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खड़ाऊँ पहनने का वैज्ञानिक महत्व Date :- 01-May-2016

पैरों में लकड़ी के खड़ाऊँ पहनने के पीछे हमारे पूर्वजों की सोच पूर्णतः वैज्ञानिक थी। गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत के अनुसार शरीर में प्रवाहित हो रही विद्युत तरंगें गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी द्वारा अवशोषित कर ली जाती हैं। इसी जैविक शक्ति को बचाने के लिए हमारे पूर्वजों ने पैरों में खड़ाऊँ पहनने की प्रथा प्रारंभ की, ताकि शरीर की विद्युत तंरगों का पृथ्वी की अवशोषण शक्ति के साथ संपर्क न हो सके।

उस समय चमड़े का जूता कई धार्मिक, सामाजिक कारणों से समाज को मान्य न था और कपड़े के जूते का प्रयोग हर जगह सफल नहीं हुआ। लकड़ी के खड़ाऊँ पहनने से किसी धर्म व समाज के लोगों को आपत्ति नहीं थी। बाद में यही खड़ाऊँ ऋषि-मुनियों के स्वरूप के साथ जुड़ गए।

खड़ाऊँ का सीधा संबंध पैर के अँगूठे से होता है। खड़ाऊँ पहनकर चलने के लिए अँगूठे ही सहायक होते हैं और इन अँगूठों पर पड़ने वाला दबाव पाचन क्रिया में भी लाभकारी होता है। जिसकी नाप (नाभी) बार-बार खिसकी रहती हो, उसे सुबह कुछ कदम खड़ाऊँ पहन कर टहलना चाहिए।

शक्तिपीठ का महत्व Date :- 01-Apr-2016

सिद्ध शक्तिपीठ से तात्पर्य उन स्थानों से है, जहाँ महामाया आदिशक्ति की जाग्रत शक्तियाँ विराजमान हैं। ऐसे देवीधामों में माँ की भक्ति करने से साधकों को शीघ्र सिद्धि और देवी माँ की कृपा मिलती है। ऐसे स्थानों में निवास करने की विशेष महिमा है। इन स्थानों की यात्रा करने और माँ के स्वरूप के दर्शन करने तथा नाम के ध्यान मात्र से मनुष्यों का कल्याण हो जाता है। इन सिद्ध शक्तिपीठों में आद्याशक्ति की अपार शक्ति और अपरम्पार महिमा प्रतिष्ठित रहती है। सती माता के अंग जिन-जिन स्थानों पर गिरे, वे सभी स्थान देवीतीर्थ बन गये। बाद में स्वयं भगवान शंकर ने उन देवीतीर्थों में शक्ति-साधना की और स्वयं अपने स्वरूप से कालभैरव, रुद्रभैरव को उत्पन्न कर प्रत्येक देवीतार्थ में उनकी स्थापना देवी की उपासना के लिये की।

जनेऊ का महत्व Date :- 01-Mar-2016

धार्मिक पक्षः धर्म के अनुसार जनेऊ के तीनों धागे त्रिदेवों का प्रतीक हैं। जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्ध होता है और शुद्ध शरीर में शुद्ध मन का प्रवास होता है, जो मनुष्य को जगत कल्याण की प्रेरणा देता है।

वैज्ञानिक पक्षः जनेऊ स्वास्थ्य और पौरुष के लिए बहुत लाभकारी होता है। हृदय रोग की संभावना को कम करता है। विज्ञान के अनुसार दाएँ कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दाएँ कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्र की रक्षा होती है। जिनको बार-बार बुरे स्वप्न आते हैं, उन्हें सोते समय कान पर जनेऊ लपेटकर सोना चाहिए। इससे बुरे स्वप्न की समस्या से मुक्ति मिल जाती है। कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है। शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दाएँ कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।

वेद क्या हैं? Date :- 01-Feb-2016

सारी दुनिया में वेदों की प्रतिष्ठा है। वेद कोई रहस्यपूर्ण ग्रंथ नहीं हैं, इनके कथन सीधे-साधे हैं। यहाँ अंध-आस्था का कोई उल्लेख नहीं, बल्कि जिज्ञासा और तर्क सम्मत वैज्ञानिक विवेचन की पद्धति है। इनमें परिपूर्ण वैचारिक विविधता है। भरा-पूरा इहलोकवाद है। प्रत्यक्ष प्रमाण पर आधारित भौतिकवाद है। संसार को मंगलमय बनाने की स्तुतियाँ व सम्यक् जीवनदृष्टि है। वेद प्राचीनतम इतिहास दर्शन का झरोखा हैं। वेद एक आनन्दमगन ‘बोधयात्रा’ है। इनका अध्ययन विचारोत्तेजक सामग्री से युक्त है, इनके अध्ययन से तमाम नए विचार उत्पन्न होते हैं, चित्त पूर्वजों के ज्ञान-विज्ञान के प्रति धन्यवाद भाव से भर जाता है। हम सोच-विचार के नए आकाश में उड़ते हैं। वेद पाँव फैलाकर आकाशचारी होने के उमंग के गीत हैं।

आज हम सब अनेक पुस्तकें पढ़ते हैं, ज्ञान-विज्ञान की ढ़ेर सारी सामग्री में रस लेते हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति, दर्शन, समाज और ज्ञान-विज्ञान के मूल स्रोत की उपेक्षा करते हैं।

ऋग्वेद - संस्कृति का महामंत्र Date :- 01-Jan-2016

ऋग्वेद भारतीय संस्कृति का मूल स्रोत है। पशु-पक्षियों, वनस्पतियों और नदियों तक को नमस्कार करने की संस्कृति भारत ने ऋग्वेद से पाई है। भौतिक पदार्थों और जीवों के अलावा भाव जगत की तमाम अनुभूतियों को भी ऋग्वेद में देवता कहा गया है। नमस्कार प्रत्यक्ष पदार्थ या वस्तु नहीं है, यह चित्त के भीतर उठने वाली प्रीति और आदर का अनुभाव है। नमस्कार उगता है हमारे अंतःस्थल में, प्रकट होता है हाथ जोड़ने और सिर झुकाने में। ऋग्वेद के ऋषियों ने ‘नमस्कार’ को भी देवता कहा है और नमस्कार को भी नमस्कार किया है।

श्रद्धा भी ऐसी ही अनुभूति है। वैदिक श्रद्धा का अर्थ अंधविश्वास नहीं है। अस्तित्व के प्रति धन्यवाद भाव का नाम ही ‘श्रद्धा’ है। ऋग्वेद के ऋषि ‘श्रद्धा’ को देवता बताते हैं और प्रातः, दोपहर, सायं श्रद्धा का आवाहन करते हैं। वे बताते हैं कि श्रद्धा में बड़ी ऊर्जा है।

चित्त की विशेष दशा को हम सब शांति कहते हैं। वैदिक साहित्य में ‘शांति’ भी देवता है, ऋषि शांति से शांति माँगते हैं।

मिट्टी की महिमा Date :- 01-Dec-2015

जिन तत्वों से हमारा शरीर बना है, वे ही प्राकृतिक उपचारों के साधन हैं और इन तत्वों में पृथ्वी अर्थात् मिट्टी तत्व की प्रधानता है। मिट्टी प्रबल कीटाणुनाशक विश्व की महानतम औषधि है और इसका ज्ञान भारतीय ऋषियों की गौरवपूर्ण देन है।

क्षार की विद्यमानता के कारण मिट्टी सब प्रकार के मल को दूर करने में समर्थ तो है ही परन्तु वानस्पतिक तत्वों के सम्मिश्रण से उसमें रोगों को दूर करने की अद्भुत क्षमता है। सब पदार्थों की सड़ांध दूर करने का गुण केवल मिट्टी में ही विद्यमान है। जल रखने, जल पीने, भोजन पकाने, दही जमाने के लिए मिट्टी के पात्र श्रेष्ठ हैं। इन बर्तनों को शुद्ध करने का मिट्टी ही सर्वोत्तम साधन है। मिट्टीयुक्त जमीन पर, हरी घास पर प्रातः और सायं नंगे पाँव चलना, जीवनी शक्तिवर्धक है। बच्चों का मिट्टी में खेलना स्वास्थ्यदायी है।

मिट्टी शुद्ध, सूखी, पिसी और छनी हुई होनी चाहिए। मिट्टी न बहुत चिकनी होनी चाहिए और न ही रेतीली। खाद वाली मिट्टी कभी भी शारीरिक रूप में इस्तेमाल नहीं करनी चाहिए। पीली मिट्टी बहुत गुणकारक होती है।

हवन की सामग्री Date :- 01-Nov-2015

हवन में विभिन्न बहु-उपयोगी औषधियाँ, अन्न आदि प्रयोग किए जाते हैं, जैसे- गूगल, चन्दन चूरा, अष्टगंध, कपूर, कचरी, नागर मोथा, बालछड़, छार छबीला, अगर नागर, लौंग, नीम के पत्ते, अमृता (गिलोय), तिल, चावल, जौ, खांड, गाय का शुद्ध घी आदि। पीपल, आम, बड़, गूलर, जामुन आदि वृक्षों की लकड़ी प्रयोग करने का विधान है। ये सब मिलाकर वायुमण्डल को शुद्ध करते हैं।

उपर्युक्त पौष्टिक द्रव्य अग्नि के माध्यम से तीव्र होकर अपने-अपने सात्त्विक प्रभाव से प्राणिजगत को आरोग्य प्रदान करते हैं। उदाहरणार्थ- एक वर्ग इंच गूगल के जलाने पर, फ्रांस विश्वविद्यालय के अनुसंधान के अनुसार, टी.बी. रोग के 6 अरब कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। बालछड़ की सुगंध हृदय रोग और वायु उपद्रवों को शांत करने में बहुत लाभकारी है।

खांड, गुड़ आदि डालने से टायफाइड, बुखार, प्लेग, हैजा आदि में बहुत लाभ होता है। हवन और भी बहुत रोगों में लाभ पहुँचाता है।

सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण Date :- 06-Oct-2015

सत्त्वगुण को प्रीतिस्वरूप समझना चाहिए, वह प्रीति सुख से उत्पन्न होती है। सरलता, सत्य, शौच, श्रद्धा, क्षमा, धैर्य, कृपा, लज्जा, शांति और संतोष- इन लक्षणों से सदैव निश्चल सत्त्वगुण की प्रतीति होती है। इसका वर्ण श्वेत है, यह सर्वदा धर्म के प्रति प्रीति उत्पन्न करता है, सत्-श्रद्धा का आविर्भाव करता है।

रजोगुण रक्तवर्ण वाला कहा गया है। यह आश्चर्य एवं अप्रीति को उत्पन्न करता है। दुःख से योग के कारण ही निश्चित रूप से अप्रीति उत्पन्न होती है। जहाँ ईष्र्या, द्रोह, मत्सर, स्तम्भन, उत्कण्ठा एवं निद्रा होती है, वहाँ राजसी श्रद्धा रहती है। अभिमान, मद और गर्व- ये सब राजसी श्रद्धा से ही उत्पन्न होते हैं।

तमोगुण का वर्ण कृष्ण (काला) होता है। यह मोह और विषाद उत्पन्न करता है। आलस्य, अज्ञान, निद्रा, भय, विवाद, कायरता, कुटिलता, क्रोध, विषमता, अत्यन्त नास्तिकता और दूसरों के दोषों को देखने का स्वभाव- ये तामसी श्रद्धा के लक्षण हैं। ये सभी लक्षण परपीड़ादायक हैं।

आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले को अपने में निरन्तर सत्त्वगुण का विकास करना चाहिए, रजोगुण पर नियंत्रण रखना चाहिए तथा तमोगुण का नाश कर देना चाहिए।

पिरामिड ऊर्जा का भण्डार Date :- 12-Sep-2015

पिरामिड के आकार को ‘शिखर का कोण’ कहा जाता है। मंत्र और तंत्र की तरह यंत्र की भी अपनी विलक्षणता और प्रभाव होता है। यदि पिरामिड के आकार के कमरे या तम्बू में रोगी को लिटाया जाए तो लाभप्रद होता है। पिरामिड के नीचे खानपान का सामान एवं अंकुरित खाद्य-पदार्थ गुणयुक्त एवं स्वादयुक्त हो जाते हैं। बीज शीघ्रता से अंकुरित होते हैं।

पिरामिड को सिर पर रखने से मस्तिष्क पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, बुद्धि का विकास होता है। पिरामिड को हैट की तरह प्रतिदिन प्रातः-सायं आधा घंटे पहनने से सिर दर्द, साइनस, टेंशन, अनिद्रा आदि बीमारियाँ दूर होती हैं। सिर के साथ-साथ पिरामिड कुर्सी के नीचे रखने से अध्ययन में बहुत लाभ होता है। पलंग के नीचे पिरामिड रखने से नींद अच्छी आती है।

पिरामिड को जल की सुराही या मटके के ऊपर रखने से जल अधिक स्वादयुक्त और आरोग्यप्रद होता है। चार गिलास पानी पीकर पेट पर पिरामिड रखने से कब्ज में बहुत लाभ होता है। शरीर में दर्द के स्थान पर रखने से दर्द दूर हो जाता है। पेट पर रखने से पेट की गड़गड़ी दूर होती है।
सिन्दूर का वैज्ञानिक महत्त्व Date :- 01-Aug-2015

भारतीय वैदिक परंपरा विशेष रूप से हिंदू समाज में शादी के बाद महिलाओं का मांग में सिंदूर भरना आवश्यक हो जाता है। आधुनिक युग में अब सिंदूर की जगह कुमकुम और अन्य चीजों ने ले ली है। सवाल यह उठता है कि आखिर सिंदूर ही क्यों लगाया जाता है। वास्तव में, इसके पीछे एक बड़ा वैज्ञानिक कारण है। यह मामला पूरी तरह स्वास्थ्य से जुड़ा है। सिर के उस स्थान पर जहाँ मांग भरी जाने की परंपरा है, मस्तिष्क की एक महत्वपूर्ण ग्रंथी होती है, जिसे ‘ब्रह्मरंध्र’ कहते हैं। यह अत्यंत संवेदनशील भी होती है। यह मांग के स्थान यानी कपाल के अंत से लेकर सिर के मध्य तक होती है। सिंदूर इसलिए लगाया जाता है क्योंकि इसमें पारा नाम की धातु होती है। पारा ब्रह्मरंध्र के लिए औषधि का काम करता है। महिलाओं को तनाव से दूर रखता है और मस्तिष्क को हमेशा चैतन्य अवस्था में रखता है। विवाह के बाद ही मांग इसलिए भरी जाती है क्योंकि विवाह के बाद जब गृहस्थी का दबाव महिला पर आता है तो उसे तनाव, चिंता और अनिद्रा जैसी बीमारियाँ प्रायः घेर लेती हैं। पारा एकमात्र ऐसी धातु है जो तरल रूप में रहती है। यह मस्तिष्क के लिए लाभकारी है, इस कारण सिंदूर मांग में भरा जाता है।

कीर्तन की महिमा Date :- 31-Jul-2015

कीर्तन जोर-जोर से होता है और इसमें संख्या का कोई हिसाब नहीं रखा जाता। यही जप और कीर्तन में भेद है। जप जितना गुप्त होता है उतना ही उसका अधिक महत्व है, परन्तु कीर्तन जितना गगनभेदी स्वर में होता है उतना ही उसका महत्व बढ़ता है। कीर्तन के साथ संगीत का अटूट संबंध है। कीर्तन के कई प्रकार हैं- अकेले ही भगवान के किसी नाम को आर्तभाव से पुकारना, जैसे- द्रौपदी और गजराज आदि ने भगवान को पुकारा था, भगवान के किसी चरित्र का गान करना और बीच-बीच में नाम कीर्तन करना, अधिक लोगों का एक साथ मिलकर एक स्वर से नामकीर्तन करना।

जब मनुष्य किसी दुःख से घबराकर भगवान से आश्रय-याचना करता हुआ जोर से उसका नाम लेकर पुकारता र्है, तब भगवान उसी समय भक्त की इच्छा के अनुकूल कार्य कर उसका दुःख दूर करते हैं। द्रौपदी ने आर्त स्वर में पुकारा था- ‘हे द्वारकावासी! हे गोपीजनप्रिय कृष्ण! क्या मुझ कौरवों से घिरी हुई को तू नहीं जानता? हे नाथ, ब्रजनाथ, दुःखनाशक जनार्दन! मुझ कौरवरूपी समुद्र में डूबी हुई का उद्धार करो। हे विश्वात्मा कृष्ण! हे महायोगी कृष्ण! कौरवों के बीच में हताश होकर तेरे शरण आने वाली मुझको तू बचा।’

जब सबकी आशा छोड़कर केवल परमात्मा पर भरोसा कर उसे मन से कोई पुकारता है तब वह करूणासिंधु भगवान एक क्षण भी निश्चिंत और स्थिर नहीं रह सकता। उसे भक्त के लिए उसी समय दौड़ना पड़ता ही है। नाम की पुकार होते ही द्रौपदी के वस्त्रों में भगवान का चीरावतार हो गया। वस्त्र का ढेर लग गया। दस हजार हाथियों का बल रखने वाली दुःशासन की भुजाएँ फटने लगीं। ‘दस हजार गज बल घटयो, घटयो न दस गज चीर।’
मंगलाचरण का महत्व Date :- 03-Jul-2015

सत्कर्मों में अनेक विघ्न आते हैं। उन सभी के निवारण के लिए मंगलाचरण की आवश्यकता होती है। शास्त्र कहते हैं कि देवगण भी सत्कर्म में विक्षेप करते हैं। देवों को ईष्र्या होती है कि नारायण का ध्यान यह करेगा तो यह भी हमारे समान ही हो जाएगा। अतः देवों से भी प्रार्थना करनी आवश्यक है- हे देवों! हमारे सत्कार्य में विक्षेप न करना। सूर्य हमारा कल्याण करें, वरूणदेव हम पर कृपा करें। जिसका आचरण मंगलमय है, उसका ध्यान करने से, उसका वन्दन करने से, उसका स्मरण करने से मंगलाचरण होता है। जिसका आचरण मंगल है, उसका मनन और चिन्तन करना ही मंगलाचरण है। भगवान का नाम और धाम मंगलमय है। इसलिए प्रत्येक कार्य का आरम्भ मंगलाचरण से करो। सवेरे सोकर उठने पर, मध्यान्ह में और रात को सोने से पूर्व मंगलाचरण अवश्य करना चाहिए। मंगलाचरण में किसी एक देव का नाम उल्लेखित नहीं है। आपकी श्रद्धा जिस देव में हो, उन्हीं का नाम और ध्यान करो।

चार प्रकार के प्राणी Date :- 01-Jun-2015

प्राणियों को चार श्रेणियों में बाँटा गया है- जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज। सिंह, हाथी, पशु, मनुष्य आदि- ये सब जरायुज जीव हैं, ये गर्भ से झिल्ली में लिपटे हुए पैदा होते हैं। पक्षी, साँप, मगरमच्छ, मछलियाँ, कछुए आदि तथा इस प्रकार के जो थलचर और जलचर जीव हैं, वे सब अण्डज कहलाते हैं, अर्थात् ये गर्भ से अण्डे के रूप में पैदा होते हैं। मच्छर, जूँ, मक्खी, खटमल और इस प्रकार के अन्य जीव जो उष्मा से पैदा होते हैं, ये सब स्वेदज कहलाते हैं। बीज तथा शाखा को तोड़कर मिट्टी में गाड़ देने से लगने वाले वृक्ष आदि स्थावर जीव उद्भिज्ज की श्रेणी में आते हैं। समस्त औषधि, वनस्पति, फूल-पौधे, लताएँ इत्यादि आते हैं। पेड़-पौधों को भी सुख-दुःख का अनुभव होता है।

घंटानाद Date :- 08-May-2015

भगवान विष्णु स्वयं कहते हैं- घंटा सर्ववाद्यमय है और मुझे सर्वदा प्रिय है। मेरी पूजा के समय उसे बजाने से मनुष्य सौ कोटि यज्ञों का फल प्राप्त करता है। घंटानाद सदा ही करने योग्य है। विशेषतः मेरी पूजा के समय घंटा अवश्य बजाना चाहिए। मृदंग और शंख की ध्वनि तथा प्रणव के उच्चारण के साथ किया हुआ मेरा पूजन मनुष्यों को सदैव मोक्ष प्रदान करने वाला है। मेरे पूजन के समय जो घंटानाद करता है, उसके सौ जन्मों के पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। जो गरुड़चिन्ह से युक्त घंटा हाथ में लेकर धूप, आरती, स्नान, पूजा और विलेपन के समय मेरे आगे प्रतिदिन बजाता है, वह प्रत्येक उपचार में बजाने के बदले सौ-सौ चान्द्रायण से प्राप्त होने वाले फल को पाता है।

स्वस्तिक का चिन्ह मंगलकारी है Date :- 01-Apr-2015

भारतीय संस्कृति के मूल ग्रंथ ‘वेद’ हैं। वेदों में स्वस्तिक का विशेष महत्व है। स्वस्तिक का चिन्ह सर्वकल्याण, सुख, शांति प्रदान करने वाला व रिद्धि-सिद्धि देने वाला है। बुरी दृष्टि व बुरी हवा को घर के अन्दर आने से रोकता है, अतः घर, आॅफिस, फैक्टरी या गोदाम के मुख्य दरवाजे के ऊपर स्वस्तिक का चिन्ह सिन्दूर में गाय का दूध या घी अथवा चमेली का तेल मिलाकर बनाना चाहिये। अपने दाहिने हाथ की एक बालिष्ठ (छोटी अंगुली से अंगूठे तक की दूरी) जितना लम्बा और चैड़ा सुन्दर और सीधा स्वस्तिक बनाना अत्यन्त शुभ माना जाता है। स्वस्तिक के साथ-साथ ‘श्री’, ‘ओम्’, ‘शुभ-लाभ’ लिखना भी बहुत शुभ होता है। स्वास्तिक जीवन में उन्नति का प्रतीक है।

पूजनीय पीपल का वृक्ष Date :- 03-Mar-2015

पीपल, आम, बरगद, आँवला, सिरस, गूलर, नीम, बेल, बाँस, देवदारु और चन्दन के वृक्ष पवित्र माने जाते हैं। इनमें पीपल सबसे पवित्र है और इसकी सर्वाधिक पूजा होती है। इसकी जड़ से लेकर पत्ते-पत्ते तक में देवताओं का वास माना जाता है। यह ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश का एकीभूत समझा जाता है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने ‘अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्’ कहकर पीपल को अपना स्वरूप बताया है। बौद्ध-जनता इसे ‘बोधिवृक्ष’ कहकर पूजती है तथा हिंदू ‘वासुदेव’। इसकी शाखा ही क्या पत्ती तक नहीं तोड़ी जाती। पीपल-वृक्ष के समान समादृत एवं पूजनीय अन्य एक भी वृक्ष संसार में नहीं है। तिब्बत में इसे ‘लालचङ’ कहते हैं। वहाँ जब इसके पास पहुँचा जाता है, तब सिर से टोपी उतार दी जाती है और ‘शोलो-शोलो’ कहा जाता है तथा इसकी जड़ पर दो-चार छोटे-छोटे सफेद पत्थर के टुकड़े डाल दिये जाते हैं। इसकी जड़ को लाल रंग से रँग डालते हैं। भारत की भाँति वहाँ भी ऐसी भावना है कि जो व्यक्ति ‘लालचङ’ वृक्ष को काटता है या नष्ट करता है, उसे कोढ़ हो जाता है।

संकीर्तन में ताली या चुटकी बजाना Date :- 01-Mar-2015

संकीर्तन आदि के समय ताली बजाना, जो स्वयं में हर्षोल्लास का प्रतीक है, शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। हथेलियों और अंगुलियों को आपस में दबाने से शरीर के विभिन्न अंग प्रभावित होते हैं। इससे रक्त-संचरण सुचारू रूप से होता है। नेत्रा ज्योति की वृद्धि होती है। रक्तचाप, कब्ज, बवासीर, हृदय आदि रोगों में सुधार होता है। मध्यमा अंगुली (आकाश की प्रतीक) और अंगुष्ठ (अग्नि का प्रतीक) के मिलाने से आकाश मुद्रा बनती है और इसी मुद्रा से चुटकी बजाई जाती है। यह चुटकी वातावरण में सूक्ष्म ऊर्जा शक्ति उत्पन्न करती है और इससे साधक अज्ञात आधि-व्याधियों से अपनी शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक रक्षा करता है। (नोटः यदि जबड़ा फँस जाये और मुख बंद न हो तो चुटकी बजाने पर मुख बंद हो जाता है)

धन्य हैं हमारे ऋषि-मुनि जिन्होंने लोगों के स्वास्थ्य हेतु ताली और चुटकी को संकीर्तन का हिस्सा बना दिया। देखा भी जाता है जो व्यक्ति नियमित रूप से संकीर्तन में भाग लेते रहते हैं, वे प्रायः दीर्घायु और स्वस्थ होते हैं।

शुभ और अशुभ कर्म Date :- 12-Feb-2015

प्रत्येक भोग में शुभ और अशुभ कर्म ही कारण हैं। पुण्य-कर्म में जीवन सुख भोगता है और पाप-कर्म में दुःख का अनुभव करता है। जैसा कर्म किया जाता है, वैसा ही फल का उपभोग किया जाता है। हम सब लोग कर्म के अधीन हैं। संसार में कर्म ही जीवों की सन्तान है, कर्म ही उनके बन्धु-बान्धव हैं तथा कर्म ही यहाँ पुरुष को सुख-दुःख में प्रवृत्त करते हैं। पूर्वजन्म का किया हुआ कर्म ही कर्ता को मिलता है। जीव अपने कर्मों के अनुसार ही देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी और स्थावर योनियों में जन्म लेता है तथा उन योनियों में वह सदा अपने किए हुए कर्म को ही भोगता है। वास्तव में, सुख-दुःख दोनों अपने ही किए हुए कर्मों के फल हैं। पृथ्वी पर कोई भी पुरुष ऐसा नहीं है जो पूर्वजन्म के किए हुए कर्म को अन्यथा कर सके अर्थात् बिना भोगे रह सके। सभी जीव अपने कमाये हुए सुख-दुःख को ही खर्च करते हैं। भोग के बिना किए हुए कर्म का नाश नहीं होता।

शास्त्रीय संगीत का महत्व Date :- 01-Jan-2015

सामवेद द्वारा संगीत भारतीय विज्ञान की बहुत बड़ी देन है। संगीत के सात स्वरों में हमारे संगीत शास्त्रियों ने संसार की सब बोलियों को बाँध दिया है। ये सात स्वर प्रकृति के सात रहस्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इनमें एक अज्ञात रहस्यमय शक्ति विद्यमान है। इसका प्रभाव प्रकृति और मानव पर बहुत ही शीघ्र पड़ता है। संगीत एक जादू है।

प्रसिद्ध है कि बैजू बावरा ने ‘माल कोस’ राग के द्वारा पत्थर को मोम बना दिया था। तानसेन ने ‘मेघ राग’ द्वारा वर्षा कर दी थी व ‘दीपक राग’ द्वारा दीप जला दिये थे। भगवान कृष्ण के वंशीवादन के सम्बन्ध में कौन नहीं जानता? रागों द्वारा मन, मस्तिष्क व हृदय के बड़े-बड़े पेचीदा एवं जटिल रोगों का समाधान किया जा सकता है।

वैज्ञानिकों ने ऐसी ध्वनियाँ निकाली हैं जिनके बजाने से कृषि की फसल व गाय के दूध में वृद्धि की जा सके। विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति और बुद्धि को तीव्र करने के लिए नाद ध्वनि अथवा स्वर शब्द शक्ति का प्रयोग किया जा रहा है।

श्रीमद्भगवद्गीता - एक विलक्षण ग्रंथ Date :- 30-Nov-2014

गीता एक ऐसा विलक्षण ग्रंथ है, जिसका आज तक ना तो कोई पार पा सका, ना पार पाता है, ना पार पा सकेगा और ना पार पा ही सकता है। गहरे उतरकर इसका अध्ययन-मनन करने पर नए-नए विलक्षण भाव प्रकट होते रहते हैं। गीता में जितना भाव भरा है, उतना बुद्धि में नहीं आता। जितना बुद्धि में आता है, उतना मन में नहीं आता। जितना मन में आता है, उतना कहने में नहीं आता। जितने कहने में आता है, उतना लिखने में नहीं आता। गीता असीम है, पर उसकी टीका सीमित ही होती है।

गीता में अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि मनुष्य इच्छा न होने पर भी पाप कर्म क्यों करता है? कृष्ण बताते हैं- काम के कारण। ‘काम’ से तात्पर्य है कामना या इच्छा- प्रभुता की, धन की, सुख की। यह ‘काम’ जब मन, बुद्धि और इंद्रियों को काबू में कर लेता है तो व्यक्ति भ्रष्टाचारी बन जाता है। बुद्धि में चित्त को वश में करने की ताकत तो है, पर जब मनुष्य के आसपास वाले हाँ में हाँ मिलाते हों तो कमजोरी उसकी ताकत पर हावी हो जाती है।

अक्षय नवमी का महत्व Date :- 01-Nov-2014

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को अक्षय नवमी के रूप में मनाया जाता है, इसे आंवला नवमी भी कहते हैं। मान्यता है कि सतयुग का आरंभ भी इसी दिन हुआ था। इस दिन आँवले के वृक्ष की पूजा करने का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार आँवले के वृक्ष में सभी देवताओं का निवास होता है तथा यह फल भगवान विष्णु को भी अति प्रिय है। एक बार भगवान विष्णु से पूछा गया कि कलियुग में मनुष्य किस प्रकार से पाप मुक्त हो सकता है। भगवान ने इस प्रश्न के जवाब में कहा कि जो प्राणी अक्षय नवमी के दिन मुझे एकाग्र होकर ध्यान करेगा, उसे तपस्या का फल मिलेगा।

आँवला नवमी की तिथि को पवित्र तिथि माना गया है। अक्षय नवमी के दिन स्नान, पूजन, तर्पण तथा अन्नदान करने से हर मनोकामना पूरी होती है। इस दिन किया गया जप, तप, गौ-दान, स्वर्ण तथा वस्त्र का दान सभी पापों से मुक्त करने वाला तथा सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाला होता है। इन वस्तुओं का दान देने से ब्राह्मण हत्या, गौ हत्या जैसे महापापों से बचा जा सकता है।

पितरों के शीतनिवारण के लिए यथाशक्ति कंबल आदि ऊर्णवस्त्र भी सत्पात्र ब्राह्मण को देना चाहिए। अगर घर में आँवले का वृक्ष न हो तो किसी बगीचे में या गमले में आँवले का पौधा लगा कर यह कार्य सम्पन्न करना चाहिए।

हरिवल्लभा तुलसी विवाह Date :- 29-Oct-2014

हमारी भारतीय संस्कृति में अनेक व्रतोत्सव मनाए जाते हैं। इनमें तुलसी-शालिग्राम जी का विवाह एक महत्वपूर्ण आयोजन है। यह विवाह अखण्ड सौभाग्य देने वाला है। अतः भारतीय महिलाएँ इस व्रतोत्सव को पूर्ण श्रद्धा और मनोयोग से पूर्ण करती हैं। देवोत्थान एकादशी के दिन आरम्भ होने वाला तुलसी विवाह विशुद्ध मांगलिक और आध्यात्मिक प्रसंग है। देवता जब जागते हैं, तो सबसे पहली प्रार्थना हरिवल्लभा तुलसी की ही सुनते हैं। इसीलिए तुलसी विवाह को देव जागरण के पवित्र मुहूर्त के स्वागत का आयोजन माना जाता है। तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आह्वान। कार्तिक शुक्ल पक्ष, एकादशी को तुलसी पूजन का उत्सव मनाया जाता है। आयोजन बिल्कुल वैसा ही होता है, जैसे हिन्दू रीति-रिवाज से सामान्य वर-वधू का विवाह किया जाता है।

तुलसी विवाह की कथा- प्राचीन काल में जालंधर नामक राक्षस ने चारों तरफ बड़ा उत्पात मचा रखा था। वह बड़ा वीर तथा पराक्रमी था। उसकी वीरता का रहस्य था, उसकी पत्नी वृंदा का पतिव्रता धर्म। उसी के प्रभाव से वह सर्वविजयी बना हुआ था। जालंधर के उपद्रवों से परेशान देवगण भगवान विष्णु के पास गये तथा रक्षा की गुहार लगाई। उनकी प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने वृंदा का पतिव्रता धर्म भंग करने का निश्चय किया। उधर, उसका पति जालंधर, जो देवताओं से युद्ध कर रहा था, वृंदा का सतीत्व नष्ट होते ही मारा गया। जब वृंदा को इस बात का पता लगा तो क्रोधित होकर उसने भगवान विष्णु को शाप दे दिया कि तुमने मेरा सतीत्व भंग किया है। अतः तुम पत्थर के बनोगे। यह कहकर वृंदा अपने पति के साथ सती हो गई। जिस जगह वह सती हुई वहाँ तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। विष्णु बोले, ‘हे वृंदा! यह तुम्हारे सतीत्व का ही फल है कि तुम तुलसी बनकर मेरे साथ ही रहोगी। जो मनुष्य तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेगा, वह परम धम को प्राप्त होगा।’

बिना तुलसी दल के शालिग्राम या विष्णु जी की पूजा अधूरी मानी जाती है। शालिग्राम और तुलसी का विवाह भगवान विष्णु और महालक्ष्मी के विवाह का प्रतीकात्मक विवाह है।

उगते सूर्य की लाली Date :- 28-Oct-2014

उगते हुए सूर्य की लाली में रोगों को नष्ट करने की विशेष क्षमता होती है। ऋग्वेद के अनुसार, यह लाली हृदय के सभी रोगों, पीलिया और रक्ताल्पता को दूर करती है। लगभग सभी रोगों में सूर्य की लाली उपयोगी है। जो लाभ सूर्योदय के समय की किरणों से होता है, वह अन्य समय सम्भव नहीं। इस लाली को देखने से नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। इस समय विधिपूर्वक सूर्य-नमस्कार खुले स्थान पर करना एक श्रेष्ठ कृत्य है। सूर्योदय के समय कम से कम 15 मिनट तक सूर्य के सम्मुख रहना चाहिए।

नेत्र ज्योति के लिए सूर्य के प्रतिबिम्ब को प्रातःकाल तालों तथा नदियों में देखना बहुत लाभप्रद है। इससे मोतियाबिंद आदि रोगों से बचा जा सकता है।

लक्ष्मी जी का निवास Date :- 08-Oct-2014

जहाँ से लक्ष्मी जी चली जाती हैं- जहाँ शंखध्वनि नहीं होती, तुलसी का निवास नहीं रहता, शंकर जी की पूजा नहीं होती तथा ब्राह्मणों को भोजन नहीं कराया जाता, वहाँ लक्ष्मी नहीं रहती। जहाँ भगवान के भक्तों की निंदा होती है, वहाँ रहने वाली महालक्ष्मी के मन में अपार क्रोध उत्पन्न हो जाता है। अतः वे उस स्थान को छोड़कर चल देती है। जो भगवान की उपासना नहीं करता तथा एकादशी और जन्माष्टमी के दिन अन्न खाता है, उस व्यक्ति के घर से लक्ष्मी चली जाती है। जिस घर में अतिथि भोजन नहीं पाता, उस घर को त्यागकर लक्ष्मी चली जाती है। जो व्यक्ति बिना प्रयोजन के घास-तिनके आदि तोड़ता है, नाखूनों से पृथ्वी को कुरेदता रहता है, जो दिन में मैथुन करता है और जो सदाचारहीन है, ऐसे लोगों के घर से लक्ष्मी चली जाती है। जो व्यक्ति ब्राह्मणों की निन्दा तथा उनसे द्वेष करता है, जीवों की सदा हिंसा करता रहता है और दयारहित है, उसके घर से महालक्ष्मी चली जाती है।

लक्ष्मी जी का निवास- जिस स्थान पर भगवान श्रीहरि की चर्चा होती है और उनके गुणों का कीर्तन होता है, वहाँ पर सम्पूर्ण मंगलों को भी मंगल प्रदान करने वाली भगवती लक्ष्मी निवास करती है। जहाँ भगवान श्रीकृष्ण तथा उनके भक्तों का यश गाया जाता है, वहाँ लक्ष्मी जी सदा विराजती हैं। जहाँ शंखध्वनि होती है तथा शंख, शालिग्राम, तुलसी- इनका निवास रहता है एवं उनकी सेवा, वन्दना और ध्यान होता है, वहाँ लक्ष्मी जी सदा विद्यमान रहती हैं। जहाँ शिवलिंग की पूजा और पवित्र कीर्तन तथा दुर्गा-पूजन एवं गुणगान होता है, उन्हें उत्तम पदार्थ भोजन कराए जाते हैं तथा सम्पूर्ण देवताओं का अर्चन होता है, वहाँ पप्रमुखी साध्वी लक्ष्मी विराजती है।

गणेश पूजा में तुलसी निषेध क्यों? Date :- 07-Oct-2014

ब्रह्मकल्प में एक समय नवयौवना तुलसीदेवी तपस्या के निमित्त से तीर्थों में भ्रमण करती हुईं गंगातट पर जा पहुँचीं। वहाँ उन्होंने गणेश जी को देखा, जो अत्यन्त सुन्दर, शुद्ध और पीताम्बर धारण किए हुए थे, जो रत्नों के आभूषणों से विभूषित थे। वे मन्द-मन्द मुस्कुराते हुए भगवान श्रीकृष्ण के चरणकमलों का ध्यान कर रहे थे। उन्हें देखते ही तुलसी का मन गणेश जी की ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी ने उनसे लम्बोदर तथा गजमुख होने का कारण पूछा।

ध्यान भंग होने पर गणेश जी ने पूछा- ‘तुम कौन हो?’ किसकी कन्या हो? यहाँ तुम्हारे आने का क्या कारण है? क्योंकि तपस्वियों का ध्यान भंग करना सदा पापजनक तथा अमंगलकारी होता है। इस पर तुलसी ने कहा- मैं धर्मात्मज की नवयुवती कन्या हूँ और तपस्या में संलग्न हूँ। मेरी यह तपस्या पति-प्राप्ति के लिए है, अतः आप मेरे स्वामी हो जाइये। यह सुनकर गणेश जी ने कहा कि विवाह करना बड़ा भयंकर व दुःखदायी होता है और इससे सुख कभी नहीं मिलता। अतः हे तुलसी! तुम मेरी ओर से अपना मन हटा लो और किसी अन्य पति की तलाश करो।

गणेश जी के ऐसे वचन सुनकर तुलसी को क्रोध आ गया। तब तुलसी ने गणेश जी को शाप देते हुए कहा- तुम्हारा विवाह अवश्य होगा। यह सुनकर गणेश जी ने भी तुलसी को शाप दिया कि तुम किसी असुर द्वारा ग्रस्त होओगी, तत्पश्चात् महापुरुषों के शाप से तुम वृक्ष हो जाओगी। यह शाप सुनकर तुलसी ने गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए उनकी स्तुति की।

तुलसी जी द्वारा स्तुति से प्रसन्न होकर गणेश जी बोले- ‘तुम पुष्पों की सारभूता होओगी और कलांश से (भगवान की 16 कलाओं में से) स्वयं नारायण की प्रिया बनोगी। यों तो सभी देवता तुमसे प्रेम करेंगे, परन्तु श्रीकृष्ण के लिए तुम विशेष प्रिय होओगी। तुम्हारे द्वारा की गई पूजा (तुलसी-दल द्वारा) मनुष्यों के लिए मुक्तिदायिनी होगी, परन्तु मेरे लिए तुम सर्वदा त्याज्य रहोगी। इसलिए आज भी गणेश जी की पूजा में तुलसी के पत्तों का प्रयोग नहीं होता।

तुलसी के शाप के कारण गणेश जी का विवाह रिद्धि, सिद्धि व बुद्धि के साथ हुआ। गणेश जी के शाप के कारण तुलसी चिरकाल तक असुरराज शंखचूड़ की प्रिय पत्नी बनी रही। तदनन्तर असुरराज शंखचूड़ शंकर जी के त्रिशूल से मृत्यु को प्राप्त हो गया। तब नारायण प्रिया तुलसी कलांश से वृक्षभाव को प्राप्त हो गई।

चावल Date :- 01-Oct-2014

चावल व्यक्ति के जीवन की मुख्य खाद्य सामग्री है। चावल (धान) से छिलका अलग होने पर उसमें पुनः अंकुरित होने की शक्ति नष्ट हो जाती है। चावल के दाने में कोई जीव-जन्तु अपना घर नहीं बना सकता। अखण्ड चावलों को अक्षत भी कहते हैं। उन्हें चढ़ाकर अक्षय पद की कामना करते हैं। इन्हीं कारणों से मंदिर में चावल चढ़ाने का महत्व है।

चावल के लिये एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जहाँ चावल अंकुरित होता है उसे वहाँ से हटाकर अंकुरित पौधे को अन्यत्र कहीं लगाया जाता है, तब चावल उत्पन्न होता है। इसी प्रकार कन्या जन्म कहीं और लेती है और संतान उत्पत्ति कहीं और करती है। इसीलिए कन्या दान के समय धान कन्या के उपर फेंके जाते हैं।

एकादशी को चावल क्यों नहीं खाते- हम सभी जानते हैं कि चावल की खेती के लिये अधिक जल की आवश्यकता होती है और चन्द्रमा का संबंध जल से होता है और वह जल को अपनी ओर आकर्षित करता है। एकादशी का व्रत इन्द्रियों सहित मन के निग्रह के लिये किया जाता है, क्योंकि चावल में जलीय तत्व की मात्रा अधिक होती है परिणामस्वरूप मन में विक्षेप और संशय का जागरण होता है। अतः एकादशी के दिन चावल खाना निषेध है।

"श्राद्ध" कर्म करने का सच्चा अधिकारी Date :- 13-Sep-2014

"श्राद्ध" अपने पूर्वजों, अपने पितरों के प्रति अपनी श्रद्धा को व्यक्त करने की क्रिया का नाम है।

हमारे पूर्वज अपने पितरों में इतनी श्रद्धा रखते थे कि मरने के बाद भी उन्हें याद और उनके सम्मान में यथायोग्य दान-पुण्य किया करते थे। अपने पितरों के प्रति यही श्रद्धान्जलि ही कालांतर में "श्राद्ध" कर्म के रूप में मनाई जाने लगी।

श्रद्धा तो आज के लोग भी रखा करते हैं मगर मूर्त माँ बाप में नहीं अपितु मृत माँ - बाप में। माँ-बाप के सम्मान में जितने बड़े आयोजन आज रखे जाते हैं, शायद ही वैसे पहले भी रखे गए हों। फर्क है तो सिर्फ इतना कि पहले जीते जी भी माँ-बाप को सम्मान दिया जाता था और आज केवल मरने के बाद दिया जाता है।

श्रद्धा वही फलदायी होती है जो जिन्दा माँ-बाप के प्रति हो अन्यथा उनके मरने के बाद किया जाने वाला श्राद्ध एक आत्मप्रवंचना से ज्यादा कुछ नहीं होगा। जो मूर्त माँ-बाप के प्रति श्रद्धा रखता है , वही मृत माँ-बाप के प्रति "श्राद्ध" कर्म करने का सच्चा अधिकारी भी बन जाता है।

श्राद्ध भले ही मृत्यु के बाद किये जाते हों मगर श्रद्धा जीते जी रखी जा सकती है। एक बात समझना आवश्यक है जीते जी माँ-बाप, दादा-दादी की पूजा का अभिप्राय क्या है ?
अपने माता-पिता और वुजुर्गों से अच्छा व्यवहार करना और समय-समय पर उनका दुःख-सुख पूछना ही उनको पूजना है। इस समयाभाव वाले युग में हमने अपने बुजुर्गों को पूजना तो दूर उनका हाल-चाल पूछना भी छोड़ दिया है। वो इसीलिए वेहाल हैं कि तुम हाल तक नहीं पूछते हो।

ऐसे में उनके साथ किया गया प्रेम व्यवहार भी किसी अनुष्ठान, किसी पूजा और किसी सत्कर्म से कम नहीं है। श्राद्ध इसलिए आवश्यक है कि वह दिवंगतों को तृप्त करता है और श्रद्धा इसलिए आवश्यक है क्योंकि वह जीवित लोगों को तृप्त करती है।

मंदिर के बाहर घंटी क्यों होती है? Date :- 08-Sep-2014

हिंदू धर्म से जुड़े प्रत्येक मंदिर और धार्मिक स्थलों के बाहर आप सभी ने बड़े-बड़े घंटे या घंटियां लटकी तो अवश्य देखी होंगी जिन्हें मंदिर में प्रवेश करने से पहले भक्त श्रद्धा के साथबजाते हैं. लेकिन क्या कभी आपने यह सोचा है कि इन घंटियों को मंदिरके बाहर लगाए जाने के पीछे क्या कारण है या फिर धार्मिक दृष्टिकोण से इनका औचित्य क्या है?

असल में प्राचीन समय से ही देवालयों और मंदिरों के बाहर इन घंटियों को लगाया जाने की शुरुआत हो गई थी. इसके पीछे यह मान्यता हैकि जिन स्थानों पर घंटी की आवाज नियमित तौर पर आती रहती है वहां का वातावरण हमेशा सुखद और पवित्र बना रहता है और नकारात्मक या बुरीशक्तियां पूरी तरह निष्क्रिय रहती हैं.

यही वजह है कि सुबह और शाम जब भी मंदिरमें पूजा या आरती होती है तोएक लय और विशेष धुन के साथ घंटियां बजाई जाती हैं जिससे वहां मौजूद लोगों को शांति और दैवीय उपस्थिति की अनुभूति होती है.

लोगों का मानना है कि घंटी बजाने से मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं की मूर्तियों में चेतना जागृत होती है जिसके बाद उनकी पूजा और आराधना अधिक फलदायक और प्रभावशाली बन जाती है.

पुराणों के अनुसार मंदिर में घंटी बजाने से मानव के कई जन्मों के पाप तक नष्ट हो जाते हैं. जब सृष्टि का प्रारंभ हुआ तब जो नाद (आवाज) गूंजी थीवही आवाज घंटी बजाने पर भी आती है. उल्लेखनीय है कि यही नाद ओंकार के उच्चारण से भी जागृत होता है.

मंदिर के बाहर लगी घंटी या घंटे को काल का प्रतीक भी माना गया है. कहीं-कहीं यह भी लिखित है कि जब प्रलय आएगा उस समय भी ऐसा ही नाद गूंजेगा. मंदिर में घंटी लगाए जाने के पीछेना सिर्फ धार्मिक कारण है बल्कि वैज्ञानिक कारण भी इनकी आवाज को आधार देते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि जब घंटी बजाई जाती है तो वातावरण में कंपन पैदा होता है, जो वायुमंडल के कारण काफी दूर तक जाता है. इस कंपन का फायदा यह है कि इसके क्षेत्र में आने वाले सभी जीवाणु, विषाणु और सूक्ष्म जीव आदि नष्ट हो जाते हैं, जिससे आसपासका वातावरण शुद्ध हो जाता है

स्वभाव के सुधरने पर मोक्ष मिलता है Date :- 01-Sep-2014

मानव शरीर को सभी साधनों का धाम एवं मोक्ष का द्वार बताया है। भोजन, निद्रा, भय तथा कामवासना- मनुष्य एवं पशु दोनों में समान है, परन्तु मानव में धर्म ही ऐसा तत्त्व है जो उसे पशु से अलग करता है। अतः दुर्लभ मानव-जीवन पाकर हमें पशुवत जीवन नहीं बिताना चाहिए। इस देव-दुर्लभ मानव जीवन को प्राप्त कर नर से नारायण बनने की चेष्टा करनी चाहिए। यही हमारे धर्मशास्त्रों का मुख्य उपदेश भी है।

यह बड़ी विडम्बना है कि मनुष्य धर्म-अधर्म, भला-बुरा, पाप-पुण्य, नफा-नुकसान आदि सब कुछ जानते हुए भी गलत काम करने लग जाता है और इस सृष्टि का सबसे दुःखी जीव बन जाता है। अपना जीवन सुधारने के लिए मनुष्य को सात प्रकार की शुद्धि करनी चाहिए, जिससे धर्म में सिद्धि मिल सके। ये सात शुद्धि हैं- देश शुद्धि, काल शुद्धि, मंत्र शुद्धि, देह शुद्धि, विचार शुद्धि, इन्द्रिय शुद्धि एवं द्रव्य शुद्धि। अतः जीवन में सर्वत्र शुद्धि हो, तभी मनुष्य का जीवन सार्थक हो पाता है।

इस पूरी सृष्टि पर केवल मनुष्य ही मोक्ष का अधिकारी है, परन्तु काम, क्रोध, मद-लोभ, लालच ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा। आज मानव पशु से भी बदतर जीवन जी रहा है। मोक्ष उसी का होता है, जिसने प्रकृति पर विजय पा ली हो। प्रकृति का अर्थ है- स्वभाव। अतः जो स्वभाव को सुधारता है, उसी का मोक्ष होता है। प्रकृति के वश में जो रहे, वही जीव है तथा जिसके वश में प्रकृति है वही ईश्वर-तुल्य है। वास्तव में, स्वभाव को जो वश में रखता है, वह ईश्वर जैसा ही है। अतः अपने स्वभाव से छल-कपट आदि दुर्गुणों को यथाशीघ्र उखाड़ फेंकना चाहिए। स्वभाव में सुधार ही मुक्ति की ओर पहला कदम है। इसके लिए अहंकार, मान-मर्यादा और ऐश्वर्य को त्यागना होगा व मन से सभी प्रकार के द्वेषों को दूर करना होगा।

चारों पुरुषार्थों में धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को माना गया है, अर्थात् धर्म और मोक्ष के बीच में जो अर्थ एवं काम का विवेकपूर्ण उपभोग करता है, वही सबसे बड़ा बुद्धिमान है तथा वही मानव जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। इसके विपरीत जो दिन-रात अर्थ एवं काम के पीछे दौड़ लगाते हैं, उनका धर्म एवं अंतिम लक्ष्य मोक्ष भी निष्क्रिय हो जाता है क्योंकि अर्थ एवं काम की ऐसी मीठी मार होती है कि आदमी जीवनभर उनका उपभोग करते-करते स्वयं को काल के हवाले कर देता है तथा सदा के लिए चैरासी के चक्कर में फँस जाता है।

अब भी समय है मानव जीवन को व्यर्थ की बातें में ना बर्बाद करके अपने स्वभाव को सुधारो और मोक्ष के अधिकारी बनो।

प्रणाम संस्कार Date :- 01-Sep-2014

यह वैज्ञानिक सत्य है कि हमारे हाथों-पैरों की अंगुलियों से निरन्तर विद्युत-किरणें निकलती रहती हैं। हमारे मस्तक के भाल-प्रदेश और हाथों की अंगुलियों को इस विद्युत-प्रभाव को ग्रहण करने की शक्ति प्राप्त है। अपने से श्रेष्ठ के चरणों पर मस्तक तथा सिर पर हाथ रखवाकर हम उनका प्रभाव ग्रहण करते हैं। अतः नमस्कार करने की पद्धति शिष्टाचार के साथ-साथ वैज्ञानिक भी है। वास्तव में, सज्जन लोग परस्पर जो विनम्रता एवं प्रणाम करते हैं, वह चित्त में स्थित ज्ञानस्वरूप परमपुरुष के लिए ही करते हैं, अतः जिसे प्रणाम किया जाता है, उसे समझना चाहिए कि प्रणाम उसमें स्थित सर्वान्तर्यामी के लिए किया गया है।

अन्त में, यदि कोई किसी भगवान्नाम उच्चारण से अभिवादन करता है तो हमें भी उसी नाम से उत्तर देना चाहिए। ‘जय राम जी’ करने वाले को ‘जय राम जी’ कहकर, ‘जय श्रीकृष्ण’ कहने वाले को ‘जय श्रीकृष्ण’ कहकर उत्तर देना शिष्ट ढंग है। इसी प्रकार दूसरे सम्प्रदाय के लोगों से व्यवहार करते समय प्रणामादि का ऐसा ही रूप होना चाहिए, जो उनकी मर्यादा के अनुरूप हो। अतः प्रणाम संस्कार को अपने जीवन में अवश्य ही पूर्णतः उतारने की चेष्टा करनी चाहिए।

झाड़ू पर पैर लगने से बढ़ती है पैसों की तंगी? Date :- 22-Aug-2014

घर में कई वस्तुएं होती हैं कुछ बहुत सामान्य रहती है। इनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। ऐसी चीजों में से एक है झाड़ू जब भी साफ-सफाई करना हो तभी झाड़ू का काम होता है। अन्यथा इसकी ओर कोई ध्यान नहीं देता। शास्त्रों के अनुसार झाड़ू के संबंध कई महत्वपूर्ण बातें दी गई हैं।

शास्त्रों के अनुसार झाड़ू को धन की देवी महालक्ष्मी माँ शीतला जी का ही प्रतीक रूप माना जाता है। इसके पीछे एक वजह यह भी है कि झाड़ू ही हमारे घर से गरीबी रूपी कचरे को बाहर निकालती है और साफ-सफाई बनाए रखती है। घर यदि साफ और स्वच्छ रहेगा तो हमारे जीवन में धन संबंधी कई परेशानियां स्वत: ही दूर हो जाती हैं।

प्राचीन परंपराओं को मानने वाले लोग आज भी झाड़ू पर पैर लगने के बाद उसे प्रणाम करते हैं क्योंकि झाड़ू को लक्ष्मी का रूप माना जाता है। विद्वानों के अनुसार झाड़ू पर पैर लगने से महालक्ष्मी का अनादर होता है। झाड़ू घर का कचरा बाहर करती है और कचरे को दरिद्रता का प्रतीक माना जाता है।

जिस घर में पूरी साफ-सफाई रहती है वहां धन, संपत्ति और सुख-शांति रहती है। इसके विपरित जहां गंदगी रहती है वहां दरिद्रता का वास होता है। ऐसे घरों में रहने वाले सभी सदस्यों को कई प्रकार की आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसी कारण घर को पूरी तरह साफ रखने पर जोर दिया जाता है ताकि घर की दरिद्रता दूर हो सके और महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त हो सके।

घर से दरिद्रता रूपी कचरे को दूर करके झाड़ू यानि महालक्ष्मी हमें धन-धान्य, सुख-संपत्ति प्रदान करती है। जब घर में झाड़ू का कार्य न हो तब उसे ऐसे स्थान पर रखा जाता है जहां किसी की नजर न पड़े। इसके अलावा झाड़ू को अलग रखने से उस पर किसी का पैर नहीं लगेगा जिससे देवी महालक्ष्मी का निरादर नहीं होगा। यदि भुलवश झाड़ू को पैर लग जाए तो महालक्ष्मी से क्षमा की प्रार्थना कर लेना चाहिए।

आयुर्वेद Date :- 01-Aug-2014

भगवान धन्वन्तरि आयुर्वेद के जनक हैं। आयुर्वेद रोग को समूल नाश करने की पद्धति है, जबकि ऐलोपैथी केवल स्वल्प कालिक लाभप्रद है और विपरीत प्रतिक्रिया से भयंकर हानि होती है।प्रो. एलोंजो क्लार्क (एम.डी.) का कहना है कि हमारी सभी दवाइयाँ विष हैं और इसके फलस्वरूप दवाई की हर एक मात्रा रोगी की जीवन शक्ति का ह्रास करती है।

आज आयुर्वेद के नुस्खे पाश्चात्य जगत को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। औषधि गुणों से युक्त तुलसी, पीपल, दूर्वा, नीम, आँवला, हरड़, बेल, चन्दन आदि असंख्य जड़ी-बूटियों के गुणों को हमने नहीं पहचाना, पर पश्चिमी देश इनका अध्ययन कर खूब लाभ उठा रहे हैं। धन्वन्तरि जी ने कहा था- जो पुरुष जिस देश में उत्पन्न हुआ है, उस देश की भूमि में उत्पन्न जड़ी-बूटियों से निर्मित औषधि ही उसके लिए वस्तुतः लाभकारी हो सकती है।

गुरू Date :- 01-Jul-2014

हमारे यहाँ गुरू को साक्षात् ब्रह्मा, विष्णु, महेश के समान माना गया है। हमारे प्राचीन शास्त्रों के अनुसार चार प्रकार के शिक्षक माने गये हैं- कुलपति, आचार्य, उपाध्याय और गुरू। जो ब्रह्मर्षि विद्वान दस सहस्र मुनियों (विद्या का मनन करने वाले ब्रह्मचारियों) को अन्न-वस्त्र आदि देकर पढ़ाता था, वह ‘कुलपति’ कहलाता था। जो शिक्षक अपने छात्रों को कल्प (यज्ञ करने की विधि) और उपनिषदों के साथ वेद पढ़ाता था, वह आचार्य कहलाता था। जो विद्वान अपने शिष्यों को मंत्र और वेदांग (शिक्षा, कल्प, निरूक्त, ज्योतिष, व्याकरण और छंद) पढ़ाता था, वह ‘उपाध्याय’ कहलाता था और जो परम ज्ञानी विद्वान् अपने छात्रों को भोजन देकर वेद-वेदांग पढ़ाता था, वह ‘गुरू’ कहलाता था।

भारतवर्ष में शुरू से ही विद्या-दान को सबसे बड़ा दान माना गया है क्योंकि विद्या पढ़ाने से जीव की मुक्ति हो जाती है। इसलिए अनेक विद्वान सब प्रकार की तृष्णा त्यागकर लोक-कल्याण की कामना से छात्रों को विद्या-दान करते रहते थे। गुरू इस संसार-सागर से पार उतारने वाले हैं और उनका दिया ज्ञान नौका के समान बताया गया है। मनुष्य उस ज्ञान को पाकर भवसागर से पार और कृतकृत्य हो जाता है।

गीता की महिमा Date :- 01-Jun-2014

जो ‘श्रीमत्’ अर्थात् सर्वशोभासम्पन्न हैं और जिनमें सम्पूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री और वैराग्य- ये छः ‘भग’ नित्य विद्यमान रहते हैं, उन भगवान के मुख से निकली हुई होने के कारण गीता को ‘श्रीमत्भगवत्’ कहा गया है।

वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय आदि का आग्रह न रखकर प्राणिमात्र का कल्याण करने वाली सर्वश्रेष्ठ विद्या होने के कारण इसका नाम ‘ब्रह्मविद्या’ है। इस ब्रह्मविद्यास्वरूप गीता में कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग आदि योग साधनों की शिक्षा दी गई है, जिससे साधक को परमात्मा के साथ अपने नित्य-सम्बन्ध का अनुभव हो जाए। इसलिए गीता को ‘योगशास्त्र’ कहा गया है।

गीता में साक्षात् पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण और भक्तप्रवर अर्जुन का संवाद है, अतः इसे ‘श्रीकृष्णार्जुनसंवाद’ भी कहा गया है।


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