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शिव प्रसन्नता हेतु प्रदोषव्रत विधान Date :- 01-Mar-2016

जो लोग प्रदोषकाल में अनन्य भक्तिपूर्वक परमेश्वर भगवान सदाशिव के पादपद्मों का पूजन करते हैं, उनके धन-धान्य, पुत्र- कलत्र, सुख-सौभाग्य की नित्य वृद्धि होती रहती है।

जिस प्रकार भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए एकादशी व्रत किया जाता है, उसी प्रकार भगवान शिवजी को प्रसन्न करने के लिए ‘प्रदोषव्रत’ किया जाता है। प्रदोष-काल में शिवजी के पूजन का बड़ा माहात्म्य है। ‘प्रदोषो वै रजनीमुखम्’ रजनी मुख को प्रदोष कहते हैं। संध्या और रात्रि के मिलन समय को ‘प्रदोषकाल’ कहते हैं। त्रयोदशी के दिन सूर्यास्त के तीन घड़ी पूर्व स्नानादि से पवित्र होकर श्रीगणेश जी का पूजन करना चाहिये। कभी-कभी द्वादशी में भी संध्या समय सूर्यास्त से पूर्व त्रयोदशी तिथि के आगमन पर प्रदोष व्रत हो जाता है। अतः सभी नर-नारियों को अपने परम अभ्युदय तथा कौटुम्बिक सुख-शांति के लिए शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को यह प्रदोष व्रत अवश्य करना चाहिये।

जब शुक्लपक्ष त्रयोदशी शनिवासरीय हो, संतान फल की वृद्धि के लिये यह व्रत करना चाहिये। ऋणमोचन के लिए मंगलवासरीय करना चाहिये। सौभाग्य और स्त्री के लिये शुक्रवासरीय करना चाहिये। आरोग्यता के लिये रविवासरीय करना चाहिये। विवाह, सुख एवं ऐश्वर्य प्राप्ति-हेतु सोमवासरीय त्रयोदशी ग्रहण करनी चाहिये। इससे भगवान शिव की विशेष प्रसन्नता भी प्राप्त होती है।

प्रदोष के समय देवाधिदेव महादेवजी कैलास पर्वत के रजत भवन में ताण्डव नृत्य करते हैं तथा समस्त देवसमुदाय कैलासाधिपति भगवान शंकर के गुणों का स्तवन करता है। अतः धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले मनुष्यों को प्रदोष व्रत में नियमपूर्वक साम्ब सदाशिव का पूजन, यज्ञ, अर्चन, चरितामृत-वर्णन एवं उनके गुणों का गान करना चाहिये।

प्रदोष व्रत में दिन भर निराहार, निर्जल रहकर प्रदोष काल में भगवान शिवजी की पूजा, अभिषेक, अर्चन कर पारण-जलपान करना चाहिए। फलाहार अथवा अन्न ग्रहण किया जा सकता है। भोजन एक बार ही पूजा करने के बाद करें। पंचाक्षर मंत्र का जप करना चाहिये। प्रदोष व्रत मानव-कल्याण के लिये स्वर्ग-सोपान स्वरूप ही नहीं, वरन् अपार-असार संसार सागर से पार करा देने वाली प्रत्यक्ष नौका है।

कार्तिकमास आने पर शनिवार के दिन यदि पूरी त्रयोदशी हो तो यह व्रत सिद्धि के लिये ग्राह्य है। एकादशी व्रत की तरह ही प्रदोष व्रत का उद्यापन होता है। इसमें छब्बीस ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। तत्पश्चात् उनको दक्षिणा, वस्त्र, पात्र, आसन, पदत्राण (खड़ाऊँ), छत्र (छाता) आदि दान में देते हैं।

स्त्री-पुरुषों को चाहिये कि वे अपने सम्पूर्ण कार्यों की सिद्धि के लिये विधिपूर्वक प्रदोष व्रत का पालन करें।

धनतेरस Date :- 01-Nov-2015

एक बार यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि जीवों की जान लेते समय क्या उन्हें दया नहीं आती। यमदूत सकपकाकर बोले, ‘नहीं महाराज! हम तो आपकी आज्ञा का पालन करते हैं। दया क्यों आयेगी?’ पर यमराज समझ गये कि यमदूत कुछ छिपा रहे हैं। उन्होंने उन्हें कुरेदते हुए पूछा, ‘डरो मत, क्या कभी कोई ऐसी घटना नहीं हुई, जब तुम्हारा हृदय पसीज गया हो?’

यमदूत बोले, ‘जी महाराज, एक बार अवश्य ऐसा हुआ। हंस नामक राजा जंगल में शिकार करते-करते भटक गया और दूसरे राज्य की सीमा में जा पहुँचा। वहाँ के राजा थे हेमा, जिन्होंने राजा हंस का बड़ा सत्कार किया। हेमा की पत्नी के उसी समय पुत्र पैदा हुआ। ज्योतिषियों ने बताया कि यह बालक विवाह के चार दिन बाद ही मर जायेगा। यह बात जब राजा हंस ने सुनी तो उसने सुझाव दिया कि बालक को यमुना किनारे एक गुफा में रखा जाये, जहाँ उसका सम्पर्क किसी कन्या से न हो पाये। जब विवाह ही न होगा, तो वह कैसे मरेगा? पर लिखे को तो बदला नहीं जा सकता।

एक दिन उसी राजा हंस की पुत्री खेलते हुए यमुना किनारे निकल गई। उस ब्रह्मचारी बालक ने उसे देखा और दोनों ने गंधर्व विवाह कर लिया। विवाह को हुए चार दिन पूरे हुए कि वह मर गया। ऐसी सुंदर युवा जोड़ी पहले कभी न देखी थी। पर आपकी आज्ञा थी, इसलिए हम स्वयं आँसू बहाते हुए उसके प्राण ले आये।’

यमराज भी यह कथा सुनकर विचलित हो उठे, पर बोले, ‘क्या किया जाये? विधि ने जो लिखा है, उसकी मर्यादा तो हमें रखनी ही पड़ती है।’ ‘पर क्या अकाल-मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं है?’ यमदूतों ने पूछा।

यमराज ने बताया कि धनतेरस पर पूजन और दीपदान करने से असमय मृत्यु से बचा जा सकता है। जिस घर में यह पूजन होता है, वहाँ अकाल-मृत्यु से कोई नहीं मरता।

करवा चोथ - हमेशा चमकता रहे चोथ का चाँद Date :- 06-Oct-2015

विवाह मात्र रस्म नहीं, यह दो लोगों के परस्पर मन को जोड़ने वाला तार है इसलिए यदि दाम्पत्य जीवन की लय-ताल में तालमेल हो तो सरगम सुमधुर बन जाती है। वहीं अगर मन मिलने को राजी न हो तो कर्कशता जिंदगी भर का साथ हो जाती है। दाम्पत्य जीवन से जुड़ी परम्पराएँ व त्यौहार आपसी प्रेम तथा सामंजस्य को बल देते हैं। तो यह त्यौहार केवल प्रतीक क्यों बनें? क्यों न हम इनकी गहराई को दाम्पत्य जीवन की नींव बना लें और गृहस्थी के आँगन में हमेशा चैथ के चाँद को चमकता देखें।

सगाई, सिंदूर, मंगलसूत्र, संबंधियों की उपस्थिति में सात फेरों व सात वचनों द्वारा सात जन्म तक पति-पत्नी बने रहने की शपथ लेने वाले वर-वधू का दाम्पत्य जीवन रूपी संगीत कुछ ही दिनों में क्यों बेसुरा हो जाता है? क्यों कुछ जोड़े शादी के सभी बंधन व कसमें तोड़कर तलाक लेने पर उतारू हो जाते हैं? यदि ऐसे टूटते रिश्तों का विश्लेषण किया जाए तो एक बात सामने आती है। वैचारिक मतभेद एवं एक-दूसरे की भावनाओं का आदर न करना, यहाँ यह सबसे बड़ी कमी होती है।

जरूरी है कि पति-पत्नी आपस में समझ को विकसित करें। आखिर ये आप दोनों के जीवन का प्रश्न है। किसी एक त्यौहार पर ही एक-दूसरे के प्रति आस्था का प्रदर्शन करने के बजाय हर दिन उस त्यौहार-सा मानकर अपने रिश्ते को सार्थकता प्रदान करें। यदि आप अपने दाम्पत्य जीवन का संगीत सुरीला बनाना चाहते हैं, तो अग्रलिखित सात स्वरों (बातों) को जीवन में उतारें।

सामंजस्यः गुण-अवगुण हर इंसान में पाए जाते हैं। भले ही कोई इंसान कितना भी अच्छा क्यों न हो, उसमें भी बुराई हो सकती है। अपने जीवनसाथी की कमियों, बुराइयों को लेकर विवाद करना दाम्पत्य जीवन में दरार पैदा करता है। इसलिए जीवनसाथी की कमियों की बजाए अच्छाइयों पर ध्यान दें और प्यार से समझाकर बुराइयाँ दूर करने का प्रयत्न करें। विचारों एवं स्वभावों का उचित सामंजस्य ही सुखी वैवाहिक जीवन की धुरी है।

सहनशीलताः जब किसी के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है तो उसकी सहनशीलता का बाँध टूट जाता है। ऐसे में वह ऐसा कुछ कर बैठता है जो उसे नहीं करना चाहिए। इसलिए पति या पत्नी द्वारा गलती करने पर असहिष्णु होने की बजाए उनके स्थान पर खुद को रखकर देखिए कि यदि आप उस जगह (परिस्थिति) होते तो क्या करते? यह सोच जहाँ आपको सहनशील बना देगी, वहीं आप व्यर्थ के तनाव से भी बच सकते हैं।

संवादः पति-पत्नी में झगड़ा होने पर पति-पत्नी अक्सर बोलना बंद कर देते हैं। वहीं कुछ पत्नियाँ रूठकर मायके चली जाती हैं। ऐसा करने से मन में अनेक शंकाएँ जन्म ले लेती हैं। रिश्तों में दरार आती है सो अलग। इसलिए मनमुटाव या तकरार होने पर बातचीत द्वारा समस्या का हल निकालने का प्रयास करें एवं अपनी गलतियों को स्वीकारना भी सीखें। जहाँ प्यार होता है, वहाँ तकरार होना लाजमी है परंतु विवाद में भी संवाद कायम रखें।

समयः आजकल तलाक के कारणों में एक मुख्य कारण एक-दूसरे को समय न दे पाना भी है। पति-पत्नी कैरियर या भौतिकता में इतना खो जाते हैं कि एक-दूसरे को समय ही नहीं दे पाते और यहीं से रिश्तों में शिथिलता आने लग जाती है। इसलिए काम से फुर्सत निकालकर एक-दूसरे के साथ कुछ लम्हें जरूर बिताएं या कहीं घूमने जाएंँ। इससे जहाँ एक-दूसरे के दिल की बातें जानने का अवसर मिलेगा, वहीं रिश्तों में नयापन, अपनापन एवं प्रगाढ़ता भी आती है।

सुझावः अक्सर हर इंसान की एक फितरत होती है कि घर, आॅफिस हर जगह प्रत्येक कार्य अपने मन के अनुरूप हो। जब मनोनुकूल कार्य नहीं होता तो वह तकरार करने लग जाता है। इसलिए पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे से अपनी बात मनवाने की अपेक्षा सुझावात्मक रूप में कहें कि अमुक कार्य यदि ऐसे किया जाए तो कैसा रहेगा। ऐसा करने से जहाँ आप मनमुटाव व तकरार से बच सकते हैं, वहीं आपसी परामर्श द्वारा कार्य करने से अच्छे परिणाम भी मिल सकते हैं।

सहयोगः किसी भी व्यक्ति के साथ तालमेल करने में अक्सर हमारा अहंकार बाधक बनता है कि मैं उससे पहले बात क्यों करूँ? यह काम मैं क्यों करूँ? यह तो उसका (पति/पत्नी का) काम है आदि, पति-पत्नी एक दूजे का सुख-दुख बाँटने के लिए होते हैं तो आपस में सहयोग करने में कभी पीछे न रहें। पति पर आॅफिस के कार्यों का बोझ आने पर पत्नी यथासंभव सहयोग कर सकती है। वहीं घर के कामकाज में यदि पति, पत्नी की मदद करे तो इससे प्यार बढ़ता है, आपसी सहयोग से कठिन काम आसान भी हो जाते हैं।

सराहनाः प्रशंसा शब्द भले ही छोटा हो परंतु आप जिसकी तारीफ करते हैं, उससे उसकी कार्यकुशलता बढ़ती है और संबंधें में मधुरता भी आती है। इसलिए अच्छा कार्य करने पर प्रशंसा करने में कभी भी कंजूसी न करें। इनके अलावा शादी की सालगिरह, जन्मदिन पर एक-दूजे को गिफ्ट देना न भूलें, आपस में पूर्ण विश्वास करें, शक को कोई जगह न दें। इस प्रकार उक्त सात बातों (सुरों) को अपने जीवन में उतारकर आप अपने दाम्पत्य जीवन की सरगम को सुरीला बना सकते हैं।

हिन्दू धर्म में महाशिवरात्रि का महत्व Date :- 11-Feb-2015

हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का विशेष धार्मिक महत्व है। यह पावन पर्व बड़ी ही श्रद्धा और उल्लास के साथ फागुन के महीने में मनाया जाता है। ऋग्वेद, शिव पुराण, विष्णु पुराण में इसका विशेष वर्णन मिलता है।

फागुन की कृष्ण चतुर्दशी को महा शिवरात्रि का पावन पर्व मनाया जाता है। इस दिन सृष्टि के मंगलकारी देवता भगवान शिव की पूजा की जाती है। भगवान भोलेनाथ को इस पर्व पर बेलपत्र, आम के बौर, मटर की फली, धतूरे का फूल, गेहूँ की बाली, बेर के फल, फूल चढ़ाये जाते हैं।

इस पर्व के बारे में ऐसा माना जाता है कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्यरात्रि को भगवान शंकर का ब्रह्मा से रौद्र रूप में अवतरण हुआ था। प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव ने तांडव करते हुए ब्रह्मांड को अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से भस्म किया था। इसलिए इसे महाशिवरात्रि अथवा कालरात्रि कहा जाता है।

यह महाशिवरात्रि के पर्व का महत्व ही है कि सभी आयु वर्ग के लोग इस पर्व में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। इस दिन कुँवारी कन्याएँ अच्छे वर के लिए शिवरात्रि का व्रत रखती हैं। शिव को नीलकंठ भी कहा जाता है। वह ऐसे देवता हैं जो विष स्वयं ग्रहण कर लेते हैं और अमृत दूसरों के लिए छोड़ देते हैं। इसलिए शिव जगत के उद्धारक हैं।

स्त्री के आदर्श रूप का प्रतीक है सीताष्टमी व्रत Date :- 11-Feb-2015

सदा से ही एक आदर्श पत्नी, ममतामयी माँ और त्याग के रूप में जनकनंदनी सीता का नाम ससम्मान के साथ लिया जाता है। सीता ने पत्नीधर्म निभाकर प्रभु राम के साथ वनवास काटा तो जंगल में अपने बच्चों की परवरिश भी की। वहीं अपनी पवित्राता को सिद्ध करने के लिए अग्नि परीक्षा तक दी। एक आदर्श नारी का यही चरित्र परिवार को एकसूत्र में बाँधकर रखता है। कुछ ऐसा ही संदेश देती है सीताष्टमी। फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष अष्टमी को सीताष्टमी व्रत मनाया जाता है।

जनक अपनी प्रजा के कल्याण के लिए यज्ञ के आयोजन के लिए भूमि की जुताई कर रहे थे, तब एक बक्से में उन्हें एक बच्चा प्राप्त हुआ, जिसका नाम उन्होंने सीता रखा। तभी से सीता का जन्म माना गया है।

सीताष्टमी का व्रत जहाँ विवाहित महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है, वहीं जिन युवतियों की शादी होने जा रही है, उन्हें भी ये व्रत रखना चाहिए। सीताष्टमी व्रत एक आदर्श पत्नी और सीता जैसे गुणों की प्राप्ति के लिए रखा जाता है।

सीता जयंती पर सुबह स्नान के बाद सीता जी की भगवान राम के साथ पूजा करें। श्रृंगार का सामान उनकी प्रतिमा पर चढ़ाएँ। दूध व गुड़ से बने व्यंजन को दान करें और इसी व्यंजन से शाम को पूजा करने के बाद व्रत खोल लें। सुखद दाम्पत्य जीवन की कामना के साथ यह व्रत करें।

माघी पूर्णिमाः सत्कर्मों का महापर्व Date :- 10-Feb-2015

शास्त्रों में माघ स्नान एवं व्रत की बड़ी महिमा बताई गई है। माघ की प्रत्येक तिथि पुण्यपर्व है, उनमें भी माघी पूर्णिमा को विशेष महत्व दिया गया है। माघ मास की पूर्णिमा तीर्थस्थलों में स्नान दानादि के लिए परम फलदायिनी बताई गई है। तीर्थराज प्रयाग में इस दिन स्नान, दान, गोदान एवं यज्ञ का विशेष महत्व है। माघी पूर्णिमा को एक मास का कल्पवास भी पूर्ण हो जाता है। इस प्रकार श्रद्धालुजन अपने क्षेत्र की नदियों एवं पवित्र सरोवरों में माघी पूर्णिमा को स्नान कर पुण्य प्राप्त करते हैं।

माघी पूर्णिमा को कुछ धार्मिक कर्म संपन्न करने की भी विधि शास्त्रों में दी गई है। प्रातः काल नित्यकर्म एवं स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु का विधिपूर्वक पूजन करें। फिर पितरों का श्राद्ध करें। असमर्थों को भोजन, वस्त्र दें। तिल, कम्बल, कपास, गुड़, घी, मोदक, फल, चरण पादुकाएँ, अन्न और द्रव्य आदि का दान करके पूरे दिन का व्रत रखकर विप्रों, तपस्वियों को भोजन करना चाहिए और सत्संग एवं कथा-कीर्तन में दिन-रात बिताकर दूसरे दिन पारण करें। यह पुण्यतिथि स्नान-दानादि के लिए अक्षय फलदायिनी होती है। परम वैष्णव संत रविदास जी की जयंती भी माघी पूर्णिमा को ही होती है।

यद्यपि प्रत्येक महीने की पूर्णिमा को सनातन धर्मावलम्बी श्रद्धालु लोग सत्यनारायण भगवान का व्रत रखकर सायंकाल कथा श्रवण करते हैं लेकिन माघी पूर्णिमा को सत्यनारायण व्रत का फल अनन्त गुना फलदायी कहा गया है।


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