Hindu Sanskriti
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जीवन में संस्कारों की आवश्यकता Date :- 03-Jun-2014

भारतीय संस्कृति संस्कारों की धुरी पर टिकी है। हमारे संस्कार ही हमारी श्रेष्ठता के प्रतीक हैं। भारतीय सनातन संस्कारों के पीछे हमारे ऋषि-मुनियों की वैज्ञानिक सोच छिपी हुई है। संस्कार ही गुणों को निखारते हैं। संस्कार के बिना कीमती से कीमती हीरा भी पत्थर कहलाता है। इसी प्रकार संस्कारयुक्त होने पर ही व्यक्ति मानव कहलाने के योग्य बनता है। हमारे संस्कार इतने महत्वपूर्ण हैं कि हजारों वर्ष पूर्व की भांति आज भी इनकी उतनी ही उपयोगिता है। संस्कारों की प्रक्रिया जन्म से पूर्व ही प्रारंम्भ हो जाती है। संस्कार रूपी सात्विक मार्ग पर चलने से ही मनुष्यमात्र का कल्याण सम्भव है। इनका उल्लंघन करने से मानव में दानवता का संचार होता है।

संसार भर की विभिन्न जातियों में तरह-तरह के संस्कार प्रचलित हैं, किन्तु हिन्दू जाति में संस्कारों का जो युक्ति-युक्त एवं व्यवस्थित रूप मिलता है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं दिखाई देता। संस्कारों के पीछे उनके वैज्ञानिक आधारों से आज लोग अज्ञात-से हो गए हैं, इसीलिए इनका प्रचलन भी दिनों-दिन कम होता जा रहा है। अतः हमें संस्कारों को पुनः व्यावहारिक रूप देना होगा।

हमारी पारम्परिक जीवन पद्धति में 16 प्रमुख संस्कारों का वर्णन आता है, जो गर्भाधान से अंत्येष्ठि पर्यन्त चलते हैं। इनमें से तीन- गर्भाधान, पुंसवन और सीमान्तो, ये जन्म के पूर्व के संस्कार हैं। पुष्ट एवं संस्कारयुक्त सन्तान से ही राष्ट्र का उत्थान सम्भव है। इसीलिए भारतीय जीवन में संस्कारों का अत्यधिक महत्व है। इन्हीं संस्कारों के परिणामस्वरूप ही भारत को श्रेष्ठतम राष्ट्र माना जाता है तथा इसे विश्वगुरू की संज्ञा प्राप्त थी। विश्व के सभी देशों के लोग संस्कारों की शिक्षा हेतु भारत में ही आया करते थे।

संस्कार किसे कहते हैं- मानव जीवन को पवित्र, चमत्कारपूर्ण एवं उत्कृष्ट बनाने वाले शास्त्रविहित कुछ अनुष्ठानों को ‘संस्कार’ कहा जाता है। इससे शारीरिक और मानसिक बल की वृद्धि होती है तथा आध्यात्मिक पूर्णता की प्राप्ति होती है। हमारे जीवन के चरम लक्ष्य ‘मोक्ष’ की प्राप्ति भी संस्कारों से सहज हो जाती है। दूसरे शब्दों में, जिस क्रिया से किसी वस्तु को भूषित किया जाये, उसे संस्कार कहते हैं।

संस्कारविहीन व्यक्ति या जिस मनुष्य का जन्म होने पर कोई भी संस्कार ना हुआ हो, वह वास्तव में एक पशु समान ही है, क्योंकि जब कोई पशु जन्म लेता है तो उसका ना कोई नामकरण संस्कार होता है, ना उसकी षष्ठी पूजा होती है और ना ही जातक सूतक दूर करने के लिए कोई यज्ञादि होता है। मनुष्य केवल अपने संस्कारित जीवन के कारण ही पशु से अलग नजर आता है। जो व्यक्ति बिछड़ कर जंगली जीवन जीने को मजबूर हो जाता है तो प्रायः यह देखा जाता है कि उसमें और जानवरों की गतिविधियों में कोई अन्तर ही नहीं होता। अतः सभ्य समाज अच्छे संस्कारों से ही स्थापित हो सकता है, इसके लिए हमें आधुनिक होने के साथ-साथ अपनी प्राचीन परम्पराओं से जुड़ना ही होगा, अन्यथा मानव-जाति एक दिन विनाश के कगार पर पहुँच जाएगी।

आशा है कि आप सभी को हमारे सनातन संस्कारों की पूर्ण जानकारी प्राप्त होगी और वे इनके वैज्ञानिक आधार को समझकर भविष्य में होने वाली अपनी संतानों को अवश्य ही संस्कारित कराएंगे। अगर ऐसा हो सका तो हम अपने इस प्रयास को सफल मानेंगे।

– ‘गौ-प्रेमी’ संजीव हंस (मुख्य संरक्षक- दिव्य शनि प्रसन्नता पत्र)

गर्भाधान संस्कार Date :- 02-Jun-2014

गर्भाधान संस्कार मानव जीवन की आधारशिला है। माँ के गर्भ में शिशु पर अंकित संस्कारों का पल्लवन जन्म के पश्चात् होता है। इसीलिए इस संस्कार का बहुत ज्यादा महत्व है। हमारे सनातन शास्त्रों ने गर्भउत्पति को खेत में बोने वाली फसल के साथ तुलना की है। जिस प्रकार उत्तम फसल के लिए उत्तम जमीन, उत्तम बीज, साफ और मीठा जल तथा प्रदूषण रहित वातावरण की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार गर्भधान से पूर्व घर का माहौल पति-पत्नी की विचारधारा आदि एवं उत्तम काल में किया गया गर्भधारण तेजस्वी और मेधावी संतान प्रदान करने में सहायक होता है।

गर्भ में आने वाली दिव्य आत्मा के आगमन के लिए पति-पत्नी को तैयारी करनी चाहिए। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है। आंतरिक रूप से प्रसन्न व्यक्ति चिंता, शोक, भय, क्रोध व तनाव से मुक्त होता है। ऐसे निर्मल और स्वस्थ पति-पत्नी एक दूसरे के प्रति पूर्ण प्रेम से जुडे़ हों, ऐसी श्रेष्ठ मनोवृत्ति वाला दम्पत्ति जब योग्य आचार-विचार से युक्त होकर ईश्वर का स्मरण कर उस दिन विशेष प्रार्थना करके, यदि सम्भव हो तो हवन करके संतान प्राप्ति के लिए प्रवृत्त हो, तभी उत्तम गर्भ की धारणा होती है।

आयुर्वेद में स्त्री-पुरूष की योग्यता (गुण-धर्म) की विस्तार से चर्चा की गई है। इसके अनुसार विवाह हमेशा असमान (भिन्न) गौत्र में ही करना चाहिए। माता-पिता के असमान गौत्र होने से कुछ आनुवांशिक बीमारियों को संतान में आने से रोका जा सकता है। भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार आहार-विहार तथा विचारों का प्रभाव गर्भस्थ बालक पर होता है। ऐसा हमारे शास्त्रों में कई स्थानों पर वर्णन आया है।

एक अध्ययन के अनुसार, जो सगर्भा स्त्री संस्कृत के श्लोकों का पठन करती है, उसकी आने वाली संतान अत्यन्त मेधावी बनती है। भारतीय शास्त्रों पर आधारित संगीत सुनने से दिमाग का विकास बहुत अच्छा होता है। गर्भधारण में दो दिव्य शक्तियों द्वारा एक नवविराट का सृजन होता है। यह एक नैसर्गिक प्रक्रिया है। स्त्री के रज और पुरूष के शुक्राणु समन्वय से गर्भ निर्माण होता है। इसलिए रज और शुक्राणु जितने शुद्ध होंगे, गर्भ भी उतना ही शुद्ध और सात्विक होगा। वास्तव में, मनुष्य को अपने अस्तित्व में से दूसरी आकृति तैयार करनी होती है, अतः जितनी ज्यादा शुद्धता होगी, उतनी ही उत्तम आकृति वाली संतान होगी।

हर दम्पत्ति का स्वप्न होता है कि उनकी संतान रोगमुक्त, सुन्दर, स्वस्थ एवं मेधावी हो। पति-पत्नी में यदि किसी में कोई रोग है तो पहले उसका निदान कराना चाहिए, क्योंकि स्त्री एवं पुरूष के बीज को शुद्ध करने के पश्चात् गर्भाधान कराया जाए तो आनुवांशिक रोगों का सन्तान में आने का खतरा नहीं रहता।

बीज शुद्धि का महत्व केवल रोगों के संक्रमण की रूकावट तक ही सीमित नहीं है, अपितु बांझपन के निवारण हेतु भी बीज शुद्धि कारगर होती है। आज के वर्तमान युग में हमारे शरीर में फास्ट-फूड व जंक-फूड ही ज्यादा आता है। अतः उत्तम संतान की प्राप्ति हेतु ऐसे खान-पीन से दूर रहना संतान के भविष्य के लिए अति आवश्यक है।

गर्भावस्था में सावधानी –

मातृत्व एक ऐसा परम आनन्द है, जिसे पाकर ही नारी सम्पूर्णता को प्राप्त होती है। गर्भावस्था के दौरान कुछ ऐसी महत्वपूर्ण बातों को अपनाना बेहद जरूरी होता है, जिनसे माँ और बच्चा स्वस्थ रह सकें। जैसे-जैसे गर्भ में शिशु बढ़ता है वैसे-वैसे माँ के शरीर में भी कई तरह के परिवर्तन आने शुरू हो जाते हैं। गर्भ के प्रारम्भ में नारी को उल्टियाँ आने लगती हैं, चक्कर आने शुरू हो जाते हैं, जी मिचलाने लगता है। कब्ज और पेट में दर्द रहने लगता है, पेट में गैस बनने लगती है। भूख नहीं लगती व पेट में जलन रहने लगती है। कमजोरी महसूस होती है। ये सभी लक्षण गर्भवस्था के सामान्य लक्षणों की श्रेणी में आते हैं। इस समय खान-पान में विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है।

गर्भ के चैथे महीने से गर्भिणी नारी के शरीर के अनुपात और वजन में बदलाव आना शुरू हो जाता है। उसके पेट की माँसपेशियाँ ढ़ीली हो जाती हैं और पीठ के निचले हिस्से में कमर के आसपास की माँसपेशियों में खिचाव आने लगता है। इस वक्त तक गर्भिणी नारी के शरीर का तमाम वजन उसकी एडि़यों पर पड़ता है, जिसके कारण पीठ में दर्द होने लगता है। गर्भावस्था के अन्तिम तीन महीनों में गर्भिणी को सूजन की शिकायत हो सकती है, खून की कमी हो सकती है। ब्लडप्रेशर बढ़ सकता है व डायबिटीज की शिकायत हो सकती है। ऐसे में सोच-समझकर ही दवाइयाँ लेनी चाहिएँ, क्योंकि कुछ दवाइयाँ गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुँचा सकती हैं।

गर्भवती स्त्री को दिन में एक-दो घंटा व रात में 9 घंटे आराम करना चहिए व बायीं करवट ही सोना चाहिए। ऐसा करने से शिशु के रक्त प्रवाह में रूकावट नहीं आ पाती। स्त्री को सुबह-शाम ताजी हवा में अवश्य टहलना चाहिए, यह उसके लिए सबसे अच्छा व्यायाम है। टहलते समय आराम-आराम से चलना चाहिए, जिससे थकावट ना हो तथा साँस भी ना फूले। इस दौरान कभी भी कठिन व्यायाम नहीं करने चाहिए, इससे उदरस्थ शिशु पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। हल्के-फुल्के आसन सुविधानुसार किए जा सकते हैं। गर्भवती नारी को भारी वजन उठाने व यात्रा पर जाने से बचना चाहिए। गर्भवती स्त्री को सदा खुश रहना चाहिए। अधिक मेहनत से बचना चाहिए। जल्दी-जल्दी चलना, बोझ उठाना, अधिक देर तक खडे़ रहना, जल्दी-जल्दी सीढि़याँ चढ़ना व उतरना, कूदना, साईकिल चलाना, नृत्य करना, तैरना इत्यादि बिल्कुल छोड़ देना चाहिए। घर के हल्के-फुल्के काम करते रहना चाहिए। अच्छा साहित्य पढ़ना व सुनना चाहिए, परन्तु घर के सामान्य कार्य सुविधानुसार करते रहने चाहिएं।

गर्भिणी को अपने बैठने की मुद्रा में जल्दी-जल्दी बदलाव करते रहना चाहिए तथा चलते समय पीठ सीधी रखनी चाहिए। वह पाँवों को आगे-पीछे करके खड़ी हो और थोड़ी-थोड़ी देर बाद पाँवों को आगे-पीछे बढ़ाती रहे। बैठते समय पाँवों को नीचे नहीं लटकाना चाहिए, अपितु स्टूल आदि पर रखना चाहिए। सीढि़याँ चढ़ते समय गर्भवती को अपने पूरे पाँव सीढ़ी पर जमा कर रखने चाहिएँ तथा आगे झुके बिना सीढि़याँ चढ़नी चाहिएँ। जब भी उसे कुछ उठाना हो तो झुककर कभी भी न उठावे, ऐसा करने से उसका संतुलन बिगड़ सकता है। घर में कभी हल्का-फुल्का वजन उठाना पड़े तो उसे सावधानी से बराबर-बराबर दोनों हाथों से उठाना चाहिए।

गर्भावस्था के समय नारी को ऊँची एड़ी की चप्पल-सैंडिल आदि भूलकर भी नहीं पहननी चाहिए, इससे वह जल्दी थक जाएगी। ऐसा करने से कई बार गर्भपात तक हो सकता है। यदि गर्भवती नारी को नशीले पदार्थ जैसे शराब आदि की आदत हो तो उसे इस दौरान उसे त्यागना ही अच्छा रहता है। इसके सेवन से गर्भस्थ शिशु पर विपरीत असर पड़ता है।

गर्भवती नारी को चर्बी बढ़ाने वाला भोजन नहीं लेना चाहिए। नमक कम मात्रा में लेने से ब्लड प्रेशर ठीक रहता है। थोड़ा-थोड़ा अजवाइन लेने से कमर का दर्द तो ठीक रहता ही है, साथ ही खाना भी सही तरह से पचता है। गैस ना बने व सीने में जलन की समस्या उत्पन्न हो तो थोड़ी-थोड़ी देर बाद कुछ न कुछ खाते रहना चाहिए। पालक का सेवन उदरस्थ शिशु के लिए वरदान होता है। सुबह-शाम खूब टहलने से वजन ठीक रहने के साथ-साथ डिलीवरी भी नाॅर्मल होती है।

गर्भावस्था में खान-पान –

शरीर पुष्ट हो तभी गर्भधारण करना चाहिए। गर्भावस्था में स्त्री को पहले की अपेक्षा अधिक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। गर्भावस्था में कैल्शियम युक्त आहार की बहुत आवश्यकता होती है, यह उच्च रक्तचाप से बचाता है। जहाँ तक सम्भव हो गर्भवती को गाय के दूध का सेवन करना चाहिए, इससे आने वाली संतान स्वस्थ, निरोगी व होनहार बनती है। गाय का दूध गर्भावस्था से पहले भी, गर्भावस्था के दौरान भी और उसके बाद भी लगातार लेते रहना चाहिए।

दूध, फलों के जूस के अलावा गर्भवस्था में अधिक पानी पीना चाहिए, इससे शिशु को लाभ होता है। भोजन में आयरन युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन उचित रहता है, सम्भव हो तो सब्जियों को लोहे की कढ़ाई में पकाकर खाएँ। दूध भी लोहे के पात्र में उबाला जा सकता है। कैल्शियम और लोह युक्त विटामिन भी लिए जा सकते हैं।

गर्भवती को सुबह के समय 3-4 भीगे बादाम, दो अंजीर, एक आवँला मुरब्बा व कुछ तुलसी के पत्तों का सेवन करना चाहिए। इससे उसकी पाचन क्रिया ठीक रहती है तथा खनिज तत्वों की भी आपूर्ति हो जाती है। इसके कुछ समय पश्चात् उसे ताजे फलों का सेवन करना अच्छा रहता है। दोपहर लगभग 12 बजे हरी-सब्जी के साथ दलिया, चावल इत्यादि के साथ एक गिलास जूस लिया जा सकता है।

दोपहर के खाने में (लगभग 2 बजे) चोकर युक्त आटे की या मिस्सी रोटी खानी चाहिए। साथ में पत्ते वाली सब्जी, दाल, एक रेसेदार सब्जी, चावल व दही लिया जा सकता है। लगभग दो घंटे बाद समयानुसार मौसमी फल लिया जा सकता है। शाम के समय सूप लेने से भूख खुलकर लगती है। तले-भुने पदार्थों से दूर रहकर ड्राई फ्रूट लिए जा सकते हैं।

रात के खाने में रोटी, कोई रेसेदार सब्जी व दाल आदि ली जा सकती है। सबसे अन्त में गर्भवती को रात को गाय का दूध अवश्य ही पीना चाहिए। गाय का दूध मनुष्य मात्र के लिए प्रकृति का अनुपम उपहार है और यह शरीर को आवश्यकतानुसार शक्ति देता है।

साधारणतया गर्भवती स्त्री को पूरे दिन अलग-अलग समय पर कई तरह के फल, अंकुरित दालें, सोयाबिन के उत्पाद, अच्छी क्वालिटी का पनीर खाने के साथ सलाद, बीन्स, हरी पत्तेदार सब्जी, दाल, मटर, दूध-दही, नारियल पानी, आँवले का मुरब्बा आदि लेने चाहिएं।।

सभी गर्भवती स्त्रियों को माँस, अण्डा, मछली आदि का परहेज रखना चाहिए क्योंकि यह गर्भस्थ शिशु के लिए अत्यन्त नुकसानदायक हैं। इस दौरान चाय, काॅफी का परहेज भी हितकर रहता है। इसी प्रकार फास्ट फूड और जंक फूड बच्चे में जन्मजात बीमारियों को जन्म देते हैं। भोजन में रक्त का निर्माण करने के लिए पर्याप्त पोषक तत्वों का न होना ही एनीमिया का मुख्य कारण है। इसकी वजह से शरीर में आॅक्सीजन के स्तर मंे कमी आ जाती है, जिससे थकान महसूस होती है। इसके अतिरिक्त तनाव, चिड़चिड़ापन बेचैनी, भावुकता, गुस्सा, रूखी त्वचा, एकाग्रता में कमी आ जाती है। लगातार गाय के दूध का सुबह-शाम सेवन इसका उपयुक्त इलाज है।

गौर वर्ण एवं सुन्दर-पुष्ट संतान के लिए

गर्भधारण के शुरू के 7-8 माह तक प्रतिदिन 2 संतरे दोपहर को खाने से बच्चा सुन्दर और गौरा होता है। गर्भाधान का पता चलते ही आधा से एक ग्राम असली वंशलोचन का चूर्ण रात में सोने से पहले शुरू के 3-4 माह तक दूध के साथ निरन्तर लेते रहने से बच्चा गौरा, सुन्दर व पुष्ट उत्पन्न होता है तथा माँं भी निरोग और शक्तिशाली रहती है। इससे गर्भपात का भी भय नहीं रहता। वंशलोचन सेवन के दिनों में जितनी खा सके, रूचिपूर्वक कच्चे नारियल की गिरी, मिश्री (धागे वाली) के साथ चबा-चबाकर खाते रहने से संतान का वर्ण गोरा होता है।

गर्भावस्था में नौ माह तक नित्य भोजन के बाद सौंफ चबाते रहने से संतान गौरवर्ण होती है। गर्भवती स्त्री को प्रतिदिन ताजा अंगूरों का रस 50 ग्राम की मात्रा में देने से शिशु स्वस्थ एवं बलवान पैदा होता है तथा माँ को मूर्छा, चक्कर आना, दाँत-दर्द, मरोड़, सूजन, अफारा और कब्ज आदि भी नहीं होती।

प्रतिदिन नाश्ते में आँवले का मुरब्बा खाते रहने से बच्चा गौरा, स्वस्थ व पुष्ट तथा माँ भी तन्दरूस्त रहती है।

पुंसवन संस्कार Date :- 01-Jun-2014

सबसे पहला संस्कार गर्भाधान संस्कार है। यह संस्कार पितृ-ऋण की पूर्ति के लिए धर्मानुकूल और पवित्र भाव से धर्म-कुल व जाति को उज्ज्वल करने वाले संतान के उत्पादनार्थ किया जाता है। गर्भाधान के बाद गर्भ के दो संस्कार होते हैं- (1) पुंसवन, (2) सीमन्तोन्नयन

पुंसवन संस्कारबालकों का संस्कार पुंसवन से प्रारम्भ होता है। पुंसवन-संस्कार बालक के गर्भावस्था का है। पुंसवन गर्भ का संस्कार है, यह सभी आचार्यों का मत है। अतः गर्भस्थ संस्कार होने के कारण इसको प्रत्येक गर्भावसर पर करना चाहिये।

‘पुंसवन’ शब्द का अर्थ है- पुरुष-संतान की उत्पत्ति।

गर्भधारण से दूसरे, तीसरे महीने में अथवा गर्भ के प्रतीत होने पर पुंसवन-संस्कार करना चाहिये। यदि पुंसवन-संस्कार उचित समय पर न हो सके तो सीमन्तोन्नयन-संस्कार के साथ भी किया जा सकता है। पुंसवन-संस्कार में गुरू और शुक्र ग्रह के अस्त का एवं मलमासादि का दोष नहीं माना जाता है।

वर्धिष्णूनां चतुर्थानामपि कर्तव्यतां गतम्।
अमन्त्रकं तु कर्तव्यं पुंकर्म तु शुभार्थिनाम्।।

पुंसवन-संस्कार को सुसम्पन्न करने के लिये पुनर्वसु, पुष्य, श्रवण, मृगशिरा, हस्त और मूल- इन नक्षत्रों में से किसी भी नक्षत्र से युक्त चन्द्रमा हो तथा रवि, मंगल अथवा गुरूवार हो तो उस दिन गर्भिणी पत्नी को उपवासपूर्वक स्नान कराकर नूतन वस्त्र आदि धारण कराकर पूर्वाभिमुख बैठावें। पति भी स्नानादि से निवृत्त होकर स्वयं बैठे। पश्चात् आचमन, प्राणायाम, स्वस्तिवाचन करके प्रधान संकल्प करें-

‘अद्येहामुकोहं ममास्यां भार्यायामुत्पत्स्यमानापत्यगर्भस्य बीजगर्भसमुद्भवैनोनिबर्हणपुंरूपताज्ञानोदयप्रतिरोधकर्मनिरसनद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं पुंसवनाख्यं कर्म करिष्ये।’

अनन्तर उस कर्म के निर्विघ्न सिद्धयर्थ गणेश और अम्बिका का पूजन करके पंचांग (पुण्याहवाचन, मातृका-पूजन, वसोर्धारापूजन, आयुष्यमन्त्र-जप, नान्दीश्राद्ध) करे। पश्चात् रात्रि में गर्भिणी का पति वटवृक्ष की जटा और वट की शाखा के अंकुर- इन दोनों को जल के साथ पीसकर और महीन वस्त्र से छानकर उस रस को गर्भिणी पत्नी के दाहिने नासिका के छिद्र में ‘ ऊँ हिरण्यगर्भः’ और ‘ ऊँ अद्भयः सम्भृतः’ इन दोनों मंत्रों को कहकर छोड़ दे। पश्चात् नवीन मिट्टी के कलश को जल से भरकर गर्भिणी की गोद में रखकर पति अपनी अनामिका अंगुली के अग्रभाग से पत्नी के पेट का स्पर्श करता हुआ ‘ ऊँ सुपर्णोऽसि गरुत्मान्’ इस मन्त्र से गर्भ को अभिमंत्रित करे। अनन्तर किये हुए कर्म की सांगतासिद्धि के लिये दस अथवा अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दक्षिणा दे और उनसे आशीर्वाद लेकर आवाहित देवताओं का विसर्जन कर दें।

सीमन्तोन्नयन संस्कार Date :- 31-May-2014

पुंसवन और सीमन्तोन्नयन की उपयोगिता- इन दोनों संस्कारों की उपयोगिता उतनी ही है जितनी कि किसी गृह-निर्माण में नींव की होती है। ये दोनों संस्कार उस समय होते हैं, जब शिशु गर्भ में रहकर बढ़ता रहता है। आज के प्रजनन शास्त्र के विद्वान भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि शिशु के बाह्य और आभ्यन्तर घटकों (अणुओं) का निर्माण गर्भ में ही प्रारम्भ हो जाता है। प्राचीन तत्ववेत्ताओं ने इस तथ्य को सर्वांगीणरूप से परखा था। वे जानते थे कि शिशु के शारीरिक एवं मानसिक घटकों का निर्माण गर्भ में तो प्रारम्भ होता ही है, साथ-साथ माता के ही तत्तत् उपादानों से होता है, यह भी वे जानते थे। यदि माता के उपादान पवित्र एवं बलिष्ठ होंगे तो उनसे निर्मित बालक भी पवित्र एवं बलिष्ठ ही होगा। इसी तरह यदि माता के वे उपादान अपवित्र और दुर्बल होंगे तो बालक तामस प्रकृति का एवं दुर्बल होगा।

कयाधू दैत्यपत्नी थी, वह दिन-रात दैत्यों के संसर्ग में रहती थी। उसका पति हिरण्यकशिपु ईश्वर तक को नहीं मानता था। फिर भी उसकी संतान ‘प्रह्लाद’ जो इतने महाभागवत हुए, उसका एकमात्र कारण यही था कि कयाधू गर्भावस्था में महर्षि नारद के आश्रम में रही थी। महर्षि नारद के अपने दिव्य उपदेशों से उसके मन को अभिभूत कर रखा था। माता के उसी सत्त्वविष्ट मन से निर्मित प्रह्लाद का मन सर्वदा के लिये सत्त्वाविष्ट ही रहा। अभिमन्यु ने अपनी माता के गर्भ से ही चक्रव्यूह के भेदन का तरीका जान लिया था। गर्भावस्था में माता की हरकतों का कितना अधिक प्रभाव बालकों पर पड़ता है, यह इन दो दृष्टान्तों से समझा जा सकता है। ऋषियों की ऋतम्भरा प्रज्ञा ने इसी अन्तरित तत्त्व का साक्षात्कार कर गर्भावस्था के इन संस्कारों की योजना की है।

सीमन्तोन्नयन संस्कार के सम्बन्ध में आचार्यों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कर्क आदि कुछ आचार्य इसको गर्भस्थ बालक का संस्कार मानते हैं और पराशर आदि कुछ आचार्य इसको स्त्री का संस्कार मानते हैं। जो आचार्य सीमन्तोन्नयन गर्भ का संस्कार मानते हैं उनके मतानुसार प्रत्येक गर्भ के समय सीमन्तोन्नयन-संस्कार होना चाहिये और जो आचार्य पत्नी का संस्कार मानते हैं उनके मत के अनुसार केवल प्रथम गर्भ में ही होना चाहिए।

गर्भ धारण से छठे या आठवें मास में सीमन्तोन्नयन संस्कार करना चाहिये। महर्षि शंख का कहना है कि यदि किसी कारण छठे अथवा आठवें मास में सीमन्तोन्नयन न हो सके तो संतानोत्पत्ति के पूर्व किसी भी दिन इसको कर लेना चाहिये। एक दूसरे आचार्य का मत है कि यदि सीमन्तोन्नयन हुए बिना ही संतान उत्पन्न हो जाये तो उस पुत्र को उसकी माता अपनी गोद में लेकर प्रथम सीमन्तोन्नयन करके उसका ‘जातकर्म-संस्कार’ करे।

सीमन्तोन्नयन के साथ यदि पुंसवन संस्कार करना हो तो महाव्याहृति होमरूप प्रायश्चित करके प्रथम पुंसवन-संस्कार करके पश्चात् सीमन्तोन्नयन करना चाहिये, ऐसी शास्त्राज्ञा है।

सीमन्तोन्नयन-संस्कार को करने के लिये पुंसवन-संस्कार की तरह स्वस्तिवाचन आदि करके प्रधान संकल्प करें-

‘अद्येहामुकोऽहं ममास्यां भार्यायां गर्भभिवृद्धिपरिपन्थिपिशितप्रियाऽलक्ष्मीभूतराक्षसगणनिरसनक्षमसकलसौभाग्यनि-
दानभूतम्रहालक्ष्मीसमावेशनद्वारा प्रतिगर्भं बीजगर्भसमुद्भवैनोनिबर्हणद्वारा च श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं स्त्रीसंस्काररूपं सीमन्तोन्नयनाख्यं कर्म करिष्ये।’

इस प्रकार संकल्प करने के अनन्तर निर्विघ्नतासिद्धयर्थं गणपत्यादि देवताओं का पूजन करके पूर्ववत् पंचाँग करें। पश्चात् बहिःशाला में स्थण्डिल बनाकर उसमें पंचभू-संस्कारपूर्वक अग्नि का स्थापन करें और आघारावाज्यभाग की आहुति तथा स्विष्टकृदादि करके अग्नि के पश्चात् भद्रपीठ (देवदारु के काष्ठ का पीढ़ा) के उपर गर्भवती स्त्री को बैठावें। अनन्तर दो फल और सुवर्णयुक्त गूलर के वृक्ष की शाखा, तेरह-तेरह कुशाओं की तीन पिंजुली तीन स्थानों में, सफेद साही का एक काँटा, पीले सूत से लपेटा हुआ एक लोहे का तकुवा और प्रादेशमात्र एक तीक्ष्ण पीपल की खूँटी- इन सब वस्तुओं को एकत्रित करके पति अपनी पत्नी के सिर के केशों (बालों) का विनयन करे अर्थात् केशों को दाहिने और बाएँ दोनों ओर दो भागों में करके ‘ ऊँ भूर्विनयामि’ इत्यादि तीन मंत्रों से माँग निकाले। पश्चात् ‘ ऊँ अयमूर्जावतो’ इस मंत्र को कहकर औदुम्बरादि पाँचों वस्तुओं की अपनी पत्नी की वेणी (चोटी) में बाँध दे। अनन्तर पति वीणा पर गाने वाले दो पुरुषों को ले आये। वीणा पर गायन करने वाले दोनों पुरुष उत्साह के साथ ‘ ऊँ सोमऽएव’ इस मंत्र का गायन करें। ‘ ऊँ सोमऽएव’ इस मंत्र के अंत में आये हुए ‘असौ’ पद के स्थान में पत्नी गंगा आदि उस नदी का नाम लें, जो वहाँ हो।

सीमन्तोन्नयन कर्म के सांगतासिद्धयर्थ दस अथवा सामथ्र्यानुसार ब्रह्माणों को भोजन कराने का संकल्प कराकर उन्हें यथोचित दक्षिणा देकर आवाहित देवताओं का विसर्जन करे और ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करे।

पुंसवन और सीमन्तोन्नयन में जितने कृत्य विहित हैं और जिन मंत्रों से वे किये जाते हैं, इन दोनों की ओर दृष्टिपात करने से यह स्पष्ट समझ में आ जाता है कि इन से माता का मन कितनी दिव्य शक्तियों से अभिभूत हो जाता है और तब बालक को दिव्य बनने में क्या संदेह रह सकता है।


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