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गाय पूरे विश्व की माता है Date :- 01-May-2016

    हमारी संस्कृति में गाय है, हमारे धर्म में गाय है। गाय का और मनुष्य के प्राणों का बहुत ही घनिष्ठ सम्बन्ध है। गाय मानवीय प्रकृति से जितनी मिल-जुल जाती है, उतना और कोई पशु नहीं मिल पाता।

    गाय जितनी प्रसन्न होती है, उतने ही उसके दूध में विटामिन्स उत्पन्न होते हैं और गाय जितनी ही दुःखी होती है, उतना ही दूध कमजोर होता है।

    गाय हमारी ही नहीं, सम्पूर्ण मानव समाज की माँ है और सारे विश्व की माँ है। गाय की रक्षा होती है तभी प्रकृति भी अनुकूल होती है, भूमि भी अनुकूल होती है। गाय की सेवा होने से भूमि की सेवा होती है और भूमि स्वयं रत्न देने लगती है।

    जैसे-जैसे आप गोसेवा करते जायेंगे, वैसे-वैसे आपको यह मालूम होता जायेगा कि गाय आपकी सेवा कर रही है। आपको यह लगेगा कि आप गाय की सेवा कर रहे हैं तो गाय हर तरह से स्वास्थ्य की दृष्टि से, बौद्धिक दृष्टि से, धार्मिक दृष्टि से आपकी सेवा कर रही है।

गोरक्षा अत्यन्त आवश्यक है Date :- 01-Mar-2016

समस्त ग्रामीण बंधु तथा शहरों में रहने वाले वे व्यक्ति जो अपने घर पर गो-पालन की व्यवस्था कर सकते हैं, उन्हें अवश्य गो-पालन करना चाहिये, ताकि पौष्टिक आहार के साथ गोबर, गोमूत्र के रूप में खाद, कीटनाशक औषधि एवं ऊर्जा प्राप्त हो सके तथा गौ के सहज वात्सल्य एवं गो-सेवा के पुण्य से जीवन सार्थक हो सके। अन्य व्यक्तियों को भी निकटवर्ती गोशालाओं में जाकर समय-समय पर गो-सेवा करनी चाहिये। सभी को गो-वंश की तस्करी रोकने तथा गो-वध रोकने का पूर्ण प्रयास करना चाहिये।

गोवंश की स्वदेशी प्रजातियों का संरक्षण एवं विकास आज के सामाजिक तथा आर्थिक परिदृश्य में एक ऐसी अपरिहार्यता है, जिससे इनकी उपादेयता के प्रसार के साथ किसानों की उन्नति एवं स्वरोजगार के नये अवसर सृजित होंगे। विश्व मानव के स्वास्थ्य और धन की उन्नति तथा सम्पन्नता के लिये गोपालन व गोधन की सुरक्षा ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है।

परमपूज्य ब्रह्मर्षि श्रीदेवरहा बाबा के अमृत वचन- ‘गाय के पृष्ठभाग में ब्रह्माजी का, गले में विष्णु भगवान का, मुख में शिवजी का और रोम-रोम में ऋषि-महर्षि, देवताओं का वास है तथा आठ ऐश्वर्यों को लेकर लक्ष्मी माता गाय के गोबर में बसती हैं। गाय की बहुत बड़ी महिमा है। जहाँ गाय के चरण पड़ते हैं, वहाँ देवताओं का वास रहता है। भारत की गरीबी दूर करने के लिये, भारत को समृद्धिशाली बनाने के लिये गोरक्षा अत्यन्त आवश्यक है। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी, अंग्रेज- कोई भी हों, यानि सबको गोरक्षा में तत्पर हो जाना चाहिये।’

गौ - आस्था का प्रतीक Date :- 02-Nov-2015

गोवंश का सम्बन्ध किसी भी धर्म से जोड़ना गलत है। गाय सबकी है और सबके लिए है। इस्लाम में कहीं इस बात का उल्लेख नहीं है कि मुसलमानों को गोमाँस खाना जरूरी है। कुरान-मशीद में कहा गया है कि गौ का दूध अमृत है, जबकि गौ का माँस बेशुमार बीमारियों का जन्मदाता है। मुसलमानों के अनेक धार्मिक संस्थानों द्वारा भी अनेक बार देश के मुसलमानों को यह निर्देश दिया जा चुका है कि वह ईद के अवसर पर गोवंश की कुर्बानी न दें। दुर्भाग्य यह है कि जिन राज्यों में गोवंश की हत्या निषेध है, वहाँ भी कानून में अनेक त्रुटियों का लाभ उठाकर माँस के व्यापारी अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। रक्षक ही भक्षक बने हुए हैं, सर्वत्र भ्रष्टाचार व्याप्त है।

1995 में महाराष्ट्र सरकार ने दोनों सदनों से सर्वसम्मति से पूर्ण गोहत्या निषेध कानून को पारित कर राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज दिया था, दुर्भाग्यवश यह बिल 19 वर्ष तक यूँ ही लटका रहा। वर्तमान देवेन्द्र फडनवीस सरकार ने इस शुभ कार्य को आगे बढ़ाया और राष्ट्रपति जी ने भी मोहर लगाने में देर नहीं की। भारत के राष्ट्रपति और महाराष्ट्र की सरकार इसके लिए बधाई के पात्र हैं।

एक बात समझ नहीं आती, जब देश का बहुसंख्यक गाय के प्रति इतनी आस्था रखता है तो क्यों नहीं शेष भारतवासी भी गाय को सम्मान दें। ऐसा करने से आपसी भाईचारे और धार्मिक सौहार्द में भी वृद्धि होगी।

गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी Date :- 01-Nov-2015

निर्विवादित रूप से गाय को हिन्दू धर्म में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। गोमाता मातृशक्ति की साक्षात् प्रतिमा है। विश्व मानव के स्वास्थ्य और धन की उन्नति तथा सम्पन्नता के लिए गोपालन व गोधन की सुरक्षा ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है। हमारे शास्त्रों, पुराणों व उपनिषदों ने गो की अपार महिमा गाई है। वेदव्यास जी के अनुसार गायों से सात्त्विक वातावरण का निर्माण होता है। गायों की प्रत्येक वस्तु पावन है और वह संसार के समस्त पदार्थों को पावन कर देती है। गाय का गोबर तथा गोमूत्र शरीर से मल, प्रकुपित दोष तथा दूषित पदार्थों को निकालकर शरीर को शुद्ध व स्वस्थ बना देते हैं। गाय के दूध, घी और गोबर से लेकर मूत्र तक में औषधीय गुण होते हैं।

‘विष्णुधर्मोत्तर पुराण’ के अनुसार गाय के गोबर से लीपा गया स्थान सभी प्रकार से पवित्र हो जाता है। गोबर पृथ्वी का सबसे बड़ा पोषक, दुर्गंधनाशक, कीटनाशक, जीवाणुनाशक व रोगनाशक है। गाय के गोबर में रेडियोएक्टिवत को कम करने का सामथ्र्य होता है। भोपाल गैस त्रासदी के समय भी एक परिवार सुरक्षित बच गया था जो दुर्घटना स्थल से बेहद करीब था। बाद में पता चला कि इस परिवार ने एक दिन पहले ही अपने घर को गाय के गोबर से लीपा था। गो दुग्ध और घी अमृत के तुल्य हैं। गाय एकमात्र पशु है जो सांस लेते समय 5% आॅक्सीजन अपने पास रखती है और 95% प्रकृति को लौटा देती है।

गाय के घी का उपयोग Date :- 06-Oct-2015

•  आधा शीश के ऊपर- गाय का देसी घी सुबह-शाम नाक में डालें, इससे 7 दिन में आधा शीशी बिल्कुल दूर हो जाएगी अथवा प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व एक तोला गाय के घी में एक तोला मिश्री मिलाकर तीन दिन तक खिलायें तो निश्चय ही आराम होता है।
•  नाक से खून गिरने पर- गाय का देसी घी नाक में डालें।
•  पित्त सिर में चढ़ जाने पर- देसी घी माथे पर चुपड़ दें, इससे चढ़ा हुआ पित्त तत्काल उतर जाता है।
•  हाथ-पैर में दाह हो तो गाय का देसी घी चुपड़ दें।
•  धतूरा विष के ऊपर- गाय का देसी घी खूब पिलायें।
•  शराब का नशा उतारने के लिये- दो तोला घी में दो तोला शक्कर मिलाकर खिलायें।
•  जले हुए शरीर पर- गाय के धोये हुए घी का लेप करें।
•  बालकों की छाती में कफ जम गया हो तो गाय का पुराना घी छाती पर लगाकर उससे मालिश करें।

गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी Date :- 12-Sep-2015

वेदों में गाय को माता एवं पूजनीय कहा गया है। यह आदर उन विशेषताओं पर आधारित है जो भगवान ने एकमात्र इस जीव को प्रदान की हैं। गायों से भगवत् प्राप्ति होती है।

गव्य पदार्थों को ही धार्मिक अनुष्ठानों और आयुर्वेदिक उपचारों में स्वीकृत किया गया है। हमारा कोई धार्मिक कृत्य गोपूजन, गोदान और पंच-गव्य के बिना सम्पन्न नहीं हो सकता। गव्य पदार्थों- दुग्ध, दही, घी, मूत्र, गोबर- में रोगों के कीटाणुओं को दूर करने की अद्भुत शक्ति है। गाय का पंच गव्य एक महान औषधि है।

गाय का दूध अनेक असाध्य रोगों की अचूक औषधि है। गाय का दूध दुर्बलता और मोटापे को दूर करता है। गोदुग्ध बलिष्ठ बनाता है और टी.बी. बीमारी के कीटाणुओं को दूर करने की शक्ति रखता है। इसका ‘सेरीब्रोसाइड्स’ तत्व बौद्धिक क्षमता बढ़ाता है।

शिशु को अपनी माता के दूध न मिलने पर, गोदुग्ध ही उसका सर्वश्रेष्ठ विकल्प है। जले-कटे घाव, फोड़े-फुंसी, दाद-खाज के लिए गाय का घी चुपड़ना एक घरेलू उपचार माना जाता रहा है। यज्ञादि में गौ-घृत का प्रयोग उत्तम माना गया है। इससे प्रदूषण नष्ट करने में सहायता मिलती है।

आयुर्वेद का कथन है, ‘रात्रि को शयन से पूर्व गोदुग्ध, प्रातः काल उठकर जल और भोजन के बाद छाछ (मट्ठा) पीने से जीवन में डाॅक्टर की आवश्यकता नहीं पड़ती।

 
गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी Date :- 03-Jul-2015

गो-रक्षा हिन्दू धर्म का एक प्रधान कार्य है। प्रायः प्रत्येक हिन्दू गौ को माता कहकर पुकारता है और माता के समान ही उसका आदर करता है। जिस प्रकार कोई भी पुत्र अपनी माता के प्रति किए गए अत्याचार को सहन नहीं करेगा, उसी प्रकार एक आस्तिक और सच्चा हिन्दू गोमाता के प्रति निर्दयता के व्यवहार को नहीं सहेगा। आज हिन्दू आपसी फूट एवं कलह के कारण छिन्न-भिन्न हो रहे हैं तथा अपनी जीवनी-शक्ति खो बैठे हैं। मूक पशुओं की भांति दूसरों के द्वारा हाँके जा रहे हैं। सबसे ज्यादा दुर्भाग्य की बात तो यह है कि आज हम सभी बातों पर पाश्चात्य दृष्टिकोण से ही विचार करने लगे हैं। यही कारण है कि हमारी इस पवित्र भूमि पर प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों की संख्या में गाय व बैल काटे जा रहे हैं और हम इसके विरोध में आवाज भी नहीं उठाते। रात-दिन गौ काटी जा रही हैं, सब कुछ चुपचाप देखना, यह नपुंसकता नहीं तो और क्या है?

गौ के लिए हमारी आदर बुद्धि केवल कहने भर के लिए रह गई है। दूसरे देशों में क्षेत्रफल के हिसाब से गौओं की संख्या भारत की अपेक्षा कहीं अधिक है और प्रति मनुष्य दूध की खपत भी अधिक है। वहाँ की गौएँ हमारी गौओं की अपेक्षा दूध भी अधिक देती हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि यद्यपि हम अपने को गो-पूजक और गोरक्षक कहते हैं, वस्तुतः आज हम गोरक्षा में बहुत पिछड़े हुए हैं। गो-जाति के प्रति हमारे इस अनादर एवं उपेक्षा का परिणाम भी प्रत्यक्ष ही है। अन्य देशों की अपेक्षा हम भारतीयों की आयु बहुत ही कम है और हमारे यहाँ के बच्चे बहुत अधिक संख्या में मरते हैं। वास्तव में, दूध और दूध से बने हुए पदार्थों की कमी ही हमारी शोचनीय अवस्था का मुख्य कारण है।

हमारे शास्त्र कहते हैं कि गाय से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष- चारों पुरूषार्थों की सिद्धि होती है। दूसरे शब्दों में, धार्मिक, आर्थिक, सांसारिक और आध्यात्मिक - सभी दृष्टियों से गाय हमारे लिए अत्यन्त उपयोगी है। अतः गाय की रक्षा करें, गाय के दुग्ध व इससे बने पदार्थों का सेवन करें। इससे हर व्यक्ति स्वस्थ होगा और देश का स्वास्थ्य अच्छा होगा और देश वास्तव में सही उन्नति करेगा।

साँड का गोधन वृद्धि में महत्व Date :- 01-Jun-2015

हिन्दुस्थान की वर्तमान दयनीय स्थिति में तभी सुधार हो सकता है, जब गोधन का अपव्यय रोका जाए। गोधन का विकास साँड के विकास पर निर्भर है। गाय की अपेक्षा साँड का महत्व सौ गुणा है- ऐसा गोविज्ञान-विशारद एक स्वर से कह रहे हैं।

धर्मग्रंथों में साँड का दान सौ गाय के दान के समान श्रेष्ठ और उद्धार करने वाला बतलाया गया है। आज प्रश्न केवल गाय की रक्षा का ही नहीं, बल्कि गाय के उद्धार व सेवा का है। गली-गली भटकने वाले, भूखे और निर्बल साँडों से काम लेने के कारण ही आज गायों का ह्रास हो रहा है और बैल निर्बल पैदा हो रहे हैं। बलवान, वीर्यवान और बढि़या साँड बढ़ें, तभी हिन्दुस्थान का विकास हो सकता है। अमेरिका, जापान आदि उन्नत देशों में लाखों की कीमत के साँड पशु सृष्टि में युग परिवर्तन कर रहे हैं।

बढि़या साँड पर किया गया खर्च और मेहनत कई गुणा होकर बाहर आती है। वास्तव में, किसी भी कृषि प्रधान देश में साँड ही सच्चा धन है। इसलिए हमारे देश में गोधन की बढ़ोतरी के लिए गाँव-गाँव नन्दी का दान करने की सुन्दर प्रथा चली आ रही है।

कहने को तो हमारे देश में साँडों की कोई कमी नहीं है, किंतु उनमें ऐसे साँड बहुत थोड़े हैं, जिन्हें हम वास्तविक साँड कह सकें। उनमें से अधिकांश नपुंसक व भटकू हैं। एक सर्वोत्तम साँड 50 गायों का यूथपति हो सकता है, तो उसको न्यायोचित खान-पान भी मिलना चाहिए, परन्तु उसे मुश्किल से एक सामान्य जीव जितना खाना भी नहीं मिलता।

इस समय युगधर्म पुकार रहा है कि गाय का दान ना करके बढि़या-से-बढि़या साँड का दान करना चाहिए, जिससे उत्तम गोधन प्राप्त हो सके। जिससे गायों में अधिक दूध देने की शक्ति, स्नेह और लावण्य उत्पन्न होगा। संक्षेप में, साँड का विकास- राष्ट्र का विकास है।

गौओं के दान की प्रथा Date :- 08-May-2015

गायों के दान की प्रथा वैदिक समय से चली आ रही है। वैदिक काल में गाय का दान करने वाले को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। दान का अवसर पाकर धनिक लोगों को आनन्द होता था। ‘मैं गाय का दान करूँगा’- इस प्रकार बोलना ही शिष्ट पुरुषों की परिपाटी थी। ‘मैं गाय का दान नहीं करूँगा’- इस प्रकार कोई नहीं बोलता था। गाय का दान करने वाले को रोकना बड़ा भारी पाप समझा जाता था।

राजा तथा देवता गौ का दान करते थे। घर पर आए हुए अतिथि को गौ का दूध पीने के लिए अवश्य दिया जाता था। यज्ञ आदि के अवसरों पर ब्राह्मणों को दक्षिणा के रूप में गौएँ दी जाती थीं। रोगी के उपयोग हेतु, जिससे उसका उपचार हो सके, गाय दान में दी जाती थी, ताकि वह गाय का दूध पीकर रोगमुक्त हो सके।

वैदिक काल में आशीर्वाद के रूप में भी ‘तुझे उत्तम गौ प्राप्त हो’, यह कहने की परम्परा थी। दान में उत्तम, दुधारू व तघ गौ के ही देने की विधान है। दाता को चाहिए कि वह तरूण गाय को बछड़े सहित दान दे। धनवान पुरुष का मापदण्ड उसके पास होने वाली गायों की संख्या थी। गायों की संख्या के अनुसार, गाय-पालकों को उपाधि दी जाती थी। वैदिक काल में गोधन को श्रेष्ठ धन माना गया था।

वैदिक काल में किसी भी प्रकार से गाय को कष्ट पहुँचाना, महापाप समझा जाता था। गायों की रक्षा के अनेक उदाहरण शास्त्रों में हैं। गाय का मान माँ से भी ऊँचा माना जाता था। सभी पुरुष गायों का आशीर्वाद प्राप्त करने की होड़ में लगे रहते थे। वास्तव में, गाय उनके जीवन का अभिन्न अंग होती थी। गाय के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जाती थी। वैदिक काल में गाय जीवन का आधार थी।

गौ - सुख, शांति व समृद्धि का प्रतीक Date :- 03-Mar-2015

वास्तुशास्त्रीय दृष्टि से भवन-निर्माण से पूर्व सवत्साधेनु अर्थात् बछड़े के साथ गाय को लाकर उस भूमि पर बाँधना भूमि-दोषों का अपमार्जन करने वाला तथा पुण्यकारी होता है। गाय जब बच्चे को दुलारती है तो उसके मुख से निकला फेन उस भूमि को पवित्र बनाता है।

महाभारत के अनुसार, जहाँ गाय निर्भयतापूर्वक बैठकर साँस लेती है, वहाँ के सारे पापों को हर लेती है। संतान लाभ के लिये गौ-सेवा से उत्तम कोई उपाय नहीं है। गाय के रँभाने की आवाज कान में पड़ना मंगलकारी होता है। पुराणों में तो गो-रज को पापविनाशक बताया गया है। गाय की महिमा व्यक्त करते हुए महाकवि घाघ कहते हैं- ‘गाय के समान धन नहीं है और गेहूँ के समान अन्न नहीं है।’ वे आगे कहते हैं- ‘जिस किसान के पास गाय नहीं है, वह वास्तव में दरिद्र है।’

यह सत्य है कि गाय का दूध पीने से बल और बुद्धि वृद्धि को प्राप्त होते हैं। गाय का दूध छोटे बच्चों के विकास में सहायक होता है। गाय के दूध में कैल्शियम, फास्फोरस, सोडियम, पोटैशियम, मैगनीशियम, आयोडीन, क्लोरीन, लोहा, ताँबा, मैंगनीज, सल्फर, विटामिन ए, विटामिन डी और बी-काॅम्प्लेक्स सहजता से प्राप्त होते हैं। गोमूत्र का सेवन रोग-प्रतिरोधक का कार्य करता है। गोमूत्र फ्लू, गठिया, कुष्ठ के लिये भी उपचारक है। दूध से दही, मट्ठा बनाकर दस्तजनित बीमारियों से बचा जा सकता है।

बायोगैस बनाने के लिए गाय के गोबर का उपयोग कर प्राकृतिक सम्पदा को सुरक्षित रखा जा सकता है। गोबर से बने उपले जलने पर वातावरण के अनुपयुक्त कीटाणुओं का नाश करते हैं, वातावरण को शुद्ध रखते हैं। गोबर विषरोधी होता है। एटाॅमिक रिएक्टर में विकिरण से बचाव के लिये आज भी गाय का गोबर ही कारगर है। अनिष्ट की आशंका को सबसे पहले आँकने की क्षमता गाय में ही होती है। प्राकृतिक आपदा के आगमन से पूर्व गायों के व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है, परंतु हम उसे आज समझ नहीं पाते हैं और उसकी उपेक्षा कर देते हैं। वस्तुतः जीवन में सुख, शांति, समृद्धि लाने वाली का नाम ही गाय है।

गौ की उपयोगिता Date :- 12-Feb-2015

प्राचीन भारतीय गुरूकुल शिक्षा-व्यवस्था में गुरू की सेवा के साथ-साथ गाय की सेवा भी आवश्यक थी। मुगल सम्राट बाबर ने तो राज्य को स्थायी रखने का मुख्य साधन गोवंश की रक्षा जानते हुए अपने पुत्र हुमायूँ को गोरक्षा की विशेष आज्ञा भी दी थी। गोसेवा के महात्म्य की चर्चा करते हुए कहा गया है- ‘जो पुण्य तीर्थों के स्नान में है, जो पुण्य ब्राह्मणों को भोजन कराने में है, जो पुण्य व्रतोपवास तथा तपस्या द्वारा प्राप्त होता है, जो पुण्य श्रेष्ठ दान देने में है और जो पुण्य देवताओं की अर्चना में है, वह पुण्य तो केवल गाय की सेवा से ही तुरन्त प्राप्त हो जाता है।’

गाय के महात्म्य की चर्चा करते हुए कहा गया है कि ‘जिस गाय की पीठ में ब्रह्मा, गले में विष्णु, मुख में रुद्र, मध्य में समस्त देवगण, रोमकूपों में महर्षिगण, पूँछ में नाग, खुराग्रों में आठों कुलपर्वत, मूत्र में गंगा आदि नदियाँ, दोनों नेत्रों में सूर्य और चन्द्रमा तथा स्तनों में वेद निवास करते हैं, वह गाय मुझे वर देने वाली हो।’

जीवनीशक्ति गोदुग्ध की महिमा में बताया गया है कि यदि पृथ्वी तल पर गाय का दूध न होता तो ईश्वर की संतानों का पालन-पोषण एवं वृद्धि नहीं हो पाती। दैवयोग से किसी का जीवन रह भी जाता तो वह रूखा, वीर्यहीन, शक्तिहीन, अतिकृश और कुरूप होता।

महाभारत के अनुशासन पर्व में महर्षि च्यवन ने राजा नहुष से कहा- हे राजन्! मैं इस संसार में गौओं के समान कोई दूसरा धन नहीं देखता हूँ। पौराणिक मत है कि जगत में सर्वप्रथम वेद, अग्नि, गाय तथा ब्राह्मण की रचना हुई। वेदोक्ति है कि गाय सम्पूर्ण ब्राह्मण का स्वरूप है।

गौ महिमा Date :- 01-Jan-2015

• गाय में 33 कोटि देवी-देवता वास करते हैं। जिस घर के द्वारा गाय की सेवा होती है, उस परिवार के कलह-क्लेश व वास्तुदोष स्वतः दूर हो जाते हैं।
गाय के गलकम्बल पर नीचे से ऊपर प्रतिदिन हाथ फेरने से ब्लड प्रेशर जैसा रोग ठीक हो जाता है।
गाय यदि कोई विषैला पदार्थ खा भी ले तो उसका प्रभाव दूध में नहीं आता बल्कि वह शिव के समान विष को स्वयं में समा लेती है।
देसी गाय के दूध के सेवन से मनुष्य की बीमारियाँ बहुत कम होती हैं, क्योंकि कुछ विटामिन केवल गाय के दूध में ही पाए जाते हैं, किसी और दूध में नहीं।
देसी गाय के घी की 2-2 बूँदें प्रतिदिन नाक में डाली जाएँ तो अनिद्रा रोग, माइग्रेन, जुकाम चाहे कितना भी पुराना हो, कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
गौमूत्र 108 बीमारियों के इलाज में प्रयोग होने के साथ-साथ यह एक अति उत्तम कीटनाशक भी है। 1 लीटर गौमूत्र में 10 लीटर पानी मिलाकर अगर फसलों पर छिड़काव कर दिया जाए तो कई तरह के कीड़े पैदा ही नहीं होते और यदि हो चुके हों तो मर जाते हैं।
एक गाय 12 एकड़ जमीन को उपजाऊ बना सकती है या फिर 25,000 रुपये की खाद एक वर्ष में दे देती है।

गौ महिमा Date :- 30-Nov-2014

• गाय में 33 कोटि देवी-देवता वास करते हैं। जिस घर के द्वारा गाय की सेवा होती है, उस परिवार के कलह-क्लेश व वास्तुदोष स्वतः दूर हो जाते हैं।
• गाय के गलकम्बल पर नीचे से उपर प्रतिदिन हाथ फेरने से ब्लड प्रेशर जैसा रोग ठीक हो जाता है।
• गाय यदि कोई विषैला पदार्थ खा भी ले तो उसका प्रभाव दूध में नहीं आता बल्कि वह शिव के समान विष को स्वयं में समा लेती है।
• देसी गाय के दूध के सेवन से मनुष्य की बीमारियाँ बहुत कम होती हैं, क्योंकि कुछ विटामिन केवल गाय के दूध में ही पाए जाते हैं, किसी और दूध में नहीं।
• देसी गाय के घी की 2-2 बूँदें प्रतिदिन नाक में डाली जाए तो अनिद्रा रोग, माइग्रेन, जुकाम चाहे कितना भी पुराना हो, कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
• गौमूत्र 108 बीमारियों के इलाज में प्रयोग होने के साथ-साथ यह एक अति उत्तम कीटनाशक भी है। 1 लीटर गौमूत्र में 10 लीटर पानी मिलाकर अगर फसलों पर छिड़काव कर दिया जाए तो कई तरह के कीड़े पैदा ही नहीं होते और यदि हो चुके हों तो मर जाते हैं।
• एक गाय 12 एकड़ जमीन को उपजाउ बना सकती है या फिर 25,000 रुपये की खाद एक वर्ष में दे देती है।

गोसेवकः प्रदीप अग्रवाल

श्रीकृष्ण ने हमें गाय का स्वरूप बताया Date :- 29-Oct-2014

भगवान श्रीकृष्ण ने गाय तथा उसके बच्चों को अत्यन्त पवित्र भूमि पर खड़ा किया और सदा के लिए यह विधान कर दिया कि गाय से प्रेम करना, उस पर श्रद्धा रखना तथा उसकी पूजा करना अनिवार्य है क्योंकि गाय एक देवता है, जो पशु के रूप में पृथ्वी पर विचरती है। ऐसा करके भगवान श्रीकृष्ण ने गाय के ऊपर से पशुत्व का पर्दा हटा दिया, जिससे मनुष्य की माँ के रूप में गौ का रहस्यमय स्वरूप अपने दिव्य प्रकाश से प्रस्फुटित हो गया। जिन नेत्रों से गाय का वह वास्तविक रूप देखा जा सकता था, मनुष्य के उन नेत्रों पर अंधकार का जाल पड़ा हुआ था। श्रीकृष्ण ने इसी जाले को काटकर अलग कर दिया, तभी मनुष्य को गाय के प्रकाशमान रूप के दर्शन हुए। वास्तव में, श्रीकृष्ण ने गाय के उस आध्यात्मिक स्वरूप को प्रत्यक्ष कराने का कार्य किया।

मथुरा के निकट वृन्दावन के वनप्रदेश में प्रतिवर्ष इन्द्र के सम्मानार्थ बड़ी धूमधाम से उत्सव मनाया जाता था। श्रीकृष्ण ने इस प्राचीन धार्मिक प्रथा के विरूद्ध अपनी आवाज ऊँची की। उन्होंने अपने पिता नन्द जी को, जो उस ग्रामीण प्रदेश के अधिपति तथा वृन्दावन के प्रधान व्यक्ति थे, अनुमति दी कि इन्द्र की नहीं, बल्कि गायों की पूजा की जाए, जो वन-पर्वतों की देवी हैं। इन्द्र इस व्यवहार से बड़े क्रोधित हुए और उनमें प्रतिशोध की भावना जाग्रत हुई। उन्होंने मेघों को आज्ञा दी कि वृन्दावन के ऊपर भयंकर काली घटा बनकर छा जाओ, कड़को, गरजों, बिजली चमकाओ, प्रचण्ड पवन द्वारा पानी की तीक्ष्ण बौछार फेंको तथा भीषण उत्पात मचाकर श्रीकृष्ण के वृन्दावन को मनुष्य तथा पशुओं सहित नष्ट कर दो। इन्द्र के क्रोध से भगवान श्रीकृष्ण ने सम्पूर्ण वृन्दावन व वनप्रदेश की रक्षा की। लोगों ने देखा कि श्रीकृष्ण ने अपने एक हाथ से गोवर्धन पर्वत को उठाकर एक विशाल अभेद्य छाता बना लिया और उसके द्वारा पूरे सप्ताह भर उस भयानक तूफान को लोगों के निकट नहीं आने दिया।

वास्तव में, श्रीकृष्ण के विषय में इन्द्र बड़ी भूल में थे। अंत में, इन्द्र के ज्ञान नेत्र खुल गए। उन्होंने अपने स्वामी तथा सारी सृष्टि के स्वामी श्रीकृष्ण को पहचान लिया। इन्द्र अपनी सारी शक्तियों के साथ उनकी शरण में आ गए। भगवान श्रीकृष्ण का ‘गोविन्द’ नाम उस दिन नए अर्थ में प्रसिद्ध हुआ। अब से श्रीकृष्ण गाय को इन्द्र से भी अधिक सम्मान के योग्य समझेंगे।

जब इन्द्र का अहंकार नष्ट हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण के प्रभाव को जाना और भगवान के शरणागत हुए, तब उस समय कामधेनु गाय ने श्रीकृष्ण का अभिषेक किया, इसी कारण से यह दिन कार्तिक शुक्ल अष्टमी धूमधाम से ‘गोपाष्टमी’ पर्व के रूप में सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है।

महापुरुषों की दृष्टि में गाय Date :- 08-Oct-2014

• जब तक गौ माता का रक्त भूमि पर गिरता रहेगा, कोई धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठान सफल नहीं होगा। - श्री देवरहा बाबा

• यदि हम संसार में हिन्दू कहलाकर जीवित रहना चाहते हैं तो सर्वप्रथम हमें प्राणपण से गौ-रक्षा करनी होगी। - श्री प्रभुदत्त ब्रह्मचारी

• एक गाय अपने जीवनकाल में 4,10,440 मनुष्यों हेतु एक समय का भोजन जुटा सकती है, जबकि उसके माँस से केवल 80 माँसाहारी एक समय अपना पेट भर सकते हैं।

• गौवंश- धर्म, संस्कृति व स्वाभिमान का प्रतीक रहा है। - स्वामी दयानंद सरस्वती

• गाय का दूध रसायन, गाय का घी अमृत तथा माँस बीमारियों का घर है। - पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहिब

• गाय उन्नति और प्रसन्नता की जननी है। गाय कई प्रकार से अपनी जननी से भी श्रेष्ठ है। - महात्मा गाँधी

• भारतीय संविधान की पहली धारा सम्पूर्ण गौवंश-हत्या निषेध की होनी चाहिए। - पं. मदनमोहन मालवीय जी की अंतिम इच्छा

• मेरे विचार से भारत की वर्तमान परिस्थिति में गौ हत्या-निषेध से बढ़कर कोई वैज्ञानिक तथा विवेकपूर्ण कृत्य नहीं है। - श्री जय प्रकाश नारायण

• गाय हमारी अर्थव्यवस्था का आधार है। - श्री ज्ञानी जैलसिंह (भूतपूर्व राष्ट्रपति)

• न तो कुरान और न अरब देशों की प्रथा ही गाय की कुर्बानी (हत्या) की इजाजत देती है। - हकीम अजमल खान (प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी)

गोदुग्ध- पृथ्वी का अमृत Date :- 01-Oct-2014

जब यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया कि ‘पृथ्वी पर अमृत क्या है?’ तब उत्तर में युधिष्ठिर ने कहा था- ‘गोदुग्ध पृथ्वी पर अमृत है।’

भारतीय नस्ल की गाय की रीढ़ में सूर्यकेतु नामक विशेष नाड़ी होती है। जब इस नाड़ी पर सूर्य किरणें पड़ती हैं तो यह नाड़ी किरणों से सूक्ष्म कणों का निर्माण करती है। इसलिये गाय के दूध, मक्खन तथा घी में पीलापन रहता है। यह पीलापन शरीर के विष को समाप्त करने में लाभदायी सिद्ध होता है। गोदुग्ध का नित्य सेवन दवाओं के दुष्प्रभाव से उत्पन्न विष को भी शमन होता है। गाय के दूध में उपस्थित ‘सेरीब्रोसाइड्स’ मस्तिष्क को ताजा रखने एवं बौद्धिक क्षमता बढ़ाने के लिए उत्तम टाॅनिक का काम करता है। गोदुग्ध में प्रोटीन की इकाई ‘अमीनो एसिड’ की प्रचुर मात्रा होने से यह सुपाच्य होता है तथा चर्बी की मात्रा कम होने से ‘कोलेस्ट्राॅल’ रहित होता है। कारनेल विश्वविद्यालय में पशु विज्ञान विशेषज्ञ प्रोफेसर रोनाल्ड गोरायटे के अनुसार गाय के दूध में एम.डी.जी.आई. प्रोटीन होने से शरीर की कोशिकाएँ कैंसरयुक्त होने से बचती हैं।

गोदुग्ध पर अनेक देशों में नित्य नए परीक्षण हो रहे हैं तथा सभी परीक्षणों से इसकी नवीन विशेषताएँ प्रगट हो रही हैं। धीरे-धीरे यह वैज्ञानिकों की समझ में आ रहा है कि भारतीय ऋषियों व ग्रंथों ने गौ को माता, अवध्य तथा पूजनीय क्यों कहा है।

गाय - एक अद्भुत रसायनशाला Date :- 01-Aug-2014

जननी जनकर दूध पिलाती, केवल साल छमाही भर।
गोमाता पय-सुध पिलाती, रक्षा करती जीवन भर।।

अभी कुछ समय पहले एक पुस्तक अमेरिका के कृषि विभाग द्वारा प्रकाशित हुई थी- ‘The Cow is a wonderful laboratory’ (गाय एक आश्चर्यजनक रसायनशाला है)। इस पुस्तक में भी सिद्ध किया गया है कि प्रकृति ने समस्त जीव-जंतुओं और सभी दुग्धधारी पशुओं में से केवल गाय ही एक ऐसी पैदा की है, जिसे लगभग 180 फुट (2160 इंच) लम्बी आँत दी है। अन्य पशुओं या जीवधारियों में यह विशेषता नहीं है। यही कारण है कि गाय जो कुछ भी खाती या पीती है, वह इस लम्बी आँत से होकर अंतिम छोर तक जाता है। जैसे दूध से मक्खन निकालने वाली मशीन में जितनी अधिक गरारियाँ लगाई जाती हैं, उससे उतना ही अधिक एवं शुद्ध फैट का मक्खन निकलता है, वैसे ही प्रकृति ने भी गाय की शारीरिक संरचना में सबसे लम्बी आँत दी है, जिससे उसका दूध अन्य दूध देने वाले पशुओं से भी अधिक श्रेष्ठ होता है।

गोवत्स- यदि गाय प्रजनन (बच्चा जनने) के बाद 18 घंटे तक उसके साथ रहे और उसे चाटती रहे तो वह उस बच्चे (बछड़ा-बछड़ी) को जिंदगी भर भूलती नहीं है। इसी प्रकार गोवत्स भी सैकड़ों गायों के बीच में से अपनी माता को ढूँढ़कर दुग्धपान करता है, जबकि भैंस का बच्चा अपनी माँ को ढूँढ़ नहीं पाता।

खीस- प्रजनन के तुरंत बाद गाय के स्तनों से जो दूध निकलता है, उसे खीस, चीका, कीला या पेवस कहते हैं। देखने में यह दूध के समान ही होता है, परंतु संरचना तथा गुणों में बिल्कुल भिन्न होता है। सामान्य रूप से गर्म करने पर तुरंत फट जाता है। इसलिये इसे मिल्क-केक बनाने की प्रक्रिया द्वारा पकाकर उपयोग में लेते हैं। प्रजनन के बाद 15 दिनों तक इसमें दूध की अपेक्षा प्रोटीन तथा खनिज तत्वों की मात्रा बहुत अधिक होती है तथा लेक्टोज, वसा एवं पानी की मात्रा कम होती है। यह स्वास्थ्य के लिये बहुत गुणकारी होता है।

गोसेवा - भगवत्सेवा Date :- 01-Jul-2014

जिन क्षेत्रों में अधिक गोसमुदाय होता है, वहाँ रोग कम पनपते हैं। जिस स्थान पर गाय, बैल, बछड़ा आदि मूत्र का विसर्जन करते हैं, उस स्थान पर दीमक नहीं लगती। गाय के गोबर की खाद सभी खादों से अधिक उपजाउ और भूमि के लिये रसवर्धक होती है। बरसात के दिनों में फसलरहित खेतों में गायों के अधिक घूमने-चरने से उन खेतों में रबी की फसल अधिक पैदा होती है और वह फसल रोगरहित होती है। गोमूत्र से जो औषधि बनती है, वह उदर रोगों की अचूक दवा होती है। खाली पेट थोड़ा-सा गोमूत्र पीने से बीमारियाँ नहीं होती हैं। गोमूत्र में आँवला, नींबू, आम की गुठली तथा बबूल की पत्ती इत्यादि के गुण होते हैं। नींबू रस पेट में जाकर पेट की गंदगी को चुनकर पेट को साफ करता है, वैसे ही गोमूत्र से मुँह, गला एवं पेट शुद्ध होता है।

जिस भूमि पर गायें नहीं चरतीं, वहाँ पर स्वाभाविक ही घास का पैदा होना कम हो जाता है। भूमि पर उगी हुई घास गाय के चरने से जल्दी बढ़ती एवं घनी होती है। बीजयुक्त पकी घास खाकर भूमि पर विचरण करके चरते हुए गायों के गोबर के द्वारा एक भूमि से दूसरी भूमि (स्थान) पर घास के बीजों का स्थानांतरण होता रहता है। आज के समय में वनों के अधिक नष्ट होने का कारण भी गोवंश और गोपालकों की कमी ही है, क्योंकि गोपालकों की संख्या अधिक होती तो गायों की संख्या भी अधिक होती और अधिक गायों को चराने के लिये गोपालक वनों को जाते, जिससे वनों की सुरक्षा वे स्वयं करते तो वनों की बहुत वृद्धि होती, किंतु अब ऐसा न होने से वन असुरक्षित हो गये हैं।

गोसेवा से जितना लौकिक लाभ है, उतना ही अलौकिक लाभ भी है। जो गोसेवा निष्कामभाव से की जाती है अर्थात् पूरी उदारता से की जाती है, उसका सीधा सम्बन्ध भगवान की सेवा से ही होता है। इसलिये गायों की सेवा परम लाभ का साधन है। गाय स्वयं पवित्र है, इसलिये उसका दूध भी परम पवित्र है। गाय अपवित्र वस्तु को भी पवित्र बना देती है, क्योंकि उसके शरीर में पवित्रता के अलावा और कुछ है ही नहीं।

गोबर में लक्ष्मी जी का निवास Date :- 03-Jun-2014

एक बार मनोहर रूपधारिणी लक्ष्मी जी ने गौओं के समूह में प्रवेश किया। उनके सौंदर्य को देखकर गौओं को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने उनका परिचय पूछा, लक्ष्मी जी ने कहा- गौओं! तुम्हारा कल्याण हो। इस जगत में सब लोग मुझे लक्ष्मी कहते हैं। सारा जगत मुझे चाहता है। मैंने दैत्यों को छोड़ दिया, इससे वे नष्ट हो गये हैं। इन्द्र आदि देवताओं को आश्रय दिया, तो वे सुख भोग रहे हैं। देवताओं और ऋषियों को मेरी ही शरण में आने से सिद्धि मिलती है। जिसके शरीर में मैं प्रवेश नहीं करती, उसका नाश हो जाता है। धर्म, अर्थ और काम मेरे ही सहयोग से सुख देने वाले हो सकते हैं। मेरा ऐसा प्रभाव है। अब मैं तुम्हारे शरीर में सदा निवास करना चाहती हूँ। इसके लिये स्वयं तुम्हारे पास आकर प्रार्थना करती हूँ। तुम लोग मेरा आश्रय ग्रहण करो और श्रीसंपन्न हो जाओ।

गौओं ने कहा- ‘देवि! बात तो ठीक है, पर तुम बड़ी चंचल हो। कहीं भी जमकर नहीं रहती। इसलिए हमको तुम्हारी इच्छा नहीं है। तुम्हारा कल्याण हो। हमारा शरीर तो स्वभाव से ही हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर है। हमें तुमसे कोई काम नहीं है। तुम जहाँ इच्छा हो, जा सकती हो। तुमने हमसे बातचीत की, इसी से हम अपने को कृतार्थ मानती हैं।’ लक्ष्मी जी ने कहा- गौओं! तुम यह क्या कह रही हो? मैं बड़ी दुर्लभ हूँ और परम सती हूँ, पर तुम मुझे स्वीकार नहीं करतीं। आज मुझे पता लगा कि बिना बुलाये किसी के पास जाने से अनादर होता है- यह कहावत सत्य है। देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, मनुष्य और राक्षस बड़ी उग्र तपस्या करने पर मेरी सेवा का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। तुम मेरे इस प्रभाव पर ध्यान दो और मुझे स्वीकार करो। देखो, इस चराचर जगत में मेरा अपमान कोई भी नहीं करता।

गौओं ने कहा- ‘देवि! हम तुम्हारा अपमान नहीं करतीं। हम केवल त्याग कर रही हैं, वो भी इसलिये कि तुम्हारा चित्त चंचल है। तुम कहीं स्थिर होकर रहती नहीं। फिर हम लोगों का शरीर तो स्वभाव से सुंदर है। अतएव तुम जहाँ जाना चाहो, चली जाओ।

लक्ष्मी जी ने कहा- ‘गौओं! तुम सबको आदर देने वाली हो। मुझको त्याग दोगी, तो फिर संसार में सर्वत्र मेरा अनादर होने लगेगा। मैं तुम्हारी शरण में आई हूँ, निर्दोष हूँ और तुम्हारी सेविका हूँ। यह जानकर मेरी रक्षा करो। तुम महान सौभाग्यशालिनी, सदा सबका कल्याण करने वाली, सबको शरण देने वाली, पुण्यमयी, पवित्र और सौभाग्यवती हो। मुझे बतलाओ मैं तुम्हारे शरीर के किस भाग में रहूँ?

गौओं ने कहा- ‘यशस्विनी! हमें तुम्हारा सम्मान अवश्य करना चाहिये। अच्छा, तुम हमारे गोबर और मूत्र में निवास करो। हमारी ये दोनों चीजें बड़ी पवित्र हैं।’ लक्ष्मी जी ने कहा- ‘सुखदायिनी गौओं! तुम लोगों ने मुझ पर बड़ा आग्रह किया। मेरा मान रख लिया। तुम्हारा कल्याण हो। मैं ऐसा ही करूँगी।’

चिकित्सा में पंचगव्य क्यों महत्वपूर्ण है? Date :- 17-May-2014

गाय के दूध, घृत, दधी, गोमूत्र और गोबर के रस को मिलाकर पंचगव्य तैयार होता है। पंचगव्य के प्रत्येक घटक द्रव्य महत्वपूर्ण गुणों से संपन्न हैं

इनमें गाय के दूध के समान पौष्टिक और संतुलित आहार कोई नहीं है। इसे अमृत माना जाता है। यह विपाक में मधुर, शीतल, वातपित्त शामक, रक्तविकार नाशक और सेवन हेतु सर्वथा उपयुक्त है। गाय का दही भी समान रूप से जीवनीय गुणों से भरपूर है। गाय के दही से बना छाछ पचने में आसान और पित्त का नाश करने वाला होता है।

गाय का घी विशेष रूप से नेत्रों के लिए उपयोगी और बुद्धि-बल दायक होता है। इसका सेवन कांतिवर्धक माना जाता है।

गोमूत्र प्लीहा रोगों के निवारण में परम उपयोगी है। रासायनिक दृष्टि से देखने पर इसमें पोटेशियम, मैग्रेशियम, कैलशियम, यूरिया, अमोनिया, क्लोराइड, क्रियेटिनिन जल एवं फास्फेट आदि द्रव्य पाये जाते हैं। गोमूत्र कफ नाशक, शूल गुला, उदर रोग, नेत्र रोग, मूत्राशय के रोग, कष्ठ, कास, श्वास रोग नाशक, शोथ, यकृत रोगों में राम-बाण का काम करता है। चिकित्सा में इसका अन्त: बाह्य एवं वस्ति प्रयोग के रूप में उपयोग किया जाता है। यह अनेक पुराने एवं असाध्य रोगों में परम उपयोगी है।

गोबर का उपयोग वैदिक काल से आज तक पवित्रीकरण हेतु भारतीय संस्कृति में किया जाता रहा है। यह दुर्गंधनाशक, पोषक, शोधक, बल वर्धक गुणों से युक्त है। विभिन्न वनस्पतियां, जो गाय चरती है उनके गुणों के प्रभावित गोमय पवित्र और रोग-शोक नाशक है। अपनी इन्हीं औषधीय गुणों की खान के कारण पंचगव्य चिकित्सा में उपयोगी साबित हो रहा है।


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