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हम बीमार क्यों पड़ते हैं? Date :- 01-Mar-2016

हमारा शरीर वात-पित्त-कफ के संतुलन से ही स्वस्थ रहता है। जब यह संतुलन बिगड़ता है तो हम बीमार पड़ते हैं। सर्दी, बरसात, गर्मी के परिवर्तन से मौसम सम्बन्धी बीमारियाँ होती हैं। अनियमित व बेमेल खान-पान, बाजारु सड़ी-गली चीजें खाने से, विपरीत आहार करने से या अपनी प्रकृति के विरुद्ध आहार करने से हम बीमार पड़ते हैं, जैसे यदि हमारी प्रकृति पित्त प्रधान है तो हम अनजाने में पित्त बढ़ाने वाला भोजन करते हैं तथा बीमारी को और बढ़ावा देते हैं। अनियमित दिनचर्या जैसे देर रात तक जागना या देर तक सोना, अनावश्यक तनाव के कारण भी कई सारी बीमारियाँ होती हैं। योग प्राणायाम, आसन आदि द्वारा हम स्वस्थ रह सकते हैं । बीमार होने का एक दूसरा बड़ा कारण यह भी है कि हम आज अनाज, फल, सब्जी आदि के रूप में जो भी खा रहे हैं, वह सब रासायनिक खाद और कीटनाशकों के सहयोग से उत्पन्न किये जाते हैं। इसलिए वह खतरनाक रासायनिक तत्व अनाजों के द्वारा हमारे शरीर में आते हैं और अलग-अलग तरह की बीमारियों को जन्म देते हैं। दूध, घी, तेल, मसाले, दवाइयों में भी भारी मिलावट रहती है।

सर्दियों में अंजीर खाना है लाभकारी Date :- 01-Feb-2016

अंजीर एक ऐसा फल है जो पूरे वर्ष नहीं उगता है, इसलिए इसके सूखे रूप का ही ज्यादातर इस्तेमाल होता है, जो हमेशा बाजार में उपलब्ध होता है। अंजीर किसी भी व्यंजन में इस्तेमाल करने पर एक अलग ही स्वाद ला देता है।

वजन घटाने में सहायता करता है- अंजीर में फाइबर उच्च मात्रा में होने के साथ-साथ कैलोरी कम होती है। अंजीर के एक टुकड़े में 47 कैलोरी होता है और पैफट 0.2 ग्राम होता है। इसलिए वजन घटाने वालों के लिए यह एक आदर्श स्नैक्स बन सकता है।

उच्च रक्तचाप से बचाता है- अगर आप आहार में नमक ज्यादा लेते हैं तो वह शरीर में सोडियम के स्तर को बढ़ाने में सहायता करता है। इससे शरीर में सोडियम-पोटाशियम के स्तर का संतुलन बिगड़ जाता है जिसके कारण उच्च रक्तचाप का खतरा बढ़ जाता है। अंजीर इस संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है क्योंकि एक सूखे अंजीर में 129 मिलीग्राम पोटाशियम और 2 मिलीग्राम सोडियम होता है।

दिल को स्वस्थ रखता है- इसमें उच्च मात्रा में एंटीआॅक्सिडेंट गुण होने के कारण यह शरीर से फ्री-रैडिकल्स को दूर करने में मदद करता है, जिससे रक्त कोशिकाएँ स्वस्थ रह पाती हैं और दिल की बीमारी का खतरा कुछ हद तक कम हो जाता है।

कैंसर से रक्षा करता है- एंटीआॅक्सिडेंट गुण से भरपूर अंजीर फ्री-रैडिकल्स के क्षति से डी.एन.ए. की रक्षा करता है जिससे कैंसर होने की संभावना कुछ हद तक कम हो जाती है।

हड्डियों को शक्ति प्रदान करता है- सूखा अंजीर शरीर के लिए कैल्शियम की जरूरत को पूरा करने में सहायता करता है। दूसरे कैल्सियम युक्त खाद्य पदार्थों के साथ यह मिलकर हड्डियों को शक्ति प्रदान करता है।

गुड़ स्वास्थय के लिए अमृत है Date :- 01-Dec-2015

चीनी को सफेद जहर कहा जाता है जबकि गुड़ स्वास्थ्य के लिए अमृत है क्योंकि गुड़ खाने के बाद यह शरीर में क्षार पैदा करता है जो हमारे पाचन को अच्छा बनाता है। चीनी अम्ल पैदा करती है जो शरीर के लिए हानिकारक है। गुड़ को पचाने में शरीर को यदि 100 कैलोरी ऊर्जा लगती है तो चीनी को पचाने में 500 कैलोरी खर्च होती है। गुड़ में कैल्शियम के साथ-साथ फास्फोरस भी होता है जो शरीर के लिए बहुत अच्छा माना जाता है और अस्थियों को बनाने में सहायक होता है। जबकि चीनी को बनाने की प्रक्रिया में इतना अधिक तापमान होता है कि फास्फोरस जल जाता है। चीनी में कोई प्रोटीन नहीं, विटामिन नहीं, कोई सूक्ष्म पोषक तत्व नहीं होता, केवल मीठापन है और वो मीठापन भी शरीर के काम का नही। इसलिये अच्छे स्वास्थ्य के लिए गुड़ का उपयोग करें।

गुड़ में कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम, पोटेशियम, आयरन और कुछ मात्रा में काॅपर जैसे स्वास्थ्यवर्धक पदार्थ होते हैं। आँकड़ों के अनुसार, गुड़ में ब्राउन शुगर की अपेक्षा पाँच गुना अधिक और शक्कर की अपेक्षा पचास गुना अधिक मिनरल्स होते हैं। गुड़ की न्यूट्रीशन वैल्यू शहद के बराबर है। बच्चे के जन्म के बाद माता को गुड़ देने से कई बड़ी बीमारियाँ दूर होती हैं। यह मिनरल्स की कमी को दूर करता है। बच्चे के जन्म के 40 दिनों के अन्दर माता के शरीर में बनने वाले सभी ब्लड क्लाट्स को खत्म करता है। गुड़ आधे सिर के दर्द से बचाव करता है। स्त्रियों में मासिक धर्म से सम्बंधित परेशानियों को ठीक करता है और शरीर को ठंडा रखता है।

मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करें Date :- 01-Nov-2015

हजारों वर्षों से हमारे यहाँ मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता आया है। घरों में दाल पकाने, दूध गर्म करने, दही जमाने, चावल बनाने और अचार रखने के लिए मिट्टी के बर्तनों का उपयोग होता रहा है। मिट्टी के बर्तन में जो भोजन पकता है, उसमें सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी नहीं होती जबकि प्रेशर कुकर व अन्य बर्तनों में भोजन पकाने से सूक्ष्म पोषक तत्व कम हो जाते हैं, जिससे हमारे भोजन की पौष्टिकता कम हो जाती है। भोजन को धीरे-धीरे ही पकाना चाहिये, तभी वह पौष्टिक और स्वादिष्ट पकेगा और उसके सभी सूक्ष्म पोषक तत्व सुरक्षित रहेंगे।

महर्षि वागभट्ट के अनुसार भोजन को पकाते समय उसे सूर्य का प्रकाश और पवन का स्पर्श मिलना आवश्यक है, जबकि प्रेशर कुकर में पकाते समय भोजन को ना तो सूर्य का प्रकाश और ना ही पवन का स्पर्श मिल पाता, जिससे उसके सारे पोषक तत्व क्षीण हो जाते हैं और प्रेशर कुकर एल्यूमीनियम का बना होता है जो कि भोजन पकाने के लिये सबसे घटिया धातु है क्योंकि एल्यूमीनियम भारी धातु होती है और यह हमारे शरीर से अपशिष्ट पदार्थ के रूप में बाहर नहीं निकल पाती है। इसी कारण एल्यूमीनियम के बर्तनों का उपयोग करने से कई प्रकार के गंभीर रोग जैसे- अस्थमा, वात रोग, टी.बी., मधुमेह (डायबिटीज), पक्षाघात (पेरेलिसिस), स्मरण शक्ति का कम होना आदि! वैसे भी भाप के दबाव से भोजन उबल जाता है पकता नहीं है।

आयुर्वेद के अनुसार जो भोजन धीरे-धीरे पकता है वह भोजन सबसे अधिक पौष्टिक होता है। भोजन को शीघ्र पकाने के लिये अधिक तापमान का उपयोग करना सबसे हानिकारक है। हमारे शरीर को प्रतिदिन 18 प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्व चाहिए जो मिट्टी से ही आते है। जैसे-  Calcium, Magnesium, Sulphur, Iron, Silicon, Cobalt, Gypsum आदि। मिट्टी के इन्ही गुणों और पवित्रता के कारण हमारे यहाँ पुरी के मंदिरों (उड़ीसा) के अलावा कई मंदिरों में आज भी मिट्टी के बर्तनों में प्रसाद बनता है।

साभारः स्वदेशी चिकित्सा

हार्ट अटैक का प्राकृतिक उपचार Date :- 06-Oct-2015

आधुनिक जीवन-शैली, भाग-दौड़ और मानसिक तनाव के कारण हार्ट अटैक (हृदयाघात) आम होता जा रहा है। यह एक प्राणघातक रोग है, इसमें रक्त धमनियों में ब्लाॅकेज हो जाता है। ऐसे में सहज सुलभ यह उपाय 99 प्रतिशत ब्लाॅकेज को भी ठीक कर देता है। इसका मुख्य घटक है- पीपल का पत्ता। औषधि-निर्माण और प्रयोगविधि इस प्रकार है-

पीपल के 15 पत्ते लें, जो कोमल गुलाबी कोपलें न हों, बल्कि पत्ते हरे एवं भली प्रकार से विकसित हों। प्रत्येक का ऊपर एवं नीचे का कुछ भाग कैंची से काटकर अलग कर दें। पत्ते का बीच का भाग पानी से साफ कर लें। इन्हें एक गिलास पानी में धीमी आँच पर पकने दें। जब पानी उबलकर एक तिहाई रह जाये, तब ठंडा होने पर साफ कपड़े से छान लें और उसे ठण्डे स्थान पर रख दें, दवा तैयार।

पीपल के पत्ते में दिल को बल और शांति देने की अद्भुत क्षमता है। इस पीपल के काढ़े की तीन खुराकें सुबह 8 बजे, फिर 11 बजे और 2 बजे ली जा सकती है। खुराक लेने से पहले पेट एकदम खाली नहीं होना चाहिये, बल्कि सुपाच्य एवं हल्का नाश्ता करने के बाद ही लें।

हार्ट अटैक के बाद कुछ समय हो जाने के पश्चात् लगातार पन्द्रह दिन तक इसे लेने से हृदय पुनः स्वस्थ हो जाता है और फिर दिल का दौरा पड़ने की सम्भावना नहीं रहती। दिल के रोगी इस नुस्खे का एक बार प्रयोग अवश्य करें।

प्रयोगकाल में तली चीजें, चावल आदि न लें। माँस, मछली, अण्डे, शराब, धूम्रपान का प्रयोग बंद कर दें। नमक बहुत कम मात्रा में लें। अनार, पपीता, आँवला, बथुआ, लहसुन, मेथी दाना, सेब का मुरब्बा, मौसिमी, रात में भिगोये काले चले, किसमिस, गुग्गुल, दही, छाछ आदि लें।

हार्ट अटैक की सर्वसुलभ औषधि होने के नाते ही सम्भवतः भगवान ने पीपल के पत्तों को हार्टशेप बनाया है।

खीर खाओ मलेरिया भगाओ Date :- 05-Oct-2015

हमारी हर परम्परा में वैज्ञानिकता का दर्शन होता है, अज्ञानता का नहीं। हम जानते हैं कि मच्छर काटने से मलेरिया होता है। हमें पूरी जिंदगी में कितनी ही बार मच्छर काटते होंगे, लेकिन अधिकांश लोगों को जीवनभर में एक-दो बार ही मलेरिया होता है। सारांश यह है कि मच्छर के काटने से मलेरिया होता है यह 1% ही सही है, परन्तु हमें उतनी स्वास्थ्य हानि मच्छर काटने से नहीं होती, जितनी इन मच्छर भगाने वाली अगरबत्तियों या स्प्रे से होती है। छोटे बच्चों को ही आज अस्थमा हो जाता है, जिसका 90% कारण ये बनता है और अस्थमा वाले मरीज को तो भूल कर भी ये नहीं लगाना चाहिए। इससे बेहतर है आप अपने आस पास सफाई रखें और मच्छर दानी का प्रयोग करें।

सभी जानते हैं कि बैक्टीरिया बिना उपयुक्त वातावरण के नहीं पनप सकते। मलेरिया के बैक्टीरिया को जब पित्त का वातावरण मिलता है, तभी वह पूरे शरीर में फैलता है, नहीं तो थोड़े समय में खत्म हो जाता है। अगर हम पित्त को नियंत्रित रखेंगे तो मलेरिया जैसी बीमारियों से बचा जा सकता है।

अब हमारी परम्पराओं का चमत्कार देखिये। वर्षा ऋतु के बाद शरद ऋतु आती है, आकाश में बादल में धूल न होने से कड़क धूप पड़ती है, जिससे शरीर में पित्त कुपित होता है, इसी समय गड्ढ़ों में जमा पानी के कारण बहुत बड़ी मात्रा में मच्छर पैदा होते हैं। खीर खाने से पित्त का शमन होता है। शरद में ही पितृ पक्ष (श्राद्ध) आता है पितरों का मुख्य भोजन है खीर। इस दौरान 5-7 बार खीर खाना हो जाता है, इसके बाद शरद पूर्णिमा को रातभर चाँदनी के नीचे चाँदी के पात्र में रखी खीर सुबह खाई जाती है (चाँदी का पात्र न हो तो चाँदी का चम्मच खीर मे डाल दें, लेकिन बर्तन मिट्टी या पीतल का हो, क्योंकि स्टील, एल्यूमिनियम, प्लास्टिक, चीनी मिट्टी महा जहर हैं।) यह खीर विशेष ठंडक पहुँचाती है। गाय के दूध की हो तो अतिउत्तम है। इससे मलेरिया होने की संभावना नहीं के बराबर हो जाती है

ध्यान रहे इस ऋतु में बनाई खीर में केसर और मेवों का प्रयोग न करें। ये गर्म प्रवृत्ति के होने से पित्त बढ़ा सकते हैं, सिर्फ इलायची डालें।

जंक फूड से बचें घर का ताजा खाना खाएं Date :- 04-Oct-2015

आजकल बाजारों में आने वाले जंक (कूड़ा) फूड स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक हैं। ये खाद्य पदार्थ मुख्य रूप से मोटापा, हृदय सम्बन्धी रोग, शुगर और ब्लड प्रेशर आदि रोगों के लिये काफी हद तक दोषी हैं। उच्च तकनीकी के नाम पर शुद्धता और लम्बे समय टिकाये रखने के लिए इनमें जो रसायन मिलाये जाते हैं, वे स्वास्थ्य के लिये अत्यंत हानिकारक होते हैं। जंक फूड (मैगी, चाऊमीन, समोसा, मैदे के बिस्कुट, बेकरी आइटम, पिज्जा, बर्गर आदि) की वस्तुएँ आयुर्वेद में निषेध हैं, इनसे कफ बढ़ता है और दमा जैसी व्याधियाँ भी होती हैं। इनके स्थान पर घर का बना शुद्ध एवं ताजा भोजन करें और शीतल पेय में मट्ठा, लस्सी, शर्बत और औषधीय पेय पियें। घर का ताजा खाना खायें और सबसे अच्छा है कि भोजन बनने के 48 मिनट के भीतर उसे ग्रहण कर लें, नहीं तो उसके बाद उसकी पोषकता कम होती चली जाती है और 12 घंटे बाद तो यह भोजन पशुओं के खाने लायक भी नहीं रह जाता, इसलिए बासी खाने से बचना चाहिए।

बच्चों के लिएः एक दिन के बच्चे से लेकर 14 वर्ष तक के बच्चों में कफ की प्रधानता होती है, इसलिए बच्चों के लिये मैदा और उससे बनी सभी प्रकार की वस्तुयें निषेध हैं (जैसे मैगी, पिज्जा, बर्गर, समोसा, चाऊमीन, बिस्कुट व बेकरी उत्पाद, जिनमें मैदा उपयोग होता है) इनसे कफ बिगड़ता है और बच्चे चिड़चिड़े व हठी स्वभाव के हो जाते हैं।

पानी हमेशा घूँट-घूँट और बैठकर पीएँ Date :- 12-Sep-2015

पानी सदैव धीरे-धीरे अर्थात घूँट-घूँट कर पीना चाहिये, यदि हम धीरे-धीरे पानी पीएंगे तो हमारे हर घूँट में मुँह की लार पानी के साथ मिलकर पेट में जायेगी और पेट में बनने वाले अम्ल को शांत करेगी क्योंकि हमारी लार क्षारीय होती है और बहुत मूल्यवान होती है। हमारे पित्त को संतुलित करने में इस क्षारीय लार का बहुत योगदान होता है। जब हम भोजन चबाते हैं तो वह लार में ही लुगदी बनकर आहार नली द्वारा अमाशय में जाता है और अमाशय में जाकर वह पित्त के साथ मिलकर पाचन क्रिया को पूरा करता है। इसलिये मुँह की लार अधिक से अधिक पेट में जाये, इसके लिये पानी घूँट-घूँट कर और बैठकर पीना चाहिए। कभी भी खड़े होकर पानी नहीं पीना चाहिए (घुटनों के दर्द से बचने के लिए)। दिन भर में कम से कम 4 लीटर पानी अवश्य पियें।

कभी भी बाहर से आने पर जब शरीर गर्म हो या श्वाँस तेज चल रही हो तब थोड़ा रुककर, शरीर का ताप सामान्य होने पर ही पानी पीना चाहिए। भोजन करने से डेढ़ घंटा पहले पानी अवश्य पियें, इससे भोजन के समय प्यास नहीं लगेगी।

प्रातः काल उठते ही सर्वप्रथम बिना मुँह धोए, बिना ब्रश किये कम से कम एक गिलास पानी अवश्य पियें क्योंकि रात भर में हमारे मुँह में स्लेव्रलउम नामक जीवाणुनाशक तैयार होता है जो पानी के साथ पेट मे जाकर पाचन संस्थान को रोगमुक्त करता है। सुबह उठकर मुँह की लार आँखों में भी लगाई जा सकती है चूंकि यह काफी क्षारीय होती है, इसलिए आँखों की ज्योति और काले सर्किल के लिए काफी लाभकारी होती है।
साभारः स्वदेशी चिकित्सा
भोजन की दिनचर्या Date :- 01-Aug-2015

हमारे भोजन की दिनचर्या अत्यधिक बिगड़ गई है। ना तो हम अपनी प्रकृति के अनुसार भोजन करते हैं और ना ही सही समय पर भोजन करते हैं। देर रात में भोजन करना सबसे हानिकारक है क्योंकि उस समय हमारी जठराग्नि सबसे मंद होती है जिसके कारण भोजन का पाचन भली-भांति नहीं हो पाता और वह सड़कर कई प्रकार की बीमारियों को जन्म देता है। दिन में सूर्य के प्रकाश के ताप से जठराग्नि सबसे अधिक सक्रिय रहती है जो भोजन के पाचन के लिये उत्तम है, इसलिये महर्षि वागभट्ट ने कहा है कि प्रातःकाल सूर्योदय से ढाई घंटे के अन्दर भरपेट भोजन करना चाहिये क्योंकि उस समय जठराग्नि सबसे तीव्र होती है। फिर दोपहर के बाद शाम को 4-6 बजे के बीच में सायं भोजन ग्रहण करना चाहिए क्योंकि सूर्यास्त के बाद जठराग्नि मंद होने लगती है, इसलिए रात में भोजन ना करें। 

सुबह भोजन के तुरन्त बाद ऋतु के अनुसार किसी भी फल का रस ले सकते हैं। दोपहर में खाने के तुरन्त बाद छाछ या मठ्ठा ले सकते हैं। शाम के भोजन के बाद, रात में दूध पीकर सोना सर्वोत्तम है। भोजन की दिनचर्या में इतना भी परिवर्तन हो जाये तो स्वास्थ्य काफी अच्छा रहता है।

भोजन जब भी करें तो जमीन पर चैकड़ी मारकर ही करें क्योंकि हमारे कूल्हों के ऊपर एक चक्र होता है जिसका सीधा सम्बन्ध जठराग्नि से होता है, इसलिए सुखासन (आल्ती-पालती) मारकर सीधे बैठकर भोजन ग्रहण करने से जठराग्नि तीव्रता से काम करती है, परन्तु जब हम कुर्सी पर बैठकर या खड़े होकर भोजन करते हैं तो इसका ठीक उल्टा होता है, इसलिये कभी भी खड़े होकर या कुर्सी में बैठकर भोजन नहीं करना चाहिये। भोजन लेने के बाद दस मिनट वज्रासन में अवश्य बैठना चाहिए, जिससे हमारा भोजन अच्छी तरह से अमाशय में पहुँच जाता है।
साभारः स्वदेशी चिकित्सा
बैठे-बैठे पैर नहीं हिलाना चाहिए, क्योंकि... Date :- 30-Nov-2014

वैदिक काल से ही कुछ ऐसे नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना हमारी सेहत और आर्थिक स्थिति दोनों के लिए ही फायदेमंद रहता है। इन नियमों के आधार पर ही परंपराएं बनी है। सभी परंपराओं के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व बताए गए हैं। प्रतिदिन हम कई छोटे-बड़े सामान्य कार्य करते हैं जिनमें से कुछ कर्म वर्जित किए गए हैं, जिनका संबंध हमारी सुख-समृद्धि से होता है।

अक्सर घर के वृद्धजनों द्वारा मना किया जाता है कि बैठे-बैठे पैर नहीं हिलाना चाहिए। वैसे तो यह सामान्य सी बात है लेकिन इसके पीछे धार्मिक कारण है। स्वभाव और आदतों का प्रभाव हमारे भाग्य पर भी पड़ता है। शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति पूजन कर्म या अन्य किसी धार्मिक कार्य में बैठा है तो उसे पैर नहीं हिलाना चाहिए। ऐसा करने पर पूजन कर्म का पूरा पुण्य नहीं मिल पाता है।

अधिकांश लोगों की आदत होती है कि वे जब कहीं बैठे होते हैं तो पैर हिलाते हैं। इस संबंध में शास्त्रों के जानकार के अनुसार पैर हिलाने से धन का नाश होता है। धन की देवी महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त नहीं होती है। शास्त्रों में इसे अशुभ कर्म माना गया है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह आदत हानिकारक है। बैठे-बैठे पैर हिलाने से जोड़ों के दर्द की समस्या हो सकती है। पैरों की नसों पर विपरित प्रभाव पड़ता है। पैरों में दर्द हो सकता है। इसका बुरा प्रभाव हृदय पर भी पड़ सकता है। इन कारणों के चलते इस आदत का त्याग करना चाहिए।

यदि किसी पूजन कार्य में या शाम के समय बैठे-बैठे पैर हिलाते हैं तो महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त नहीं होती है। धन संबंधी कार्यों में विलंब होता है। पैसों की तंगी बढ़ती है। वेद-पुराण के अनुसार शाम के समय धन की देवी महालक्ष्मी पृथ्वी भ्रमण पर रहती हैं, ऐसे में यदि कोई व्यक्ति बैठे-बैठे पैर हिलाता है तो देवी उससे नाराज हो जाती हैं। लक्ष्मी की नाराजगी के बाद धन से जुड़ी परेशानियां झेलना पड़ती हैं। अत: बैठते समय इस बात का ध्यान रखें।

स्वस्थ रहना चाहते हैं तो मुस्कुराना सीखिये Date :- 29-Oct-2014

मुस्कान स्वस्थ जीवन का वरदान है। मनुष्य के अन्दर जब आनन्द का निर्झर झरना बहता है तो अधरों पर सहज रूप से मुस्कुराहट तैरने लगती है और जब प्रसन्नता अत्यधिक उद्वेलित करती हो तो मुस्कान खिलखिलाहट में बदल जाती है। हँसी ईश्वर प्रदत्त अनुपम उपहार है जो कि मनुष्य के अलावा संसार में अन्य किसी जीव को प्राप्त नहीं है। अतः जो हँसता रहता है, स्वस्थ और दीर्घायु रहता है।

मुस्कुराहट और आनन्द प्राकृतिक सौन्दर्य का अथाह सागर हैं। हास्य से जीवन में नई स्फूर्ति मिलती है तथा चेतना का विकास होता है। यह जीवन को उल्लास, उमंग से भर देता है तथा भविष्य के स्वर्णिम द्वार खोल देता है। मुस्कुराना अनेक रोगों की दवा है। कई ऐसे रोग विशेषतः मनोरोग तो केवल खिलखिलाहट, ठहाका लगाकर हँसने मात्र से दूर हो जाते हैं। हँसी एक ऐसी पोशाक है जो कहीं भी, किसी भी मौसम में धार्य है।

मनोरोग खासकर तनावजन्य रोगों के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण, सरल, उपयोगी उपाय खिलखिलाकर हँसना है। जीव वैज्ञानिकों का मानना है कि 5 वर्ष की आयु तक के बच्चे प्रायः 30 बार हँसते हैं, जबकि वयस्क मात्र 16-17 बार। स्वस्थ रहने के लिए प्रयास करके 30-35 बार अवश्य खिलखिलाकर हँसना चाहिए। महात्मा गाँधी तनाव दूर करने हेतु अपने कार्यों के बीच में हास-परिहास किया करते थे। अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन तो व्हाइट हाऊस के नौकरों के साथ बैठकर हँसते थे। हँसने से चेहरे पर एक चमक आ जाती है।

अनुसंधान में पाया गया है कि मुस्कुराने से ‘इम्युनोग्लो व्यूलिन ए’ की मात्रा बढ़ जाती है, जिसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता काफी है। यही कारण है कि मुस्कुराते रहने वाले लोग अधिक स्वस्थ तथा संक्रमण जनित रोग से अप्रभावी रहते हैं। हँसने से ‘ऐन्डोर्फिन’ दर्द निवारक रसायन का स्राव होता है, जो माँसपेशियों की जकड़न को कम करता है। यह हृदयगति कम करने, भूख बढ़ाने, शरीर में व्याप्त विषाक्तता दूर करने, गठिया, वात रोग तथा एलर्जी जन्य रोगों में राहत देता है।

‘योग शास्त्र’ विशेषज्ञ कहते हैं कि हँसने से सम्पूर्ण शरीर का व्यायाम हो जाता है। योग शास्त्र में हँसी को ‘इंटरनल जाॅगिंग’ कहा जाता है। इससे अभिव्यक्ति में काफी सुधार हो जाता है तथा मानसिक एवं भावनात्मक क्षमता में भी वृद्धि होती है। स्मरण शक्ति बढ़ाने में इसे रामबाण माना गया है।

आॅस्ट्रेलिया में एक अनुसंधानात्मक प्रायोगिक अध्ययन में पाया गया है कि खुलकर दिन में 25 से 30 बार हँसने से मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मानसिक अवसाद निश्चित रूप से कम हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण आजीवन मुस्कुराते रहे। महाभारत के युद्ध की विभीषिका भी उनके मुस्कुराहट को बाधित नहीं कर सकी।

संक्षेप में, हँसना एक सकारात्मक सोच है। यह निःशुल्क, सर्वोत्तम, सहज व सरल औषधि है जो स्वस्थ तथा निरोगी रखने में उपयोगी है। हँसना आंतरिक प्रसन्नता की निशानी है। हमें हँसी (मुस्कान) को अपने जीवन का अविभाज्य अंग बना लेना चाहिए।

फास्ट फूड से याददाश्त कमजोर होती है Date :- 01-Oct-2014

नोएडा के विनायक अस्पताल में डाइटीशियन उशमा फोशान का कहना है कि बर्गर, चाउमीन, पिज्जा में काफी मात्रा में कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है, जो शरीर को तेजी से मोटा बनाता है। हाई कैलोरी खाने से लीवर के पास फैट यानि वसा जमा हो जाती है, जो मोटापे के साथ-साथ अन्य बीमारियों को भी निमंत्रण देती है।

उनका कहना है कि बहुत ही कम बच्चों को मालूम होगा कि फास्ट फूड शारीरिक और मानसिक विकास पर भी प्रतिकूल असर डालता है। उन्होंने बताया कि इस उम्र में आप शारीरिक व मानसिक विकास की प्रक्रिया से गुजर रहे होते हैं, आप क्या खाते हैं इसका असर सेहत के साथ बौद्धिक क्षमता पर भी पड़ता है। जो बच्चे फास्ट फूड नहीं खाते, उन्हें उनका पढ़ा हुआ जल्दी याद हो जाता है।

उशमा ने बताया कि कभी-कभी यह खान-पान फूड पाॅयजनिंग का भी कारण बन जाता है। एक स्वस्थ शरीर के लिए दिन भर में कम से कम एक बार संतुलित भोजन लेना बहुत जरूरी है। पिज्जा, बर्गर, चाउमीन, मोमोज, ब्रेड में प्रोटीन व विटामिन न के बराबर होते हैं, इसलिए इनसे परहेज करना ही अच्छा है।

हाथों से खाना खाना क्‍यूं होता है फायदेमंद Date :- 04-Sep-2014

अधिकतर भारतीय अपने हाथों से खाना खाते हैं। लेकिन आजकल हमने पाश्चात्य संस्कृति का अनुसरण करते हुए चम्मच और कांटे से खाना शुरू कर दिया है। लेकिन क्या आप जानते हैं की अपने हाथों से खाना खाने के स्वास्थ्य से संबंधित कई फायदे हैं।

यह आपके प्राणाधार की एनर्जी को संतुलित रखता है: आयुर्वेद में कहा गया है की हम सब पांच तत्वों से बने हैं जिन्हे जीवन ऊर्जा भी कहते हैं, और ये पाँचों तत्व हमारे हाथ में मौजूद हैं ( आपका अंगूठा अग्नि का प्रतीक है, तर्जनी अंगुली हवा की प्रतीक है, मध्यमा अंगुली आकाश की प्रतीक है, अनामिका अंगुली पृथ्वी की प्रतीक है और सबसे छोटी अंगुली जल की प्रतीक है)। इनमे से किसी भी एक तत्व का असंतुलन बीमारी का कारण बन सकता है। जब हम हाथ से खाना खाते हैं तो हम अँगुलियों और अंगूठे को मिलाकर खाना खाते हैं और यह जो मुद्रा है यह मुद्रा विज्ञान है, यह मुद्रा का ज्ञान है और इसमें शरीर को निरोग रखने की क्षमता निहित है। इसलिए जब हम खाना खाते हैं तो इन सारे तत्वों को एक जुट करते हैं जिससे भोजन ज्यादा ऊर्जादायक बन जाता है और यह स्वास्थ्यप्रद बनकर हमारे प्राणाधार की एनर्जी को संतुलित रखता है।

इससे पाचन में सुधार होता है: टच हमारे शरीर का सबसे मजबूत अक्सर इस्तेमाल होने वाला अनुभव है। जब हम हाथों से खाना खाते हैं तो हमारा मस्तिष्क हमारे पेट को यह संकेत देता है कि हम खाना खाने वाले हैं। इससे हमारा पेट इस भोजन को पचाने के लिए तैयार हो जाता है जिससे पाचन क्रिया सुधरती है।

यह आपके मुह को जलने से बचाता है: आपके हाथ एक अच्छे तापमान संवेदक का काम भी करते हैं। जब आप भोजन को छूते हैं तो आपको अंदाजा लग जाता है कि यह कितना गर्म है और यदि यह ज्यादा गर्म होता है तो आप इसे मुह में नहीं लेते हैं। इस प्रकार यह आपकी जीभ को जलने से बचाता है।

गुड़ स्वास्थ्य के लिये अमृत है Date :- 01-Sep-2014

चीनी को सफेद जहर कहा जाता है, जबकि गुड़ स्वास्थ्य के लिये अमृत है क्योंकि गुड़ खाने के बाद यह शरीर में क्षार पैदा करता है जो हमारे पाचन को अच्छा बनाता है, इसलिए वागभट्ट जी ने खाना खाने के बाद थोड़ा-सा गुड़ खाने की सलाह दी है। जबकि चीनी अम्ल (एसिड) पैदा करती है जो शरीर के लिए हानिकारक है। गुड़ को पाचने में शरीर को यदि 100 कैलोरी उर्जा लगती है तो चीनी को पचाने में 500 कैलोरी खर्च होती है। गुड़ में कैल्शियम के साथ-साथ फास्फोरस भी होता है, जो शरीर के लिए बहुत अच्छा माना जाता है और हड्डियों को बनाने में सहायक होता है। जबकि चीनी को बनाने की प्रक्रिया में इतना अधिक तापमान होता है कि फाॅस्फोरस जल जाता है, इसलिए अच्छी सेहत के लिए गुड़ का उपयोग करें।

गुड़ में कैल्शियम, फाॅस्फोरस, मैग्नीशियम, पोटेशियम, आयरन और कुछ मात्रा में काॅपर नायसिन जैसे स्वास्थ्यवर्धक पदार्थ होते हैं। आँकड़ों के अनुसार, गुड़ में ब्राउन शुगर की अपेक्षा पाँच गुना अधिक और शक्कर की अपेक्षा पचास गुना अधिक मिनरल्स होते हैं। गुड़ की न्यूट्रीशन वैल्यू शहद के बराबर है। बच्चा पैदा होने के बाद माता को गुड़ देने से कई बड़ी बीमारियाँ दूर होती हैं। यह मिनरल्स की कमी को दूर करता है। बच्चे के जन्म के 40 दिनों के अन्दर माता के शरीर में बनने वाले सभी ब्लड क्लाॅट्स को खत्म करता है। गुड़ आधे सिर के दर्द से बचाव करता है। स्त्रियों में मासिक धर्म से सम्बन्धित परेशानियों को ठीक करता है और शरीर को ठंडा रखता है।

गोपाल कृष्ण सोलंकी - 9899182158
पंचगव्य थैरेपिस्ट, रेकी मास्टर, सुजोक एक्यूप्रेशरिस्ट एवं मुद्रा एक्सपर्ट

भोजन के अंत में पानी विष के समान है Date :- 10-Aug-2014

भोजन हमेशा धीरे-धीरे, आराम से जमीन पर बैठकर करना चाहिए, ताकि वह सीधे अमाशय में जा सके। यदि पानी पीना हो तो भोजन से 48 मिनट पहले पी लें। भोजन के समय पानी न पिएं। यदि प्यास लगती है या भोजन अटकता हो तो मट्ठा/छाछ ले सकते हैं या उस मौसम के किसी भी फल का रस पी सकते हैं (डिब्बा बंद फलों का रस गलती से भी न पियें) और पानी भोजन के डेढ़ घंटे बाद ही पिएं।

अधिक ठंडा पानी नहीं पीना चाहिए क्योंकि जब हम भोजन करते हैं तो उस भोजन को पचाने के लिए हमारे जठर में अग्नि प्रदीप्त होती है। उसी अग्नि से वह खाना पचता है। यदि हम ठंडा पानी पीते हैं तो खाना पचाने के लिए पैदा हुई अग्नि मंद पड़ती है और खाना अच्छी तरह से नहीं पचता और वह विष बनता है। कई तरह की बीमारियाँ पैदा करता है। भोजन के मध्य में थोड़ा-सा पानी पी सकते हैं- एक दो घूँट भर, लेकिन अंत में पानी न पिएं। इससे अमाशय में कफ की मात्रा बढ़ जाती है जो मोटापे का सबसे बड़ा कारण है, अर्थात् अगर मोटापा दूर करना हो तो भोजन के अंत में पानी पीना बंद कर दें। एक-दो महीने में काफी लाभ मिलेगा, करके देख सकते हैं। मोटापा कम करने के लिए यह पद्धति सर्वोत्तम है। पित्त की बीमारियों को कम करने के लिए, अपच, खट्टी डकारें, पेट दर्द, कब्ज, गैस आदि बीमारियों को इस पद्धति से अच्छी तरह से ठीक किया जा सकता है।

ठंडे शीतल जल को पचने में 6 घंटे लगते हैं। गरम करके ठंडा किया हुआ जल 3 घंटे में पचता है और गुनगुने पानी पीने पर वह एक घंटे में ही पच जाता है, इसलिए गुनगुना पानी पीना सर्वोत्तम है।

नशा मुक्ति हेतु - घरेलू उपाय Date :- 01-Aug-2014

यदि दुर्भाग्यवश किसी को शराब, ड्रग्स, पान, बीड़ी, सिगरेट, गुटका आदि की लत पड़ गई हो तो यहाँ इससे मुक्ति हेतु अतिसरल उपाय दिया जा रहा है-

अदरक के छोटे-छोटे टुकड़े काट लें। इसे काला नमक और नींबू में डाल दें। तत्पश्चात् इन टुकड़ों को 2-3 दिन धूप में सूखने के लिए रख दें। अब किसी छोटी डिब्बी में 8-10 टुकड़े अपनी जेब में अवश्य रखें। जब भी सिगरेट, शराब या अन्य किसी भी प्रकार के नशे की लत लगे तो उसी समय एक टुकड़ा मुँह में रख लें और उसे चूसते रहें। ध्यान रहे, इस अदरक के टुकड़े को चबाना नहीं है।

इसी प्रकार दिन भर जब भी नशे की तलब उठे, तभी एक टुकड़ा मुख में रखें। लगभग एक मास ऐसा करने पर किसी भी प्रकार के नशे की आदत छूट जाती है। साथ ही, यह अदरक का टुकड़ा स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है।

गोपाल कृष्ण सोलंकी - 9899182158

लीवर को स्वस्थ रखें Date :- 01-Jul-2014

लीवर का मुख्य काम भोजन को पचाना है, इससे उर्जा शक्ति मिलती है। शरीर में विद्यमान सभी अंगों में लीवर का वजन अधिक है। लीवर हमारे शरीर में प्रतिरक्षा शक्ति में वृद्धि करता है। पित्त को संचित करना और उसे भोजन तत्वों में भेजना इसका कार्य है। लीवर भोजन के साथ पहुँचे विषाक्त तत्वों को भी विषहीन कर देता है।

लीवर ठीक कार्य करे, इसके लिये उपाय- नारियल पानी का सेवन, शलजम का अधिकाधिक सेवन पित्त को पूरी तरह सक्रिय करता है, चुकन्दर और शल्जम का रस भी लीवर के लिए उत्तम है। चुकन्दर में क्लोराइड, सोडियम तथा पोटैशियम रहते हैं, जिनसे लीवर शुद्ध रहता है। पका पपीता- काला नमक व नींबू डालकर खाएँ। कच्चे पपीते की सब्जी लीवर को पूरी तरह से ठीक रखती है। अंगूर तथा अंगूर का रस लें। इसमें मौजूद पोटैशियम लीवर की धीमी गति को तीव्र कर देता है। तरबूज के सेवन से लीवर की क्रियाशीलता बढ़ती है। करेले की सब्जी व करेले का रस पीना हितकारी है। पोदीने की ताजी पत्तियों का सेवन करें।

साँप काटने का सबसे सस्ता और बढ़िया ईलाज! Date :- 17-Jun-2014

आपने देखा होगा साँप जब भी काटता है तो उसके दो दाँत है जिनमे जहर है जो शरीर के मास के अंदर घुस जाते हैं ! और खून मे वो अपना जहर छोड़ देता है ! तो फिर ये जहर ऊपर की तरफ जाता है ! मान लीजिये हाथ पर साँप ने काट लिया तो फिर जहर दिल की तरफ जाएगा उसके बाद पूरे शरीर मे पहुंचेगा ! ऐसे ही अगर पैर पर काट लिया तो फिर ऊपर की और heart तक जाएगा और फिर पूरे शरीर मे पहुंचेगा ! कहीं भी काटेगा तो दिल तक जाएगा ! और पूरे मे खून मे पूरे शरीर मे उसे पहुँचने मे 3 घंटे लगेंगे !

मतलब ये है कि रोगी 3 घंटे तक तो नहीं ही मरेगा ! जब पूरे दिमाग के एक एक हिस्से मे बाकी सब जगह पर जहर पहुँच जाएगा तभी उसकी death होगी otherwise नहीं होगी ! तो 3 घंटे का time है रोगी को बचाने का और उस तीन घंटे मे अगर आप कुछ कर ले तो बहुत अच्छा है !

क्या कर सकते हैं ?? ???

(1) घर मे कोई पुराना इंजेक्शन हो तो उसे ले और आगे जहां सुई लगी होती है वहाँ से काटे ! सुई जिस पलास्टिक मे फिट होती है उस प्लास्टिक वाले हिस्से को काटे !! जैसे ही आप सुई के पीछे लगे पलास्टिक वाले हिस्से को काटेंगे तो वो injection एक सक्षम पाईप की तरह हो जाएगा ! बिलकुल वैसा ही जैसा होली के दिनो मे बच्चो की पिचकारी होती है !

उसके बाद आप रोगी के शरीर पर जहां साँप ने काटा है वो निशान ढूँढे ! बिलकुल आसानी से मिल जाएगा क्यूंकि जहां साँप काटता है वहाँ कुछ सूजन आ जाती है और दो निशान जिन पर हल्का खून लगा होता है आपको मिल जाएँगे ! अब आपको वो injection (जिसका सुई वाला हिस्सा आपने काट दिया है) लेना है और उन दो निशान मे से पहले एक निशान पर रख कर उसको खीचना है ! जैसी आप निशान पर injection रखेंगे वो निशान पर चिपक जाएगा तो उसमे vacuum crate हो जाएगा ! और आप खींचेगे तो खून उस injection मे भर जाएगा ! बिलकुल वैसे ही जैसे बच्चे पिचकारी से पानी भरते हैं ! तो आप इंजेक्शन से खींचते रहिए !और आप first time निकलेंगे तो देखेंगे कि उस खून का रंग हल्का blackish होगा या dark होगा तो समझ लीजिये उसमे जहर मिक्स हो गया है !

तो जब तक वो dark और blackish रंग blood निकलता रहे आप खिंचीये ! तो वो सारा निकल आएगा ! क्यूंकि साँप जो काटता है उसमे जहर ज्यादा नहीं होता है 0.5 मिलीग्राम के आस पास होता है क्यूंकि इससे ज्यादा उसके दाँतो मे रह ही नहीं सकता ! तो 0.5, 0.6 मिलीग्राम है दो तीन बार मे आपने खीच लिया तो बाहर आ जाएगा ! और जैसे ही बाहर आएगा आप देखेंगे कि रोगी मे कुछ बदलाव आ रहा है थोड़ी consciousness (चेतना) आ जाएगी ! साँप काटने से व्यकित unconsciousness हो जाता है या semi consciousness हो जाता है और जहर को बाहर खींचने से चेतना आ जाती है ! consciousness आ गई तो वो मरेगा नहीं ! तो ये आप उसके लिए first aid (प्राथमिक सहायता) कर सकते हैं !

इसी injection को आप बीच से कट कर दीजिये बिलकुल बीच कट कर दीजिये 50% इधर 50% उधर ! तो आगे का जो छेद है उसका आकार और बढ़ जाएगा और खून और जल्दी से उसमे भरेगा ! तो ये आप रोगी के लिए first aid (प्राथमिक सहायता) के लिए ये कर सकते हैं !

(2) दूसरा एक medicine आप चाहें तो हमेशा अपने घर मे रख सकते हैं बहुत सस्ती है homeopathy मे आती है ! उसका नाम है NAJA! homeopathy medicine है किसी भी homeopathy shop मे आपको मिल जाएगी ! और इसकी potency है 200 ! आप दुकान पर जाकर कहें NAJA 200 दे दो ! तो दुकानदार आपको दे देगा ! ये 5 मिलीलीटर आप घर मे खरीद कर रख लीजिए!

और ये जो medicine है NAJA ये दुनिया के सबसे खतरनाक साँप का ही poison है जिसको कहते है क्रैक ! इस साँप का poison दुनिया मे सबसे खराब माना जाता है ! इसके बारे मे कहते है अगर इसने किसी को काटा तो उसे भगवान ही बचा सकता है ! medicine भी वहाँ काम नहीं करती उसी का ये poison है लेकिन delusion form मे है तो घबराने की कोई बात नहीं ! आयुर्वेद का सिद्धांत आप जानते है लोहा लोहे को काटता है तो जब जहर चला जाता है शरीर के अंदर तो दूसरे साँप का जहर ही काम आता है !


तो ये NAJA 200 आप घर मे रख लीजिये !अब देनी कैसे है रोगी को वो आप जान लीजिये !
1 बूंद उसकी जीभ पर रखे और 10 मिनट बाद फिर 1 बूंद रखे और फिर 10 मिनट बाद 1 बूंद रखे !! 3 बार डाल के छोड़ दीजिये !बस इतना काफी है !

और राजीव भाई video मे बताते है कि ये दवा रोगी की जिंदगी को हमेशा हमेशा के लिए बचा लेगी ! और साँप काटने के एलोपेथी मे जो injection है वो आम अस्तप्तालों मे नहीं मिल पाते ! डाक्टर आपको कहेगा इस अस्तपाताल मे ले जाओ उसमे ले जाओ आदि आदि !!

और जो ये एलोपेथी वालो के पास injection है इसकी कीमत 10 से 15 हजार रुपए है ! और अगर मिल जाएँ तो डाक्टर एक साथ 8 से -10 injection ठोक देता है ! कभी कभी 15 तक ठोक देता है मतलब लाख-डेड लाख तो आपका एक बार मे साफ !! और यहाँ सिर्फ 10 रुपए की medicine से आप उसकी जान बचा सकते हैं !

तो अंत आप याद रखिए घर मे किसी को साँप काटे और अगर दवा(NAJA) घर मे न हो ! फटाफट कहीं से injection लेकर first aid (प्राथमिक सहायता) के लिए आप injection वाला उपाय शुरू करे ! और अगर दवा है तो फटाफट पहले दवा पिला दे और उधर से injection वाला उपचार भी करते रहे ! दवा injection वाले उपचार से ज्यादा जरूरी है !!

तो ये जानकारी आप हमेशा याद रखे पता नहीं कब काम आ जाए हो सकता है आपके ही जीवन मे काम आ जाए ! या पड़ोसी के जीवन मे या किसी रिश्तेदार के काम आ जाए! तो first aid के लिए injection की सुई काटने वाला तरीका और ये NAJA 200 hoeopathy दवा ! 10 - 10 मिनट बाद 1 - 1 बूंद तीन बार रोगी की जान बचा सकती है !!

फ्रिज में रखे आटे के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी Date :- 10-Jun-2014

भोजन केवल शरीर को ही नहीं, अपितु मन-मस्तिष्क को भी गहरे तक प्रभावित करता है। दूषित अन्न-जल का सेवन न सिर्फ शरीर-मन को बल्कि आपकी संतति तक में असर डालता है। ऋषि-मुनियों ने दीर्घ जीवन के जो सूत्र बताये हैं उनमें ताजे भोजन पर विशेष जोर दिया है।

ताजे भोजन से शरीर निरोगी होने के साथ-साथ तरोताजा रहता है और बीमारियों को पनपने से रोकता है।लेकिन जब से फ्रीज का चलन बढा है तब से घर-घर में बासी भोजन का प्रयोग भी तेजी से बढा है। यही कारण है कि परिवार और समाज में तामसिकता का बोलबाला है। ताजा भोजन ताजे विचारों और स्फूर्ति का आवाहन करता है जबकि बासी भोजन से क्रोध, आलस्य और उन्माद का ग्राफ तेजी से बढने लगा है।

शास्त्रों में कहा गया है कि बासी भोजन भूत भोजन होता है और इसे ग्रहण करने वाला व्यक्ति जीवन में नैराश्य, रोगों और उद्विग्नताओं से घिरा रहता है। हम देखते हैं कि प्रायःतर गृहिणियां मात्र दो से पांच मिनट का समय बचाने के लिए रात को गूंथा हुआ आटा लोई बनाकर फ्रीज में रख देती हैं और अगले दो से पांच दिनों तक इसका प्रयोग होता है।

गूंथे हुए आटे को उसी तरह पिण्ड के बराबर माना जाता है जो पिण्ड मृत्यु के बाद जीवात्मा के लिए समर्पित किए जाते हैं। किसी भी घर में जब गूंथा हुआ आटा फ्रीज में रखने की परम्परा बन जाती है तब वे भूत और पितर इस पिण्ड का भक्षण करने के लिए घर में आने शुरू हो जाते हैं जो पिण्ड पाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे भूत और पितर फ्रीज में रखे इस पिण्ड से तृप्ति पाने का उपक्रम करते रहते हैं। जिन परिवारों में भी इस प्रकार की परम्परा बनी हुई है वहां किसी न किसी प्रकार के अनिष्ट, रोग-शोक और क्रोध तथा आलस्य का डेरा पसर जाता है। इस बासी और भूत भोजन का सेवन करने वाले लोगों को अनेक समस्याओं से घिरना पडता है। आप अपने इष्ट मित्रों, परिजनों व पडोसियों के घरों में इस प्रकार की स्थितियां देखें और उनकी जीवनचर्या का तुलनात्मक अध्ययन करें तो पाएंगे कि वे किसी न किसी उलझन से घिरे रहते हैं

आटा गूंथने में लगने वाले सिर्फ दो-चार मिनट बचाने के लिए की जाने वाली यह क्रिया किसी भी दृष्टि से सही नहीं मानी जा सकती। पुराने जमाने से बुजुर्ग यही राय देते रहे हैं कि गूंथा हुआ आटा रात को नहीं रहना चाहिए। बासी भोजन का सेवन शरीर के लिए हानिकारक है।

औषधीय गुणों की खान है गुनगुना पानी, वजन कम करने में भी मददगार Date :- 04-Jun-2014

पानी अपने आप में गुणों की खान है यह हम सब जानते है लेकिन गुनगुना पानी के बारे में यह कहा जाता है कि इसका सेवन काफी फायदमंद होता है। कहा जाता है कि गुनगुना या गर्म पानी औषधीय गुणों की खान है।

जो लोग बढ़ते मोटापे से परेशान है उन्हें खाने के आधे घंटे बाद एक ग्लास गुनगुने पानी को सिप कर यानी धीरे धीरे घूंट-घूंट कर पीने की सलाह दी जाती है। जानकारों का दावा है कि यह उपाय शरीर के अतिरिक्त फैट को कम करने लिए बेहद कारगार माना जाता है। दरअसल गर्म पानी शरीर के विजातीय और विषैले तत्वों को बाहर निकाल देता है।

साथ ही पानी को थोड़ा गर्म करके पी लें तो कब्ज को दूर करने में भी मदद मिलती है। गर्म पानी से स्नान थकान मिटाने, त्वचा को निखारने और इसकी बीमारियों को दूर करने का सबसे अच्छा साधन है। गर्म पानी का इस्तेमाल वजन कम करने, रक्त प्रवाह को संतुलित बनाने और रक्त प्रवाह का संचार ठीक से करने में भी लाभकारी है।

साथ ही गुनगुना पानी शरीर में मौजूद गंदगी को साफ करने की प्रक्रिया तेज करता है और गुर्दों के माध्यम से गंदगी बाहर निकल जाती हैं। शाररिक श्रम करने के पहले थोड़ा गुनगुना पानी पी ले थकान कम महसूस होगी और आपका शरीर ज्यादा हल्का महसूस करेगा। गर्म पानी के साथ नींबू और शहद का मिश्रण बनाकर सेवन करने से आपकी प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है और वजन कम करने में भी ये नुस्खा लाभदायक है।

गुर्दों की सेहत अच्छी बनाए रखने के लिए दिन में कम से कम दो बार यानी सुबह-शाम गुनगुना पानी पीना चाहिए इससे शरीर में मौजूद गंदगी का जमाव नहीं हो पाता।

मानव शरीर (आश्चर्यजनक किन्तु सत्य) Date :- 03-Jun-2014

मनुष्य के शरीर में इतनी चर्बी है कि उससे साबुन की सात बट्टियां बनाई जा सकती हैं। इतना चूना है कि उससे 10X10 फुट के एक कमरे की पुताई की जा सकती है।

14 किलोग्राम के करीब कोयला (कार्बन) है।

अग्नितत्त्व (फास्फोरस) यानि आग इतना है कि उससे करीब 2200 माचीस बनाई जा सकती हैं।

1 इंच लंबी कील बनाने लायक लोहा और एक चम्मच गंधक होता है और करीबन एक चम्मच अन्य धातुएं जैसे सोना, पारा आदि होती हैं।

इस शरीर को जीवित रखने के लिए ताजिन्दगी ईंधन के रूप में 50 टन खाद्य सामग्री और 11000 गैलन पीने वाले पदार्थों की जरुरत होती है।

मनुष्य जब जन्म लेता है तो उसके शरीर में 305 हड्डियां होती हैं। मनुष्य जैसे-जैसे बडा होता है, वैसे-वैसे ये हड्डियां घटकर 205 रह जाती हैं। इन हड्डियों मे 100 जोड होते हैं।

शरीर में 650 पेशियां होती हैं।

हड्डियों और पेशियों को जोडने वाली कंडरा (टेंडन) 8 टन प्रति साढे छह वर्ग सेंटीमीटर दबाव सह सकती है।

अपनी पूरी जिन्दगी में शहरी आदमी लगभग 16000 किलोमीटर और ग्रामीण 48000 किलोमीटर पैदल चल लेता है।

शरीर में उपलब्ध धमनियों, शिराओं और कोशिकाओं को मिलाकर नसों की लम्बाई 96540 किलोमीटर होती है।

खून में उपलब्ध 25 खरब लाल कोशिकाएं (रक्ताणु) प्रतिपल रोगाणुओं से लडने को तैयार रहती हैं।

सफेद कोशिकाएं (श्वेताणु) जीवन पर्यन्त 5 अरब बार सांस लेने में मदद करती हैं।

शरीर में व्यवस्थित सभी अंग वाटरप्रूफ थैलियों में सुरक्षित रहते हैं।

शरीर की संपूर्ण त्वचा लगभग 20 वर्गफुट लंबी व चौडी होती है।

पूरे शरीर में करीब 50 लाख बाल होते हैं।

• जीवन का संपूर्ण आनन्द लूटने के लिए 9000 स्वाद कोशिकाएं होती हैं।

पीलिया का प्राकृतिक उपचार Date :- 19-May-2014

• पीलिया के रोगियों को ऐसा भोजन करना चाहिए जो कि आसानी से पच जाए जैसे खिचड़ी, दलिया, फल, सब्जियां आदि।

• पीलिया के रोगियों को मैदा, मिठाइयां, तले हुए पदार्थ, अधिक मिर्च मसाले, उड़द की दाल, खोया, मिठाइयां नहीं खाना चाहिए।

• रोगी को दिन में तीन बार एक एक प्लेट पपीता खिलाना चाहिए।

• नीम के पत्तों को धोकर इनका रस निकाले। रोगी को दिन में दो बार एक बड़ा चम्मच पिलाएँ। इससे पीलिया में बहुत सुधार आएगा।

• पीलिया के रोगी को लहसुन की पांच कलियाँ एक गिलास दूध में उबालकर दूध पीना चाहिए , लहसुन की कलियाँ भी खा लें। इससे बहुत लाभ मिलेगा।

• टमाटर पीलिया के रोगी के बहुत लाभदायक होता है। एक गिलास टमाटर के जूस में चुटकी भर काली मिर्च और नमक मिलाएं। यह जूस सुबह के समय लें। पीलिया को ठीक करने का यह एक अच्छा घरेलू उपचार है।

• इस रोग से पीड़ित रोगियों को नींबू बहुत फायदा पहुंचाता है। रोगी को 20 ml नींबू का रस पानी के साथ दिन में 2 से तीन बार लेना चाहिए।

• एक गिलास पानी में एक बड़ा चम्मच पिसा हुआ त्रिफला रात भर के लिए भिगोकर रख दें। सुबह इस पानी को छान कर पी जाएँ। ऐसा 12दिनों तक करें।

• आधा कप सफेद प्‍याज के रस में गुड़ और पिसी हल्‍दी मिला कर प्रात: वह शाम को पीने से पीलिया में लाभ होता है। छोटे प्‍याज को छील कर चौकोर काट कर सिरके या नींबू के रस में भिगो दें, ऊपर से नमक काली मिर्च डाल दें। पीलिया का यह शर्तियां इलाज है।

• तोरई को धीमी आग में भूनें और फिर इसका भुरता बना लें। इसका रस निचोड़कर, थोड़ी मिश्री मिलाकर पिएं। यह पीलिया में अत्यंत लाभदायक होती है।


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