

राम राज्य Date :- 01-Nov-2015

श्रीरामजी के राज्य पर प्रतिष्ठित होने पर तीनों लोक हर्षित हो गए, उनके सारे शोक जाते रहे। कोई किसी से वैर नहीं करता। श्रीराम जी के प्रताप से सबकी विषमता नष्ट हो गई। सब लोग अपने धर्म में तत्पर हुए सदा वेद-मार्ग पर चलते हैं। उन्हें न किसी बात का भय है और न कोई रोग ही सताता है। राम-राज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते थे। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं। मर्यादा में रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं। स्वप्न में भी कहीं पाप नहीं है।

श्रीराम जी के राज्य में किसी की छोटी अवस्था में मृत्यु नहीं होती, न किसी को कोई पीड़ा होती है। न कोई दरिद्र है, न दुःखी है और न दीन ही है। ऐसे राज्य में सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं, पुण्यात्मा हैं और गुणवान हैं। समूची प्रजा दूसरों के गुणों का आदर करने वाली है तथा दूसरों के किए गए उपकारों को मानने वाली है। कपट-चतुराई किसी में भी नहीं है। राम राज्य में सभी नर-नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और सभी ब्राह्मणों के चरणों के सेवक हैं। सभी पुरुष एकपत्नी-व्रती हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्म से पति का हित करने वाली हैं। राम राज्य में कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिए ‘जीतो’ शब्द केवल मन के जीतने के लिए ही कहा जाता है। इसी प्रकार, ‘दण्ड’ शब्द केवल संन्यासियों के हाथ में रहने वाले दण्ड के लिए ही रह गया है। वास्तव में, रामराज्य में सभी कुछ अनुकूल रहने के कारण भेदनीति की आवश्यकता ही नहीं रह गई। ‘भेद’ शब्द केवल सुर-ताल के भेद के लिए ही कार्यों में आता है।

यह रामराज्य का ही प्रताप है कि हाथी और सिंह वैर भुलाकर एक-साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभी ने स्वाभाविक वैर भुलाकर आपस में प्रेम बढ़ा लिया है। पक्षी मीठी बोली बोलते हैं तथा भाँति-भाँति के पशुओं के समूह-वन में निर्भय विचरते और आनन्द करते हैं। शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चलता रहता है। भौरें पुष्पों का रस लेकर चलते हुए गुँजार करते जाते हैं। वृक्ष सदा फूलते-फलते हैं। बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु टपका देते हैं। गौएँ मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेती से भरी रहती है। दूसरे अर्थ में त्रेता में सत्ययुग की स्थिति हो गई।

रामराज्य में, पर्वतों ने स्वयं अनेक प्रकार की मणियों की खानें प्रकट कर दीं। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल से लबालब भर गईं। समुद्र अपनी मर्यादा में रहते हैं। वे लहरों के द्वारा किनारों पर रतन डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य पा जाते हैं। सब तालाब कमलों से परिपूर्ण हैं। रामचन्द्र जी के राज्य में चन्द्रमा अपनी अमृतमयी किरणों से पृथ्वी को पूर्ण कर देते हैं। सूर्य आशीर्वाद रूप में उतना ही तपते हैं, जितने की आवश्यकता होती है तथा मेघ माँगने से जब जहाँ जितना चाहिये, उतना ही जल देते हैं। अर्थात् जहाँ सभी कुछ हितकारक हो, अनुकूल हो, कल्याणकारी हो, वहीं रामराज्य स्थापित हो पाता है यानि प्रतिकूलता के लिए कोई स्थान ही नहीं है। अतः हम सब भी आपसी वैर-भाव को भुलाकर एकजुट होकर एक-दूसरे की भावना का आदर करके, समाज में सामंजस्य स्थापित करें, जिससे हमारे यहाँ भी रामराज्य आ जाए।

स्वाध्याय - जीवन के विकास की अनिवार्य आवश्यकता Date :- 06-Oct-2015

स्वाध्याय शब्द की उत्पत्ति दो शब्दों- स्व तथा अध्याय के योग से हुई है। ‘स्व’ का अर्थ होता है स्वयं और ‘अध्याय’ का अर्थ होता है- अध्ययन करना। इस प्रकार स्वाध्याय शब्द का अर्थ हुआ स्वयं का अध्ययन करना अर्थात् स्वयं को पढ़ना, स्वयं अपने ज्ञान की अभिवृद्धि करना तथा स्वयं की समस्याओं को समझना और उनका निराकरण करना। ज्ञान की जिज्ञासा का समाधान करने वाले ग्रंथों का अध्ययन करना तथा उन पर सोचना और मनन करना ही स्वाध्याय है। अन्य शब्दों में स्वाध्याय वह है, जो हमारे जीवन की समस्याओं और आन्तरिक उलझनों के समाधान पर प्रकाश डालता है तथा मानवता को उज्ज्वल करने वाली सत्प्रवृत्तियों को अपनाने की हमें प्रेरणा देता है।

मनुष्य की प्रगति का प्रमुख आधार स्वाध्याय ही है, जिसकी शास्त्रों में बड़ी महिमा गायी गई है। इसे मनुष्य के धर्म-कत्र्तव्यों में सम्मिलित किया गया है। स्वाध्याय में प्रमाद न करो। उपासना आदि का तो समय निश्चित होता है, किंतु स्वाध्याय का कोई समय निश्चित नहीं होता। स्वाध्याय हम रात्रि अथवा दिन में- कभी भी कर सकते हैं। पुण्यार्जन की दृष्टि से स्वाध्याय की महत्ता पर शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है- ‘धनधान्य से सम्पन्न धरती का दान करने से दाता को जितना पुण्य प्राप्त होता है, उससे तीन गुना अधिक पुण्य व्यक्ति को नियमित रूप से स्वाध्याय करने से मिलता है।’

स्वाध्याय चरित्रनिर्माण में भी सहायक है। यदि हम समुन्नत होना चाहते हैं तथा अपने जीवन को चरित्र, शुद्ध और निर्मल बनाना चाहते हैं तो हमें आलस्य और प्रमाद का परित्याग कर नित्य सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना चाहिये।

स्वाध्याय से हमारी चिन्ताएँ दूर होती हैं, हमारी शंकाओं का समाधान होता है, मन में सद्भाव और शुभ संकल्प उत्पन्न होते हैं तथा हमारी आत्मा को शांति मिलती है। स्वाध्याय मानव-जीवन को सुखी और समुन्नत बनाता है। स्वाध्याय से हमें जीवन को आदर्श बनाने की प्रेरणा मिलती है। स्वाध्याय हमें प्रभु प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। अतः हम कह सकते हैं कि स्वाध्याय आत्मा का भोजन, स्वर्ग का द्वार तथा मुक्ति का सोपान है। संसार में जितने महापुरुष और संत-महात्मा हुए हैं, सभी स्वाध्यायशील थे।

प्रतिदिन सद्ग्रंन्थों का अध्ययन करने से बुद्धि तीव्र होती है, विवेक बढ़ता है और अन्तःकरण की शुद्धि होती है। अध्ययनशील व्यक्ति कुसंग से उत्पन्न होने वाली विकृतियों से बच जाता है। निरन्तर अध्ययन करते रहने से मनुष्य का ज्ञान बढ़ता है तथा वाणी सफल, सार्थक और प्रभावशाली बनती है। अध्ययनशील व्यक्ति का ही कथन प्रामाणिक तथा तथ्यपूर्ण माना जाता है। संसार ज्ञान की जन्मभूमि है। इसलिये जो व्यक्ति अध्ययनशील होता है, वह नित्य नये ज्ञान से अवगत होता रहता है। अध्ययनशील व्यक्ति एक जागरूक नागरिक की भाँति जीवन जीने का वास्तविक सुख प्राप्त कर लेता है।

स्वाध्याय से हम शनैः-शनैः जीवन की समाधि-अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं। कहा जाता है कि एक बार लोकमान्य तिलक का आॅपरेशन होने वाला था। जब डाॅक्टरों ने उन्हें क्लोरोफार्म सूँघाकर बेहोश करना चाहा तो उन्होंने डाॅक्टरों को यह कहते हुए मना कर दिया कि आप मुझे गीता की एक पुस्तक ला दो। मैं उसे पढ़ता रहूँगा और आप लोग आॅपरेशन कर लेना। पुस्तक लाई गई। लोकमान्य तिलक उस पुस्तक में इतने तल्लीन हो गये कि डाॅक्टरों ने पूरा-का-पूरा आॅपरेशन कर डाला और लोकमान्य तिलक जरा भी विचलित नहीं हुए। यह था स्वाध्याय का चमत्कार।

क्षमावान ही महान होता है Date :- 12-Sep-2015

क्षमा ही धर्म है, क्षमा ही यज्ञ है, क्षमा ही वेद है और क्षमा ही शास्त्र है। क्षमा के स्वरूप को जानने वाला सबको क्षमा ही करता है। क्षमा ही ब्रह्म, भूत, भविष्य, तप, शौच, सत्य सब कुछ है। इस चराचर जगत को भी क्षमा ने ही धारण कर रखा है। तपस्वियों को, ज्ञानियों को, कर्मियों को जो गति मिलती है, उससे भी उत्तम गति क्षमावान पुरुषों को मिलती है। जो सब प्रकार से क्षमा को धारण किए होते हैं, उनको ब्रह्म की प्राप्ति होती है।

क्षमा एक सात्त्विक प्रवृत्ति है। बदला लेने की भावना या क्षमा न करना एक तामसिक यानि राक्षसी प्रवृत्ति है। भगवान अपने भक्त को प्रायश्चित्त करने और माफी माँगने पर तुरंत माफ कर देते हैं, पर राक्षस हमेशा बदले की भावना से ग्रसित रहते हैं।

क्षमा धर्म का मूल तत्व है। क्षमा वस्तुतः एक मनोदशा अथवा चित्त की एक प्रकार की वृत्ति है, जिससे मनुष्य दूसरों द्वारा पहुँचाए गए भौतिक अथवा मानसिक क्लेश को चुपचाप स्वीकार कर लेता है और उसे दण्ड देने की इच्छा नहीं करता। इस प्रकार मन में प्रतिशोध, प्रतिवैर, अस्वीकार्यता, अशांति आदि नकारात्मक भावों का अभाव ही क्षमा है। क्षमा मन की एक सकारात्मक वृत्ति है। मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बतलाए गए हैं। उनमें धैर्य के बाद क्षमा का ही महत्वपूर्ण स्थान है। जैन और हिंदू मत में ही नहीं, अन्य सभी मतों में भी क्षमा का अत्यंत महत्व है। करुणावतार गौतम बुद्ध तो क्षमा के पर्याय थे। इस्लाम में भी क्षमा का महत्वपूर्ण स्थान है।

आज हिंसा, नफरत, अपराध और बदले की भावना बहुत बढ़ गई है। ऐसे में क्षमा का महत्व भी बढ़ गया है। बदले की भावना आदमी को अन्दर से खोखला कर देती है। यह शरीर, मस्तिष्क और आत्मा तक को दूषित कर देती है।

क्षमा एक उपचार प्रक्रिया है। यदि हम किसी को क्षमा नहीं कर सकते, तो इसका अर्थ है कि हम क्रोध, क्षोभ, अशांति, अस्वीकृति, प्रतिकार आदि नकारात्मक भावों का संचय कर पोषण अपने अंदर कर रहे हैं। इस अवस्था में हमारी सारी ऊर्जा अथवा जीवनी शक्ति इन्हीं भावों के पोषण और स्थायित्व में व्यर्थ चली जाती है। हम अपनी ऊर्जा का उपयोग सकारात्मक भावों का निर्माण करने की बजाय उसे नकारात्मकता में परिवर्तित करने के लिए बाध्य हो जाते हैं। ऊर्जा का ये असंतुलन ही सभी व्याधियों के लिए उत्तरदायी है। क्षमा द्वारा इस प्रक्रिया को बदल कर ही हम स्वस्थ-संतुलित जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

वास्तविक रूपांतरण क्षमा द्वारा ही संभव है। जहाँ क्षमा है वहाँ शत्रुता अथवा द्वेष का क्या काम। क्षमा दुश्मनी का विनाश कर दोस्ती का विस्तार करती है, इसीलिए जैन धर्म में इसे एक पर्व के रूप में मनाया जाता है। गौतम बुद्ध की क्षमा ने अंगुलिमाल जैसे दुर्दांत डाकू को रूपांतरित कर धर्म के मार्ग पर ला दिया। माता-पिता और गुरू अपने बच्चों की असंख्य गलतियों को क्षमा कर उन्हें सुधार के लिए अवसर प्रदान करते हैं, जो उनके रूपांतरण में ही सहायक होता है। गलती होना स्वाभाविक है। गलतियों से सीखकर ही आदमी आगे बढ़ता है। अतः गलती होने पर क्षमा करना जरूरी है। गलती करने वाले को ही नहीं, अपराधी को भी क्षमा करके श्रेष्ठ मार्ग पर लाया जा सकता है। क्षमा ही वह सेतु है जो गलतियों को परिमार्जन कर वास्तविक रूपांतरण में सहायक होता है। जो लोग न क्षमा माँगना जानते हैं और न क्षमा करना, वे अपने लिए इस धरती पर नरक की सृष्टि करते हैं।

क्षमा बड़न को चाहत है, छोटन का उत्पात।

विष्णु का क्या घटि गयो, जो भृगु मारि लात।।

मनुष्य की क्षमाशीलता के कारण ही मनुष्य जाति का अखंड अस्तित्व स्थिर है। 

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

 
प्रकृति से प्रेम ही पर्यावरण की सुरक्षा का मूल मंत्र है Date :- 01-Aug-2015

ब्रह्म सृष्टि का रचयिता है और उसी से पंचभूतत्व उत्पन्न हुए। इसी ब्रह्म से आकाश उत्पन्न हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल तथा जल से पृथ्वी। इन तत्त्वों की सूक्ष्म मात्राओं से सूक्ष्म शरीर और सूक्ष्म शरीर से स्थूल शरीर की उत्पत्ति हुई। मानव-शरीर पंचतत्त्वों- आकाश, वायु, तेज, जल एवं पृथ्वी से बना है और अन्त में इन्हीं में विलीन हो जाता है।

ये पंचतत्त्व पाँच ज्ञानेन्द्रियों से संबंधित हैं। नासिका पृथ्वी से, क्योंकि पृथ्वी का स्वयं का गुण ‘गन्ध’ है, जीभ जल से, क्योंकि जल का स्वयं का गुण ‘रस’ है, आँखें तेज या अग्नि से, क्योंकि अग्नि का अपना गुण ‘रूप’ है, त्वचा वायु से, क्योंकि वायु का अपना गुण ‘स्पर्श’ है और कान आकाश से सम्बन्धित है क्योंकि आकाश का स्वयं का गुण ‘शब्द’ है।

ये पाँचों तत्त्व हमारे पर्यावरण के पर्याय एवं प्रतीक हैं। पर्यावरण शुद्ध रखने का तात्पर्य है- इन्हीं पंचतत्त्वों को शुद्ध एवं नैसर्गिक अवस्था में रखना। ये पाँचों प्राकृतिक तत्त्व जीवनदायक हैं। ये जीवन की वृद्धि, सुरक्षा, उपचार एवं पुनरूत्थान करते हैं। अगर हम इनको ठीक रखेंगे तो ये बदले में हमें ऊर्जा, शक्ति एवं आरोग्यता देंगे। स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन के लिये इन तत्त्वों को स्वच्छ, पवित्र, प्रदूषण मुक्त होना एवं उनका समुचित संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। यदि हम इन सबको या एक को भी प्रदूषित, क्षीण या नष्ट करेंगे तो उसका कुप्रभाव हमारे शरीर पर पड़ेगा। अतः प्रकृति से प्रेम ही पर्यावरण की सुरक्षा का मूल मंत्र है। प्रकृति का अनियंत्रित दोहन वातावरण में असंतुलन उत्पन्न कर विनाश का तथा प्राकृतिक आपदाओं का हेतु बन जाता है।

पंचतत्त्वों का महत्त्व साधारण जन तक पहुँचाने के लिये और इनका समुचित आदर करने हेतु हमारे मनीषियों ने इनको देवताओं का रूप मानने और उनकी पूजा करने का विधान भी बनाया है। इसी भावना से हिन्दू-धर्म में कई विधि-विधान हैं, जिनको करने से वातावरण एवं पर्यावरण शुद्ध एवं स्वच्छ रखा जा सकता है। हवन, यज्ञ, पूजा आदि से उसका वास्तविक लाभ- आध्यात्मिक लाभ तो होता ही है, पर्यावरण भी स्वतः शुद्ध रहता है।

प्रभु ने कृपा कर हमें अपार प्राकृतिक सम्पदा दी है। वह प्रत्येक प्राणिमात्र के लिये है। मानव, पशु और वृक्षों का जीवन एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। परंतु मनुष्य स्वार्थवश दूसरों का अर्थात् पशु एवं वृक्षों का जीवन नष्ट करने पर तुला है। तथाकथित आर्थिक विकास के लिये किया जाने वाली औद्योगिकरण प्राकृतिक पर्यावरण-संतुलन को संकटग्रस्त कर रहा है। इस कारण मानव-समाज को वायु एवं जल-प्रदूषण, घटते हुए वन्य पशु, विकिरण समस्या, घटती हुई वन-सम्पदा और विषाक्त फल-सब्जियों से जूझना पड़ रहा है। फलतः मनुष्यों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है।

पाँचों मुख्य तत्त्व प्राकृतिक देन हैं, जब प्रकृति प्रदूषण का शिकार हो गई है, तो मानव भी प्रदूषित होगा ही, इसमें कोई संदेह नहीं है। तभी तो छोटी आयु में ही बच्चों में असाध्य रोग दिखने को मिल रहे हैं। हम प्रकृति को, आधुनिकता को पोषित करने के कारण, आघात लगा रहे हैं, यही आघात मानव में जन्मजात चिड़चिड़ापन, अवसाद, रक्तचाप, हृदयाघात, मधुमेह, तनाव, असंतोष, क्रोध, गुर्दे, आदि भयानक बीमारियाँ के रूप में उभर कर सामने आ रहा है। उपरोक्त बीमारियाँ 50 वर्ष के उपरांत सुनने में आती थीं, परन्तु अब बच्चे भी इन बीमारियों से ग्रस्त देखे जा सकते हैं। अगर प्रदूषण इसी प्रकार लगातार बढ़ता रहा तो जन्मजात बीमारियों की स्थिति अत्यन्त भयावह हो जाएगी।

एक और चिन्ता का विषय है- जंक फूड। बचपन में ही बच्चे ‘जंक-फूड’ फैशन में खाने लगते हैं, जो अपने में सभी बीमारियों की जड़ है। यही जंक-फूड विभिन्न प्रकार के कैंसर का कारण बन रहा है। पश्चिमी अंधानुकरण के कारण बच्चे मूल सांस्कृतिक मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं। इसी कारण देश रोगी हो रहा है।

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

योग दिवस - भारत के विश्व-गुरु बनने की शुरूआत है Date :- 03-Jul-2015

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ का विधिवत उद्घाटन करते हुए कहा कि निरंतर अभ्यास से योग जीवन के लिए औषधि बन जाता है। योग को आत्मसात करने के बाद ही व्यक्ति को इसका असली आनन्द मिलने लगता है।

प्रधानमंत्री मोदी जी ने कहा कि ‘पूरब से पश्चिम तक सूरज की पहली किरण जहाँ-जहाँ पड़ेगी और 24 घंटे के बाद सूरज की किरण जहाँ समाप्त होगी, ऐसा कोई स्थान नहीं होगा, जहाँ योग नहीं हो रहा हो और पहली बार दुनिया को यह स्वीकार करना होगा कि यह सूरज योग अभ्यासी लोगों के लिए है और योग अभ्यास का यह सूरज ढलता नहीं है।’ मोदी जी ने कहा कि हम केवल इसे एक दिवस के रूप में नहीं बना रहे हैं, बल्कि हम मानव के मन को, शांति के नये युग की ओर उन्मुख बना रहे हैं। यह कार्यक्रम मानव कल्याण का है और शरीर, मन को संतुलित करने का माध्यम और मानवता, प्रेम, शांति, एकता, सद्भाव के भाव को जीवन में उतारने का है। योग को हमें अब अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लेना चाहिए। मोदी जी ने कहा- योग जीवन को जी भरकर जीने की जड़ी-बूटी है।

राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने इस अवसर पर कहा कि योग में मानवता के कल्याण और आधुनिक शैली से जुड़ी व्याधियों के लिए आश्चर्यजनक उपचारात्मक और निरोधक शक्तियाँ हैं। उन्होंने कहा कि भारत योग का गृह है, जहाँ सदियों से योग किया जाता रहा है। राष्ट्रपति जी ने कहा कि योग कला और विज्ञान दोनों है।

योग दिवस विश्व के 177 देशों में मनाया गया, जिसमें 47 मुसलमान देश भी शामिल हैं। भारत में मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड आदि अनेक इस्लामी संगठन मुसलमानों में यह प्रचार कर रहे हैं कि वे योग के कार्यक्रम से दूर रहें, क्योंकि यह इस्लाम विरोधी है। सरकार ने मुसलमानों से आग्रह किया है कि वह योग को मजहब से न जोड़ें। कुछ मुसलमान नेताओं द्वारा सूर्य नमस्कार का भी विरोध किया जा रहा है। इसलिए सरकार ने सूर्य नमस्कार से संबंधित आसनों को कार्यक्रम से बाहर निकाल दिया। क्या यह मुस्लिम तुष्टीकरण नहीं है?

भारतीय परम्पराओं में 84 सिद्धों और 64 योगिनियों का उल्लेख मिलता है। योग विद्या को घर-घर पहुँचाने में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। योग विद्या भारतीय संस्कृति का एक मुख्य अंग है। भगवान शिव को योग विद्या और तंत्र विद्या का जनक माना जाता है। वेदों में भी योग विद्या का उल्लेख है। दो हजार वर्ष पूर्व महर्षि पतंजलि ने जो योग सूत्र लिखा था, उसके अनुसार योग एक व्यापक विद्या है, जिसके 52 अंग हैं। इनमें ध्यान योग, क्रिया योग, भक्ति योग, ज्ञान योग, जप योग, कर्मयोग, राजयोग, अष्टांग योग आदि मुख्य हैं।

योग सिर्फ एक व्यायाम नहीं है, यह एक सांस्कृतिक आयाम है। यह जीवन को रूपांतरित कर देता है। आधुनिक जीवनशैली से हमने जितनी खराबियाँ बटोरी हैं, यह उनको दूर करता है और हमें सुख व प्रसन्नता देने वाला है। योग आपके शरीर की प्रकृति को सुधारता है। योग और आयुर्वेद का संबंध अटूट है। जब मनुष्य का चंचल मन भौतिकता और विलासिता की ओर जाना चाहता है, तो उस नाजुक घड़ी में केवल योग द्वारा ही हम अपने मन को नियंत्रित कर सकते हैं।

योग किसी भी मत और संप्रदाय से नहीं जुड़ा है। योग प्रेम, अहिंसा, करूणा और सबको साथ लेकर चलने की बात करता है। योग मत, नस्ल, जाति, वर्ण, क्षेत्र या भाषा के आधार पर जन्मे भेदभाव से परे है, इसलिए इसमें पूरी दुनिया को एक परिवार के तौर पर बाँधने की क्षमता है।

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

साहस और सूझबूझ Date :- 01-Jun-2015

बहुत समय पहले की बात है। किसी गाँव में एक किसान रहता था, उस किसान की एक बहुत ही सुन्दर बेटी थी। दुर्भाग्यवश गाँव के जमींदार से उसने बहुत सारा धन उधार लिया हुआ था। जमींदार बूढ़ा और कुरूप था। किसान की सुंदर बेटी को देखकर उसने सोचा, क्यों न कर्जे के बदले किसान के सामने उसकी बेटी से विवाह का प्रस्ताव रखा जाये।

जमींदार किसान के पास गया और उसने कहा- तुम अपनी बेटी का विवाह मेरे साथ कर दो, बदले में मैं तुम्हारा सारा कर्ज माफ कर दूँगा। जमींदार की बात सुनकर किसान और किसान की बेटी के होश उड़ गए। तब जमींदार ने कहा- चलो गाँव की पंचायत के पास चलते हैं और जो निर्णय वे लेंगे, उसे हम दोनों को मानना होगा। वे पंचायत के पास गए और उन्हें सब कह सुनाया। उनकी बात सुनकर पंचायत ने थोड़ा सोच-विचार किया और कहा- ये मामला बड़ा उलझा हुआ है। अतः हम इसका फैसला किस्मत पर छोड़ते हैं।

जमींदार सामने पड़े सफेद और काले रोड़ों के ढेर से एक काला और एक सफेद रोड़ा उठाकर एक थैले में रख देगा, फिर लड़की बिना देखे, उस थैले से एक रोड़ा उठाएगी और उस आधार पर उसके पास तीन विकल्प होंगे-
1.    अगर वह काला रोड़ा उठाती है तो उसे जमींदार से शादी करनी पड़ेगी और उसके पिता का कर्ज माफ कर दिया जायेगा।
2.    अगर वह सफेद पत्थर उठाती है तो उसे जमींदार से शादी नहीं करनी पड़ेगी और उसके पिता का कर्ज भी माफ कर दिया जायेगा।
3.    अगर लड़की पत्थर उठाने से मना करती है तो उसके पिता को जेल भेज दिया जाएगा।

पंचायत के आदेशानुसार जमींदार झुका और उसने दो रोड़े उठा लिए। जब वह रोड़ा उठा रहा था तो तब तेज आँखों वाली किसान की बेटी ने देखा कि उस जमींदार ने दोनों काले रोड़े ही उठाये हैं और उन्हें थैले में डाल दिया है। लड़की इस स्थिति से घबराये बिना सोचने लगी कि वह क्या कर सकती है, उसे तीन रास्ते नजर आये-
1.    वह रोड़ा उठाने से मना कर दे और अपने पिता को जेल जाने दे।
2.    सबको बता दे कि जमींदार दोनों काले पत्थर उठाकर सबको धोखा दे रहा है।
3.    वह चुप रहकर काला पत्थर उठा ले और अपने पिता को कर्ज से बचाने के लिए जमींदार से शादी करके अपना जीवन बलिदान कर दे।

लड़की को लगा कि दूसरा तरीका सही है, पर तभी उसे एक और भी अच्छा उपाय सूझा। उसने थैले में अपना हाथ डाला और एक रोड़ा अपने हाथ में ले लिया और बिना रोड़े की तरफ देखे उसके हाथ से फिसलने का नाटक किया। उसका रोड़ा अब हजारों रोड़ों के ढेर में गिर चुका था और उनमें ही कहीं खो चुका था।

लड़की ने कहा- हे भगवान! मैं कितनी फूहड़ हूँ, लेकिन कोई बात नहीं, आप लोग थैले के अन्दर देख लीजिये कि कौन-से रंग का रोड़ा बचा है, तब आपको पता चला जाएगा कि मैंने कौन-सा उठाया था, जो मेरे हाथ से गिर गया।

थैले में बचा हुआ रोड़ा काला था। सब लोगों ने मान लिया कि लड़की ने सफेद पत्थर ही उठाया था। जमींदार के अन्दर इतना साहस नहीं था कि वो अपनी चोरी मान ले। लड़की ने अपनी सोच से असम्भव को सम्भव कर दिया।

मित्रों, हमारे जीवन में भी कई बार ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती हैं, जहाँ सब कुछ धुंधला दिखता है। हर रास्ता असफलता की ओर जाता महसूस होता है, पर ऐसे समय में यदि हम अपना धैर्य बनाए रखें और अपने विवेक से समझ-बूझकर कर समस्याओं के निवारण का प्रयास करें तो उस लड़की की तरह हम सब भी अपनी मुश्किलें दूर कर सकते हैं।

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

कर्मफल की कहानी Date :- 08-May-2015

एक सेशन जज थे, सुविज्ञ तथा कर्म के नियमों में अडिग आस्था रखने वाले थे। एक दिन प्रातःकाल वे धुँधलके नदी किनारे टहलते हुए लघुशंका के लिये घनी झाड़ी की ओट में बैठे ही थे कि इतने में एक आदमी दौड़ता हुआ आया। उसके पीछे कोई दूसरा आदमी आया और उसने पहले वाले आदमी की पीठ में छुरा भोंक दिया। वह गिर पड़ा और उसकी तत्काल मृत्यु हो गई। खूनी भाग गया। उसका चेहरा सेशन जज ने भलीभाँति पहचान लिया।

सेशन जज घर आये और इस घटना का उन्होंने किसी से उल्लेख नहीं किया, क्योंकि खून का मुकदमा अन्त में उन्हीं की अदालत में आना था। फिर पुलिस की छानबीन हुई। छः महीने में सम्पूर्ण जाँच पूरी हो गई। खून का मुकदमा दाखिल हुआ। जज साहब ने देखा कि जिस खूनी को उन्होंने स्वयं अपनी आँखों से खून करते देखा था, उसके बदले में किसी दूसरे व्यक्ति को आरोपी बनाकर प्रस्तुत किया गया है, पुलिस ने अकाट्य प्रमाण दिया और बनावटी आरोपी खूनी साबित हुआ। जज साहब जानते थे कि यह आदमी खूनी नहीं है, किंतु न्यायधीश को प्रमाणों के आधार पर फैसला करना होता है और अकाट्य प्रमाणों के कारण आरोपी को फाँसी की सजा भी देनी पड़ सकती है। जज साहब को लग रहा था कि असली खूनी बच जाएगा और किसी निर्दोष को फाँसी हो जायेगी। इसलिए खून की सजा का आदेश सुनाने से पहले सेशन जज ने उस बनावटी आरोपी को अपने चैम्बर में एकान्त में बुलाया।

बनावटी आरोपी रो पड़ा और कहने लगा कि मैं बिल्कुल निर्दोष हूँ, मैंने खून नहीं किया और बिना वजह मारा जा रहा हूँ, क्योंकि असली खूनी न मिलने की स्थिति में लगता है मेरे पहले के कर्मों के आधार पर मुझे पकड़कर मजबूत प्रमाण जुटा लिये गये हैं और कोर्ट की दृष्टि में कानून के अनुसार मैं खूनी साबित हो रहा हूँ।

सेशन जज ने कहा कि मैं जानता हूँ कि तुम खूनी नहीं हो, किंतु कानून प्रमाणों के आधार पर चलता है और सारे प्रमाण तुम्हारे विरुद्ध होने के कारण मैं तुम्हें कानूनन खूनी करार देकर फाँसी की सजा सुनाऊँगा तथापि मैं तुमसे एक सवाल पूछता हूँ, उसका तुम बिल्कुल सच्चा जवाब देना। अब मरते समय जरा भी झूठ मत बोलना। भूतकाल में तुमने कभी किसी का खून किया था? उसने रुँधे गले से ईश्वर को साक्षी मानकर सच-सच कह दिया कि भूतकाल में मैंने दो खून किये थे। उनका मुकदमा चला था, किंतु मैंने बहुत होशियार वकील से पैरवी कराई थी और खूब पैसे खर्च किये थे। इसलिए मैं दोनों मुकदमों में बिल्कुल निर्दोष छूट गया, किंतु इस मुकदमे में मैं वास्तव में निर्दोष होते हुए मारा जा रहा हूँ।

सेशन जज को जवाब मिल गया था कि ईश्वर के कर्म के नियमों में कहीं भी कमी या गलती नहीं है। पहले दो खून के समय इस आरोपी के पुण्य प्रबल थे, इसलिये उस खून का फल भोगने में विलम्ब हुआ और जब उसके जमा पुण्य समाप्त हो गये तो उसे पिछले कर्मों की सजा मिल रही है।

वास्तव में, भगवान के यहाँ देर तो है, पर अंधेरा नहीं है। कोई भी किसी का बुरा करके बच नहीं सकता। अतः हमें अपने कर्मफल की शुद्धता पर लगातार ध्यान रखना चाहिए।

दुःख में सिमरन सब करें, सुख में करे ना कोय।
जो सुख में सिमरन करें, तो दुःख काहे को होय।।

जीवन में यदि आप सुख अनुभव कर रहे हैं तो समझो आपके पुण्य क्षीण हो रहे हैं, क्योंकि पुण्यों का बैंक-बैलेंस सुखों के आने पर खर्च होने लगता है। इसी प्रकार दुःखों की अनुभूति होने पर समझना चाहिए कि पाप कम हो रहे हैं। अतः यह आवश्यक है कि हमें सुख के समय अधिक पुण्य-कर्म करने चाहिएँ, जिससे पुण्यों का बैंक-बैलेंस कम ना हो।

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

जीवन में सफलता के सूत्र Date :- 01-Apr-2015

बुराई के अवसर दिन में सौ बार आते हैं। पतन और प्रलोभनों की सर्वत्र भरमार है। माया का गुरुत्वाकर्षण हर किसी को हर घड़ी गिरने के लिए बुलाता और घसीटता है। अच्छाई का अवसर तो मनुष्य को स्वयं निर्मित करना पड़ता है। वह बिना बुलाए किसी के पास नहीं आता है। आदर्शों के प्रति निष्ठा और अपने भरोसे पर हिम्मत जिस क्षण उठ पड़े, समझना चाहिए कि ऊँचे उठने और आगे बढ़ने की शुभ घड़ी आ पहुँची। इस प्रसंग में एक दृष्टान्त है-

एक भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा था। स्वामी विवेकानंद चिन्तक मनोवृत्ति होने की वजह से हर कार्य के प्रत्येक घटना की समीक्षा गहराई से करते थे। जैसे ही उस मंदिर के लिए चल रहे निर्माण कार्य पर उनकी दृष्टि पड़ी, उन्होंने उसके प्रांगण में प्रवेश किया। देखा कि सैकड़ों मजदूर, कारीगर, मिस्त्री, बढ़ई वहाँ काम कर रहे हैं। सामान्य व्यक्ति के लिए यह घटना उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी। प्रतिदिन संसार में अनेकों महलों की नींव पड़ती हैं, असंख्य तैयार होते हैं, हजारों लाखों का श्रम उनमें लगता रहता है। स्वामी विवेकानंद को एक घटना विशेष जान पड़ी। कारीगरों, मजदूरों के कार्यों में विशेष अंतर दिखाई पड़ा। कोई बोझिल मन से काम कर रहे थे, तो किसी का मनोयोग देखते ही बनता था, किसी की भाव भंगिमा स्वयं परिचय दे रही थी, जैसे संतोष, आनंद का कोई स्रोत फूट पड़ा हो।

चेहरे की भाव भंगिमा में इतना अंतर क्यों? कार्य करने के ढंग में विभिन्नता का क्या कारण है? इन प्रश्नों से कौतूहल बढ़ा? स्वामी जी के मन में उत्तर पाने की जिज्ञासा प्रबल हुई। किनारे बैठे काम कर रहे मजदूर के पास जाकर उन्होंने पूछा- भाई क्या कर रहे हो? स्वामी जी की आशा के विपरीत उसने कठोर तथा झल्लाए स्वर में उत्तर दिया- देखते नहीं हो, पत्थर तोड़ रहा हूँ। प्रश्न बड़ी विनम्रता से पूछा गया था, पर उत्तर अत्यन्त कठोर मिला। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि काम करने वाले को कार्य में तनिक भी रूचि नहीं है।

स्वामी जी थोड़ा आगे बढ़े और दूसरे मजदूर के पास जाकर उसी प्रश्न को दोहराया। उसका उत्तर पहले वाले जैसा नहीं था। उसने कहा- पेट भरने के लिए रोटी चाहिए तथा आगे बढ़ने के लिए योग्यता भी जरूरी है। रोटी जुटाने तथा अपने काम में कुशलता प्राप्त करने का प्रयास कर रहा हूँ। उसके उत्तर में थोड़ी विवशता दिखाई पड़ रही थी, पर उज्ज्वल भविष्य की कल्पना के कारण उसके कार्यों में उत्साह एवं मनोयोग का समावेश था।

एक तीसरे कार्यकर्मी के पास वे पहुँचे और उससे भी उन्होंने वही प्रश्न किया। पर ऐसा लगा, जैसे उसने कुछ सुना ही नहीं हो। उसकी तत्परता एवं तन्मयता देखते ही बनती थी। चेहरे पर एक आनन्द की दीप्ति नाच रही थी। आँखों में आह्लाद की चमक थी। स्वामी जी ने उससे दोबारा थोड़ा तेज स्वर में पूछा- भाई यहाँ क्या हो रहा है, तुम क्या कर रहे हो? मजदूर ने बिना हाथ काम रोके एक बार स्वामी जी की ओर देखा। मुस्कुराते हुए धैर्यपूर्वक उत्तर दिया- यहाँ भगवान का मंदिर बन रहा है। उसके निर्माण में मैं भी अपनी नगण्य सेवा अर्पित कर रहा हूँ। प्रत्युत्तर में ऐसा सुनकर स्वामी जी को अपूर्व संतोष मिला, एक प्रेरणा मिली।

अपने शिष्य को समझाते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा- भावों के आरोपण से एक ही कार्य किसी के लिए बोझ, किसी की दक्षता बढ़ाने का साधन तो किसी के लिए कर्मयोग बन जाता है। इस दृष्टान्त को हम अपने जीवन में जितना सही ढंग से उतारेंगे, उतने ही उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हो जाएंगे।

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

महान चक्रवर्ती सम्राट अशोक Date :- 03-Mar-2015

संसार के सबसे महान चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने पूर्णरूप से नागरिक स्वतंत्रता, समता और न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था का निर्माण किया। उन्हीं के शासनकाल में भारत ‘विश्व-गुरू’ तथा ‘सोने की चिडि़या’ कहलाया। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री नोबल पुरस्कार विजेता डाॅ. अमर्त्य सेन के अनुसार, सम्राट अशोक के काल में दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी 35% थी, अर्थात् अशोक के काल में भारत विश्व की महाशक्ति था। यह महाशक्ति भारत द्वारा किसी देश पर आक्रमण करके नहीं, किसी का शोषण करके नहीं, अपितु अपनी हस्तकला के हुनर के बल पर बना था।

अशोक एक महान कल्याणकारी शासक था। उसने विश्व में सर्वप्रथम पशु-पक्षियों के लिए चिकित्सालयों का निर्माण कराया, यह बात गिरनार अभिलेख में उल्लेखित है। अपने शिलालेख में अशोक कहते हैं कि ‘मैंने पशु-बलि पर पूर्णतया नियंत्रण स्थापित कर लिया है।’ इसका अर्थ यह हुआ कि इतने विशाल राज्य में पशु-पक्षियों की हत्या पर अंकुश लग गया। यह कितनी महानता की बात है कि अशोक ने न केवल मानव-मात्र के कल्याण के लिए सोचा, अपितु निरीह पशु-पक्षियों के सम्बन्ध में भी सोचा। इससे यही सिद्ध होता है कि चक्रवर्ती राजा अशोक प्रकृति-प्रेमी था और प्रकृति पर सबका अधिकार समझता था। आज हम केवल मानवाधिकार की बातें करके अपने को बड़ा मानते हैं, जबकि अशोक ने उस समय पशु-अधिकार के सम्बन्ध में कानून बनाया था।

अशोक महान से पहले या बाद में कोई ऐसा सम्राट नहीं हुआ, जिसने इतने बड़े अखण्ड भारत पर राज किया। अशोक का साम्राज्य नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, ब्रह्मा और अफगानिस्तान तक फैला हुआ था, जिसे हम आज भी अखण्ड भारत कहते हैं। सम्राट अशोक का काल ही भारत का सबसे समृद्धिशाली व उन्नतिशील स्वर्णिम काल था। अशोक ने विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय खोला, भारत उस समय आध्यात्मिक ज्ञान का एकमात्र स्रोत था और विश्व-गुरू कहलाया। अशोक का साम्राज्य उस समय विश्व का सबसे शक्तिशाली, सबसे धनाढ्य, चरित्रवान राज्य था। दुनिया की प्रथम औद्योगिक क्रांति सम्राट अशोक के शासनकाल में ही हुई, उसी से भारत विश्व में ‘सोने की चिडि़या’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ज्ञातव्य है कि यह औद्योगिक क्रांति प्रकृति के अनुकूल थी, यानि प्रकृति को किसी प्रकार से क्षति नहीं पहुँचाई गई, जैसा कि आजकल हो रहा है।

अशोक अपनी प्रजा में अत्यधिक लोकप्रिय था। वह प्रजा को पुत्रवत समझकर उसका लालन-पालन करता था। जनता का सुख-दुःख जानने के लिए वह स्वयं रात्रि में वेश बदलकर भ्रमण किया करता था। प्रजा भी अशोक की सभी नीतियों का आदर के साथ पालन करती थी। अशोक ने अपनी प्रजा की भौतिक और नैतिक दोनों प्रकार की उन्नति की। अशोक ने धर्म प्रचार के लिए नैतिक उपदेशों को प्रजा तक पहुँचाने के लिए शिलालेखों को माध्यम बनाया और सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर उन्हें स्थापित किया। इसी के अन्तर्गत अशोक ने अनेकों स्तूपों की स्थापना की। वाराणसी के निकट सारनाथ में उनके द्वारा निर्मित स्तूप के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं।

लोक-कल्याण के साधनों का सबसे प्रथम अशोक ने ही श्रीगणेश किया। उसके शासनकाल में नेशनल हाईवे जैसे बड़े रोड बने, जिनके दोनों ओर छायादार वृक्ष लगे थे। साथ ही, सड़क पर उचित दूरी पर पानी की प्याऊ व सराय इत्यादि बनवाए गईं, जिससे पथिकों को आराम मिल सके। अशोक ने राज्य के विभिन्न भागों, प्रमुख राजपथों पर धर्म-स्तम्भ स्थापित किए, इनमें सारनाथ का ‘सिंह शीर्ष स्तम्भ’ सबसे अधिक प्रसिद्ध है। इसी सारनाथ की सिंह मुद्रा को भारत सरकार ने अपना राष्ट्रीय-चिन्ह बनाया।

उपरोक्त बातें उस महान सम्राट अशोक की हैं, जिसके अशोक-चक्र को भारत के झंडे में स्थान मिला है। उसी सम्राट के राज-चिन्ह (चार शेर) को भारत का राष्ट्रीय प्रतीक घोषित किया गया है। हमारे देश में सेना का सबसे बड़ा युद्ध सम्मान ‘अशोक चक्र’ भी अशोक के नाम पर ही है। यह घोर आश्चर्य का विषय है कि भारत के ऐसे सर्वकालिक महान चक्रवर्ती राजा अशोक को आज बिल्कुल भुला दिया गया है। उनकी जन्मतिथि चैत्र शुक्ल अष्टमी को होती है। पूरे भारतवर्ष में कहीं भी अशोक जयंती नहीं मनाई जाती, ना ही ऐसे सम्राट की जयंती पर राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया गया है।

भारत की मोदी सरकार से इस दिव्य पत्र के माध्यम से प्रार्थना है कि इस पर आवश्यक कदम उठाएँ और सम्राट अशोक की जयंती को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाए तथा बच्चों के पाठ्यक्रम में अशोक को सम्मिलित किया जाए।

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

नाम जप का महत्व Date :- 11-Feb-2015

व्याकुलतापूर्ण नाम कीर्तन का फल तत्काल होता है, जब सबकी आशा छोड़कर केवल परमात्मा पर भरोसा कर उसे एक मन से कोई पुकारता है, तब वह करूणा सिन्धु भगवान बिना विलम्ब भक्त के लिये दौड़े आते हैं। द्रौपदी द्वारा नाम की पुकार होते ही भगवान का वस्त्रावतार हो गया। सच्चे मन से भगवान को पुकारने से लोक-परलोक दोनों की सिद्धि निश्चित रूप से हो सकती है। जहाँ तक हो सके भगवन्नाम निष्काम और प्रेमपूर्वक होना चाहिये।

नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद।।

भगवान चक्रधारी विष्णु जी नारद से कहते हैं- ‘मैं वैकुण्ठ में या योगियों के हृदय में नहीं रमता। मेरे भक्त जहाँ मिलकर मेरा गान करते हैं, मैं वहीं जाता हूँ।’

नामजप या कीर्तन में प्रेम का सागर उमड़ता है, यह पूरे जगत को पावन कर देता है। कीर्तन में सभी सम्मिलित हो सकते हैं, ऊँच-नीच और बड़े-छोटे या निर्धन-धनवान का कोई भेद नहीं होता।

जाति-पाँति पूछें नहि कोई। हरि को भजे सो हरि का होई।।

वास्तव में, बड़ा वही है जो मतवाला होकर नाम कीर्तन करता है तथा स्वयं पावन होकर औरों को भी पावन करता है। हरि संकीर्तन की ध्वनि पापी, पतित, पशु-पक्षी आदि सबको पवित्र और पापमुक्त करती है। जिसके कानों से हृदय में भगवन्नाम चला गया, वही धन्य हो जाता है। पृथ्वी में नारायण-नाम रूपी प्रसिद्ध चोर कहा जाता है, क्योंकि वह कानों में प्रवेश करते ही मनुष्यों के अनेक जन्मों के पापों को एकदम चुरा लेता है। (वामन पुराण)

जिस नाम-कीर्तन का ऐसा प्रताप है, जो मनुष्य जीभ पाकर भी उसका कीर्तन नहीं करता, वह निश्चय ही मन्दभागी है। ‘राम नाम बिन गिरा न सोहा’ नाम जपने में ही गिरा (जीभ) की शोभा है।

कुछ लोगों को जोर-जोर से भगवान नाम लेने में संकोच का अनुभव होता है, परन्तु उन्हें झूठ बोलने, निन्दा करने या गाली देने में संकोच नहीं होता। यह बड़ा ही दुर्भाग्य है। वही मनुष्य धन्य है जिसके हरी कीर्तन मात्र से रोमांच हो जाता है, नेत्रों में प्रेमाँसू भर आते हैं, कण्ठ रूक-सा जाता है। श्रीमद्भागवद् में भगवान कहते हैं- जिसकी वाणी गद्गद हो जाती है, हृदय द्रवित हो जाता है, जो बारम्बार ऊँचे स्वर से नाम ले-लेकर मुझे पुकारता है, वह कभी रोता है, कभी हँसता है और कभी लज्जा (संकोच) छोड़कर नाचता है, ऊँचे स्वर से मेरा गुणगान करता है, ऐसा भक्तिमान पुरूष अपने को पवित्र करे, इसमें तो बात ही क्या है, परन्तु वह अपने दर्शन मात्र से जगत को पवित्र कर देता है। यह सर्वविदित है कि चैतन्य महाप्रभु के कीर्तन को सुनकर वन में रहने वाले हिंसक पशु भी प्रेम में मग्न होकर नाम कीर्तन करते हुए नाचने लगते थे। भगवान कृष्ण कहते हैं- ‘जो मेरे नामों का गान करता हुआ मुझे अपने समीप मानकर मेरे सामने नाचता है, मैं सत्य कहता हूँ कि मैं उनके द्वारा खरीदा जाता हूँ।’

श्रद्धया हेलया नाम रटन्ति मम जन्तवः।
तेषां नाम सदा पार्थ वर्तते हृदये मम।।

हे पार्थ! श्रद्धा या अवहेलना से जो मेरा नाम रटते हैं, उन मनुष्यों के नाम मेरे हृदय में सदा के लिए अंकित रहते हैं।

जो कीर्तन करता है, उसी भाग्यवान को इसके असीम और अनुपम आनन्द का पता है। वाणी इस अद्भुत आनन्द के रस का वर्णन नहीं कर सकती। इसी नाम के प्रताप से प्रहलाद ने जड़ में से चेतनरूप होकर भगवान को अवतार लेने के लिए बाध्य कर दिया। नाम के प्रताप से ब्रह्माजी सृष्टि रचने में समर्थ हुए, पानी पर पत्थर तैरने लगे, हनुमान जी समुद्र लांघ गए। संतों ने नाम जप के बल से जनता को मुक्ति की राह बतलाने में सफलता प्राप्त की। भगवान का नाम लेना और दर्शन करना एक ही बात है।

और अन्त में, नाम से ही परम मुक्ति है, नाम से ही परम गति है, नाम से ही परम शान्ति है, नाम से ही परम निष्ठा है, नाम से ही परम भक्ति है। नाम ही जीव का कारण है, नाम ही प्रभु है, नाम ही आराध्य है और नाम ही परम गुरू है।

धर्म-परिवर्तन पर कानून बनना राष्ट्रहित में है Date :- 01-Jan-2015

हमारा सनातन धर्म प्रकृति के अनुरूप है। सही मायनों में यह एक वैज्ञानिक धर्म है। यह जीवन जीने की कला सिखाता है। यही एकमात्र धर्म है जो जन्म से पूर्व भी और मृत्यु के उपरान्त भी जीवित रहता है।

आज अनेकों मत व पंथ हिन्दुओं को पद, लालच, धन व किसी अन्य प्रलोभन से बाध्य कर धर्म-परिवर्तन करवा रहे हैं। शायद यही उनके मत व पंथ के प्रचार का सबसे अच्छा तरीका है। इस प्रचार के लिए वह निर्धन व विवश लोगों को अपना शिकार बनाते हैं। यदि आप किसी को धन, पद व वस्तु देकर अपने मत व पंथ में आकर्षित करते हैं तो इसका अभिप्राय यह हुआ कि आपका मजहब कोई ऐसा विशेष गुण रखता ही नहीं कि जो अन्य लोगों को अपने गुणों से प्रभावित कर सके?

इतिहास साक्षी है कि आज तक कभी हिन्दू, जैन, सिख, बौद्ध और पारसी धर्म ने किसी का धर्म-परिवर्तन नहीं किया। अपितु मुसलमानों और ईसाइयों ने हमारे देश में धर्म-परिवर्तन का व्यापार चला रखा है। विदेशी धन इस कार्य के लिए प्रचुर मात्रा में आ रहा है। धर्म-परिवर्तन के लिए स्थिति के अनुसार साम-दाम-दंड और भेद की नीति अपनाई हुई है। इस नीति के अन्तर्गत लाखों- करोड़ों हिन्दुओं का धर्म बदल दिया गया। साथ ही, वोटों के लिए बांग्लादेशियों का स्थायी आयात किया जा रहा है।

इस जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन और बांग्लादेशी घुसपैठ पर आज तक देश में केवल भारतीय जनता पार्टी ने ही आवाज उठाई है। देश के शेष राजनीतिक दल अपने वोट-बैंक के लालच में इस घोर अन्याय और पाप की अनदेखी कर रहे हैं और भारत के भोले-मानस हिन्दुओं की आस्था पर कुठाराघात कर रहे हैं। धर्म-परिवर्तन का सबसे ज्यादा शिकार हिन्दू हुआ है क्योंकि उसका धर्म उसे विश्व-बंधुत्व की भावना सिखाता है उसकी इसी सहिष्णुता का लाभ विधर्मी उठाकर अपने विदेशों में बैठे आकाओं का लक्ष्य पूरा कर रहे हैं।

आज कुछ-सौ लोगों की ‘घर-वापसी’ पर सभी विपक्षी दल एक हो गए, जैसे कि देश पर कोई महान संकट आ गया हो। सोचने वाली बात यह है कि जब इन हिन्दुओं का धर्म-परिवर्तन हो रहा था, तब तो ये सब दल चैन की बंसी बजा रहे थे, पर अब बेचैन हो रहे हैं। और-तो-और देश की सबसे बड़ी संसद ‘राज्यसभा’ को ही नहीं चलने दिया कई दिनों तक। यह सब चमचागिरि किसके लिए हो रही है? सब भली-भाँति जानते हैं। शायद इन विपक्षी दलों को जनता इसलिए सही सबक सिखा रही है और एक-एक करके ये दल क्षेत्रीय दल तक सीमित होते जा रहे हैं। एक खुशी की बात अवश्य है कि अब हिन्दू जाग गया है, बस यही बात विपक्षी दलों के बर्दाश्त से बाहर हो रही है। हिन्दू का जागना देश का सौभाग्य है और विपक्षी दलों के लिए उनका बोरिया-बिस्तर बाँधने का सामान।

आज ‘घर-वापसी’ पर जो हंगामा हो रहा है, इसका एक ही इलाज है कि किसी भी तरह ऐसी नीति बनाई जाए, जिससे हिन्दुओं का धर्म-परिवर्तन ना हो। सम्पन्न हिन्दुओं से इस पत्र के माध्यम से प्रार्थना है कि वे देश-हित में आगे आएँ और जो लोभ-लालच ये विधर्मी दे रहे हैं, वे अपने हिन्दू भाइयों को सुविधानुसार सहयोग कर बचाएँ, नहीं तो एक दिन हम हिन्दू गिनती मात्र रह जाएँगे।

इस कार्य के लिए श्री हरि सत्संग समिति, इन्द्रप्रस्थ (बी-4, हाऊसिंग सोसायटी, साऊथ एक्स-1, नई दिल्ली-49 फोनः 011-65682585, 24644600) द्वारा ‘वनवासी रक्षा परिवार’ नामक योजना चला रखी है। इसके अन्तर्गत यह समिति दूर-दराज के गाँवों तक पहुँचकर उनकी देखभाल करती है, जिसमें शिक्षा, चिकित्सा, धार्मिक आयोजनों द्वारा भोले ग्रामवासियों को अपने हिन्दू धर्म के बारे में सम्पूर्ण जानकारी दी जाती है, जिससे वे किसी के बहकावे में ना आ सकें। यह बड़े हर्ष का विषय है कि इस समिति ने 43,000 आदिवासी एवं वनवासी गाँवों को गोद ले रखा है। अगले दो वर्षों में यह संख्या दो लाख गाँवों तक बढ़ाने की योजना है।

‘वनवासी रक्षा परिवार’ योजना में आप भी वार्षिक सहयोग दे सकते हैं। एक गाँव को गोद लेने का शुल्क समिति द्वारा 4000 रुपये प्रतिवर्ष रखा गया है। सुविधानुसार आप एक, दस, पचास, सौ गाँव गोद लेकर हिन्दू धर्मांतरण को बचाने में अमूल्य और पावन सहयोग कर सकते हैं। इस समिति द्वारा गाँव-गाँव रामकथा, भागवतकथा आदि का नियमित आयोजन किया जाता है, इसके लिए 2000 प्रशिक्षित कथावाचक नियुक्त किए गए हैं। साथ ही, भारत के प्रमुख संत भी समय-समय पर इन गाँवों का भ्रमण करके प्रवचन करते हैं। यह हम सबके हित में एक आदर्श योजना है, इसको आगे बढ़ाना और अपनाना एक धार्मिक कार्य है। यह समय की पुकार भी है और मानवता भी है।

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

गीता पूरे विश्व को भारत का आध्यात्मिक वरदान है Date :- 30-Nov-2014

हम सब भारतवासी बड़े ही भाग्यशाली हैं, क्योंकि इस देश में गंगा बहती है, गीता गाई जाती है, गायत्री की पूजा की जाती है और गाय यहाँ माँ स्वरूप में सम्मान पाती हैं।

जिन सौभाग्यशाली व्यक्तियों ने गीता को पढ़ा और समझा है, वे यह जानते हैं कि इस ग्रंथ में कुछ बातें ऐसी हैं, जिन्हें केवल भगवान ही कह सकते हैं। संसार के जिस किसी विद्वान ने गीता को अपनाया है, उसने यही कहा है कि इस ग्रंथ की तुलना में विश्व का कोई दूसरा ग्रंथ नहीं है। वास्तव में, गीता धर्म नहीं, मानवता का पाठ पढ़ाती है। मनुष्य चाहे किसी जाति-वर्ग व सम्प्रदाय का हो, अगर उसमें मानवता नहीं है तो वह पशु-समान ही है। इसलिए गीता सफल और सुखी जीवन का आधार मानी जाती है।

हमारे सभी सद्-ग्रंथों का मानना है कि संस्कृत भगवान की भाषा है, इसलिए गीता को भगवान ने अपनी भाषा में ही उच्चारित किया। प्रकृति ने जिस प्रकार से मनुष्य के तालू की रचना की है, संस्कृत भाषा उससे 100% मेल खाती है। संस्कृत बोलने मात्र से हमारे मस्तिष्क की सूक्ष्म से सूक्ष्मतम नाडि़यों का प्राणायाम हो जाता है। अतः गीता के अध्यायों का प्रतिदिन पाठ किया जाए तो मनुष्य की बुद्धि तीव्र होती है व स्मरण शक्ति में भी आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि होती है। सभी अभिभावकों से करबद्ध प्रार्थना है कि बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्हें संस्कृत भाषा का ज्ञान अवश्य कराएँ तथा गीता के अध्यायों का प्रतिदिन नियम से पाठ करने के लिए प्रेरित करें। संस्कृत पढ़ने वाले बच्चे अन्य विषयों में भी अच्छे अंक प्राप्त करते हैं।

गीता के अध्ययन से मनुष्य की सोच बड़ी हो जाती है, वह अपने को प्रभु के निकट समझता है। गीता अपनाने से निडरता बढ़ती है तथा समस्त प्रकार के सांसारिक भयों से मुक्ति मिलती है। गीता में भगवान ने स्पष्ट कहा है कि ‘तू बस मुझे अपना समझकर, अपने सभी कर्म मेरे सुपुर्द कर दे, फिर मैं तेरा सब प्रकार से ध्यान रखूँगा।’ जिस किसी भी मनुष्य की भगवान में शरणागति हो गई, उसी ने उस परमानन्द को पा लिया।

यह संसार का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि गीता जैसे विश्व के इस निराले ग्रंथ को केवल हिन्दू धर्म से जोड़ दिया गया। होना तो यह चाहिए था कि संसार के सभी धर्म गीता को अपना ग्रंथ कहकर गौरवान्वित होते क्योंकि गीता का उपदेश मोह-ग्रस्त मानव मात्र के लिए है। यह किसी एक धर्म विशेष के लिए नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण के लिये रचा गया ग्रंथ है। यह परमात्मा का अपनी संतान के साथ सीधा संवाद है।

अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय सखा व भक्त था। अर्जुन कोई बड़ा ऋषि-मुनि या तपस्वी नहीं था, वह मात्र श्रेष्ठ धनुर्धर था। अर्जुन को युद्धक्षेत्र में मोह हो गया, उसकी इसी वैचारिक कायरता को दूर करने के लिए दिव्य गीता उपदेश के माध्यम से भगवान के कण्ठ से निकली। शुरू में अर्जुन तर्क-वितर्क करता रहा, पर अन्त में वह भगवान के शरणागत हो गया। अतः गीता को समझने के लिए भगवान में भक्ति और शरणागति अनिवार्य है।

इस संसार में गीता ही एकमात्र ऐसा ग्रंथ है, जिसकी प्रतिवर्ष जयन्ती मनाई जाती है। सौभाग्य से 2 दिसम्बर 2014 (मार्गशीर्ष एकादशी) को गीता की 5151वीं जयन्ती बड़ी धूमधाम से उत्साह के साथ मनाई जा रही है। अतः भारत की सरकार से ‘दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र’ की ओर से प्रार्थना है कि गीता को ‘राष्ट्रीय-ग्रंथ’ के रूप में मान्यता दी जाए और प्रत्येक विद्यार्थी को इसे अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाए, तभी ‘गीता-जयन्ती’ वास्तव में सार्थक हो सकेगी।

गीता मनुष्यों में नहीं, बल्कि सभी प्राणियों में ईश्वर का अंश है, ऐसी शिक्षा देती है। गीता के उपदेशों का ठीक से पालन करने वाला व्यक्ति कभी हिंसक और अपराधी नहीं बन सकता है और सपने में भी किसी का अहित नहीं सोच सकता, चूँकि सभी हिन्दू गीता पर श्रद्धा रखते हैं, इसलिए हिन्दुओं ने न तो किसी देश पर आक्रमण करके उस पर कब्जा करने का प्रयत्न किया और न ही किसी प्रकार की जिहाद करके लोगों को जबरन हिन्दू बनाया है। गीता में बताया गया धर्म पूर्णतः वैज्ञानिक, तर्क सम्मत और सार्वभौमिक है।

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

वास्तव में, कोई भी वर्ण ऊँचा या नीचा नहीं होता Date :- 29-Oct-2014

वर्ण व्यवस्था हिंदू धर्म की बहुत उपयोगी विशिष्टता है। इस व्यवस्था का सुझाव जिस रूप में प्रकृति एवं परमात्मा ने दिया था, जो कि काम और जिम्मेदारियों को सुचारू रूप से विभाजित करने के लिए बनी थी, उनको आज कर्म के आधार पर नहीं, जन्म से जोड़कर तरह-तरह की भ्रांतियाँ पैदा की जा रही हैं। निहित स्वार्थों वाले राजनीतिज्ञ, धार्मिक और सामाजिक नेताओं तथा दूसरे विचारों और मतों वाले लोग इनका गलत प्रचार करके हमारी भावनाओं को भड़का कर हिंदू धर्म को मानने वालों को विभाजित कर रहे हैं, तोड़ रहे हैं और हानि पहुँचा रहे हैं। कर्म केवल कर्म होता है। वह छोटा या बड़ा नहीं होता। फिर कैसे मानें कि यह कर्म करने वाले छोटे हैं और ये कर्म करने वाले बड़े? वैज्ञानिक और व्यावहारिक आधार पर समाज को गतिशील दिशा देने के लिए यह व्यवस्था की गई, जिसमें चार वर्ण निर्धारित हुए- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।

जिस प्रकार मनुष्य शरीर चार मुख्य भागों से मिलकर ही पूर्ण बनता है, वैसा ही है हमारा समाज। मस्तिष्क से मुख तक का जो भाग है, उसका काम है सोचना, ज्ञान देना। बाँहें शक्ति का स्वरूप हैं। शरीर के मध्य भाग को, शरीर के लालन-पालन तथा उसकी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करना होता है। पाँव शरीर को गति देते हैं और उसे आधार प्रदान करते हैं, या कहें कि वे शरीर को धारण करते हैं। शरीर के ये चारों अंग अलग-अलग अपना काम करते हुए भी एक साथ मिलने पर ही शरीर को पूर्णता देते हैं। इसी तरह ये चारों वर्ण भी अपने-अपने उत्तरदायित्व को निभाते हुए सम्पूर्ण समाज का निर्माण करते हैं। ये चारों वर्ण ऐसी व्यवस्था का प्रतिफल हैं जिसमें एक के बिना दूसरे का होना निरर्थक है।

कर्म के अनुसार वर्ण की मान्यता के प्रमाण में पौराणिक काल से अनेक उदाहरण मिलते हैं। स्वयं वेद व्यास, जिन्हें वेदों की व्याख्या करने के निमित्त द्वापर में भगवान का अवतार माना जाता है, वास्तव में एक मछुआरिन के पुत्र थे, फिर भी अपने कर्म के कारण वे महर्षियों की तरह पूज्य बने। विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय थे, किंतु तपस्या एवं साधना से महर्षि बने। इसी प्रकार रामायण के रचयिता वाल्मीकि आखेटक थे और निम्न वर्ण के होने पर भी अपने कर्म से ऋषि बने।

कर्मानुसार वर्ण निर्धारित करने के प्रसंग में एक अत्यन्त महत्वपूर्ण वृत्तांत जाबाला का है। जाबाला गृहकाज करने वाली नौकरानी थी। उसका पुत्र था सत्यकाम। जाबाला को यह ज्ञात नहीं था कि सत्यकाम का पिता कौन है। उसे स्वयं अपना गोत्र और वर्ण का पता नहीं था। सत्यकाम विद्या अध्ययन के लिए एक गुरु के पास गया। गुरु ने उससे नाम पूछा तो उसने बताया सत्यकाम जाबाला अर्थात् उसने अपनी माँ का नाम अपने गोत्र के रूप में बताया। गुरु उसकी स्पष्टवादिता से प्रसन्न हुए। उसे शिष्य बना लिया। गुरुजी की छत्रछाया में रहते हुए उसने मनन और साधना से ब्रह्म ज्ञान प्राप्त किया। इससे सिद्ध होता है कि दूसरे वर्ण के लोग भी साधना करके ज्ञान पाकर ब्राह्मण बन सकते थे, जिस प्रकार अज्ञात वर्ण का सत्यकाम ऋषि जाबाला बनकर जगत प्रसिद्ध हुआ।

संत रैदास चर्मकार थे, संत कबीर जुलाहे थे, संत नामदेव छिपि समाज के थे और संत तुकाराम कुन्वी जाति के थे, पर उनकी प्रभु भक्ति ने उन्हें संत शिरोमणि की श्रेणी में ला दिया।

चंद्रगुप्त मौर्य जन्म से शूद्र होते हुए भी पराक्रमी राजा बने और क्षत्रियों का पद प्राप्त किया। उनके महामंत्री चाणक्य ब्राह्मण थे। उन्होंने कौटिल्य अर्थशास्त्र जैसा नीति विषयक ग्रंथ लिखा। रामायण और महाभारत में भी ऐसे अनेक उदाहरण हैं।

आदिशंकराचार्य के शिष्यों के रास्ते में एक चांडाल आ गया। शिष्यों ने उसे अछूत कहते हुए रास्ता छोड़ने को कहा। चांडाल ने प्रश्न किया, ‘क्या तुम जानते हो कि तुम कौन हो और मैं कौन हूँ? क्या मेरी आत्मा तुम्हारी आत्मा से अलग प्रकार की है।’ उस चांडाल की यह बात शंकराचार्य ने सुनी और इन शब्दों का गूढ़ार्थ समझते ही वे उसके चरणों में गिर गये और बोले, ‘जो ब्रह्म में जा मिला है, वह चाहे निम्न वर्ण का चांडाल हो या ब्राह्मण, मैं उसे अपना गुरु मानता हूँ।’

इन सब प्रसंगों-प्रमाणों से यही सार निकलता है कि ऊँच-नीच, छूत-अछूत, जाति-पंत आदि का भेद न्यायसंगत नहीं है। इनको महत्व देकर आदमी-आदमी को बाँटने की स्वार्थपूर्ण राजनीति को नकारने की आज आवश्यकता है और इन प्रसंगों से यह प्रेरणा ग्रहण करने की जरूरत भी है कि अपने निर्धारित कत्र्तव्य को ईमानदारी से निभाना मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिए। अच्छा ब्राह्मण, अच्छा क्षत्रिय, अच्छा वैश्य और अच्छा शूद्र बनना ज्यादा आवश्यक है, तभी अच्छा इंसान बना जा सकेगा। यही अवधारणा भारत को फिर से विश्वगुरू के पद पर आसीन करेगी।

 

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक

दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

शनि प्रसन्न तो बढ़े अन्न-धन Date :- 01-Oct-2014

प्रसन्नचित्त व्यक्ति बड़ा आशावादी होता है, वह स्वयं तो खुश रहता ही है, साथ ही साथ अपने सम्पर्क में आने वाले सभी बन्धु-बान्धवों, परिजनों, मित्रों व अन्य को भी खुश करने की कोशिश करता है। इसके विपरीत उदास व्यक्ति एक निराशा के साम्राज्य में जीता है। कारणवश अपने आसपास उदासी का माहौल उत्पन्न करे रहता है। उसे संसार में कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

एक प्रसन्न व्यक्ति ही सर्वत्र खुशहाली और सौहार्द का वातावरण पैदा कर सकता है। मनुष्य यदि दुःखी होता है तो वह अपने ईष्ट से प्रार्थना करता है, दुःख निवारण के लिए, परन्तु ऐसे वातावरण में वह प्रभु को प्रसन्न करने की नहीं सोच पाता क्योंकि दुःख उसके मनोभावों पर हावी होता है। प्रसन्नचित्त व्यक्ति अपने भगवान को खुश करने के लिए उनके अनुकूल आचरण करता है क्योंकि उस समय उसे भगवान से कुछ याचना नहीं करनी होती। ऐसा व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से प्रभु का भजन करता है और सद्मार्ग पर चलता है।

जो अपने मन में वैर की भावना रखता है, वह जगत में अपने वैरी उत्पन्न करता है। जो प्रेम के संकल्प करता है, वह प्रेमियों की संख्या बढ़ाता है। जो भोगों में मन लगाता है, भोगों में रचा-पचा रहता है, वह लोगों में भोगासक्ति बढ़ाता है। जिसके मन में शूरता है, वह शूरता का वातावरण उत्पन्न करता है। जो कायर है, वह कायरता फैलाता है। जो भक्त है, वह भक्ति का प्रसार करता है। जो अभक्त है वह नास्तिकता फैलाता है। जो भय से काँपता है, वह आसपास भय के वातावरण का विस्तार करता है। जो निर्भय है, वह सबको निर्भय बनाता है। जो सुखी है, वह जगत को सुखी करता है। जो दिन-रात शोक, दुःख और विषाद में डूबा रहता है, वह सबको ये ही चीजें देता है और जो भगवान से प्रेम करता है, वह भगवत प्रेमियों की संख्या बढ़ाता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति हमेशा खुश या प्रसन्न रहता है, वह सदैव दूसरों को भी प्रसन्न रखने की कोशिश करता है। यह सर्वविदित है कि जिसके पास जो चीज होती है, उसी को वह दूसरों को देता है।

मन में सदा अच्छे संकल्प रहें, वह सत्-विचारों से भरा रहे। वाणी के द्वारा सत्य, हितकर, मधुर वचन बोले जाएँ और शरीर से सर्वदा उत्तम सेवा कार्य किए जाएँ, तो ऐसे व्यक्ति से शनिदेव ही क्या, संसार के सभी प्राणी खुश रहते हैं, सभी देव व ग्रह अनुकूल रहते हैं।

यह जगत् विदित है कि शनिदेव न्यायकारी देव हैं, अतः जो सत्य व न्याय के मार्ग पर चलता है, उससे ही भगवान शनि शीघ्र प्रसन्न होते हैं। यह प्राणीमात्र की प्रकृति है कि जो जैसा होता है, वैसी ही स्थिति में वह प्रसन्न होता है। इसीलिये शनिदेव को परोपकारी, हितकारी, सदाचारी, न्यायकारी व सत्यवादी व्यक्ति ही अच्छे लगते हैं, वे उनसे सहज ही प्रसन्न रहते हैं, कारणवश ऐसे व्यक्ति संसार में सबसे आदर व सम्मान पाते हैं।

भगवान शंकर शनिदेव के गुरू हैं तो हनुमान जी उनके प्रिय सखा हैं। अतः शिवजी की भांति शनिदेव शीघ्र प्रसन्न होने वाले (आशुतोष) व हनुमान जी की तरह अपने भक्तों को हर संकट से बाहर निकालने वाले देव हैं। हम सबके अच्छे-बुरे कर्मों का न्याय भगवान शनि ने करना है, उन्हें किसी से राग-द्वेष नहीं है। जिस प्रकार एक न्यायाधीश किसी को फांसी की सजा देता है तो न्यायाधीश का उस व्यक्ति से कोई द्वेष नहीं होता, वह तो केवल न्याय कर रहा है।

अतः इस संसार में सुखी रहने के लिए ऐसे आचरण करें, जिससे शनिदेव प्रसन्न हों, अगर वे प्रसन्न हो गए तो जिंदगी में दुःख का प्रवेश असंभव है।

प्रसन्नचित्त व्यक्ति सबको प्यारा होता है।

शिष्टाचार Date :- 01-Sep-2014

शिष्टाचार मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान है। मनुष्य को मनुष्य की तरह ही रहना शोभा देता है, जो मनुष्य होते हुए भी अपने शील-स्वभाव को उसके अनुरूप नहीं ढालता, वह पशु से भी गया-गुजरा होता है। पशु तो पशु होता है, उसमें वह विवेक-बुद्धि नहीं होती, जिसके बल पर वह अपने आचरण को शिष्टाचार के साँचे में ढाल सके, किंतु परमात्मा ने मनुष्य को विशेष रूप से बुद्धि-विवेक का बल दिया है, ताकि वह अपनी जड़ता का परिष्कार करके सभ्य बन सके।

शिष्टाचार जीवन का दर्पण है, जिसमें हमारे व्यक्तित्व का स्वरूप दिखाई देता है। शिष्ट व्यवहार का दूसरों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है, दूसरों की सद्भावना, आत्मीयता और सहयोग की प्राप्ति होती है, साथ ही समाज में लोकप्रियता बढ़ती है। इसके विपरीत अशिष्ट व्यवहार दूसरों में घृणा, द्वेष पैदा कर देता है, अशिष्ट व्यक्ति को कोई आत्मीय सहयोग नहीं मिलता, अपने भी पराये बन जाते हैं। अशिष्टता से व्यक्तित्व का विकास अवरुद्ध हो जाता है। अशिष्ट व्यक्ति को समाज अकेला छोड़ देता है। निःसंदेह मनुष्य में कोई विशेषता या आकर्षण न हो, परंतु शिष्ट व्यवहार से सहज ही दूसरों की सद्भावनाएँ अर्जित की जा सकती हैं, जो जीवन-पथ पर आगे बढ़ने के लिए बड़ी उपयोगी और आवश्यक हैं। शिष्टाचार और सद्व्यवहार से विरोधियों को भी अपना बनाया जा सकता है। यह वह अमृत है, जिससे कटुता, विरोध और शत्रुता समाप्त हो जाती है।

शिष्टाचार व्यवहार की वह रीति-नीति है, जिसमें व्यक्ति एवं समाज की आंतरिक सभ्यता एवं संस्कृति के दर्शन होते हैं। परस्पर बातचीत, सम्बोधन से लेकर दूसरों की सेवा, त्याग, सम्मानयुक्त भावनाएँ आदि तक शिष्टाचार में आ जाते हैं। शिष्टाचार हमारे आचरण एवं व्यवहार का नैतिक मापदंड है, जिस पर सभ्यता एवं संस्कृति का भवन-निर्माण होता है। दूसरों के प्रति नम्र, विनयशील, आदरपूर्ण उदार आचरण ही शिष्टाचार है।

शिष्टाचार मन, वचन, कर्म से किसी को हानि नहीं पहुँचाता। वह दुर्वचन कभी नहीं बोलता। न मन से किसी का बुरा चाहता है, जिससे किसी का दिल दुःखे, ऐसा कार्य भी वह नहीं करता। विनय और मधुरतायुक्त व्यवहार ही उसके जीवन का अंग होता है। किसी भी तरह के अभिमान की शिष्टाचार में गुंजाइश नहीं रहती। नम्रता, विनयशील आदि सद्गुण शिष्टाचार के आधार हैं।

समाज में जहाँ-जहाँ भी हमारा दूसरे व्यक्तियों से संपर्क होता है, वहीं शिष्टाचार की आवश्यकता पड़ती है। घर में परिवार के छोटे से लेकर बड़े सदस्यों के साथ, सभी जगह हमें शिष्टाचार की आवश्यकता पड़ती है। जहाँ एक से अधिक व्यक्तियों का सम्पर्क हो, वहीं शिष्टाचार की अपेक्षा रहती है। हमारा सम्पूर्ण जीवन, कार्य-व्यापार, मिलना-जुलना सभी में शिष्ट व्यवहार की आवश्यकता पड़ती है।

शिक्षा, सम्पन्नता एवं प्रतिष्ठा की दृष्टि से कोई व्यक्ति उँचा हो और उसे हर्ष के अवसर पर हर्ष, शोक के अवसर पर शोक की बातें न करना आए तो लोग उसके सम्मुख सम्मान भले ही करें, परंतु मन में उसके प्रति कोई अच्छी धारणाएँ नहीं रख सकेंगे। शिष्टाचार और लोक-व्यवहार का यही अर्थ है कि हमें समयानुकूल आचरण एवं बड़े-छोटों से उचित बर्ताव करना आए। यह गुण किसी विद्यालय में प्रवेश लेकर अर्जित नहीं किया जा सकता, इसका ज्ञान प्राप्त करने के लिए सम्पर्क एवं पारस्परिक व्यवहार का अध्ययन तथा क्रियात्मक अभ्यास ही किया जाना चाहिए।

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक

दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

जीवन में अध्यात्म की आवश्यकता Date :- 01-Aug-2014

भारतीय संस्कृति की मूल भावना आध्यात्मिक है। आध्यात्मिक आनन्द हमारे मन, आत्मा और शरीर को अखण्ड आनन्द प्रदान करता है। मानव जीवन की सार्थकता आध्यात्मिक सुख-शांति में है। हिन्दू संस्कृति अध्यात्म प्रधान है। पवित्र भारत में इस महान संस्कृति का उदय हुआ, इसी से भारत धन्य है और धन्य रहेगा।

अध्यात्मवाद जीवन का वह तत्वज्ञान है जिस पर हमारी भीतरी-बाहरी उन्नति, समृद्धि, सुख एवं शांति निर्भर है। यह वह विज्ञान है, जिसकी जानकारी के बिना भूतल के समस्त वैभव निरर्थक हैं और जिसका थोड़ा-सा भी ज्ञान प्राप्त हो जाने पर जीवन आनन्द से ओत-प्रोत हो जाता है। आध्यात्मिक चिन्तन के बिना मनुष्य में विनीत भाव नहीं आता और न उसमें अपने आपको सुधारने की क्षमता रहती है। आध्यात्मिक चिन्तन चिंताओं के निवारण का सर्वोत्तम उपाय है। इस चिंतन से मनुष्य वर्तमान में रहना सीखता है और अपने भीतर रहने वाली अमिट शक्ति का ज्ञान प्राप्त करता है।

इस संसार में एक ही ऐसा तत्व है जो अमर है, शाश्वत है और कभी न बदलने वाला है, वह तत्व हमारी आत्मा है। हमारी आत्मा संसार में व्याप्त परमात्मा का अंश है। जो व्यक्ति सांसारिकता छोड़कर अपनी आत्मा के दिव्य गुणों की अभिवृद्धि में लग जाता है, उसे आंतरिक संतोष, प्रेम, आनन्द एवं उल्लास प्राप्त होता है। उसकी दैवी सम्पदाएँ उत्तरोत्तर विकसित होती रहती हैं और उसके कुसंस्कार- ईष्र्या, तृष्णा, द्रोह, लोभ, भय तथा वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं।

अध्यात्म की गहनता तभी प्राप्त होती है, जब उसे व्यावहारिक जीवन में सद्भावना और नेकी से दूसरों के लिए प्रयोग किया जाये। यदि कोई व्यक्ति जीवन में ईमानदारी और मेहनत से काम करते हुए सभी की हर सम्भव मदद करता है, तो उससे बड़ा आध्यात्मिक योगी कोई नहीं है। अतः सामान्य व्यक्ति भी अपने प्रयासों से आध्यात्मिक हो सकता है।

अध्यात्मवाद असत् से सत् की ओर ले जाता है। आगे बढ़ने के लिये सत्य, प्रेम और न्याय का मार्ग दिखाता है। आध्यात्मिक मनुष्य अन्तर्मुखी होता है। बाह्य संसार में ऐसी वस्तुएँ नहीं मिलतीं, जिनमें स्थायी सुख हो। सांसारिक सुख तो अल्पकाल में ही समाप्त हो जाते हैं और उल्टे दुःख का कारण बनते हैं।

आत्मविलास ही वास्तविक उन्नति है। यही पूर्ण धर्म है। हमारी बुद्धि की शक्ति बढ़ती चली जाये और धीरे-धीरे हम आत्मस्फूर्ति को प्राप्त करें। हमारा मन प्रतिदिन पहले से अधिक बलवान तथा अधिक प्रेमपूर्ण तरंगों को प्रवाहित करें। सहानुभूति, निःस्वार्थता तथा सेवा की न केवल भावनाएँ ही जाग्रत हों, बल्कि वे सफल क्रिया का रूप भी ग्रहण करने लगें। काम-क्रोध के विकारों का शमन होता चला जाये। मन में अधिक समता, प्रसन्नता तथा शांति का उदय हो। हमारा संकल्प प्रबल हो, ओछी वृत्तियों पर हम विजयी हों तथा अपने कार्यों में सफल हों। ये सब वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति के बाहर प्रकट होने वाले लक्षण हैं।

आध्यात्मिक विकास के दो प्रमुख उपाय हैं- पहला ‘तप’ और दूसरा ‘त्याग’। तप अभ्यास का परिणाम है और त्याग वैराग्य का। नैतिकता तप सिखाती है और सत्यता त्याग सिखाती है। नैतिकता और सत्य धार्मिक जीवन का आवश्यक अंग हैं। शुद्धता और सदाचारयुक्त हृदय में ही आध्यात्मिकता का प्रादुर्भाव और परिणामों का दिव्य अनुभव सम्भव है।

आज संसार में क्रूरता तथा अशांति का चारों ओर साम्राज्य है। इसका मूल कारण है- आध्यात्मिकता का अभाव। यदि शांति और आनन्द का साम्राज्य स्थापित करना है तो हमें आध्यात्मिकता का आश्रय लेना होगा। जब अन्तःकरण निर्मल हो जाता है, अज्ञान की निवृत्ति हो जाती है तो सत्य स्वतः ही प्रकट हो जाता है।

हमारी शिक्षा प्रणाली आध्यात्मिक हो Date :- 01-Jul-2014

पूर्वकाल में भारतवर्ष सभी प्रकार से उन्नति-अभ्युदय के शिखर पर था। ज्ञान-विज्ञान, बल-बुद्धि, धन-धान्य, सुख-सम्पत्ति, ऐश्वर्य-वैभव, प्रेम-परोपकार, शील-सदाचार, व्यापार-वाणिज्य, कारीगरी-उद्योग और कला-कौशल आदि प्रत्येक विषय में इस महान देश ने अत्यधिक विकास करके कल्पनातीत सामथ्र्य प्राप्त किया था। ऐसे अनुपम एवं अद्भुत शक्ति-सम्पन्न होने का कारण यह था कि यहाँ के लोग अध्यात्मवादी व ज्ञानपरायण थे। वे ईश्वर और धर्म को ही अपना सर्वस्व मानते थे। उनकी वेद-शास्त्रों में अटल श्रद्धा थी।

ज्ञान-प्राप्ति के लिये हमारे शास्त्रों में बालकों को ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गुरु के घर रहकर (गुरुकुल आश्रम) विद्याभ्यास करने का निर्देश है। भगवान वेदव्यास, भृगु, भारद्वाज, वशिष्ठ, विश्वामित्र, याज्ञवल्क्य जैसे महान ऋषियों के आश्रमों में दस-दस हजार बालक ब्रह्मचर्य से रहकर संयम-नियम का पालन, सत्य-सदाचार का सेवन और गुरू तथा गायों की सेवा-सुश्रूषा करते हुए विद्याज्ञान का उपार्जन करते थे। बालक गुरू की आज्ञा में रहकर तप-योग, अनुष्ठान, भक्तिपूर्वक अभ्यास करते थे, जिससे वे 25 वर्ष की आयु में ही सहज ही महापुरुष बन जाते थे।

आजकल की शिक्षा-प्राप्ति में अपनी शक्ति से अधिक फीस देकर काॅपी-पुस्तकों पर पर्याप्त व्यय करके और अपनी आत्मा को कुचल कर भी हम बालकों को केवल विदेशी भाषा-ज्ञान ही सिखाते हैं। धर्म-कर्म को एक ओर रखकर केवल नौकरी-गुलामी के लिये ही अपने बच्चों को तैयार कर पाते हैं। वहीं हमारी प्राचीन शिक्षण-प्रथा धर्म-कर्म-अर्थ को सहज प्राप्त कराने वाली होती थी। नैतिक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता था, कारणवश सभी नागरिक कत्र्तव्यपरायण, राष्ट्रभक्त तथा धार्मिक होते थे।

शिक्षा के लिये ऋषि-मुनियों ने गुरुकुल की प्रणाली का आविष्कार किया था। ये गुरुकुल ग्रामों और नगरों से दूर प्रकृति के शांत वातावरण में नदियों किनारे होते थे। नैसर्गिक जलवायु और सात्त्विक आहार-विहार के परिवेश में प्राप्त शिक्षा आनन्दमयी होती थी, किन्तु वहाँ विलासमय जीवन की नहीं, अपितु तपोमयी चर्चा की मान्यता थी।

प्राचीन शिक्षा भारत में जीवन की साधना मानी गई है, जो जीवन के चरम लक्ष्य तक पहुँचने में साधक हो। अमीर-गरीब व राजा-रंक की शिक्षा में कोई भेदभाव नहीं था। शिक्षा का क्षेत्र केवल धर्मनिरपेक्ष ऋषियों के हाथ में था तथा अभिभावकों पर बच्चों की शिक्षा का कोई बोझ नहीं होता था। यह एक बहुत गम्भीर और ध्यान देने योग्य बात है कि भारत की प्राचीन शिक्षा न तो शासक के हाथ में थी और न राजनीतिक अथवा अन्य नेताओं के प्रभाव में थी। इसी कारण हमारी महान सांस्कृतिक विरासत का लाखों वर्षों बाद भी लोप नहीं हुआ।

सभी प्रकार की शिक्षा का उद्देश्य ‘मनुष्य-निर्माण’ ही होना चाहिए। सारे प्रशिक्षणों का अंतिम ध्येय मनुष्य का विकास करना है। जिस अभ्यास से मनुष्य की इच्छाशक्ति का प्रवाह और प्रकाश संयमित होकर फलदायी बन सके, उसी का नाम शिक्षा है। शिक्षा की हिन्दू-पद्धति के अपने उच्चतर लक्ष्य थे।

आज वैज्ञानिक उपलब्ध्यिों के लिए विख्यात पाश्चात्य जगत में शिक्षा का वातावरण पतनोन्मुख है। अमेरिका में मस्तिष्क का स्थान यंत्र ले रहे हैं और शिक्षकों की जगह कम्प्यूटर। दुर्भाग्य से भारत में भी यही अनुसरण हो रहा है। श्रेष्ठ मस्तिष्क शिक्षा की ओर न लगकर बड़ी-बड़ी कम्पनियों और सरकार द्वारा चलाये गये शोध-कार्यों में लग रहे हैं। इन सब में उपयोगितावाद तथा व्यावहारिकता तो है, किन्तु मस्तिष्क के आंतरिक गुण सामने नहीं आ पाते।

हमारा समाज आज वैदिक शिक्षा प्रणाली की ओर ताक रहा है, क्योंकि भारतवर्ष की मूल चेतना आध्यात्मिक है। जिस प्रकार ब्रिटेन की मूलचेतना राजनीतिक है और जापान की मूलचेतना आर्थिक है।

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक

दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

अब आयेगा रामराज्य Date :- 01-Jun-2014

सर्वप्रथम मैं श्री नरेन्द्र मोदी को भारत के प्रधानमंत्री बनने की हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ। यह न केवल कांग्रेस युग का अंत है, अपितु धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हो रही साम्प्रदायिकता की राजनीति का भी अंत है। भारत की जनता ने पहली बार किसी प्रधानमंत्री को छप्र धर्मनिरपेक्षता के आवरण से बाहर आकर गंगा आरती करते देखा। यह एक अत्यन्त सुखद दृश्य था। यह एक संदेश था कि अपने धर्म का पालन करने से भारत का प्रधानमंत्री साम्प्रदायिक नहीं हो जाता।

श्रीराम जी के राज्य पर प्रतिष्ठित होने पर तीनों लोक हर्षित हो गए, उनके सारे शोक जाते रहे। कोई किसी से वैर नहीं करता। श्रीराम जी के प्रताप से सबकी विषमता नष्ट हो गई। सब लोग अपने धर्म में तत्पर हुए सदा वेद-मार्ग पर चलते हैं। उन्हें न किसी बात का भय है और न कोई रोग ही सताता है। राम-राज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते थे। ऐसे राज्य में सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं, पुण्यात्मा हैं और गुणवान हैं। समूची प्रजा दूसरों के गुणों का आदर करने वाली है तथा दूसरों के किए गए उपकारों को मानने वाली है। कपट-चतुराई किसी में भी नहीं है। सभी पुरुष एकपत्नी-व्रती हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्म से पति का हित करने वाली हैं। राम राज्य में कोई शत्रु है ही नहीं, इसलिए ‘जीतो’ शब्द केवल मन के जीतने के लिए ही कहा जाता है। इसी प्रकार ‘दण्ड’ शब्द केवल संन्यासियों के हाथ में रहने वाले दण्ड के लिए ही रह गया है। वास्तव में, रामराज्य में सभी कुछ अनुकूल रहने के कारण भेद नीति की आवश्यकता ही नहीं रह गई। ‘भेद’ शब्द केवल सुर-ताल के भेद के लिए ही कामों में आता है।

यह रामराज्य का ही प्रताप है कि पक्षी और पशु सभी ने स्वाभाविक वैर भुलाकर आपस में प्रेम बढ़ा लिया है। शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चलता रहता है। वृक्ष सदा फलते-फूलते हैं। बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु टपका देते हैं। धरती सदा खेती से भरी रहती है। दूसरे अर्थ में, त्रेता में सत्ययुग की स्थिति हो गई। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल से लबालब भर गईं। राजा राम के  शासन में केवल मनुष्य मात्र ही नहीं, अपितु पृथ्वी के समस्त जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, आकाश-पाताल, नदी-नाले, पर्वत श्रृंखलाएँ आदि सब एक-दूसरे के अनुकूल हो गए।

जब सौभाग्य से देश को एक अच्छा, ईमानदार और कर्मठ योगी शासक के रूप में मिल ही गया है तो हम सबका भी यह नैतिक कत्र्तव्य हो जाता है कि हम भी इस रामराज्य रूपी महान यज्ञ में अपनी आहुति दें। हम सब नागरिकों को चाहिये कि राष्ट्र के उत्थान के लिए पूरी तन्मयता के साथ काम में लग जाएँ। ना तो गलत काम स्वयं करें और ना ही दूसरों को करने दें। भ्रष्टाचार स्वतः ही मिट जाएगा।

हम सभी भारतवासी नई सरकार से एक सुशासन एवं सुराज की कामना करते हैं। आशा करते हैं कि वर्तमान सरकार एक आदर्श राम राज्य की स्थापना करने में सफल हो। आओ आज सब मिलकर संकल्प करें कि हम सभी भारत को विश्व का सिरमौर बनाएँ तथा इस देश को पुनः विश्व के आध्यात्मिक गुरु का दर्जा दिलाएँ।

हमारी संस्कृति कर्म प्रधान है - जाति प्रधान नहीं Date :- 01-May-2014

ईश्वर मनुष्य के कर्मों के अनुसार फल देते हैं ना कि जाति के आधार पर। परन्तु आज मनुष्य अपनी जाति को ही सर्वोपरि समझ रहा है। दूसरे शब्दों में, कह सकते हैं कि मनुष्य वास्तव में जाति को जी रहा है। हमारे सनातन शास्त्रों में वर्ण व्यवस्था कर्मों के आधार पर है, उसके अनुसार कोई भी मनुष्य उँचा-नीचा नहीं होता, वह अपने कर्मों से पहचाना जाता है। रामचरितमानस में भी स्पष्ट लिखा है-

कर्म प्रधान विश्व करि रखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा।।

भगवान ने इस सम्पूर्ण विश्व की रचना कर्मों की प्रधानता को मद्देनजर रखते हुए की है, उसके आधार पर ही जो जैसा कर्म करता है, वह वैसा ही फल पाता है। अतः अच्छा काम करोगे तो अच्छा फल पाओगे और बुरा कार्य या कर्म करोगे तो फल भी बुरा ही पाओगे।

मनुष्य की पहचान उसकी परोपकारिता, दया-भाव, क्षमा, उत्तम शिक्षा आदि के आधार पर होनी चाहिए। जिस मनुष्य में इन गुणों की जितनी अधिकता हो, वह उतना ही उँचा कहलाया जाना चाहिए। इस गुण आधारित पहचान में जाति का कोई नामोनिशान होना ही नहीं चाहिए। यदि कोई व्यक्ति उच्च जाति में जन्म लेकर मूर्ख और अनपढ़ रह जाता है और दूसरा छोटी जाति में जन्म लेकर प्रकाण्ड पंडित बन जाता है तो आप स्वयं निर्णय करें कि उँचा कौन हुआ? इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि किसी पिता के दो बालकों में जो बच्चा माँ-बाप का आज्ञाकारी और अनुकूल कार्य करने वाला होता है, वह अधिक प्रिय होता है, जबकि बात-बात पर माता-पिता की अवहेलना करने वाला उतना प्रिय नहीं होता। अब यहाँ दोनों बच्चे एक ही खून और एक ही जाति के होते हुए भी उँचे और नीचे आचरण वाले हैं। अब बताइये कि हमारा जीवन कर्म प्रधान है या जाति प्रधान।

सः ईश्वरः सर्वभूतानाम् हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति।

गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं- हे अर्जुन! वह परमात्मा सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है। अतः किसी एक जाति को छोटा कहना, वास्तव में ईश्वर का ही अपमान है।

हमारे भारतवर्ष में तो न जाने कब से यही कहा जाता रहा है कि ‘राम को भजे सो राम का होहि, जात-पात पूछे नहीं कोई।।’ पर अब हमारे समाज को क्या हो गया कि हर कोई नाम से पहले जाति पूछता है। हमारे शास्त्रों में वर्णन है कि

जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान।

यानि हमें किसी की जाति-पांति के चक्कर में न पड़कर उस व्यक्ति के गुणों की ओर ध्यान देना चाहिए।

ऋषिकुल में पैदा हुआ परम विद्वान रावण, जिसे पूरे ब्रह्माण्ड का ज्ञान था, अपने अधर्म के कारण उसे तिरस्कृत होना पड़ा, जबकि केवट, निषाद आदि छोटे होते हुए भी श्रीराम ने उन्हें अपने गले लगाकर उच्च स्थान प्रदान किया। रैदास जूते बनाते थे, कबीर कपड़ा बुनते थे, परन्तु अपने उच्च कर्मों और आदर्शों के कारण समाज में अग्रणी स्थान प्राप्त किया और परमपद के भागी बनें। यह तो सभी जानते हैं कि कृष्णभक्त मीराबाई के धर्मगुरु रैदास जी थे। गुण और ज्ञान की पूजा शुरू से ही भारत की विशेषता रही है।

समय की आवश्यकता है कि जाति के आधार पर किसी को छोटा-बड़ा ना समझा जाए। किसी भी जाति का मनुष्य हो, प्रकृति ने उसे एक समान ही बनाया है। भेद तो हमारी दृष्टि में है और इसी कारण आज समाज विभिन्न जाति-प्रजातियों में बंट गया है। इन सबका दुष्परिणाम सम्पूर्ण देश को भुगतना पड़ रहा है। जिन विवादों का अस्तित्व ही नहीं होना चाहिये था, वे मुँह बाहें खड़े हैं। अब तक इतिहास में धर्म के नाम पर लड़ाई-झगड़े सुने जाते थे, पर अब जाति आधारित झगड़े बढ़ रहे हैं, जो देश को अन्दर-ही-अन्दर खोखला कर रहे हैं।

अपनी जाति-आधारित रीति-रिवाजों को बनाए रखो, उन्हें उत्सव के रूप में धूमधाम से मनाओ, पर उन्हें किसी अन्य के उपर थोपो मत। एक-दूसरे के धर्म के समान, एक दूसरी की जाति का सम्मान करो और परस्पर प्रेमभाव से दूसरों के भी उत्सवों में भाग लो, तभी देश से जाति रूपी वैमनस्य दूर हो सकेगी।

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक

दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

देश बचेगा तो धर्म और संस्कृति बचेगी Date :- 01-Apr-2014

आज देश में जाति, प्रान्त और पंथ के नाम पर राजनीति की जा रही है। ऐसा लगता है कि नेता देश के नाम पर मात्र अपनी जाति विशेष या प्रान्त विशेष को महत्व देकर सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं। पंथों को गुमराह कर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। दुर्भाग्य से आज देश की अखण्डता की बात करना साम्प्रदायिक बन कर रह गया है। देश की चिंता किसी को भी नहीं है।

दूर-संचार के साधनों में क्रांति के बावजूद भी पूर्व-पश्चिम और उत्तर-दक्षिण के बीच की दूरी बनी हुई है। यह मीडिया जगत की असफलता ही कही जाएगी कि वह प्रान्तों की दूरी दूर करने में उचित योगदान नहीं दे पाया। बजट प्रावधानों में जब पूरे देश के लिए समान नीतियाँ बनती हैं तो क्यों नहीं पूरा देश किसी भी एक विषय पर एकजुट हो पाता? इसका साफ मतलब यह है कि घोषित नीतियों का लाभ सबको नहीं मिल पाता। इसी कारण जनता में रोष व्याप्त रहता है, जो देश की अखण्डता को चोट पहुँचाता है। साथ ही, राजनैतिक स्वार्थों के कारण देश के संसाधनों को लूटाना, देश की नींव को खोखला करने वाला साबित हुआ है।

वोट-बैंक के कारण किसी सम्प्रदाय विशेष को लुभाने से जनता में मन-मुटाव और भेद बुद्धि की बढ़ोतरी हुई। देश के संसाधनों पर पहला हक गरीबों, कमजोरों और असहायों का बनता है ना कि साधन-सम्पन्न और पढ़े-लिखों का। यह कितना हास्यापद है कि किसी धर्म-विशेष का गरीब तो अल्पसंख्यक होने के नाते सरकारी सुविधा प्राप्त करे और बहुसंख्यक होने के जुर्म में दूसरा गरीब भूखा मर जाए। इस तरह का व्यवहार और नीति पापमूलक है, मानवता का मजाक उड़ाने वाली है।

गरीब का भी कभी कोई धर्म-सम्प्रदाय हुआ है? उसको तो सबमें रोटी ही नजर आती है, उसको भरपेट खाना मिले, यही राष्ट्र-नीति होनी चाहिए। जो व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे जीवन व्यतीत कर रहा है, उसे आरक्षण आदि से क्या लेना-देना है। उस गरीब की रोटी पर राजनीति करना महापाप है। आज समय की आवश्यकता है कि सभी सम्पन्न, चाहे वो किसी भी जाति, धर्म-सम्प्रदाय से हों, वे स्वयं आगे बढ़कर कहें कि पहले गरीब को भरपेट खाना मिले, उसके बाद सुविधाओं का बँटवारा हो। आखिरकार वे अभागे गरीब भी तो इसी देश के नागरिक हैं, जब तक वे दुःखी और भूखे हैं, हम कैसे अपने देश को महान कह सकते हैं।

यह ध्यान देने योग्य है कि जिस तरह आज जाति-प्रांत-पंथ को बढ़ावा दिया जा रहा है, अगर भविष्य में चीन-पाकिस्तान से भिड़ना पड़े तो क्या हम अलग-थलग होकर इन दुश्मनों से लोहा ले सकेंगे। उनकी निगाहों में हम सब जाति वाले, पंथ वाले, प्रान्त वाले और अमीर-गरीब भारतवासी हैं। यह कैसी विडम्बना है कि दुश्मन तो हमें भारतवासी समझता है, पर हम अपनी-अपनी पृथकता को लिए घूम रहे हैं। याद रखो, एकजुट भारत ही दुश्मन को ललकार सकता है।

अतः आगामी लोकसभा चुनावों में बेईमान, भ्रष्ट और राष्ट्रद्रोही प्रवृत्ति के लोगों का चयन भूलकर भी ना करें। सोच-समझकर जो भी पार्टी देश की सार्वभौमिक अखण्डता की बात करे, एकजुट हो, राष्ट्र धर्म निभाते हुए बिना किसी लालच और डर से उन्हें ही वोट दो। साथ ही, जो इस राष्ट्रीय-यज्ञ में वोट रूपी आहुति नहीं डालेगा, वह अपना तथा देश का नुकसान करेगा। इसलिए सभी को अपने विवेक से अच्छा-बुरा सोच-समझकर, भविष्य की चुनौतियों को मद्देनजर रखकर सच्चे राष्ट्र-वीरों को चुनाव में जिताकर अपने को धन्य करें क्योंकि देश बचेगा तो हम बचेंगे, हमारी संस्कृति तथा हमारा धर्म बचेगा।

राष्ट्र यदि मजबूत हाथों में होगा, तभी आप अपने धर्म-कर्म शांतिपूर्वक करके जीवन लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस बार के लोकसभा चुनावों का भारतीय सनातन संस्कृति के लिए बड़ा ही महत्व है। अतः इस मर्म को समझकर राष्ट्र व धर्म के उद्धार के लिए सबसे बड़ा दान ‘मतदान’ करें।

आज जातिवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद तथा वंशवाद ने अपना मुख इतना उँचा उठा लिया है कि भारत अपनी पहचान खो गया है। अतः हम सब पर यह दायित्व आन पड़ा है कि अपनी भारतीयता की खोई हुई छवि को फिर से स्थापित करने के लिए आगामी लोकसभा चुनावों में सच्चे राष्ट्रवादियों को भारी बहुमत से विजयी बनाएँ। 

विजेंद्र गोयल, मुख्य संपादक

दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

प्रकृति हमारी माँ है Date :- 01-Mar-2014

मनुष्य ने हमेशा प्रकृति से लिया ही है। प्रकृति उदारतापूर्वक मनुष्य की हर आवश्यकता की पूर्ति करती रही है, परंतु जब से मनुष्य ने अपने भोग-विलास के लिए प्राकृतिक संपदाओं के निर्बाध उपयोग के साथ-साथ उसे नष्ट करने का सिलसिला शुरू किया, तभी से अपने विनाश को भी आमंत्रित कर लिया। आज समूचा विश्व जिस तरह किसी न किसी प्राकृतिक आपदा की चपेट में आकर जन-धन की अपार क्षति उठा रहा है, उसने मनुष्य को प्रकृति के साथ अपने संबंधों पर पुनः विचार करने हेतु बाध्य कर दिया है।

आज हम वैज्ञानिक उपलब्धियों की चकाचैंध में अपने मूल तत्व एवं संस्कृति को भूल चुके हैं। अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए हम धरती की जीवनदायी व्यवस्था में व्यवधान उपस्थित करने पर उतारू हो गए हैं। अपने भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए उन्हीं प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट कर रहे हैं, जो प्रकृति ने स्वचालित संतुलन व्यवस्था के रूप में हमें दिए हैं। विकास करते हुए हमने प्राकृतिक संतुलन की महत्ता को एकदम विस्मृत कर दिया। इससे होने वाले दूरगामी परिणाम के रूप में हम अपने ही विनाश को अनदेखा करते गए। आज कार्बनडाईआॅक्साइड व अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में हो रही वृद्धि के कारण धरती का औसत तापमान काफी बढ़ चुका है। इस प्रकार पिछला दशक पूरी सदी का सर्वाधिक गरम दशक रहा है। परिवर्तन की यह दर पिछले वर्षों में तीव्रतम है। मौसम के नियंता माने जाने वाले वनों पर किस खतरनाक हद तक दबाव बढ़ चुका है, इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि विश्व-बाजार में लकड़ी व उसके उत्पादों का प्रतिवर्ष अरबों डाॅलर का कारोबार होता है। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक संतुलन का छिन्न-भिन्न होना स्वाभाविक है।

जल, अग्नि, पृथ्वी, वायु और आकाश- इन पाँचों के संतुलन से ही सृष्टि का संचालन होता है। किसी एक तत्व की कमी होने पर सृष्टि संचालन अस्त-व्यस्त हो जाता है। इसलिए प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना प्रत्येक व्यक्ति का कत्र्तव्य है।

प्राचीनकाल में सुखद जीवन का सार यही था कि मानव प्रकृति के साथ आत्मिक संबंध स्थापित कर बहुत सीध-सादा जीवन व्यतीत करता था। वह सिर्फ अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं के लिए प्रकृति का उपयोग करता था और इसके लिए वह प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होता था। उसकी इस भावना के फलस्वरूप उसके और प्रकृति के बीच आंतरिक सहयोग विद्यमान था। प्रकृति की गोद में उन्मुक्त विचरण करते हुए मनुष्य का मन आनंदानुभूति से भर उठता था।

मानवीय जीवन प्रकृति से इतना घुला-मिला है कि प्रकृति की परिधि के बाहर कुछ सोचा ही नहीं जा सकता। हमारा सम्पूर्ण जीवन, हमारी खुशियाँ, हमारा सुख, हमारे आविष्कार, हमारा स्वास्थ्य सब कुछ प्रकृति में ही निहित है। इसके बाद भी मनुष्य यदि प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की बात सोचता है, तो इसे उसके मिथ्या दंभ के सिवाय और क्या कहा जा सकता है। प्रकृति पर विजय की इस भावना ने ही प्रकृति को विनाश-लीला फैलाने पर विवश कर दिया है। प्रकृति के विभिन्न रूपों में विभिन्नता होते हुए भी उनमें एक नियमबद्धता है। उसके सभी रूपों के भीतर कोई श्रृंखला अनुस्यूत है, कोई नियम चल रहा है। जिसके परिणामस्वरूप समस्त सृष्टि सुव्यवस्थित रूप से चलती रहती है। सभी जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों एवं नदी-पर्वतों आदि पर प्रकृति का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव पड़ता ही है। ये सब हजारों-लाखों वर्षों से प्रकृति के नियमों का पालन कर रहे हैं। एक मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जिसने प्राकृतिक नियमों की अवहेलना करते हुए प्रकृति का विध्वंस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

अभी भी समय है संभलने का, अब तक हुए विनाश से सबक लेकर सादगी एवं संयम का जीवन अपनाकर, प्रकृति से मातृवत व्यवहार करके ही मानवजाति इस स्वनिर्मित विनाश से बच सकती है। हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रारम्भ से ही प्रकृति को माँ की संज्ञा दी है। अतः प्रकृति की रक्षा करना मानव का पहला धर्म होना चाहिए।

मुख्य संपादक, दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

 

मौन आध्यात्मिक तप है Date :- 01-Feb-2014

सामान्य रूप से शान्त रहकर चुपचाप रहना ‘मौन’ कहलाता है। मन को इधर-उधर भटकने से रोकना और मन में आने वाले सभी विचारों को रोकना महामौन की श्रेणी में आता है। जो व्यक्ति कभी बातें नहीं करता, अबोल रहता है, उसे ‘वाचा मौन’ कहा जाता है। वास्तविक मौन की अवस्था में मनुष्य केवल मुँह द्वारा ही नहीं, अपितु मन और शरीर को भी शान्त रखता है। ऐसे समय केवल भगवान की लीलाओं का मनन, चिन्तन करने में ही तल्लीनता रखनी चाहिए, यही सच्चा और सार्थक मौनव्रत कहलाता है। इसे ही मन का मौन कहा गया है।

मौन अनेक सात्विक गुणों से सम्पन्न कल्पवृक्ष माना जाता है, जो सुख-शांति, समाधान, आत्मज्ञान, प्रसन्नता, वैभव, तेज और मोक्ष को देने वाला होता है। ऐसा मौन सभी के लिए लाभदायक होता है। मौन के द्वारा एकाग्रता और स्मरणशक्ति बढ़ने में मदद मिलती है। मौन से दैवीशक्ति, इच्छाशक्ति और मनोबल अत्यन्त प्रभावशाली होता है। मौनव्रत के साथ यदि उपवास भी किया जाए तो उसका फल अनन्त गुणा हो जाता है।

बड़े-बड़े शास्त्रकारों के बारे में देखा जाए तो वे अपने आप को एक ही जगह केन्द्रित कर प्रयोग के द्वारा नए सिद्धांत खोज निकालते हैं। हिमालय में शांति से बैठे हुए मौनी, तपस्वी, महायोगी सर्वत्र विश्व में संचार करते हैं। मौनी होने के नाते उन्हें वाक्सिद्धि भी प्राप्त होती है। मौन धारण करने वाला व्यक्ति असत्य बोलने से मुक्त होता है। मौनव्रत में शरीर, इन्द्रियाँ, मन- इन सभी की शुद्धि होती है। आत्मबल बढ़ता है व शांति प्राप्त होती है। मौन द्वारा शरीर को आराम होने के कारण स्वास्थ्य-सामर्थ्य बढ़कर मानसिक रोग तथा तनाव दूर होता है।

मौन की महानता इससे ज्यादा और क्या हो सकती है कि यदि मूर्ख व्यक्ति मौन रहे तो वह भी बुद्धिमान जैसा माना जाता है। ज्यादा बातें करने वाला, चाहे कितना भी विद्वान क्यों न हो, समाज में आदर नहीं पाता। इसके विपरीत कम बोलने वाला और गम्भीर स्वभाव का व्यक्ति समाज में अपना अलग स्थान बनाता है। स्वयं प्रभु परमेश्वर मौन को अपना रूप बताते हैं। ज्यादा बातें या मजाक करने से दूसरों के मन को दुःख पहुँचता है और अन्त में, मित्रों और रिश्तेदारों से सम्बन्ध खराब हो जाते हैं। प्रतिदिन के जीवन में व्यापार, व्यवहार तथा युद्ध आदि कार्यों में रहस्यमय विषयों पर मौन रखने की नितान्त आवश्यकता है। शास्त्रों में भी कहा गया है कि दूसरे को दुःख देने वाली बातें नहीं करनी चाहिएं। झूठ, गलत और ज्यादा बातें करना व्यर्थ है। चुगली, निन्दा- जैसी बातें करना बड़ा अपराध है। वास्तव में, ऐसी बातें करना बीमारी और मौत को बुलावा देने के समान है।

आत्मप्रशंसा और परनिन्दा नहीं करनी चाहिए। ऐसा करना मानो स्वयं का आत्मघात करना है। इतना ही नहीं, निन्दा करने से अपना पुण्य उसके पास चला जाता है और उसका पाप हमें मिलता है। तात्पर्य यह है कि स्वस्तुति और दूसरों की बुराई से बेहतर है मौनव्रत रखा जाये।

संयमित-विवेकपूर्ण बातें करने से तथा मौनव्रत से बुढ़ापे में शांति से जीवन व्यतीत होता है क्योंकि कम बोलने वाले से किसी का झगड़ा या मन-मुटाव नहीं होता तथा मित्रों, सम्बन्धियों से स्नेह बना रहता है। इसलिए संकल्पपूर्वक अभी से कुछ समय का मौन धारण करने का अभ्यास प्रतिदिन अवश्य करना चाहिए तथा आवश्यकतानुसार कम से कम बातें तो सत्य व हितप्रद हों, वे ही बोलनी चाहिएं। ऐसा करने से हम समाज में शांति की धारा फैलाने में सहायक होंगे तथा दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दे सकेंगे।

मौन सर्वोत्तम भाषण है। मौन में शब्दों से भी अधिक ताकत होती है।

मौन शांति की भाषा है और इसका सहज अभ्यास सबको सुलभ है। पारस्परिक सद्भाव का स्रोत मन में है। कठिन से कठिन परिस्थितियों में मौन सफल अस्त्र है। मौन की भाषा पहले खुद सीखनी चाहिए, फिर दूसरों को प्रेरणा देनी चाहिए।

- विजेन्द्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

1 जनवरी हमारा नववर्ष नहीं है Date :- 01-Jan-2014

हर वर्ष 1 जनवरी के आगमन पर इस देश में 31 दिसम्बर की अर्धरात्रि में लोग जिस प्रकार नववर्ष मनाते हैं, वह हमारी पुरातन सभ्यता का अपमान है। पहले तो यह 1 जनवरी हमारा नववर्ष है ही नहीं और दूसरे इसे मनाने का ढंग पाश्चात्य सभ्यता की नकल पर है। दुर्भाग्य से हमने अपने संवत्सरों को त्याग कर इस पश्चिमी कैलेंडर को अपनाया है। हम यह भूल गए हैं कि हमारी सांस्कृतिक विरासत लाखों साल पुरानी और पाश्चात्य संस्कृति से हजारों गुना समृद्ध है। इसके बावजूद हम इसकी उपेक्षा कर रहे हैं। भारतीय तिथि-दिवस-मास वर्ष प्रणाली दुनिया की सर्वोत्तम वैज्ञानिक प्रणाली है। इस पर आधारित पंचांग ज्योतिष एवं खगोलविद्या के अनुपम उदाहरण हैं, जिस पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए।

सम्भवतः हमारे सांस्कृतिक पतन का मुख्य कारण 200 साल की अंग्रेजी दासता है परन्तु आजादी के बाद, हम अपनी सभ्यता संस्कृति का पुनस्र्थापन कर सकते थे, पर दुर्भाग्य से हमारे अधिकांश नेताओं पर देशी से अधिक विदेशी संस्कृति का प्रभाव था। उदाहरणार्थ, भाषाएँ संस्कृति की प्रमुख वाहक होती हैं, परन्तु हमने अंग्रेजी को भारतीय भाषाओं से अधिक महत्व दिया। ‘हिन्दी’ को आजादी के 66 साल बाद भी सही मायने में राजभाषा बनने से वंचित रखा।

आज अनेक मुस्लिम राष्ट्रों ने ‘हिजरी संवत्’ अपनाया हुआ है परन्तु भारत सरकार ने क्रिश्चियन कैलेंडर अपनाकर देश की नई पीढ़ी को हमारे अपने सांस्कृतिक संवत्सरों से अनभिज्ञ कर दिया है। गौर से देखा जाए तो 1 जनवरी को ‘नया’ कुछ भी नहीं है। प्रकृति मुरझाई-सी रहती है, फूल तो क्या, नए पत्ते भी वृक्षों पर नहीं लगते। सजीव प्रकृति केवल इन्हीं दिनों जड़वत प्रतीत होती है। सूर्य के उगने से सवेरा और इसके अस्त होने से सायं होती है, उसी प्रकार जब प्रकृति श्रृंगार करे, तभी नववर्ष होना चाहिए। ऐसा केवल चैत्र मास में होता है, जब हमारा सनातन नववर्ष ‘विक्रमी संवत्’ होता है। चैत्र मास का मौसम लगभग सभी स्थानों पर मनोरम होता है। इस समय प्रकृति उत्सव मनाती नजर आती है।

शनैः शनैः इस देश में पाश्चात्य संस्कृति हावी होती जा रही है। पारम्परिक पर्व, त्यौहार और उत्सव आदि भी इसी रंग में रंग चुके हैं। सांस्कृतिक मूल्यों का यह अवमूल्यन आज समाज के हर क्षेत्र में दिखाई पड़ रहा है। नव वर्ष मनाने की हमारी परम्पराएँ इतनी बहुल हैं कि देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग ढंग से मनाई जाती रही हैं। यह विभिन्नता हमारी संस्कृति की समृद्धि को दर्शाती हैं।

आज के सामाजिक एवं सांस्कृतिक ढांचे को देखें तो पाएंगे कि हम एक संक्रमण काल से गुजर रहे हैं, जहाँ हमारी जड़ें कमजोर हुई हैं। इन्हें मजबूत करने के लिए हमें पश्चिम की नकल को त्यागकर अपनी संस्कृति को अपनाना होगा क्योंकि पाश्चात्य संस्कृति ने हमारे नैतिक मूल्यों पर गहरी चोट की है। यही नहीं, गरीबी का लाभ उठाकर ‘धर्म परिवर्तन’ की प्रचेष्ठाएँ भी सांस्कृतिक हमला ही कहा जाएगा। हमारा आदिवासी व गरीब वर्ग आज इस धर्म परिवर्तन का शिकार होता जा रहा है जबकि इन आदिवासी समाजों की अपनी सभ्यता व संस्कृति पाश्चात्य सभ्यता से कहीं अधिक समृद्ध है। वास्तव में, धर्म परिवर्तन अपनी संस्कृति का परित्याग है।

इसी परिप्रेक्ष्य में भाषा का सवाल भी जुड़ा है। जब तक हिन्दी को सारे देश को जोड़ने वाली सम्पर्क भाषा के रूप में नहीं अपनाया जाएगा, तब तक हम पश्चिम की भाषायी गुलामों से भी मुक्त नहीं हो पाएंगे।

भारत की कालगणना प्राचीन ही नहीं, शास्त्रीय भी है। विक्रमी संवत् शादी-विवाह का मुहूर्त निकालने तक सीमित ना रह जाए, इसलिए इसे हमें अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए। बच्चों का जन्मदिन और विवाह की वर्षगांठ हिन्दी तिथि के अनुसार मनाने का प्रयास करें।

- विजेन्द्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

संयुक्त परिवार- सुखी जीवन का आधार Date :- 01-Aug-2013

भारतीय संस्कृति में संयुक्त परिवार की परम्परा अनादि काल से चली आ रही है। अगर यह कहा जाए कि संयुक्त परिवार का अस्तित्व सृष्टि के आरंभ से ही रहा है तो कोई अनुचित न होगा। व्यक्ति, परिवार तथा समाज- सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त एक-दूसरे पर निर्भर रहते हैं। वैसे भी प्रत्येक जीव का संबंध् अनादि काल से एक-दूसरे के साथ सदैव रहा है। किसी भी जीव को जन्म लेने का स्थान ढूँढ़ना नहीं पड़ता, बल्कि माता, पिता, भाई तथा बहन का सम्बन्ध कर्मानुसार स्वयमेव निर्मित हो जाता है। पति-पत्नी का संबंध भी पूर्वनिर्धारित तथा निश्चित है, परिणामतः वैसा ही निमित्त पाकर सामाजिक परम्परा के अनुसार वे एक-दूसरे के जीवन साथी बन जाते हैं। व्यक्ति तथा परिवार समाज के अंग हैं, सामाजिक व्यवस्था के अन्तर्गत जीवन-निर्वाह करना सबके लिये हितकारी होता है।

वर्तमान पाश्चात्य अंधानुकरण में अधिकतर व्यक्ति विवाह के पश्चात् अलग घर बसाना पसन्द करते हैं। विशेष रूप से, युवी पीढ़ी कुटुम्ब के बड़े-बुजुर्गों को बोझ रूप मानने लगती है। उस समय उन्हें यह अनुभव नहीं होता कि उनकी अपनी भी सन्तान हैं और वे स्वयं भी एक समय बूढ़े अवश्य होंगे। युवावस्था के नशे में भविष्य के भले-बुरे का आभास उन्हें नहीं रहता, अतः जोश में आकर होश खो देते हैं तथा तात्कालिक निर्णय कर बैठते हैं, जो आगे जाकर पश्चाताप का कारण बन जाता है।

पारिवारिक सुख उनको नसीब होते हैं, जो तात्कालिक असुविधा की अनदेखी कर देते हैं अथवा किसी बात को लेकर आक्रोश एवं आवेश में न आकर समस्या को विवेकपूर्वक सुलझाने का प्रयास करते हैं। संयुक्त परिवार के सुख दीर्घकालीन होते हैं, जिनका अनुभव कठिनाई तथा दुःख की घडि़यों में किया जा सकता है, जैसे- लम्बी बीमारी, आकस्मिक विपदा अथवा आर्थिक कठिनाई आदि। उस समय परिवार के सदस्य एक-दूसरे की सेवा-सहायता करते हैं, आपसी सहयोग, सामंजस्य तथा मेल-जोल के साथ समस्याओं से जूझते हैं, जिससे उस संघर्ष की अवस्था में भी सहानुभूति का अनुभव होता है और विषम परिस्थितियों में आंतरिक बल मिलता है।

इस प्रकार संयुक्त परिवार में सुखी जीवन छिपा हुआ है। परिवार में बड़े-बूढ़े लोगों के रहने से घर में समृद्धि बनी रहती है। समय-समय पर सत्परामर्श मिलता रहता है और घर सनाथ रहता है। आजकल टी.वी. सीरियलों में संयुक्त परिवार के नाम पर जो साजिश दिखाई जाती हैं, वही विचारधारा महिलाएँ घरों में अपना रही हैं, जिसका परिणाम एकल परिवारों में वृद्धि होना है। क्या यह सीरियल आम जनता की जीवन शैली का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करते हैं? नहीं, क्योंकि इसमें दिखाए जाने वाले परिवार प्रायः धनाढ्य होते हैं और सभी सीरियल में इन धनी परिवारों की जीवन शैली का चित्रण कर कौन-सी पारिवारिक शांति आम जनता को परोसी जा रही है? यह टी.वी. चैनल यदि चाहे तो संयुक्त परिवार का अच्छा चित्रण कर नैतिक मूल्यों को बढ़ावा दे सकते हैं। परन्तु नई पीढ़ी भी नया मसाला चाहती है और बेरोक-टोक स्वच्छन्दता की ओर बढ़ना चाहती है, अगर ऐसा ही चलता रहा तो आगे क्या होगा! इसकी कल्पना से भी भय लगता है, इसलिए नई पीढ़ी से यही प्रार्थना है कि वह आगे बढ़े जरूर, लेकिन पीछे देखना ना भूले, अपने सांस्कृतिक गौरव और मूल्यों को ना भूले।

संयुक्त परिवार विश्वास, पारिवारिक सहयोग एवं त्याग की भावना पर टिका हुआ है। इसमें परिवार के मुखिया को अपने व्यक्तिगत स्वार्थों का त्याग कर नीतिगत तथ्यों पर जोर देना होता है। परिवार के अन्य सदस्यों का भी कत्र्तव्य हो जाता है कि वे अपने निजी स्वार्थों को महत्व न देकर परिवार के हित में कार्य करें। एक-दूसरे की उन्नति देखकर खुश होना आदर्श संयुक्त परिवार की निशानी है। ऐसे परिवार में सबसे ज्यादा त्याग घर की महिलाओं को अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा का देना होता है।

अन्त में, एक बात और, आजकल भयंकर और बेलगाम महँगाई का भयावह दौर चल रहा है, इससे बचने या इसकी तीव्रता को कम करने का एकमात्र उपाय भी संयुक्त परिवार ही हैं। जहाँ चार रसोई की जगह एक रसोई में मिलजुल कर सबके लिए भोजन बनेगा, तो वहीं खर्च एक-तिहाई रह जाएगा। अतः स्वयं को खुशहाल बनाए रखने के लिए संयुक्त परिवार की ओर कदम बढ़ाएँ।

- विजेन्द्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

प्रकृति से छेड़छाड़ बंद करो Date :- 01-Jul-2013

प्रकृति से खिलवाड़ के कारण उत्तराखण्ड में प्रकृति-प्रकोप का कहर बरपा है। पर्यावरणविदों द्वारा बार-बार विरोध जताने के बावजूद पहाड़ों पर जगह-जगह नदियों की मुख्य धारा को मोड़कर अपना वैज्ञानिक-विवेक का इस्तेमाल कर बड़े-बड़े बाँध बनाए जाना, इस भीषण त्रासदी का मुख्य कारण है। वैज्ञानिकों द्वारा प्रकृति को जड़ समझना इसका मूल कारण है। प्रकृति इस ब्रह्माण्ड के नायक द्वारा रची गई है और उसका कोई कार्य बिना प्रयोजन के नहीं होता। इसलिए कहीं पर्वत-श्रृंखला हैं तो कहीं मैदानी इलाका, तो कहीं बड़े-बड़े जलाशय। इन सबको ब्रह्माण्ड-नायक ने हमारी सुविधा के लिए बनाया है, ना कि इनको अपनी स्वार्थप्ररता के कारण छेड़छाड़ करने के लिए।

यह सबको अच्छी तरह याद ही होगा कि अभी कुछ वर्ष पूर्व चीन में बेमौसम भयंकर बर्फबारी हुई, वो भी उन स्थानों पर जहाँ कभी बर्फ नहीं पड़ती थी। इसी प्रकार चीन की सभी प्रमुख नदियों में अभूतपूर्व बाढ़ आई, जिससे बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ। चीन ने प्रकृति के साथ जबरदस्त छेड़छाड़ की थी, जैसे- कई बड़ी नदियों की धारा बदलकर बाँधों का निर्माण किया, साथ ही विस्फोटों द्वारा पर्वतों को उड़ाकर उनका मलबा बाँध बनाने के काम में लिया। चीन के वैज्ञानिकों ने एक और गलत काम किया था कि आकाश में उड़ते बादलों पर कैमिकल की वर्षा कर जबरदस्ती मनपसंद जगहों पर बरसात करवाई। कुछ समय के लिए चीनी वैज्ञानिक अपने कृत्यों पर खुश होते रहे, लेकिन बाद में प्रकृति ने अपना आक्रोश दिखाया तो सब तहस-नहस कर डाला और सब कुछ उजाड़कर रख दिया।

चीन तो धार्मिक देश नहीं है, परन्तु भारत की विश्व में धार्मिक देश के रूप में छवि बनी हुई है। प्रकृति भगवान का ही दूसरा रूप है। हमारे सभी धार्मिक शास्त्र यह कहते हैं कि जो हमें कुछ देता है, वह देवता कहलाता है। अब आप ही सोचिए, प्रकृति हमें क्या-क्या नहीं देती? हमारी हर जरूरत केवल प्रकृति ही पूरा कर रही है। परन्तु जब मानव अपने स्वार्थवश प्रकृति का दोहन करता है तो संतुलन बिगड़ने के कारण इसी प्रकार की विनाश लीलाएँ हमें देखनी और झेलनी पड़ती हैं। लाभ तो कोई और उठा जाता है और भोगना पड़ता है मजबूर जनता को।

देखने में आया है कि देश के सभी प्रमुख हिल-स्टेशनों पर पहाड़ हरियाली-विहीन कर गंजे कर दिए गए हैं और उन पर बड़े-बड़े होटल बनाकर कमाई की जा रही है। इसी प्रकार प्रायः सभी बड़ी नदियों के मार्गों पर अवरोधक लगाकर बाँध बनाए जा रहे हैं।

यह समझने वाली बात है कि प्रकृति हमें बिना माँगे, हमारी आवश्यकता के अनुसार स्वयं देती है। बादल समय आने पर जल बरसातें हैं, वृक्ष समयानुसार फल देते हैं, वायु बिना रूके सबको जीवन देती है। सूर्य-चन्द्रमा बिना माँगे प्रकाश और उर्जा देते हैं। प्राकृतिक रूप से बनी झीलें, तालाब आदि हमें वर्ष भर पीने को पानी देते हैं। परन्तु जब हम आधुनिकता का शिकार होकर इसी देवता रूपी प्रकृति से जबरदस्ती सुविधाएँ लेने लगते हैं, इसका शोषण करने लगते हैं, तब यह बिगड़ जाती है और अपना रौद्र रूप दिखाकर सब उपलब्धियों को चैपट कर देती है। ध्यान देने योग्य है कि पर्वतों के उपर आसमान छूते वृक्ष क्या हम लगाने जाते हैं? यह सब स्वयं प्रकृति द्वारा अपने निर्धारित मापदण्डों द्वारा किया जाता है। इन्हीं वृक्षों से बादल आकर्षित होकर भूमि पर वर्षा करते हैं और वृक्षों की जड़ें भूमि की मिट्टी को जकड़े रखती हैं, जिससे भूस्खलन नहीं होता।

हमें अपनी सुरक्षा के लिए चाहिए कि प्रकृति को अपना निर्धारित कार्य निर्बाध गति से करने दें, उसमें अपना वैज्ञानिक विवेक का समन्वय कर मूर्खता न दिखाएँ। प्रकृति से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ ना करें और प्रकृति से प्रेम करें।

किसी भी बड़े हादसे एवं प्राकृतिक दुर्घटना जैसे- भूकम्प, सूनामी, बाढ़ इत्यादि के आने पर बड़े नेता-लोग प्रभावित इलाके का हवाई सर्वेक्षण करते हैं। यह बात समझ नहीं आती कि उपर हवाई जहाज में बैठकर क्या ये लोग कोई जादू-टोना करते हैं? घटना के हालातों का तो घर बैठे ही समाचार माध्यम से भलीभांति अंदाजा लगाया जा सकता है। नेताओं के वहाँ जाने से राहत कार्यों में बाधा अलग पड़ती है। अगर इन नेताओं को वास्तविक हमदर्दी है तो उन्हें वहीं तम्बू गाड़कर बैठकर स्थिति का अवलोकन करना चाहिए व राहत कार्यों में सहयोग करना चाहिए।

- विजेन्द्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

संस्कृत विश्व की सरलतम, दिव्य व अनुपम भाषा है Date :- 01-Jun-2013

संस्कृत विश्व की सर्वांगपूर्ण, सुसंस्कृत तथा प्राचीनतम भाषा है। इसकी बराबरी की कोई भी भाषा नहीं हो सकती। ग्रीक, लैटिन, अंग्रेजी, जर्मन, फारसी आदि सभी भाषाएँ इसी संस्कृत भाषा से प्रादुर्भूत हुई हैं। ऐसी महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक आधार वाली भाषा का अध्ययन विश्व के सभी लोगों को इसलिए करना चाहिए क्योंकि उनकी अपनी-अपनी भाषाओं की उत्पत्ति की मूल यह संस्कृत भाषा ही है। साथ ही, संस्कृत भाषा में सर्वोत्तम अध्यात्मतत्व, विशुद्ध ज्ञान, सदाचार, परोपकार व भगवद्भक्ति के हजारों दुर्लभ गुणों का समावेश है। वेद, उपनिषद्, गीता, पुराण, वाल्मीकि रामायण, दर्शनशास्त्र, धर्मशास्त्र आदि सभी संस्कृत भाषा में ही रचे गए हैं। वास्तव में, मनुष्य जाति के कण्ठ और तालू आदि से प्राकृतिक रूप से सम्बन्ध रखने वाली यह विश्व की एकमात्र और ईश्वरीय भाषा है। इन सब गुणों के आधार पर संस्कृत को साक्षात् दैवी भाषा माना जा सकता है। इसकी महिमा अनन्त है और इसके अनन्त गुणों का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता।

आज हमारे देश में संस्कृत-भाषा का दिनों-दिन ह्रास होता जा रहा है, इसके चलते यह भाषा एक दिन लुप्तप्रायः हो जाए तो कोई बड़ी बात नहीं है। पाण्डवों, चन्द्रगुप्त मौर्य, विक्रमादित्य और पृथ्वीराज चैहान के राज्य तक इस भाषा का खूब बोलबाला था और यह इनकी राजभाषा भी थी। इनके राज्य में सभी राजनीतिक कार्य तथा दण्डविधान, सब स्मृतियों आदि के आधार पर ही किए जाते थे। नीति, धर्म और अध्यात्म विषयक साहित्य को देखने से मालूम होता है कि संस्कृत भाषा सारे भारत में व्यापक रूप से प्रचलित थी। आज भी भारतवर्ष में कोई भी ऐसा प्रांत और जिला नहीं, जहाँ संस्कृत भाषा न पाई जाती हो।

हमारी संस्कृत भाषा के पूर्व की कोई अन्य भाषा और संस्कृत वर्णमाला के पूर्व की कोई अन्य वर्णमाला देखने-सुनने में नहीं आती, इससे संस्कृत भाषा की अनादिता सिद्ध होती है। इस भाषा की वर्णमाला में प्रत्येक शब्द को जैसा बोला जाता है, ठीक वैसा ही लिखने का प्रावधान है, यानि किसी भी प्रकार का तुक्का इस्तेमाल करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। यह संस्कृत भाषा कितनी मधुर है, इसे केवल इस अमृतमय भाषा का आस्वादन करने वाले विद्वान ही जानते हैं। संस्कृत का व्याकरण भी अलौकिक है तथा ऐसा विशिष्ट व सर्वांगपूर्ण व्याकरण जगत की किसी भी भाषा में देखने को नहीं मिलता।

आज सर्वत्र व्याप्त भ्रष्टाचार, अशान्ति, अनीति का मुख्य कारण मानव का अपनी मूल संस्कृति से दूर होना है। भारतीय संस्कृति की संवाहिका संस्कृत भाषा रही है। संस्कृत ही भारतीय सभ्यता की आधारशिला रही है। इसलिए संस्कृति व संस्कृत का संरक्षण बहुत जरूरी है।

विश्व की इस महानतम और गौरवशाली भाषा को बचाना हमारा परम कत्र्तव्य है। संस्कृत भाषा के बचने से ही धर्म बचेगा, क्योंकि हमारे जितने भी मूल धार्मिक ग्रंथ हैं, वे सब इसी भाषा में रचे गए हैं। ऐसी दिव्य व अनुपम संस्कृत-भाषा रूपी अलौकिक रत्न का यदि हमारे भारतवर्ष में अभाव हो जाएगा तो पुनः इसका प्रादुर्भाव होना बहुत कठिन होगा। अतः राष्ट्रहित में सरकार और देशवासियों से प्रार्थना है कि जिस प्रकार भी ऐसी वैभवशाली भाषा जीवित रहे तथा उत्तरोत्तर इसका खूब प्रचार हो, यह पूर्ण रूप से समृद्धि को प्राप्त हो, इसके लिए सभी को साम्प्रदायिक दृष्टि को छोड़कर यथाशक्ति इसके उत्थान में लग जाना चाहिए।

पहले तो विदेशी आक्रमणों से, तत्पश्चात् विधर्मियों द्वारा इस संस्कृत भाषा पर बहुत कुठाराघात हुआ है। संस्कृत विश्व की ऐसी एकमात्र भाषा है, जिसे षडयंत्रपूर्वक नष्ट करने का विदेशियों और विधर्मियों द्वारा प्रयास किया गया है। रही-सही कसर हम इसकी अवहेलना और अपने अंग्रेजी प्रेम से इसका नाश कर पूरा कर रहे हैं। याद रखो, संस्कृत बचेगी तो सृष्टि बचेगी।

सम्भव हो तो एक प्रयोग स्वयं करके देखें, दो अंग्रेजी के विद्वानों का वार्तालाप सुनें और फिर दो संस्कृत के विद्वानों का वार्तालाप सुनें। आपको संस्कृत में बातचीत करते व्यक्ति देवपुरुष लगेंगे और ऐसा महसूस होगा कि उनके मुख से अमृतवर्षा हो रही है।

- विजेन्द्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

नैतिक शिक्षा का अभाव ही पतन का कारण है Date :- 01-May-2013

आज से 30-35 वर्ष पूर्व तक कभी ‘बलात्कार’ नाम का शब्द सुनने में भी नहीं आता था। ऐसा भी नहीं होता था कि बहन-बेटियाँ घर पर ही रहती हों, वे अपने घरेलू कामों से व दफ्तरों में नौकरी आदि के लिए भी आती-जाती थीं। स्कूल-कालेजों में भी लड़के-लड़कियाँ साथ-साथ पढ़ते थे। उस समय समाज में इतनी नैतिकता व्याप्त थी कि अगर कोई बहू-बेटी अपने परिजनों के साथ जा रही होती थी तो कोई भी उनको नजर उठाकर देखता तक नहीं था।

दूरदर्शन, चलचित्रों और विज्ञापन आदि में नारी का प्रयोग तो होता था, पर उसे परोसा नहीं जाता था, उसकी गरिमा के अनुरूप ही उसे दिखाया जाता था। पर जब से मोबाइल, इंटरनेट और शिक्षा पर विदेशी प्रभाव हावी हुआ, तब से सारा खेल बिगड़ गया और इन सब चीजों ने नारी को एक भोग्य पदार्थ बना डाला। जहाँ विज्ञापन में नारी को दिखाने की कोई तुक भी नहीं है, वहाँ पर उसके अंग-प्रदर्शन द्वारा लोगों को रिझाया जा रहा है। बिना बात लोगों के अन्दर नारी के प्रति उत्सुकता व कामुकता पैदा की जा रही है। वास्तव में, यही कामुकता आज बलात्कार के रूप में सर्वत्र अपना घिनौना रूप दिखा रही है।

भारतवर्ष का सबसे ज्यादा पतन शिक्षा में नैतिकता के अभाव के कारण हुआ है। धीरे-धीरे पाश्चात्य जगत के प्रभाव के कारण शिक्षा पर भौतिकता हावी हो गई। शिक्षा बाजारमूलक होने से बच्चों के संस्कारों पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिए जाने के कारण उनमें नारी के प्रति आदर की भावना का लोप होता गया। स्कूल-कालेजों में साथ पढ़ने वाले बच्चों में लड़का-लड़की के बीच भाई-बहन की अनुभूति के स्थान पर ‘दोस्त’ ने अपनी पहचान बना ली। रही-सही कसर इंटरनेट के द्वारा ‘दोस्ती’ ने पूरी कर दी। आज हालात ये हो चुके हैं कि इंटरनेट के बदचलन के कारण बहनें व बेटियाँ चारदीवारी में रहकर भी सुरक्षित नहीं हैं।

आज इंटरनेट दावानल की अग्नि की तरह भारतीयता को भस्म करने में लगा हुआ है। बच्चे घर बैठे बिगड़ रहे हैं, इससे समाज सामाजिक स्तर पर दिन-प्रतिदिन खोखला होता जा रहा है। आधुनिकता के इस दमनचक्र में सबसे ज्यादा आघात नारी जाति को लगा है। माँ-बाप काम-धन्धों में ऐसे लिप्त हैं कि उन्हें धन कमाने के अलावा कुछ नजर नहीं आ रहा है। बच्चों की आधुनिकता को वे अपनी आधुनिकता समझकर इतरा रहे हैं। माँ-बाप आज समझ ही नहीं पा रहे हैं कि उनके ध्यान न देने के कारण बच्चों में कितने विकार आ चुके हैं।

समय के अभाव और काल के प्रभाव के कारण लोगों में धार्मिकता कम होती जा रही है, कारणवश आज कोई भी अभिभावक अपने बच्चों को यह शिक्षा नहीं दे पा रहा कि उन्हें अपने सनातन धार्मिक ग्रंथों जैसे- गीता, रामायण, महाभारत आदि का पठन और मनन करना चाहिए, जिससे वे पतन की ओर अग्रसर होने से बचें। यह तो हमारे हाथ हैं कि बच्चे को बताया जाए कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है। जब तक उसे यह भेदभाव नहीं समझ आएगा, तब तक वह गलत रास्ते पर भी सही समझ कर जाएगा। अच्छे-बुरे का अन्तर हमारे सद्ग्रंथ ही भली-भांति बता सकते हैं।

सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद की नाईं।

रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में भी कहा गया है कि परनारि को ऐसे तज (त्याग) देना चाहिए, जैसे- चैथ के चाँद का दर्शन अशुभ माना जाता है। सोचो परनारी में सहानुभूति दिखाने की आवश्यकता ही क्या है? बस यहीं से पापवृत्ति में मन रम जाता है और सब कुछ भूलकर वह उस नारी के चिन्तन में ही रत रहता है। कारणवश, उसका उचित, अनुचित का बोध जाता रहता है।

तुलसीदास जी ने कहा है कि - परधन धूल समान और परनारि मात समान।

अगर हम अपने सद्ग्रंथों से जुड़े रहें तो परनारी को माँ के रूप में देखेंगे तो बताइये पाप कैसे सम्भव हो सकता है। यह संस्कारविहीनता का ही परिणाम है जो दो-चार वर्ष की अबोध बालिकाएँ बलात्कार का शिकार हो रही हैं।

आज के संदर्भ में प्रत्येक माता-पिता व अभिभावकों का यह कत्र्तव्य है कि वे इस बात पर ध्यान दें कि उनके छोटे से बच्चे से कोई भी ज्यादा लाड़-चाव ना दिखाएँ, कुकर्मी किसी भी रूप में हो सकता है।

- विजेन्द्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

हमें अपने लिये चिडि़या (गौरेया) को बचाना होगा Date :- 01-Apr-2013

सुबह सूर्योदय से पूर्व पौं फटने के समय जब चिडि़याँ, जिसे हम गौरेया के नाम से भी जानते हैं, सामूहिक रूप से चहचहाती हैं, तो उस समय ऐसा मधुर कोलाहल होता है कि मन आनन्द से झूम उठता है। शायद वे भगवान का धन्यवाद करती हैं जो उन्हें एक नया दिन प्रदान किया गया। चिडि़यों का यह सामूहिक मधुर गान हर किसी को भाता है। परेशान और बीमार व्यक्ति को कभी शोर अच्छा नहीं लगता, परन्तु चिडि़यों का यह कलरव गान, उन्हें भी खूब भाता है और मन को सुकून देता है, साथ ही बीमारी और परेशानी से भी मुक्ति दिलाने वाला होता है।

यह गौरेया प्रकृति और पर्यावरण की पहरेदार है। सुबह सबको अपनी मनोरम तान से अमृतमयी शांति प्रदान करती है। दिन में खल-खलिहानों से कीट-पतंगों को खाकर खेती-बाड़ी में सहयोग करती हैं। घरों में कितने ही विषाक्त जीव-जन्तुओं को खाकर उन्हें खत्म करती है। अपनी गरिमामयी फुदक से बड़ों और बच्चों का मन मोह लेती है। यह चिडि़या अपने को घर का सदस्य ही मानती है। तभी तो रसोई घर तक अधिकारपूर्वक कुछ भी चुग कर खा जाती है। घर में किसी से नहीं डरती, अपितु बिल्कुल नजदीक से खाने का टुकड़ा उठाकर खा जाती है। सही अर्थों में यह अपने होने का हमें बड़ा ही सुखद अहसास कराती है।

एक बात और गौर करने की है कि कबूतर, कौए आदि को तो सब घर से भगा भी देते हैं, पर चिडि़या को कोई नहीं भगाता, अपितु उसे तो मौका दिया जाता है कि आ जा और खा जा। यह तो सभी जानते हैं कि घरों में दो ही शोर सबसे अच्छे माने जाते हैं, पहला बच्चे की किलकारी और दूसरा चिडि़यों का चहचहाना।

अब यह उपरोक्त महिमा अतीत का सपना बनती जा रही है। आधुनिकता ने इस सदस्य चिडि़या को सबसे दूर कर दिया, अब यह विलुप्त होती जातियों में सम्मिलित हो गई है। मोबाइल टावरों से निकलने वाली तरंगों के कारण चिडि़या के अण्डे देर में फूटते हैं, कारणवश चिडि़या जब एक नियत समय तक अण्डे में हलचल नहीं पाती तो वह उन्हें खराब समझकर गिरा देती है। हम मोबाइल तो सुन रहे हैं पर चिडि़यों के चहचहाने की कीमत पर।

दूसरे अन्धाधुंध भवन निर्माण ने चिडि़यों के लिए बैठने लायक कोई स्थान नहीं छोड़ा। गली-मोहल्लों से पेड़ गायब होते जा रहे हैं। चिडि़यों को चहचहाने के लिए पेड़ चाहिएं, ना कि मकान। साथ ही आधुनिक भवन निर्माण ऐसा हो रहा है कि चिडि़या चाह कर भी अपना घोंसला नहीं बना पातीं। पहले जंगले-खिड़की, रोशनदान, दीवारों पर पत्थर की जालियाँ लगी होती थीं, जिनके अन्दर या उपर प्रजनन के समय वह घोंसला बना लेती थीं। साथ ही पहले के मकानों में हवा-प्रकाश आदि के लिए दीवारों में झरोखे बनाए जाते थे, उनका इस्तेमाल भी चिडि़या करती थीं, और तो और कुछ परोपकारी लोग अपने घरों की दीवारों में कुछ छेद इसलिए भी करा देते थे कि कोई पक्षी आकार बैठ जाएगा।

आज व्यस्त और आधुनिक जीवन ने चिडि़या को हमसे छीन लिया। मानव की सोच में स्वार्थ ज्यादा परोपकार कम होता जा रहा है। उसका ध्यान केवल मैं और मेरे बच्चों पर ही केन्द्रित है। हमारे दैनिक जीवन से न जाने कितने असंख्य जीवाणुओं को चिडि़या दूर रखने में सहायक होती थीं, इसके न रहने से तरह-तरह की जीवाणु आधारित बीमारियों से मनुष्य बेमौत मर रहा है। खेतों के खरपतवार और कीट-पतंगों को पहले चिडि़या खाती थी, पर अब रासायनिक जहर कीड़ों को, मनुष्यों को और चिडि़यों को भी मार रहा है। कारणवश, जहरीले अन्न से घर-घर में कैंसर जैसी बीमारी एक महामारी का रूप धारण करती जा रही है।

आज यदि स्वयं को बचाना और सुरक्षित रखना है तो हमें चिडि़या को बचाना होगा। अगर हम संकल्प लें तो अभी भी चिडि़या बच सकती है। सभी राज्य सरकारें चिडि़या को ‘राज्य पक्षी’ घोषित करें, क्योंकि राष्ट्रीय पक्षी तो हमारा सिरमौर ‘मोर’ है। अतः चिडि़या को राज्य पक्षी बनाकर संरक्षित किया जाए। मोबाइल टावरों के प्रदूषित तरंगों का समाधान सरकार की ओर से किया जाए। किसान भाई ज्यादा फसल के लालच में फसलों पर जहर छिड़कने से बाज आएं! सभी व्यक्तियों को प्रयासपूर्वक अपने घरों में ऐसा समुचित इंतजाम करना होगा, जिससे चिडि़या घर में आ सकें, कुछ खा सकें व प्रजनन काल के दौरान अपना घोंसला भी घर में बना सके। साथ ही घर में चिडि़याँ पंखों आदि से कटकर ना मरें, इसका भी ध्यान रखना बहुत जरूरी है। हर घर में चिडि़यों के लिए दाना-पानी अवश्य रखा जाना चाहिए।

प्रकृति ने चिडि़या हमें वरदान रूप में दी है, इसको मिटाए नहीं। इसको जीवित रखने के लिए हर सम्भव सहयोग करें और प्रकृति का आनन्द लें।

- विजेन्द्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

भ्रष्टाचार कैसे खत्म हो! Date :- 01-Mar-2013

कम प्रतिभावान का अधिक महत्वाकांक्षी होना भ्रष्टाचार का मूल कारण है या प्रतिभावान बनने के लिए किया गया महँगा पढ़ाई-लिखाई पर खर्च, अच्छे स्कूल या प्रशिक्षण संस्थान में प्रवेश के लिए दी गई रिश्वत इसका कारण बनता है। ये सब खर्चे करने के बाद जब व्यक्ति को नौकरी पाने के लिए मोटी रकम उपहारस्वरूप देनी पड़ती है तो वह उस पद को पाकर अनाप-शनाप तरीकों से धन उगाने की जुगाड़ में लगकर अपना और अपने समाज का पथ-भ्रष्ट करने लग जाता है। यह भ्रष्टाचार की बीमारी एक दीमक की तरह समाज को भीतर-ही-भीतर खोखला करती जाती है। जब किसी को रिश्वतखोरी की आदत पड़ जाती है तो उसमें अच्छे-बुरे का भेद करने की मति नहीं रह जाती और वह धीरे-धीरे समाज का दुश्मन बन जाता है।

अब एक डाक्टर का उदाहरण लीजिये, बच्चा पहले तो अच्छी-खासी राशि देकर उँचे व नामी स्कूल में प्रवेश लेगा, बाद में प्रत्येक विषय की महँगी ट्यूशन रखेगा। इतना सब कुछ करने के पश्चात् अच्छे मेडिकल कालेज में प्रवेश के लिए लाखों-करोड़ों में रिश्वत देगा। जब डाक्टर बनकर बाहर आता है तो दो या चार वर्ष तक उसे जूनियर डाक्टर बनकर समय काटना पड़ता है। अब इतने बड़े समय तक पैसा खर्च करते-करते वह छटपटा जाता है कुछ कमाने के लिए। एक डाक्टर बनने में जब इतना निवेश कर दिया जाता है तो वह अपनी उस शपथ को, जिसमें रोगी को बचाना उसका सर्वप्रथम धर्म होता है, उठाकर एक ओर रख देता है। अब उस डाक्टर की नजर रोगी की बीमारी और मजबूरी या परेशानी पर नहीं अपितु उसकी जेब पर होती है। छोटी-मोटी बीमारी को बड़ा बनाकर परोसना और उसकी भयावहता बढ़ाने के लिए बड़े टेस्ट करवाना, रोगी को बिना इलाज ही मारने के बराबर है। यह रोगी की जेब पर कुठाराघात और देश में सुलभ संसाधनों का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है?

यहाँ एक प्रश्न पैदा होता है कि क्या डाक्टर बनने के लिए बच्चे को उँचे और फैन्सी स्कूल में जाना अनिवार्य है? साथ ही मेडिकल कालेजों को फीस के अलावा मोटी रकम अलग से क्यों चाहिए? तथा वह रकम जाती किसके पास है? जब फीस मुँह-माँगी मिल रही है तो यह चढ़ावा क्यों? वास्तव में, ये सब बातें ही एक प्रतिभावान डाक्टर को पैसा बटोरने के लिए मजबूर कर रही हैं। इन मोटे खर्चों के कारण ही आज डाक्टरों से जाने-अनजाने कितने ही पाप हो रहे हैं तथा मजबूर और परेशान रोगियों की बददुआएँ मिल रही हैं।

इसी प्रकार पुलिस विभाग में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। पुलिस में भर्ती के समय एक जवान को काफी कीमत चुकानी पड़ती है। थानों के रेट बने हुए हैं। यदि पुलिस के जवानों को उपर के खर्च ना देने पड़ें और उनको दिया जाने वाला प्रशिक्षण मात्र शारीरिक ही ना होकर, नैतिकता का पाठ और जनता की सेवा करने वाला हो तो कोई कारण नहीं कि पुलिस जनता का दिल जीत ले। पुलिस वालों को अन्य सरकारी कर्मचारियों जितनी सुविधाएँ और वेतन मिलें तो उन्हें रिश्वत आदि के चक्कर में पड़ने की आवश्यकता ही ना रहे। व्यवस्था में सुधार से पुलिस और आम जनता का हित होगा।

चुनाव सुधारों का कारगर ना होना राजनीति में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहा है, इसी कारण उपर किया गया भ्रष्टाचार नीचे को बह रहा है। एक नेता को आगे बढ़ने के लिए प्रतियोगिता में करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। अतः मजबूरन एक नेता को अपने सीमित कार्यकाल में उससे ज्यादा वसूलने की चिन्ता लगी रहती है, क्योंकि पाँच साल बाद उसे फिर से करोड़ों रुपये चाहिएं। नेताओं में सेवाभाव आ ही नहीं सकता, क्योंकि राजनीति लेन-देन का व्यापार बन चुकी है। आज सच्चे, ईमानदार व देशभक्त बिना पैसे लगाए आगे राजनीति में आ नहीं सकते तो देश पर ऐसे ही राजनीतिक व्यापारियों या उद्योगपतियों का कब्जा हो जाएगा। ये तो सब जानते हैं कि व्यापारी पैसा लगाकर कमाने की विद्या में पारंगत होता है। यही हाल रहा तो ‘देश सेवा’ नामक शब्द ‘शब्दकोषों’ की धरोहर बनकर रह जाएगा।

इस सबका निष्कर्ष यही है कि हमारी व्यवस्था में दोष है, दोष व्यक्ति में नहीं है, व्यक्ति की तो विवशता है। इस विवशता को नैतिकता से ही दूर किया जा सकता है।

- विजेन्द्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

महँगाई ऐसे कम हो सकती है! Date :- 01-Feb-2013

आज से 48 वर्ष पूर्व सन् 1965 में देश में खाद्यान्न का अभूतपूर्व संकट था। देश के सभी गोदाम खाली पड़े थे, मजबूरी में अमेरिका की शर्तों पर भारत अन्न आयात करने पर विवश था। तब सादगी के प्रतीक प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी ने देशवासियों को प्रत्येक सोमवार को व्रत करने का आवाहन किया। वह समय ऐसा था जब नेतागण जनता के दिलों पर राज करते थे और जनता भी उनकी प्रत्येक बात को आदेश समझकर सर आँखों पर लेती थी। शास्त्री जी के कहने मात्र पर सभी होटल, रेस्टोरेंट इत्यादि प्रत्येक सोमवार शाम को बन्द होने लगे। प्रधानमंत्री के इस आवाहन ने देश में एकता और प्रतिबद्धता का ऐसा जोश भरा कि भूखों मरने की स्थिति आने पर भी देश उस कठिन समय को आराम से निकाल सका।

आज देश में विपरीत स्थिति है, पहले खरीदने के लिए अन्न नहीं था। आज देश में अन्न तो भरपूर है, पर घनघोर महँगाई के कारण आम जनता के पास अन्न खरीदने के लिए पैसा नहीं है। इस कारण देश का लाखों टन अनाज गोदामों में सड़ के जा रहा है और गरीब जनता भूखों मरने को विवश है। संस्कार विहीन सरकार में इच्छाशक्ति की कमी है, कारणवश अनाज सड़ कर तो खराब हो जाता है, पर उसे गरीब जनता में मुफ्त में बाँटने की हिम्मत नहीं है। यह वही मिसाल हो गई कि ‘खरबूजा छुरी पर गिरे या छुरी खरबूजे पर गिरे, कटना तो खरबूजे को ही है।’ अनाज नहीं था तब भी और आज अनाज बहुत है, फिर भी गरीबों को तो भूख का ही दामन थामना पड़ रहा है।

लगातार कई वर्षों से महँगाई कम करने के सरकारी प्रयास विफल हो रहे हैं, उल्टे दिन-प्रतिदिन यह बढ़ती ही जा रही है। सरकारी मिलीभगत से उपभोग की वस्तुओं की कृत्रिम कमी बना-बनाकर भाव बढ़ाने का षड्यंत्र माफिया द्वारा सफलतापूर्वक किया जा रहा है। कारणवश गरीब जनता अपने ही हाथों चुनी सरकार से शोषित हो रही है। पहले कभी सरकारें अचानक छापे मारकर मुनाफाखोरों के अन्दर डर पैदा करती रहती थीं, पर वर्तमान में तो ऐसे लोग मौज उड़ा रहे हैं।

महँगाई को कम करना सरकार के बूते की बात नहीं है, अब तो समय आ गया है जनता को स्वयं ही इसका समाधान निकालकर अपने अस्तित्व की रक्षा करनी है। अभी हाल में हुए 16 दिसम्बर को वसंत विहार में चलती बस में गैंगरेप की शिकार दामिनी के समर्थन में एकत्रित विशाल जन-समूह ने जिस प्रकार बिना नेतृत्व के अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है, यह भविष्य के लिए भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ साबित होगी। इसी एकजुटता को यदि जनता महँगाई से लड़ने में लगा दे तो कोई कारण नहीं कि महँगाई गायब ना हो।

सप्ताह में एक दिन का व्रत यदि आज भी जनता स्वयं ही चालू कर दे तो बहुत हद तक दो-चार महीने में जरूरी चीजों के दाम कम होने लगेंगे। बूँद-बूँद से सागर बनता है, यह कहने को एक छोटा-सा प्रयास है, पर आज की आबादी को देखकर हिसाब लगाया जाए तो एक बहुत बड़ी बचत जनता की ही होगी। इससे आम जनता के स्वास्थ्य पर भी अनुकूल और प्रभावी असर पड़ेगा। लोगों में एकजुटता बढ़ेगी, साथ ही उनमें आत्मविश्वास की वृद्धि भी होगी। निचले से निचले स्तर का व्यक्ति भी अपने को गौरवान्वित महसूस करेगा कि देश के हितार्थ जनजागरण में मैं भी सम्मिलित हूँ। यह डाक्टरों का निष्कर्ष है कि सप्ताह में एक दिन का व्रत शरीर को स्वस्थ रखता है।

महँगाई कम करने का एक और कारगर उपाय है कि कभी भी दुकानदारों द्वारा दिए जा रहे प्रलोभनों में न आना। प्रायः ऐसा देखा जाता है कि घर से चले तो थे दाल-आटा लेने, पर प्रलोभनवश दो कमीजें लेकर इतराते वापस आ रहे हैं कि हमें एक कमीज मुफ्त में मिल गई, जबकि दुकानदार कह रहा होता है कि मैंने दो कमीजें बेच दीं, वो भी तब जब उसे एक की भी आवश्यकता नहीं थी। सावधान! यह अच्छी तरह समझ लो कि दुकानदार अपने लाभ के लिए बैठा है, ना कि तुम्हारे। आम जीवन में इस तरह के और भी बहुत उदाहरण हमारे ईर्द-गिर्द दिखाई देते ही रहते हैं, हमें तो बस समझदारी से कम पैसों में अपना गुजारा कर अपने को इस महँगाई के दौर में बनाए रखना है।

महँगाई से जीतने के लिए जीवन में यह सिद्धांत बना लो कि जिस वस्तु की आवश्यकता नहीं है, उसे मुफ्त में भी नहीं लेना है।

- विजेन्द्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

रह-रहकर गुलाम होना हमारी नियति है Date :- 01-Jan-2013

18वीं शताब्दी में जब अंग्रेजों ने कलकत्ता में ईस्ट इंडिया कम्पनी का रूप धारण कर भारत में प्रवेश किया था, तब किसी को भी तनिक संदेह नहीं था कि यह कम्पनी अन्ततः हमें गुलाम बनाकर एक दिन भारत पर ही शासन करेगी। इतिहास पढ़ते समय मन में यह आता था कि उस समय के भारतवासी कम पढ़े-लिखे थे जो उनकी चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गए होंगे। साथ ही यह भी विचार आता था कि यदि उस समय हम होते या आज का आधुनिक भारत होता तो शायद ऐसा सम्भव हो ही नहीं सकता था।

पर घोर आश्चर्य की बात तो यह है कि लगभग सम्पूर्ण देश एफ.डी.आई. नहीं चाहता, फिर भी संसद में सरकार जीती और लाचार देश फिर से अंग्रेजों से हार गया। यहाँ ध्यान देने योग्य यह है कि 18वीं शताब्दी में पश्चिम में औद्योगिक क्रांति की मात्र शुरुआत ही हुई थी, तो भी अंग्रेजों ने भारत को मूलतः बर्बाद कर दिया था, पर अब तो वे महावैज्ञानिक बनकर अणुयुग का नेतृत्व कर रहे हैं। अब यहाँ (भारत में) पैर जमाने के बाद हमारे देश का ऐसा डंका बजाएंगे जैसा सोवियत रूस का छिन्न-छिन्न कर किया था। हम ढूँढ़ते रह जाएंगे, कहाँ गया हमारा भारतवर्ष।

18वीं शताब्दी में कम से कम देश तो एक छतरी के नीचे था, परंतु जब देश के टुकड़े ही इतने हो जाएंगे तो आजाद किसे कराएंगे? कहाँ से इतने सरदार पटेल लाएंगे? आजकल के नेताओं से तो सब भलीभांति परिचित हैं ही, इनका काम तो व्यापारी वाला है, ये तो देश बेचेंगे ही।

पहले अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाई थी, पर आज दुर्भाग्य से अंग्रेजों के भाग्य से देश में पहले से ही कई प्रकार की फूटें पड़ी हुई हैं। अब आप स्वयं कल्पना कर सकते हैं कि इस बार ये विदेशी क्या कयामत ढाएंगे। उस समय हिन्दू-मुसलमानों के बीच फिरंगियों ने वैमनस्य पैदा कर देश को दो टुकड़ों में बाँटा था, पर अब तो इतने तरह के गुट मुँह उठाए खड़े हैं कि कल्पना से भी बाहर है। ये सब गुट अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए ‘मीर जाफर’ और ‘जयचन्द’ बनकर विदेशियों की चाटुकारी कर भारतवर्ष के विनाश में सहयोगी होंगे।

पिछली गुलामी में अंग्रेजों ने कभी चुनाव नहीं लड़े थे, अपितु लोगों को लोभवश अपना बनाकर उन्हें उँचे पद देकर शासन चलाते थे। इस बार एफ.डी.आई. के माध्यम से ये सब मजबूर लोगों को बाध्य कर देंगे कि जैसा हम कहते हैं वैसा करो, वरना भागो यहाँ से। मरता क्या ना करता, आम आदमी विवश होकर जैसा अंग्रेज चाहेगा, वैसा ही करेगा और अपने देश में विदेशियों को वोट देकर अपनी गुलामी की सरकार स्वयं चुनेगा। इस नई सरकार में लगभग सारे विदेशी होंगे या फिर आज के एफ.डी.आई. समर्थक नेता। जो नेता जितनी चमचागिरि करेगा या जो जनता का जितना खून चूसेगा, वह उतनी ही तरक्की करेगा।

आज तक भारत में धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर, व्यक्ति के नाम पर वोट पड़ते आए हैं, पर अब पैसे के नाम पर वोट पड़ेंगे। पैसा या रोजगार चाहिए तो अमुक व्यक्ति को ही वोट देना होगा, यानि हर जगह अंग्रेज का बोलबाला होगा।

सौभाग्य से सन् 1947 से पहले तक भारत में देशभक्तों और क्रांतिकारियों की बाढ़ आई हुई थी, सभी देश के लिए हँसते-हँसते सूली पर चढ़ जाते थे। पर आज का युग भौतिकवादी है सभी आराम पसंद हैं, तो कौन देश के लिए कुर्बानी देगा?

आज सभी चाहते हैं देश में क्रांतिकारी तो पैदा हों, पर पड़ोस के घर में।

- विजेन्द्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र

आम नागरिक कब तक कुर्बानी देगा? Date :- 01-Jan-2012

कुछ वर्ष पूर्व न्यूजीलैंड देश में एक महिला बीमार चल रही थी। लम्बी बीमारी के कारण उसका उपचार घर पर ही हो रहा था। इन उपचारों में कुछ उपकरण ऐसे भी थे, जो बिजली से चलते थे। किन्हीं कारणवश वह महिला अपना बिजली का बिल समय पर जमा नहीं करा सकी, इस कारण प्रशासन ने उसकी बिजली सप्लाई काट दी। बिजली न होने से उपकरणों ने काम करना बंद कर दिया, जिससे उस बीमार महिला की असमय मृत्यु हो गई। बाद में प्रशासन की लापरवाही के कारण हुए इस हादसे से देश में हड़कम्प मच गया। न्यूजीलैंड के प्रधनमंत्री ने निजी तौर पर उस महिला के घरवालों से माफी माँगी और सांत्वना देने उसके घर भी गए। साथ ही बीमार महिला की अंत्येष्टि में सम्मिलित भी हुए।

यह होती है एक नागरिक की इज्जत और उसकी मौत की कीमत। अब अपने देश में निगाह डालिए। अभी कलकत्ता के एक निजी अस्पताल में लापरवाही के कारण 100 से अधिक मरीज और उनके साथ रहने वाले अकाल मृत्यु की नींद में सो गए। सोचने वाली बात यह है कि क्या इस हादसे में मरीजों की गलती थी? वे तो अस्पताल प्रशासन पर अन्धा विश्वास करके ठीक होने आए थे, परन्तु जो उन्हें लेकर अस्पताल आए थे, वे निरोगी भी काल के ग्रास बन गए। इतनी बड़ी मौतों के जिम्मेदार बड़े लोग साफ बचकर निकल जाएंगे। सरकारी घोषणाएँ जाँच समिति बनाने तक सीमित रह जाएंगी, परन्तु जिनके घरों ने अपने परिवार के लोग खोए हैं, वे कहाँ जाएँ?

वास्तव में, अस्पताल में हुआ अग्निकांड प्रबंधकों की जानलेवा लापरवाही और सरकारी प्रशासन की ढील का नतीजा था। इसी ग्रुप के कलकत्ता में चार अस्पताल हैं। कड़ी कार्रवाई यह होती है कि इस ग्रुप के सभी मालिकों को गिरफ्तार कर उनकी सारी आर्थिक गतिविधियों पर रोक लगा देनी चाहिए और इन अस्पतालों से कमाई अपार सम्पत्ति को नीलाम कर हादसे के शिकार हुए लोगों की सहायता करनी चाहिए, तभी और लोगों को भी सीख मिलेगी और वे लापरवाही से बाज आएंगे।

कलकत्ता में हुए अस्पताल अग्निकांड की ज्वाला अभी शांत भी नहीं हो पाई थी कि इसी शहर में जहरीली शराब से लगभग 150 व्यक्ति सरकारी लापरवाही के कारण अकाल मौत के मुँह में चले गए। क्या सरकार में इतनी हिम्मत है कि इस जहरीली शराब कांड की नैतिक जिम्मेदारी अपने उपर लेकर इस्तीफा दे। देशवासियों को याद होगा 1963-64 में श्री लाल बहादुर शास्त्री, पं. नेहरू जी के मंत्रीमंडल में रेल मंत्री थे, उस दौरान एक रेल दुर्घटना में मात्र 4 व्यक्ति मौत के शिकार हुए थे, उस समय शास्त्री जी ने इस दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी अपने उपर लेकर रेलमंत्री के पद से अपना इस्तीफा नेहरू जी को सौंप दिया था। हमारे देश से वो नैतिकता अब कहाँ चली गई है? क्या कुर्सी से चिपके रहना ही, राजनैतिक उद्देश्य रह गया है?

अगर देश के नेता लोग लापरवाही से हुए हादसों को अपने उपर लेकर इस्तीफा देने लगे तो इस तरह की दुर्घटनाएँ होनी बन्द हो जाएंगी। अभी कलकत्ता में हुए दोनों हादसों की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए यदि पं. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस्तीफा दे दिया होता तो सरकारी स्तर पर भी और निजी क्षेत्रों में भी ऐसा संदेश पहुँचता कि वे सदा के लिए सावधान हो जाते। परन्तु दुर्भाग्य से इस देश की जनता को व्यवस्था के लिए कुर्बानी देनी ही पड़ती है। आम नागरिक की जान की कीमत सरकारी निगाह में कुछ भी नहीं है, अन्यथा इतनी बड़ी संख्या में हुई मौतों के लिए किसी को भी मृत्युदंड न मिलना क्या दर्शाता है?

- विजेन्द्र गोयल, मुख्य संपादक
दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र


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