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पुरी स्थित गम्भीरा मंदिर में गौरांग देव Date :- 02-Jun-2016

चैतन्य महाप्रभु 24 वर्ष की आयु में ही संन्यास धर्म की दीक्षा लेकर पुरी में पधारे। पहले छः वर्ष उन्होंने भारत के सभी तीर्थों का भ्रमण किया एवं सबसे अंत में वृन्दावन की यात्रा की। इसके पश्चात् लगभग 18 वर्षों तक उन्होंने परम पावन ‘जगन्नाथ पुरी’ में ही वास किया। पहले छः वर्षों तक महाप्रभु भक्तों के साथ भगवद्चर्या, आनन्दोत्सव एवं संकीर्तन करते रहे किंतु अंतिम 12 वर्ष उन्होंने ‘दिव्योन्माद’ की अवस्था में ‘गम्भीरा मंदिर’ में व्यतीत किये।

श्री जगन्नाथ मंदिर के पास ही महाराज प्रतापरुद्र के कुलगुरु पंडित काशी मिश्र का मकान है। यद्यपि वह काफी बड़ा है किंतु महाप्रभु उसमें एक छोटे से स्थान (जो गुफा की तरह था) में निवास करते थे, जिसे ‘गम्भीरा’ कहा जाता है। प्रभु-विरह एवं प्रेमोन्माद की अवस्था में गौरांग महाप्रभु ने अंतिम 12 वर्ष इसी गम्भीरा मंदिर में व्यतीत किये। शायद प्रभु के गम्भीर भाव से रहने के कारण भक्त इसे ‘गम्भीरा मंदिर’ के नाम से पुकारने लगे। यहीं पर चैतन्य महाप्रभु के कमण्डलु, पादुका एवं गुदड़ी भी एक बक्से में सुरक्षित रखी हैं।

प्रभु ने गम्भीरा मंदिर में रहकर जो बारह वर्ष बिताए एवं उन वर्षों में उन्होंने जो लीलाएँ कीं, उन्हें भक्त ‘गम्भीरा लीला’ के नाम से जानते और कहते हैं। महाप्रभु निरन्तर वियोगिनी ‘श्री राधिका जी’ के भाव में भावान्वित रहते थे। इन 12 वर्षों में प्रभु के शरीर में जो-जो प्रेम-भाव उत्पन्न हुए थे, वे आज तक किसी भी महापुरुष के शरीर में प्रगट नहीं हुए। उस समय उनके अंतरंग भक्त ही उनके शरीर की देखरेख तथा सेवा सुश्रुषा करते थे। उनमें गोविंद जगदानंद, रघुनाथदास, स्वरूप दामोदर एवं राय-रामानंद जी ही मुख्य थे। उस समय दिव्योन्माद के कारण महाप्रभु की जो दशा होती थी, उसे स्वरूप दामोदर जी अपने कड़चा में लिखते जाते थे, जिसे ‘स्वरूप-दामोदर जी का कड़चा’ कहा जाता है।

गम्भीरा मंदिर में महाप्रभु की दिव्य वस्तुएँ, कमण्डलु, पादुकाएँ एवं गुदड़ी एक बक्से में सुरक्षित हैं। पाठकों से विनम्र निवेदन है कि श्री जगन्नाथ पुरी में जाने का भाग्य प्राप्त होने पर इस परम-पावन स्थल ‘गम्भीरा मंदिर’ में अवश्य जाएँ और चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रयोग की गई उनकी वस्तुएँ को प्रकट रूप में अवश्य देखें।

सिद्ध बकुल Date :- 01-Jun-2016

पुरी स्थित श्री गम्भीरा मंदिर के समीप ही ‘सिद्ध बकुल’ के नाम से विख्यात एक अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थल है। यह वह पावन स्थल है, जहाँ चैतन्य महाप्रभु के परमप्रिय परिकर ठाकुर ‘हरिदास’ नित्यप्रति श्रीकृष्ण के तीन लाख नामों का जप किया करते थे। संन्यास के पश्चात् जब महाप्रभु नीलांचल धाम में आये तो उनके दर्शनों एवं संग के लोभी नामाचार्य हरिदास भी पुरी में पधारे। ‘तृणादपि सुनीचेन’ के मूर्तिमंत्र स्वरूप हरिदास जी अपने दीन स्वभाव के कारण चैतन्य महाप्रभु के पास न जाकर ‘गम्भीरा’ के पास ही एक निर्जन स्थान में निवास करने लगे। अपने को अत्यन्त तुच्छ समझते हुए हरिदास ठाकुर चैतन्य महाप्रभु के समीप नहीं जाते थे, उनके इस भाव से अभिभूत होकर ‘चैतन्य महाप्रभु’ स्वयं उनके पास दर्शन देने आया करते थे।

ठाकुर हरिदास जी को छाया प्रदान करने के उद्देश्य से एक दिन चैतन्य महाप्रभु ने जगन्नाथ जी की प्रसादी बकुल दातुन का वहाँ रोपण कर दिया। महाप्रभु के प्रभाव से शीघ्र ही उसका प्राकट्य विशाल वृक्ष के रूप में हुआ। इसी वृक्ष के नीचे बैठकर ठाकुर ‘हरिदास’ तीन लाख नाम जप करते थे। इसी वृक्ष की शीतल छाया में बैठकर श्रील रूप गोस्वामी ने ‘ललित माधव’ एवं ‘विदग्ध माधव’ की रचना की। श्रीपाद सनातन गोस्वामी ने भी अपने नीलांचल वास के समय यहाँ श्री हरिदास जी के साथ समय व्यतीत किया। ठाकुर हरिदास के बैकुण्ठ गमन पर महाप्रभु ने इनकी दिव्य देह को अपने हाथों में लेकर यहाँ नृत्य किया था।

एक बार जगन्नाथ देव के रथ निर्माण के लिये राज्य कर्मचारियों ने इस वृक्ष का छेदन करने का निर्णय किया। तब एक आश्चर्यजनक घटना हुई, जिस दिन वृक्ष छेदन करने का निश्चय हुआ था, उसकी पूर्वरात्रि में ही वृक्षराज खोखले हो गए। दूसरे दिन राज्य कर्मचारी वृक्ष की दशा देखकर विस्मित होते हुए लौट गये। उसी दिन से यह वृक्षराज ‘सिद्ध बकुल’ के नाम से पूजित हो रहे हैं।

यद्यपि वृक्षराज अंदर से खोखले हैं, किंतु ऊपर से पूरी तरह हरे-भरे हैं। चैतन्य महाप्रभु की प्रभुता एवं ठाकुर हरिदास के भजन के प्रभाव का साक्षी ‘सिद्ध बकुल’ पुरी के दर्शनीय स्थलों में एक है। पुरी धाम में आकर यहाँ के दर्शन अवश्य करने चाहिएँ।

भक्त चोखामेला Date :- 17-Mar-2016

चोखामेला भगवद्भक्त थे। उनकी भक्ति सनातन धर्म के अनुकूल थी। हीन जाति के होने के कारण वे मंदिर के अंदर जाते नहीं थे, बाहर से ही दर्शन करते थे। किसी के बुलाने पर भी मंदिर में नहीं जाते थे। उनकी उत्कृष्ट भक्ति से जब भगवान को उन्हें देखने की इच्छा होती थी, तब भगवान विट्ठलनाथ स्वयं बाहर आ जाते थे। आज भी मंदिर के बाहर उनका स्थान है। एक बार मजदूरों के साथ काम करते-करते आठ-दस मजदूरों के साथ चोखामेला की मृत्यु हो गई। भगवान श्रीपण्ढरीनाथ जी की आँखों से अश्रुधारा निकल पड़ी। उन्होंने संत नामदेव को प्रेरणा की- ‘भक्त चोखामेला की अस्थियों का संचय करो।’ नामदेवजी के मन में जब शंका हुई कि इतनी हड्डियों में से भक्त चोखामेला की कौन-सी हड्डी है, तब भगवान ने प्रेरणा की कि ‘जिस हड्डी से ‘विट्ठल-विट्ठल’ की ध्वनि निकलती हो, उस हड्डी का संचयन कर लेना।’ श्रीनामदेव जी ने जब सुना, तब उन्हें उन हड्डियों में ‘विट्ठल’, ‘विट्ठल’ की ध्वनि सुनायी पड़ती थी। उन्होंने उन नाममयी हड्डियों को चुनकर विसर्जित किया और परम सौभाग्य प्राप्त किया। धन्य है भक्त चोखामेला, जिससे मिलने स्वयं नारायण मंदिर से बाहर आते थे।

स्वामी रामतीर्थ की भक्ति भावना Date :- 06-Oct-2015

स्वामी रामतीर्थ लाहौर के सरकारी महाविद्यालय के छात्र थे। उन्होंने 1892 में गणित में एम.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। गणित के प्राध्यापक मि. गिल्बर्टसन तीर्थराम के अथाह ज्ञान तथा प्रतिभा से प्रभावित थे। उन्होंने काॅलेज के प्राचार्य की उपस्थिति में तीर्थराम को बुलाकर कहा, ‘हमारे शासन को तुम्हारे जैसे प्रतिभाशाली प्रशासक की बहुत जरूरत है। हम चाहते हैं कि तुम्हें इसकी परीक्षा में शामिल करें। तुम जज बन जाओगे।’

तीर्थराम ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा, ‘मैं अपने ज्ञान तथा प्रतिभा का उपयोग अपने देश की महान संस्कृति और अध्यात्म के प्रचार-प्रसार में करना चाहता हूँ। मेरी यह इच्छा है कि हर श्वास प्रभु की भक्ति व सेवा में लगे। मेरे हिन्दू धर्मशास्त्रों में सेवा और सहयोग को सर्वोत्कृष्ट बताया गया है। मैं उसी में मस्त रहूँगा।’ तीर्थराम की बात सुनकर दोनों चकित हो उठे।

वर्ष 1897 में स्वामी विवेकानंद अमेरिका से लौटने के बाद लाहौर गये। प्रो. तीर्थराम ने वेदान्त और अध्यात्म पर उनका व्याख्यान सुना, तो मंत्रमुग्ध हो उठे। उन्होंने विवेकानंद के पास पहुँचकर संकल्प लिया कि वह भी विदेश जाकर भारतीय संस्कृति और सनातनधर्म के शाश्वत मूल्यों का प्रचार-प्रसार करेंगे। विवेकानंद ने उन्हें आशीर्वाद दिया। तीर्थराम से संन्यासी बने रामतीर्थ ने वर्ष 1902 में अमेरिका-जापान आदि देशों में जब भारतीय संस्कृति के महत्त्व पर भाषण दिया तो लोग चमत्कृत हो गये।

नारायण मेघाजी लोखंडे Date :- 06-Oct-2015

ज्यादातर लोग नहीं जानते कि रविवार की छुट्टी हमें क्यों मिली? ये छुट्टी किसने हमें दिलाई और इसके पीछे उस महान व्यक्ति का क्या उद्देश्य था? क्या है इसका इतिहास? जिस व्यक्ति की वजह से हमें छुट्टी हासिल हुई है, उस महापुरुष का नाम है ‘नारायण मेघाजी लोखंडे’। नारायण मेघाजी लोखंडे, जोतीराव फुलेजी के सत्यशोधक आंदोलन के कार्यकर्ता और कामगार नेता भी थे। अंग्रेजो के समय में हफ्ते के सातों दिन मजदूरों को काम करना पड़ता था। लोखंडेजी का ये मानना था कि हफ्ते में सात दिन हम अपने परिवार के लिए काम करते हैं, लेकिन जिस समाज की बदौलत हमें नौकरियाँ मिली हैं, उस समाज की समस्याओं के लिए हमें एक दिन छुट्टी मिलनी चाहिए। उन्होंने अंग्रेजों के सामने 1881 में इसका प्रस्ताव रखा। लेकिन अंग्रेजों ने ये प्रस्ताव ठुकरा दिया। इसलिए नारायण मेघाजी लोखंडेजी को इस छुट्टी के लिए 1881 में आंदोलन करना पड़ा। ये आंदोलन लगभग 8 वर्ष तक चला। आखिरकार 1889 में अंग्रेजो को रविवार की छुट्टी को मानना पड़ा। अगर हमें आज इसकी जानकारी होती और हम समाज का काम ईमानदारी से करते तो समाज में भुखमरी, बेरोजगारी, गरीबी, लाचारी ये समस्या नहीं होती। साथियों, इस रविवार की छुट्टी पर हमारा हक नहीं है, इस पर ‘समाज’ का हक है। अतः आज से ही रविवार के दिन को हम ‘आराम डे’ नहीं, बल्कि ‘मिशन डे’ मनायेंगे और समाज की सेवा में लगाएंगे।

साहित्य के शीर्ष स्तम्भ 'गणेश शंकर विद्यार्थी' Date :- 06-Oct-2015

साहित्य और समाज का संबंध हमेशा से ही बहुत गहरा रहा है। समाज को सही राह पर अग्रसर रखने और व्याप्त कमियों को समझने के लिए साहित्य ने बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वाधीनता संग्राम की ज्वाला को प्रज्ज्वलित रखने में साहित्यकारों के योगदान को कभी भी कम नहीं आंका जा सकता। इन्हीं साहित्यकारों की सम्माननीय श्रेणी में गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम भी शामिल है। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में ऐसे ही शीर्ष स्तंभ थे, जिनके द्वारा लिखित और प्रकाशित समाचार पत्र ‘प्रताप’ ने स्वाधीनता आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई। प्रताप के जरिये ही ना जाने कितने क्रांतिकारी स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित हुए। इतना ही नहीं, यह समाचार पत्र समय-समय पर साहसी क्रांतिकारियों की ढाल भी बना।

26 सितंबर, 1890 को कानपुर में जन्मे गणेश शंकर विद्यार्थी एक निडर और निष्पक्ष पत्रकार तो थे ही, एक समाज-सेवी, स्वतंत्रता सेनानी और कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। गणेश शंकर विद्यार्थी एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो कलम और वाणी के साथ-साथ महात्मा गाँधी के अहिंसक आंदोलनकारियों और क्रांतिकारियों को समान रूप से देश की आजादी में सक्रिय सहयोग प्रदान करते रहे।

विद्यार्थी जी की शैली में भावात्मकता, ओज, गाम्भीर्य और निर्भीकता भी पर्याप्त मात्रा में पायी जाती है। उनकी भाषा कुछ इस तरह की थी जो हर किसी के मन पर तीर की भांति चुभती थी। गरीबों की हर छोटी से छोटी परेशानी को वह अपनी कलम की ताकत से दर्द की कहानी में बदल देते थे।

गणेश शंकर विद्यार्थी की मृत्यु कानपुर के हिन्दू-मुस्लिम दंगे में असहायों को बचाते हुए 25 मार्च, 1931 ई. को हुई। गणेश शंकर जी की मृत्यु देश के लिए एक बहुत बड़ा झटका रही।

गणेश शंकर विद्यार्थी एक ऐसे साहित्यकार रहे हैं जिन्होंने देश में अपनी कलम से सुधार की क्रांति उत्पन्न की। आज हमारे समाज को ऐसे साहित्यकारों की आवश्यकता है जो अपने सभी दायित्वों का निर्वाह करना जानता हो और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझे।

हाड़ी रानी और उसकी निशानी Date :- 12-Sep-2015

सत्य घटनाः एक ऐसी रानी जिसने युद्ध में जाते अपने पति को निशानी माँगने पर अपना सिर काट कर भिजवा दिया था। यह रानी बूंदी के हाडा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर ठिकाने के रावत रतन सिंह चुण्डावत की रानी थी, जिनकी शादी का गठजोड़ा खुलने से पहले ही उसके पति रावत रतन सिंह चुण्डावत को मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1653-1681) का औरंगजेब के खिलाफ मेवाड़ की रक्षार्थ युद्ध का फरमान मिला। नई-नई शादी होने और अपनी रूपवती पत्नी को छोड़कर रावत चुण्डावत का तुंरत युद्ध में जाने का मन नहीं हो रहा था। यह बात रानी को पता लगते ही उसने तुरंत रावत जी को मेवाड़ की रक्षार्थ जाने व वीरतापूर्वक युद्ध करने का आग्रह किया। युद्ध में जाते रावत चुण्डावत पत्नी मोह नहीं त्याग पा रहे थे, सो युद्ध में जाते समय उन्होंने अपने सेवक को रानी के रनिवास में भेज रानी की कोई निशानी लाने को कहा। सेवक के निशानी माँगने पर रानी ने यह सोच कर कि कहीं उसके पति पत्नीमोह में युद्ध से विमुख न हो जाएँ या वीरता प्रदर्शित नहीं कर पाएँ, इसी आशंका के चलते इस वीर रानी ने अपना शीश ही काटकर निशानी के तौर पर भेज दिया ताकि उसका पति अब उसका मोह त्याग निर्भय होकर अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध कर सके।

रावत चुण्डावत ने अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटकाकर औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया और वीरतापूर्वक लड़कर अपनी मातृभूमि के लिए शहीद हो गये। 

भारत और विज्ञान Date :- 01-Aug-2015

एक समय था जब भारत विज्ञान के क्षेत्र में सबसे अधिक उन्नत था। चारों वेदों में ऋग्वेद विज्ञान पर आधारित है। इस वेद की जानकारी प्राप्त करने के लिए जर्मनी के वैज्ञानिकों ने संस्कृत भाषा का अध्ययन कर उससे विज्ञान की जानकारी प्राप्त की और उन्हीं वैज्ञानिकों ने अमेरिका में अणु बम का आविष्कार किया।

हमारे देश में अध्यात्म, मंत्र व योग के द्वारा विज्ञान शिखर पर था। अपने योग और तपोबल से किसी जीवित व्यक्ति को पाषाण में बदलने की क्षमता थी और पाषाण को जीवनदान देने की शक्ति भी थी। इसी साधना की शक्ति और विकास के चलते लोगों ने हवा में उड़ने की क्षमता प्राप्त की थी। मृत प्राणी को पुनः जीवनदान देने की कला हमारे पूर्वजों के पास थी। इन विद्याओं को आधुनिक विज्ञान अभी तक प्राप्त नहीं कर सका।

त्रेतायुग में विज्ञान बहुत उन्नत था। रावण सीता माता का हरण करके अपने विमान द्वारा लंका ले गया। मारीच के पास रूप बदलने की कला थी, जिसके सहारे उसने स्वर्ण मृग का रूप धारण कर सीता जी को भ्रमित कर दिया। लक्ष्मण जी द्वारा खींची गई रेखा को रावण पार नहीं कर सका और छलपूर्वक सीता जी को उस रेखा से बाहर लाकर ही उनका हरण कर सका। यह इंजीनियरिंग का ही कौशल था, जिसके चलते नल-नील द्वारा पत्थर तैराकर समुद्र पर सेतु बनाकर श्रीराम जी की सेना को लंका तक पहुँचाया जा सका। रामसेतु कोई काल्पनिक नहीं है, उसके अवशेष आज भी विज्ञान को चुनौती देने के लिये मौजूद हैं।

हनुमान जी के पास कई कलाएँ थीं। वह अपने आकार को बड़ा भी कर सकते थे और दुश्मन को चकमा देने के लिये लघु रूप भी धारण कर सकते थे। बाल हनुमान जी ने सूर्य को एक अद्भुत फल समझकर भक्षण कर लिया था और सबकी प्रार्थना पर उसे उगल दिया था। हनुमान चालीसा के एक पद्य में सूर्य से पृथ्वी की दूरी का जो वर्णन किया था, आज के वैज्ञानिकों की गणना के हिसाब से शत-प्रतिशत मिलता है। ‘युग सहस्र योजन पर भानू, लील्यो ताहि मधुर फल जानू’। राम-रावण के युद्ध में मेघनाद और रावण युद्ध करते-करते हवा में अपने रथ समेत उड़ जाते थे और आकाश से युद्ध करते थे। उनके रथों में इस प्रकार के यंत्र लगे हुए थे, जिनकी सहायता से उनके रथ हवा में उड़ सकते थे। ऐसा भी वर्णन है कि श्रीराम द्वारा चलाया गया बाण अपने लक्ष्य को पूरा करके उनके तरकश में वापस आ जाता था। जब श्रीहनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर वापस जा रहे थे तो अयोध्या के ऊपर से जाते समय भरत जी ने बाण चलाकर हनुमान जी को नीचे गिरा दिया। भरत द्वारा हनुमान जी को बाण पर बैठाकर लंका पहुँचाने वाला बाण कोई साधारण बाण नहीं, बल्कि आधुनिक युग जैसी मिसाईल ही थी, जो अपने लक्ष्य पर प्रहार भी कर सकती थी और लक्ष्य पर पहुँच भी सकती थी। क्या यह सब आधुनिक विज्ञान से अधिक उन्नत विज्ञान नहीं था?

युद्धों में चलाये जाने वाले अग्नि बाण और वर्षा बाण, जिनकी चर्चा महाभारत में आती है, ऐसे अस्त्र थे, जिनकी मारक क्षमता अचूक थी, किंतु उनका प्रभाव क्षेत्र सीमित होता था। यह सभी सूक्ष्म आणविक अस्त्र थे, जिनका विकास इस युग के वैज्ञानिक अभी तक नहीं कर सके।

हमारा विज्ञान प्रयोगशालाओं में उन्नत न होकर ऋषि-मुनियों के आश्रमों में विकसित हुआ था और इस विकास का मुख्य सूत्र साधना, मंत्र शक्ति और तपोबल था। उस समय अखण्ड भारत विज्ञान, कला और शिक्षा के क्षेत्र में इतना उन्नत था कि आज के सबसे विकसित देश भी उस विकास की कल्पना नहीं कर सकते, जो भारतवर्ष ने हजारों वर्ष पूर्व अर्जित किया था। यही कारण है कि यातायात के साधनों का अभाव होते हुए भी निकटवर्ती देशों के छात्र विद्याग्रहण के लिये भारतवर्ष आया करते थे। तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय इसका जीता-जागता उदाहरण हैं।

भारतीय संस्कृति के अनुपम रत्न महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी Date :- 31-Jul-2015

आज से लगभग 500 वर्ष पूर्व ऐसा समय था जब भारत में शैक्षिक, धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक रूप से जीवन अंधकारमय हो गया था। हमारे सब धर्मग्रंथ संस्कृत भाषा में थे जो जनसाधारण की भाषा नहीं थी। इस कारण धर्मग्रंथ में क्या लिखा है, यह वे नहीं जानते थे। इस कारण समाज में अनेक अंधविश्वास और कुप्रथाएँ जड़ जमा रही थीं। धर्म का सच्चा और कल्याणकारी स्वरूप लोगों की आँखों से ओझल हो रहा था। विदेशी शासन के कारण युगों से चली आ रही पारिवारिक और सामाजिक मर्यादाएँ टूट रही थीं। धर्म के नाम पर पाखण्ड हो रहा था। विधर्मी अपना धर्म फैला रहे थे। समाज पर अत्याचार हो रहे थे और समाज में निराशा घर कर रही थी। वैष्णवों व शैवों में मनमुटाव बढ़ रहा था। दोनों अपने-अपने इष्टदेव को बड़ा बता रहे थे। इसका मूल कारण अज्ञान ही था। नाथ पंथियों और कुछ निर्गुण संतों ने इन परिस्थितियों में ईश्वर को अपने भीतर ही खोजने का उपदेश दिया। उनके उपदेश के कारण ईश्वर की प्राप्ति बड़ी रहस्यमय और गोपनीय जैसी बन रही थी। समाज की इस चिंताजनक स्थिति पर गोस्वामी जी ने गंभीर चिंतन किया। तभी उनके मन में यह प्रेरणा जागी कि जनभाषा में रामकथा को लिखा जाय, जो संपूर्ण समाज के लिये रसायन बना और धर्म के प्रति आस्था जागृत हुई।

गोस्वामी तुलसीदास ऐसे समय में भारतीय संस्कृति के अनुपम रत्न रूपी एक महाकवि के रूप में उभरे। जिनकी बातों को अनेक सम्प्रदायों ने स्वीकार किया, गोस्वामी तुलसीदास जी ने उन्हीं के साथ सामंजस्य स्थापित किया। इसीलिए उनके दार्शनिक विचारों में संकीर्णता नहीं दिखाई दी। वास्तव में तुलसीदास ने प्राचीन शास्त्रों में उपलब्ध सामग्री की सहायता से जीव, ब्रह्म, इनके पारस्परिक सम्बन्ध, माया और ब्रह्म इत्यादि के विषय में चिन्तन किया और फिर उनका स्पष्टीकरण भी प्रस्तुत किया। तुलसीदास ने अपने काव्य के छंदों में दर्शन के गहन और नीरस विषय को इस सादगी के साथ भर दिया कि साधारण जनता तक को उनके समझने में कठिनाई नहीं होती।

तुलसीदास जी के अनुसार, मानव-जीवन ही सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि इसी जीवन में जीव कर्म कर सकता है, बाकी सभी योनियों में वह अपने कर्मों का फल भुगतता है। इसलिए मानव-जीवन का मुख्य लक्ष्य ईश्वर की भक्ति ही होनी चाहिए। विदेशियों के शासन काल और वर्तमान काल में भी रामचरितमानस ने हिंदू धर्म और समाज की रक्षा की है। डेढ़ सौ वर्ष पहले बिहार तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश से हजारों लोग मजदूरी करने माॅरिशस, ट्रिनिडाड, सूरिनाम, गुयाना आदि देशों में गए। वे अपने साथ रामचरितमानस को लेते गए। विदेश में, विदेशी संस्कृति के बीच उन्हें ईसाई बनाने का प्रयास किया गया। ऐसे में रामचरितमानस ने ही उन्हें अपने धर्म पर दृढ़ रहने की तथा धर्म परिवर्तन के कुचक्र से बचने की प्रेरणा और हिम्मत दी।

धर्म, ईश्वर, जीव, प्रकृति और माया आदि मान्यताओं को लेकर तुलसीदास ने हरि प्राप्ति के साधनों पर प्रकाश डाला है। इनके अनुसार दास्यभक्ति ही राम की प्राप्ति का सर्वोचित माध्यम है। राम और धर्म के प्रति आस्था प्रकट करने के बाद भी गोस्वामी जी की दृष्टि जनकल्याणी और विश्वव्यापी है। अतः यह कहना उचित होगा कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ ही उनकी विचारधारा थी और राम की भक्ति ही उनकी दार्शनिक आस्था थी।

हिन्दी के महान साहित्यकार 'मुंशी प्रेमचन्द' Date :- 03-Jul-2015

‘प्रेमचंद’ उपनाम लिखने वाले धनपत राय श्रीवास्तव हिन्दी और उर्दू के महानतम भारतीय लेखकों में से एक हैं। उन्हें ‘मुंशी प्रेमचंद’ व ‘नवाब राय नाम’ से भी जाना जाता है और उपन्यास सम्राट की उपाधि भी उन्हें प्रदान की गई।

‘प्रेमचंद’ ने हिन्दी को पाला-पोसा, बड़ा किया और उसे एक संस्कार दिया। प्रेमचंद ने कहानी और उपन्यास की एक ऐसी परंपरा का विकास किया, जिसने एक पूरी सदी के साहित्य का मार्गदर्शन किया। अपने बाद की एक पूरी पीढ़ी को गहराई तक प्रभावित कर प्रेमचंद ने साहित्य को आम आदमी और जमीन से जोड़ा। उनका लेखन हिन्दी साहित्य की एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी के विकास का अध्याय अधूरा रहेगा।

कथा सम्राट प्रेमचंद का कहना था कि ‘साहित्यकार देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई नहीं बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सच्चाई है।’ यह बात उनके साहित्य में उजागर भी हुई है। प्रेमचंद ने साहित्य को सच्चाई के धरातल पर उतारा। उन्होंने जीवन और कालखंड की सच्चाई को पन्ने पर उतारा।

वे सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, जमींदारी, कर्जखोरी, गरीबी, उपनिवेशवाद पर आजीवन लिखते रहे। प्रेमचंद की ज्यादातर रचनाएँ गरीबी और दैन्यता की कहानी कहती हैं। यह भी गलत नहीं है कि वह आम भारतीय के रचनाकार थे। उनकी रचनाओं में ऐसे नायक हुए, जिसे भारतीय समाज अछूत और घृणित समझता था।

उन्होंने सरल, सहज और आम बोल-चाल की भाषा का उपयोग किया और अपने प्रगतिशील विचारों को दृढ़ता से तर्क देते हुए समाज के सामने प्रस्तुत किया। 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि लेखक स्वभाव से प्रगतिशील होता है और जो ऐसा नहीं है, वह लेखक नहीं है। प्रेमचंद हिन्दी साहित्य के युग प्रवर्तक माने गए।

महान तीर्थ नैमिषारण्य और उसका महत्व Date :- 02-Jul-2015

अत्यन्त पवित्रतम पावन तीर्थ, जो वैष्णव, शैव आदि सगुण-निर्गुण उपासकों तथा जनसाधारण के बीच पुनीत कर्मस्थली रही है, जहाँ ऋषियों ने स्वाध्याय, तप, ज्ञानादि के द्वारा वेदोपनिषद के गूढ़ रहस्यों को प्रकाशित किया। इस स्थान को पुराणों में भोग-मोक्ष दातृ के रूप में माना है।

यह स्थान उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में गोमती नदी के किनारे लखनऊ से 80 किलोमीटर की दूरी पर नैमिषारण्य रेलवे स्टेशन पर है। श्रीमद्भागवत स्कन्द एवं वायुपुराण आदि में विभिन्न कथायें मिलती हैं। एक बार ब्रह्मा ने विश्व सृजन की इच्छा से यज्ञ करना चाहा। स्थान चयन के प्रसंग में भगवान विष्णु ने एक दिव्य चक्र दिखाते हुए कहा कि यह चक्र जहाँ नेमिशीर्ण हो जाये, वही स्थान यज्ञभूमि होगी। ब्रह्मा ने इसी स्थान पर चक्र को नेमिशीर्ण होते हुए देखा। पद्मपुराण, देवीभागवत, शिवपुराण आदि में इसी कथा की पुष्टि मिलती है। यह चक्र प्राण और शरीर दोनों का मनोमय चक्र है।

पुराणों में इस तीर्थ के सम्बन्ध में अभिमत-

अग्नि पुराण के अनुसार, नैमिषारण्य परमतीर्थ, भोग मोक्षदायक है।

इस तीर्थ को गरुड़पुराण में पुण्यदायक, मुक्तिदायक तथा सिद्धि देने वाला माना है।

यह सभी तीर्थ क्षेत्रों में उत्तम है। यहाँ भगवान का द्रवरूप प्रकट करने वाला विग्रह है। यहाँ तप करने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति तथा यहाँ जिनकी मृत्यु होती है, उन्हें नरक नहीं भोगना पड़ता। यहाँ भगवान हरि स्वयं निवास करते हैं।

महाभारत में आया है कि इस तीर्थ में स्नान करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। मेधयज्ञ का फल तथा पितरों के तर्पण से सुख-शांति मिलती है। वायु पुराण के अनुसार, यहाँ पिण्डदान करने से पितृदोष दूर हो जाता है।

वायु पुराण में वर्णन मिलता है कि यहाँ संयमपूर्वक निवास करने, तर्पणादि से सात पीढि़यों का उद्धार हो जाता है तथा हजारों तीर्थों में वास करने का फल मिलता है।

यहाँ की यज्ञ भूमि देवर्षियों द्वारा सेवित तथा यहाँ सूर्य का अक्षय पात्र स्थित है।

कूर्मपुराण में लिखा है कि यहाँ तप, दान, श्राद्ध, योग करने से सात जन्म का पाप छूट जाता है।

रामचरितमानस में तुलसी दास ने लिखा है- यह विष्णु का आश्रय स्थान तथा पृथ्वी का सर्वोत्तम स्थान है।

हमारा सनातन हिंदू धर्म धन्य है Date :- 01-Jun-2015

सनातन हिन्दू धर्म बड़ा अद्भुत विलक्षण धर्म है। इसकी सानी का समस्त विश्व में कोई दूसरा अन्य धर्म है ही नहीं। बड़े ही महान पुण्यों के फलस्वरूप धर्मप्राण भारत में जन्म होता है और यह मनुष्य-योनि मिलती है, फिर हिन्दू जाति में उत्पन्न होना, सनातन हिन्दू धर्म का पालन करना, यह तो बड़े ही महान पुण्यों का और प्रभु की असीम कृपा का फल है। यह हमारा वही तो सनातन हिन्दू धर्म है कि जिसकी रक्षा के लिये साक्षात् अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक परात्पर ब्रह्म जगदाधार परमात्मा का भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के रूप में अवतार हुआ करता है। इसी धर्म की रक्षा के लिये शिवि, दधीचि, हरिश्चन्द्र आदि ने करोड़ों कष्ट सहन किये थे।

इसी धर्म की रक्षा के लिये जगद्गुरु भगवान श्रीशंकराचार्य महाराज ने चार मठों की स्थापना कर हिन्दू धर्म की पताका बड़ी शान से फहरायी थी। इसी धर्म की रक्षा के लिये प्रातःस्मरणीय हिन्दू सूर्य महाराणा प्रताप ने जंगल-जंगल भटक कर घास की रोटियाँ खाईं थीं। इसी धर्म की रक्षा के लिये छत्रपति शिवाजी ने मुगलों से टक्कर ली थी। श्रीगुरुतेगबहादुर साहब ने अपना सर कटाया था और श्रीगुरु गोविन्द सिंह के दो दुधमुँहे लाल श्री जोरावरसिंह, फतेहसिंह ने हँसते-हँसते अपने को जीवित दीवारों में चुनवाया था। इसी धर्म की रक्षा के लिये वन्दावीर वैरागी ने अपने माँस की बोटी-बोटी नोचवाई थी। इसी धर्म की रक्षा के लिये धर्मवीर हकीकत का बलिदान हुआ था। इसी धर्म की रक्षा के लिए लाखों धर्मवीरों ने अपने सर कटाये थे।

आज उसी परम पवित्र महान हिन्दू धर्म को दो कौड़ी का समझकर उसे छोड़कर दूसरे मत-मजहबों को ग्रहण कर लेना कोई बुद्धिमानी का कार्य नहीं है। यह तो अमूल्य हीरे को छोड़कर काँच की ओर और पारसमणि को छोड़कर पत्थर की ओर दौड़ना है।

रानी अहिल्याबाई होल्कर Date :- 08-May-2015

रानी अहिल्याबाई होल्कर एक ऐसा नाम है जिसे आज भी प्रत्येक भारत वासी बड़ी श्रद्धा से स्मरण करता है। वे एक महान शासक और मालवा की रानी थीं। इनका जन्म सन् 1725 में हुआ था और देहांत 13 अगस्त 1795 को। अहिल्याबाई किसी बड़े राज्य की रानी नहीं थीं लेकिन अपने राज्य काल में उन्होंने जो कुछ किया वह आश्चर्यचकित करने वाला है। वे एक बहादुर योद्धा और कुशल तीरंदाज थीं। उन्होंने कई युद्धों में अपनी सेना का नेतृत्व किया और हाथी पर सवार होकर वीरता के साथ लड़ी।

अपने जीवनकाल में पति, पुत्र, पुत्री और दामाद सभी को अकाल मृत्यु का ग्रास बनते देखा। अहिल्याबाई ने अपने राज्य की सीमाओं के बाहर भी भारत के प्रसिद्ध तीर्थों और स्थानों में मंदिर व घाट बनवाए, कुओं और बावडि़यों का निर्माण करवाया, मार्ग बनवाए, भूखों के लिए सदाब्रत (अन्नक्षेत्र) खोले, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाईं, मंदिरों में विद्वानों की नियुक्ति शास्त्रों के मनन-चिंतन और प्रवचन हेतु की। उन्होंने काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारिका, बद्रीनारायण, रामेश्वर, जगन्नाथ पुरी इत्यादि प्रसिद्ध तीर्थस्थानों पर मंदिर बनवाए और धर्मशालाएँ खुलवायीं। कहा जाता है कि रानी अहिल्याबाई के स्वप्न में एक बार भगवान शिव आए। वे भगवान शिव की भक्त थीं और इसलिए उन्होंने 1777 में विश्वप्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण कराया।

इंदौर वासी आज भी उन्हें अपनी माँ के रूप में ही याद करते हैं। माँ अहिल्याबाई आत्म-प्रतिष के झूठे मोह का त्याग करके सदा न्याय करने का प्रयत्न करती रहीं। अपने जीवनकाल में ही इन्हें जनता ‘देवी’ समझने और कहने लगी थी। उस काल में ना तो न्याय में शक्ति रही थी और न विश्वास। उन विकट परिस्थितियों में अहिल्याबाई ने जो कुछ किया, वह कल्पनातीत और चिरस्मरणीय है। इंदौर में प्रतिवर्ष भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी के दिन ‘अहिल्योत्सव’ बडी धूमधाम से मनाया जाता है।

भक्तिमती मीराजी Date :- 07-May-2015

मीराबाई की जन्मभूमि मेड़ता नगर (जोधपुर) में थी। बाल्यकाल से मीरा कृष्ण की भक्त हो गई। मीरा की चित्तौड़ के राणा साँगा के सुपुत्र भोजराज से सगाई हुई। मीराबाई का मन रंगीले श्यामसुन्दर में डूब चुका था। वह अपने गिरधर गोपाल को साथ ले ससुराल आ गई। वहाँ मीरा की कृष्ण भक्ति से सभी अप्रसन्न थे। अतः ससुराल वालों ने मीरा को जान से मारने की योजना बनाई। उसे रहने के लिए महल में अलग कोठरी दे दी। वहाँ मीरा दिन-रात गिरधर गोपाल से लाड़ लड़ाती रहती तथा सेवा-पूजा करते हुए उन्हीं के गुणों का गान करती। मीरा को संतों का सत्संग सदैव अच्छा लगता था।

मीराबाई की भक्ति से खिन्न होकर राणा जी ने दयाराम पण्डा के हाथ एक कटोरा विष भगवान का चरणामृत कहकर भेज दिया। मीरा ने प्रसन्नतापूर्वक उस विष को पी लिया। विषपान के बाद मीरा के अंगों में एक विशेष प्रकार की कांति दिखलायी पड़ने लगी। इसी प्रकार मीरा को छल से मारने के लिए राणा जी ने दो विषैले सर्पों को एक टोकरी में रखकर मीरा के पास पहुँचाया। परन्तु कृष्ण-कृपा से वे सर्प दिव्य पुष्पमाला में परिवर्तित हो गये।

एक बार राणा जी की योजना से एक कामी मनुष्य साधु का वेष धारणकर मीराबाई के पास आया और बोला- ‘तुम्हारे ठाकुर गिरधरगोपाल ने स्वयं मुझे आज्ञा दी है कि मीरा के साथ अंग-संग करो। इसलिए मैं तुम्हारे पास आया हूँ, अतः तुम मेरे साथ अंग-संग करो।’ यह सुनकर मीरा ने कहा- ‘आज्ञा स्वीकार है, परन्तु सर्वप्रथम आप भोजन कीजिए, फिर आपकी यथोचित सेवा होगी।’ उस ढोंगी साधु ने भोजन किया, तत्पश्चात् मीराबाई ने संतों से भरे हाॅल में शयया बिछाकर उस विषयी पुरुष को बुलाकर कहा- ‘मेरे ठाकुरजी ने जैसी आज्ञा आपको दी है, वैसा ही कीजिए।’ वह बड़े भारी संकोच में पड़ गया और उसका मुख सफेद हो गया।’ मीरा की भक्ति के प्रताप से उसकी विषय-वासना सर्वथा दूर हो गई। वह तत्काल मीरा के चरणों में गिर गया और रोता हुआ बोला- ‘अब आप मुझे भक्ति का दान दीजिए।’

मीराजी श्रीवृन्दावन धाम आईं और श्रीजीव गोस्वामी से मिलकर उनसे सत्संग कर बहुत संतुष्ट हुईं। जीव गोस्वामी के स्त्री-मुख न देखने के प्रण को मीरा ने छुड़ा दिया। यह कहकर कि श्रीवृन्दावन में तो एक ही पुरुष है और वो है श्रीकृष्ण, अर्थात् श्रीवृन्दावन में कृष्ण के अतिरिक्त सभी गोपियाँ हैं। वृन्दावन की सभी कुँजे, प्रिया-प्रियतम श्रीराधा-माधव के विहारसुख-समूह से निरन्तर भरी हुई हैं। मीरा जी ने उनका दर्शन किया। फिर उन्हें अपने हृदय में स्थापित करके अपने देश को लौट आईं। वहाँ रहते हुए मीरा ने वृन्दावन की अनुभूत-निकुँज लीला का अपने पदों द्वारा गान किया।

राणाजी की द्वेष-बुद्धि देखकर मीरा द्वारका में जाकर बस गईं। उधर बाद में राणाजी को मीरा की भक्ति के स्वरूप का ज्ञान हुआ तो उन्हें बड़ा भारी मानसिक पश्चाताप हुआ। उन्होंने बहुत-से ब्राह्मणों को द्वारका भेजा और उनसे कहा कि जैसे भी बने, आप लोग मीराबाई को वापस ले आईये। वे आकर मुझे प्राणदान देकर जीवित करें। ब्राह्मणों द्वारा द्वारका जाकर विनती करने पर मीरा ने वापस आने से इन्कार कर दिया। अब ब्राह्मण अन्न-जल त्यागकर मीराबाई के द्वार पर धरना देकर पड़ गए। ब्राह्मणों के हठ को देखकर मीरा ने कहा- ‘अच्छा तो मैं रणछोड़लाल जी से विदा हो आऊँ।’ ऐसा कहकर मीरा मंदिर में गई। भगवान के सन्मुख विनती करते हुए इस आशय का पद गाया कि ‘प्रभो, मुझ दीन-हीन को अपने चरणों में रखिए, अथवा त्याग कर दीजिए, जैसी आपकी इच्छा। पद-कीर्तन एवं नृत्य करते-करते मीरा श्री रणछोड़ जी में लीन हो गई। इसके बाद फिर किसी ने उनका दर्शन नहीं पाया।

महान चक्रवर्ती सम्राट अशोक Date :- 03-Mar-2015

संसार के सबसे महान चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने पूर्णरूप से नागरिक स्वतंत्रता, समता और न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था का निर्माण किया। उन्हीं के शासनकाल में भारत ‘विश्व-गुरू’ तथा ‘सोने की चिडि़या’ कहलाया। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री नोबल पुरस्कार विजेता डाॅ. अमर्त्य सेन के अनुसार, सम्राट अशोक के काल में दुनिया की अर्थव्यवस्था में भारत की भागीदारी 35% थी, अर्थात् अशोक के काल में भारत विश्व की महाशक्ति था। यह महाशक्ति भारत द्वारा किसी देश पर आक्रमण करके नहीं, किसी का शोषण करके नहीं, अपितु अपनी हस्तकला के हुनर के बल पर बना था।

अशोक एक महान कल्याणकारी शासक था। उसने विश्व में सर्वप्रथम पशु-पक्षियों के लिए चिकित्सालयों का निर्माण कराया, यह बात गिरनार अभिलेख में उल्लेखित है। अपने शिलालेख में अशोक कहते हैं कि ‘मैंने पशु-बलि पर पूर्णतया नियंत्रण स्थापित कर लिया है।’ इसका अर्थ यह हुआ कि इतने विशाल राज्य में पशु-पक्षियों की हत्या पर अंकुश लग गया। यह कितनी महानता की बात है कि अशोक ने न केवल मानव-मात्र के कल्याण के लिए सोचा, अपितु निरीह पशु-पक्षियों के सम्बन्ध में भी सोचा। इससे यही सिद्ध होता है कि चक्रवर्ती राजा अशोक प्रकृति-प्रेमी था और प्रकृति पर सबका अधिकार समझता था। आज हम केवल मानवाधिकार की बातें करके अपने को बड़ा मानते हैं, जबकि अशोक ने उस समय पशु-अधिकार के सम्बन्ध में कानून बनाया था।

अशोक महान से पहले या बाद में कोई ऐसा सम्राट नहीं हुआ, जिसने इतने बड़े अखण्ड भारत पर राज किया। अशोक का साम्राज्य नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान, ब्रह्मा और अफगानिस्तान तक फैला हुआ था, जिसे हम आज भी अखण्ड भारत कहते हैं। सम्राट अशोक का काल ही भारत का सबसे समृद्धिशाली व उन्नतिशील स्वर्णिम काल था। अशोक ने विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय खोला, भारत उस समय आध्यात्मिक ज्ञान का एकमात्र स्रोत था और विश्व-गुरू कहलाया। अशोक का साम्राज्य उस समय विश्व का सबसे शक्तिशाली, सबसे धनाढ्य, चरित्रवान राज्य था। दुनिया की प्रथम औद्योगिक क्रांति सम्राट अशोक के शासनकाल में ही हुई, उसी से भारत विश्व में ‘सोने की चिडि़या’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ज्ञातव्य है कि यह औद्योगिक क्रांति प्रकृति के अनुकूल थी, यानि प्रकृति को किसी प्रकार से क्षति नहीं पहुँचाई गई, जैसा कि आजकल हो रहा है।

अशोक अपनी प्रजा में अत्यधिक लोकप्रिय था। वह प्रजा को पुत्रवत समझकर उसका लालन-पालन करता था। जनता का सुख-दुःख जानने के लिए वह स्वयं रात्रि में वेश बदलकर भ्रमण किया करता था। प्रजा भी अशोक की सभी नीतियों का आदर के साथ पालन करती थी। अशोक ने अपनी प्रजा की भौतिक और नैतिक दोनों प्रकार की उन्नति की। अशोक ने धर्म प्रचार के लिए नैतिक उपदेशों को प्रजा तक पहुँचाने के लिए शिलालेखों को माध्यम बनाया और सभी महत्वपूर्ण स्थानों पर उन्हें स्थापित किया। इसी के अन्तर्गत अशोक ने अनेकों स्तूपों की स्थापना की। वाराणसी के निकट सारनाथ में उनके द्वारा निर्मित स्तूप के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं।

लोक-कल्याण के साधनों का सबसे प्रथम अशोक ने ही श्रीगणेश किया। उसके शासनकाल में नेशनल हाईवे जैसे बड़े रोड बने, जिनके दोनों ओर छायादार वृक्ष लगे थे। साथ ही, सड़क पर उचित दूरी पर पानी की प्याऊ व सराय इत्यादि बनवाए गईं, जिससे पथिकों को आराम मिल सके। अशोक ने राज्य के विभिन्न भागों, प्रमुख राजपथों पर धर्म-स्तम्भ स्थापित किए, इनमें सारनाथ का ‘सिंह शीर्ष स्तम्भ’ सबसे अधिक प्रसिद्ध है। इसी सारनाथ की सिंह मुद्रा को भारत सरकार ने अपना राष्ट्रीय-चिन्ह बनाया।

उपरोक्त बातें उस महान सम्राट अशोक की हैं, जिसके अशोक-चक्र को भारत के झंडे में स्थान मिला है। उसी सम्राट के राज-चिन्ह (चार शेर) को भारत का राष्ट्रीय प्रतीक घोषित किया गया है। हमारे देश में सेना का सबसे बड़ा युद्ध सम्मान ‘अशोक चक्र’ भी अशोक के नाम पर ही है। यह घोर आश्चर्य का विषय है कि भारत के ऐसे सर्वकालिक महान चक्रवर्ती राजा अशोक को आज बिल्कुल भुला दिया गया है। उनकी जन्मतिथि चैत्र शुक्ल अष्टमी को होती है। पूरे भारतवर्ष में कहीं भी अशोक जयंती नहीं मनाई जाती, ना ही ऐसे सम्राट की जयंती पर राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया गया है।

भारत की मोदी सरकार से इस दिव्य पत्र के माध्यम से प्रार्थना है कि इस पर आवश्यक कदम उठाएँ और सम्राट अशोक की जयंती को राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाए तथा बच्चों के पाठ्यक्रम में अशोक को सम्मिलित किया जाए।


चैतन्य महाप्रभु Date :- 02-Mar-2015

1486 ई. के मार्च (फाल्गुन) के महीने में पश्चिमी बंगाल के नदिया जिले में श्रीमायापुर में श्रीचैतन्य महाप्रभु इस मृत्युलोक में प्रकट हुए। अपने भक्तों के प्रार्थना और निवेदन करने पर पूर्ण ब्रह्म ने नररूप में अवतार लिया। भारत के लिये वह एक दिव्य दिवस था। वे इस मृत्युलोक में केवल 48 वर्ष रहे, जिसमें उन्होंने 24 वर्ष गृहस्थाश्रम में बिताये और शेष 24 वर्ष एक भिक्षुक संन्यासी के रूप में। वे धर्मगुरू थे और परमार्थ-जीवन के जीते-जागते उदाहरण थे।

चैतन्य महाप्रभु ने यह प्रकट कर दिया कि नाम के द्वारा मनुष्य अपनी आध्यात्मिक और दैवी प्रकृति को विकसित करके सारी निराशा और विषय-वासना से ऊपर उठ सकता है। जो कुछ इतने दिनों तक कल्पना के रूप में था, महाप्रभु के हाथ में एक विज्ञान बन गया। भगवन्नाम स्वयं उद्धार करने वाला है। उन्होंने ही यह बतलाया और दिखला दिया कि नाम और स्वयं भगवान में कोई अन्तर नहीं है।

महाप्रभु ने 24 वर्ष नवद्वीप में रहकर गृहस्थाश्रम में बिताये। संन्यास लेकर छः वर्षों तक आप तीर्थों में भ्रमण करते रहे और अन्त में अठारह वर्षों तक जगन्नाथ जी के धाम पुरी में ही रहे। बारह वर्षों तक दिव्योन्माद की दशा में रहे। श्रीचैतन्य जिस कार्य के लिए अवतरित हुए थे, वह कार्य भी सुचारू रीति से सम्पन्न हो गया।

अब उन्होंने लीला-संवरण करने का निश्चय कर लिया। सम्वत् 1590 ई. सन् 1533 का आषाढ़ माह था। महाप्रभु आज अन्य दिनों की अपेक्षा अत्यधिक गम्भीर थे। भक्तों ने इतनी अधिक गम्भीरता उनके जीवन में कभी नहीं देखी। उनके ललाट से एक अद्भुत तेज-सा निकल रहा था। सहसा वे अकेले ही श्रीजगन्नाथ जी के मंदिर की ओर दौड़ने लगे। मंदिर के दरवाजे के समीप गये। जल्दी से मंदिर में घुस गये। महान आश्चर्य! मंदिर के कपाट अपने-आप बंद हो गये। महाप्रभु अकेले ही मंदिर के भीतर थे। भाग्यवान पुजारी प्रभु की इस अंतिम लीला को प्रत्यक्ष देख रहे थे। महाप्रभु जगन्नाथ जी के सम्मुख हाथ जोड़े खड़े हैं और गद्गद् कण्ठ से प्रार्थना कर रहे हैं, हे दीनवत्सल प्रभो! हे जगत्पिता जगन्नाथ देव! सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग- इन चारों युगों में कलियुग का एकमात्र धर्म श्रीकृष्ण-संकीर्तन ही है। हे नाथ! आप जीवों पर ऐसी दया कीजिये कि वे निरन्तर आपके सुमधुर नामों का सदा संकीर्तन करते रहें। इन अनाश्रित जीवों पर कृपा करके अपने चरणकमलों का आश्रय प्रदान कीजिये। बस, इतना कहते-कहते प्रभु ने श्रीजगन्नाथ जी के श्रीविग्रह का आलिंगन किया और उसी क्षण उसमें लीन हो गये। भक्त और भगवान एक हो गये। इसी प्रकार भक्तिमती मीरा भी अपने इष्ट गिरधर गोपाल के श्रीविग्रह में सशरीर समा गईं थीं। पुजारी जल्दी में प्रभु को पकड़ने दौड़ा, किंतु प्रभु अब वहाँ कहाँ? वे तो अपने असली स्वरूप में विलीन हो गये। इस प्रकार अड़तालीस वर्षों तक इस धराधाम पर प्रेमरूपी अमृत की वर्षा करने के उपरान्त महाप्रभु अपने सत्य स्वरूप में जाकर अवस्थित हो गये।

संत तुकाराम Date :- 01-Mar-2015

कहते हैं संत की ना कोई जात होती है, ना कोई धर्म। संत तो बस भक्ति का साधक होता है। दया, शील, विनम्रता जैसे गुणों से ही उसकी पहचान होती है। संत तो उस बहती नदी के जल के समान है जो सभी को अपनी शीतलता से ठंडा कर देता है। भक्ति की राह पर संत कभी पीछे नहीं हटते और यही वजह है कि दुनिया उन्हें हमेशा याद रखती है। संतों के इन्हीं सभी गुणों से भरपूर और भक्ति के परिचायक संत तुकाराम भी थे। अपनी कविताओं के द्वारा तुकाराम ने अपने विट्ठल की आराधना की और अपनी जिंदगी उनके नाम की।

दुनियादारी निभाते एक आम आदमी संत कैसे बना, साथ ही किसी भी जाति या धर्म में जन्म लेकर उत्कट भक्ति और सदाचार के बल पर आत्मविकास कैसे साधा जा सकता है, यह विश्वास आम इंसान के मन में निर्माण करने वाले थे संत तुकाराम यानी तुकोबा। अपने विचारों, अपने आचरण और अपनी वाणी से अर्थपूर्ण तालमेल साधते अपनी जिंदगी को परिपूर्ण करने वाले तुकाराम जनसामान्य को हमेशा कैसे जीना चाहिए, यही प्रेरणा देते हैं।

ऐसे महान संत कवि तुकाराम का 17वीं सदी में पुणे के देहू कस्बे में जन्म हुआ था। उनके पिता छोटे-से कारोबारी थे। उन्होंने महाराष्ट्र में भक्ति आंदोलन की नींव डाली। तुकाराम जी की अनुभव दृष्टि बेहद गहरी व ईशपरक रही। तुकाराम को संत नामदेव का रूप माना गया है। वे समर्थ रामदास व छत्रपति शिवाजी के समकालीन थे। इनका व्यक्तित्व बड़ा मौलिक व प्रेरणास्पद है। निम्न वर्ग में जन्म लेने के बावजूद वे कई शास्त्रकारों व समकालीन संतों से बहुत आगे थे। वे धर्म व अध्यात्म के साकार विग्रह थे।

श्री माधवराव सदाशिवराज गोलवलकर Date :- 11-Feb-2015

पूजनीय गुरुजी का जन्म 19 फरवरी 1906 को नागपुर में हुआ। उनके पिता का नाम श्री सदाशिव बालकृष्ण गोलवलकर तथा माता का नाम लक्ष्मीबाई था। गुरुजी बाल्यकाल से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने 1922 ई. में चन्द्रपुर से मैट्रिक और 1924 में नागपुर के ईसाई मिशन के द्वारा संचालित हिस्लाप काॅलेज से इंटरसाईंस की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 1926 में बी.एस.सी. और 1929 में प्राणिशास्त्र में प्रथम श्रेणी में एम.एस.सी. की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ही वे प्राणिशास्त्र के प्राध्यापक के पद पर नियुक्त हो गए। काशी में गुरुजी का निवास सात वर्ष तक रहा। विद्यार्थी उन्हें स्नेह और आदरवश ‘गुरुजी’ कहकर पुकारते थे। कालांतर में यही उपनाम लोक प्रसिद्ध हुआ।

1929 में भैयाजी दाणी ने काशी में संघ की शाखा प्रारंभ की। गुरूजी से उनका सम्पर्क हुआ। भैयाजी दाणी ने उन्हें डाॅ. हेडगेवार जी का संघ दर्शन समझाया। उनकी प्रेरणा से गुरूजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शाखा में जाने लगे। 1933 में डाॅ. हेडगेवार ने काशी जाकर महामना मदनमोहन मालवीय से भेंट की। संघ के अनुशासन से प्रभावित होकर मालवीय जी ने विश्वविद्यालय परिसर में संघ कार्यालय के लिए एक भवन बनाकर दिया। यहीं पर श्री गुरुजी, डाॅ. हेडगेवार के विशेष संपर्क में आए और अपना संपूर्ण जीवन संघ कार्य हेतु समर्पित करने का निश्चय किया। प्राध्यापक पद की तीन वर्षों की कालमर्यादा समाप्त हो जाने पर श्री गुरुजी 1933 में काशी से नागपुर वापस आ गए। 1936 में वे नागपुर छोड़कर, मुर्शिदाबाद जिले के सारागाछी आश्रम में स्वामी अखण्डानन्द जी के पास आ गए। मकर संक्रान्ति 14 जनवरी 1937 को गुरुजी ने स्वामी अखण्डानन्द जी से दीक्षा ली।

9 जून 1940 को अपनी मृत्यु के कुछ दिन पूर्व डाॅ. हेडगेवार जी ने नागपुर के एक संघ शिक्षा वर्ग में विशेष विदाई समारोह के अवसर पर बोलते हुए कहा- ‘अब आगे चलकर संघ का सारा दायित्व आपको (गुरूजी) ही संभालना है’ और फिर 21 जून 1940 को हेडगेवार जी ने अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया। 3 जुलाई 1940 को श्रीगुरुजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक पद पर आसीन हुए।

1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, पर विभाजन के कारण पाकिस्तान में रहने वाले लाखों हिन्दुओं का जीवन संकट में पड़ गया। परम पूजनीय गुरुजी के नेतृत्व में संघ के स्वयंसेवकों ने अमिट बलिदान देकर पचास लाख हिन्दुओं को सुरक्षित भारत लाने में सफलता प्राप्त की। 1947 में मुस्लिम लीग के षड्यंत्र को असफल कर केन्द्रीय नेताओं के जीवन की सुरक्षा की।

राष्ट्रनेता के नाते श्री गुरू जी की राष्ट्र की सुरक्षा और हित संवर्धन की दृष्टि से अत्यन्त जागरूक भूमिका रही। देश का विभाजन होते ही 1947 के अक्टूबर मास के तीसरे सप्ताह में पाकिस्तान ने कश्मीर में अपनी सेना भेजी जो भारतीय सेनाओं में मौजूद उच्च ब्रिटिश अधिकारियों की खुली सहायता से कश्मीर को हड़पने के लिए आगे बढ़ने लगी। तटस्थ लोगों पर भीषण अत्याचार होने लगे। पाक सेना कश्मीर के भू-भाग पर कब्जा करने लगी। दुर्भाग्य से ऐसे आसन्न संकट के समय कश्मीर को भारत में विलीन करने के बारे में कई प्रकार की शंकाओं के शिकार कश्मीर के महाराजा की मनःस्थिति डोलायमान थी। ऐसे मौके पर सरदार पटेल को लगा कि उनसे मिलकर उनके मन को भारत के अनुकूल बनाने के लिए एकमात्र श्रीगुरूजी ही समर्थ व्यक्ति हैं, इसलिए श्रीगुरूजी को कश्मीर भेजा गया।

चीन ने 1950 के प्रारम्भ से ही भारत के उत्तरी और ईशान्य सीमाओं में गुप्त रूप से सैनिकी रास्ता बनाना और वहाँ की भूमि पर कब्जा करना शुरू कर दिया था। 1951 में समाचार पत्रों में लेख के द्वारा अपने विचार प्रकट करते हुए श्रीगुरूजी ने कहा था, ‘चीन की प्रकृति विस्तारवादी है तथा निकट भविष्य में ही उसके भारत पर आक्रमण करने की संभावना है।’ इस चेतावनी के पीछे संदर्भ था चीन की तिब्बत में चल रही सैनिक कार्यवाही। श्रीगुरूजी ने अनेक बार चेतावनी के रूप में कहा था कि ‘भारत ने चीन को तिब्बत की भूमि भेंट कर भयानक भूल की है। जो गलती अंग्रेजों ने नहीं की, वह अदूरदर्शिता से भारतीय शासन ने की है।’ अन्त में 20 अक्टूबर 1962 के उत्तरी पूर्वी सीमा पर चीन ने भारत पर आक्रमण किया।

प्रबल हिन्दू संगठन द्वारा राष्ट्र की सेवा करते हुए 5 जून 1973 को भारत माता के इस महान सपूत ने अपनी इहलीला समाप्त की।

करुणा व दया के सागर संत दादू दयाल Date :- 10-Feb-2015

भारत सदा से संतों की भूमि रही है। जब-जब धर्म पर संकट आया, तब-तब संतों ने अवतार लेकर भक्ति के माध्यम से समाज को सही दिशा दी। ऐसे ही एक महान संत थे दादू दयाल।

दादू का जन्म गुजरात प्रांत के कर्णावती नगर (अमदाबाद) में 28 फरवरी, 1601 ई. (फाल्गुन पूर्णिमा) को हुआ था, पर किसी अज्ञात कारण से इनकी माता ने नवजात शिशु को लकड़ी की एक पेटी में बंद कर साबरमती नदी में प्रवाहित कर दिया। कहते हैं कि लोदीराम नागर नामक एक ब्राह्मण ने उस पेटी को देखा, तो उसे खोलकर बालक को अपने घर ले आया। बालक में बालसुलभ चंचलता के स्थान पर प्राणिमात्र के लिए करुणा और दया भरी थी। इसी से सब लोग इन्हें दादू दयाल कहने लगे।

दादू धर्म में व्याप्त पाखण्ड के बहुत विरोधी थे। उनका कहना था कि भगवान की प्राप्ति के लिए कपड़े रंगने या घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। आगे चलकर उनके विचारों को लोगों ने ‘दादू पन्थ’ का नाम दे दिया। इनके मुस्लिम अनुयायियों को ‘नागी’ कहा जाता था, जबकि हिन्दुओं में वैष्णव, विरक्त, नागा और साधु नामक चार श्रेणियाँ थीं।

दादू दयाल जी कबीर, नानक और तुलसी जैसे संतों में समकालीन थे। जयपुर से 61 किलोमीटर दूर स्थित ‘नरेगा’ उनका प्रमुख तीर्थ है। निर्गुण भक्ति के माध्यम से समाज को दिशा देने वाले श्रेष्ठ समाज सुधारक और परम संत दादू दयाल इस जगत में साठ वर्ष बिताकर 1660 ई. में परमधाम चले गये।

अद्वैत वेदांत के प्रणेता याज्ञवल्क्य Date :- 10-Feb-2015

भारतीय दर्शन की जितनी शाखाएँ हैं, सबका निचोड़ उपनिषदों में मिलता है। उपनिषदों में सबसे प्राचीन तथा आकार में सबसे बड़ा उपनिषद बृहदारण्यक है। इस उपनिषद के दार्शनिक याज्ञवल्क्य हैं। उन्होंने राजा जनक के दरबार में तत्कालीन समस्त महान दार्शनिकों से शास्त्रार्थ करके अपने दर्शन को सर्वोच्च सिद्ध किया था। अद्वैत वेदांत का शास्त्रीय रूप उन्हीं से आरंभ होता है। विष्णु पुराण के अनुसार, याज्ञवल्क्य ने शुक्ल यजुर्वेद को सूर्य से प्राप्त किया था और शुक्ल यजुर्वेद की समस्त शाखाएँ याज्ञवल्क्य द्वारा ही प्रवर्तित की गई हैं।

याज्ञवल्क्य अध्यात्मवेत्ता एवं दार्शनिक थे। उन्हें पुराणों में ब्रह्मा का अवतार कहा गया है। पुराणों में कहा गया है कि वे वेदाचार्य महर्षि वैशंपायन के शिष्य थे, जिनसे उन्हें वेद आदि का ज्ञान प्राप्त हुआ था। एक पौराणिक कथा के अनुसार, उनका अपने गुरु महर्षि वैशंपायन से कुछ विवाद हो गया। गुरुजी ने नाराज होकर कहा- मैंने तुम्हें यजुर्वेद के जिन मंत्रों का उपदेश दिया है, उनका वमन कर दो। इस पर याज्ञवल्क्य ने सारी शिक्षा उगल दी, जिन्हें वैशंपायन के दूसरे शिष्यों ने तित्तिर (तीतर) बनकर ग्रहण कर लिया। यजुर्वेद की उस शाखा को तैत्तिरीय शाखा के नाम से जाना गया। वेदों के ज्ञान से शून्य हो जाने के बाद उन्होंने सूर्य से वेदों का ज्ञान प्राप्त किया। सूर्य से प्राप्त शुक्ल यजुर्वेद संहिता के मुख्य आचार्य याज्ञवल्क्य हैं। इस संहिता में चालीस अध्याय हैं। आज रुद्राष्टाध्यायी नाम से जिन मंत्रों से रुद्र (भगवान शिव) की आराधना होती है, वे इसी संहिता में हैं। इस संहिता में शतपथ ब्राह्मण और बृहदारण्यकोपनिषद भी महर्षि याज्ञवल्क्य द्वारा प्राप्त है।

याज्ञवल्क्य का पूरा आध्यात्मिक दर्शन शास्त्रार्थों द्वारा ही उपजा है। गार्गी, मैत्रेयी और कात्यायनी आदि विदुषी नारियों से उनके ज्ञान-विज्ञान एवं ब्रह्म संबंधी शास्त्रार्थ हुए थे।

महर्षि दयानन्द सरस्वती की दूरदर्शिता Date :- 09-Feb-2015

जिस समय 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में महर्षि दयानन्द ने सामाजिक क्षेत्र में पदार्पण किया, उस समय हमारे देश में अधिकांश शिक्षण संस्थाएँ ईसाई मिशनरियों द्वारा चलाई जा रहीं थीं। इनका मुख्य उद्देश्य शिक्षा के माध्यम से भारतीयों को ईसाई बनाना था। महर्षि दयानन्द ने इस स्थिति को भली-भाँति समझा था और इसके निराकरण के लिए सत्यार्थ-प्रकाश में यह उल्लिखित किया कि बच्चों को प्रथम शिक्षा माता दे। जब बच्चा पाँच वर्ष का हो जाये, तब पिता द्वारा प्रारम्भिक शिक्षा दी जाये। देवनागरी अक्षरों का अभ्यास कराया जाये। अन्य राज्यीय भाषाओं के अक्षरों का भी अध्यापन कराया जाये। इसके पश्चात् बच्चों को अच्छी शिक्षा, विद्या, धर्म का ज्ञान करायें तथा परमेश्वर, माता-पिता, आचार्य, विद्वान, राजा-प्रजा, परिवार के लोग व सेवक आदि से कैसा व्यवहार करना चाहिये, की शिक्षा दी जाये।

महर्षि दयानन्द ने भारतीय संस्कृति के अनुरूप संस्कृत को महत्व दिया और विभिन्न पाठशालाएँ खुलवाईं। महात्मा मुंशीराम, जो बाद में स्वामी श्रद्धानंद कहलाए, ने महर्षि के पद-चिन्हों पर चलते हुए गुरूकुल कांगड़ी, हरिद्वार और अन्य कई गुरूकुलों की स्थापना की।

इस प्रकार महर्षि दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द आदि आर्य-समाज के विभिन्न सेवकों ने भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए अपना बहुमूल्य योगदान दिया।

नरसी मेहता Date :- 29-Oct-2014

भक्तवर नरसी मेहता के माता-पिता का बचपन में ही निधन हो गया था। किसी बात पर नाराज होकर बाल्यावस्था में ही उन्होंने घर-बार छोड़ दिया। घर छोड़कर नरसी सात दिन तक भूखे-प्यासे शिव मंदिर में पड़े रहे। तब भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर उनसे वर माँगने को कहा। नरसी ने कहा कि मुझे वर माँगना नहीं आता, अतः जो आपकी सबसे प्रिय वस्तु हो, आप उसे ही मुझे दे दीजिए। ऐसा विचार कर शिवजी ने नरसी को अपने-जैसा श्रीकृष्ण-प्रेम प्रदान किया और नरसी को सुन्दर सखी स्वरूप प्रदान कर स्वयं भी त्रिलोचना सखी का रूप धारणकर श्रीवृन्दावन धाम में आए। वहाँ दिव्य मणियों से जड़े हुए रासमण्डल पर अगणित ब्रजगोपियों के मध्य श्रीराधाश्यामसुन्दर का दिव्य-दर्शन शिवजी ने नरसी को कराया।

कृष्णजी की दृष्टि नरसी रूपी सखी पर पड़ी तो जान लिया कि यह कोई नई सखी आज रास में आई है। शिवजी ने मीठी मुस्कान और संकेत से जताया कि ये मेरे साथ आई है। तब श्रीकृष्णजी ने नरसी से कहा कि तुम अब यहाँ से चले जाओ और मेरे इस बिहारी रूप का सर्वदा ध्यान करते रहना। जब जहाँ तुम मेरा स्मरण करोगे, तब वहाँ ही प्रकट होकर मैं तुम्हें दर्शन दूँगा। साथ ही, भगवान ने कीर्तन करने के लिए करताल प्रदान किए। भगवान की आज्ञा मानकर आँख बंद करने पर नरसी अपने ग्राम को वापस लौट आये और अलग निवास बनाकर भजन करने लगे।

कुछ समय पश्चात् नरसी का विवाह माणिकगौरी से सम्पन्न हुआ। इनके दो पुत्रियाँ- कुँवरबाई, रतनबाई और एक पुत्र शामलदास हुए। नरसीजी के भजन-कीर्तन से अन्य विप्रजन बहुत दुःखी रहते थे। एक बार तीर्थयात्रा करते हुए कुछ साधुजन जूनागढ़ पहुँचे। उन्होंने पूछा कि यहाँ कोई ऐसा महाजन है जो हमारा धन लेकर द्वारकाधीश के लिए हुण्डी लिख दे क्योंकि रास्ते में चोर-डाकुओं का भयंकर खतरा रहता है। नरसीजी से द्वेष करने वाले ब्राह्मणों ने उन साधुओं को नरसी मेहता का पता बतला दिया। नरसी ने श्रीसाँवलशाह के नाम हुण्डी लिख दी और साधुओं से मिले धन को सत्कार्यों में लगा दिया। हुण्डी लेकर साधुओं की मण्डली द्वारका पहुँची और वहाँ श्रीसाँवलशाह का पता पूछने लगी। परन्तु किसी ने भी उनका पता नहीं बतलाया, तब साधुजन निराश होकर जाने लगे, तभी ‘श्रीनरसी की हुण्डी किसके पास है’, ऐसा शब्द सुनकर वे साधु वहीं रूक गए और हुण्डी देकर अपना धन प्राप्त कर लिया। साथ ही, नरसी मेहता के लिए उन साधुओं को चिट्ठी लिखकर दी कि मेरे पास धन की कमी नहीं है, आप बार-बार हुण्डी लिखकर भेजा करें। संतजन द्वारकापुरी का दर्शन करके लौटे और श्रीनरसी को साँवलशाह की चिट्ठी दी। उसे पाकर नरसीजी प्रेमानन्द में डूब गये।

नरसीजी की बड़ी लड़की कुँवरबाई को विवाह उपरान्त लड़का हुआ। रीति-रिवाज के अनुसार इन्हें छूछक देना चाहिए, पर इनके पास कुछ न था। लड़की ने अपने पिता को कहलवा भेजा कि ‘मेरी सास ताने मारती है, इससे मेरी छाती जलती रहती है, अतः आप छूछक देने आ जाइये।’ लड़की का संदेश पाकर नरसी एक टूटी-सी बैलगाड़ी जोतकर, जहाँ पुत्री ब्याही थी, उस नगर के किनारे पहुँच गए और उसकी सास से पूछवा लिया कि छूछक में क्या-क्या चाहिए। सास गुस्से में बोली, मैं समझ गई कि तेरे पिता यहाँ आकर हँसी कर रहे हैं। अन्त में, खिसियाई सास ने गाँव के सभी स्त्री-पुरुषों-बालकों के सभी तरह के गहने-कपड़े इत्यादि माँग लिये।

नरसी जी को अपमानित करने के लिए उन्हें एक टूटे-फूटे घर में ठहरा दिया। नरसी जी ने झाडू-बुहारू देकर उसे साफ कर उसके द्वार पर एक परदा लगा दिया। सामान की चिट्ठी वहीं रखकर श्रीहरिनाम-संकीर्तन करने लगे। भगवत्कृपा से अगणित पोशाकें-वस्त्राभूषण आकर उस घर में भर गए। नरसीजी ने गाँव के सभी लोगों को सुन्दर मूल्यवान वस्त्र-आभूषण पहनाये, उससे पूरा गाँव शोभायमान हो रहा था। अपने पिताजी के अद्भुत प्रभाव को देखकर उनकी पुत्री अपने अंग में फूली नहीं समाती थी। अपने पति, सास-ससुर आदि को भुलाकर वह आपने पिता के साथ अपने घर को चली आई।

पतिपरायणा शाण्डिली Date :- 01-Aug-2014

सती शाण्डिली का वास्तविक नाम शैव्या था, किंतु शाण्डिल्य गोत्र में उत्पन्न होने के कारण लोग उन्हें ‘शाण्डिली’ कहते थे। उनका विवाह प्रतिष्ठानपुर के कौशिक नाम के ब्राह्मण से हुआ था। विधाता का विधान भी कैसा है- शाण्डिली परम सुन्दर, शीलवान एवं धर्मनिष्ठ थीं और कौशिक अपने दुष्कर्मों के कारण कोढ़ी हो गया था। इतने पर भी उसकी इन्द्रियलोलुपता मिटी नहीं थी।

‘पति की सेवा ही नारी का परम धर्म है’- यह निश्चय रखने वाली शाण्डिली कोढ़ी पति के घाव धोती, उसके पैरों में तेल लगाती, उसे नहलाती, वस्त्र पहनाती और अपने हाथ से भोजन कराती। लेकिन ब्राह्मण कौशिक क्रोधी था। वह अपनी पत्नी को डाँटता-फटकारता रहता था।

एक दिन उस कोढ़ी ब्राह्मण ने घर बैठे-बैठे मार्ग से जाती वेश्या को देख लिया। उसका चित्त बेचैन हो गया। स्वयं तो कहीं जा सकता नहीं था, निर्लज्जतापूर्वक पत्नी से ही उसने अपने को वेश्या के पास ले चलने को कहा। पतिव्रता पत्नी ने चुपचाप पति की बात स्वीकार कर ली। कमर कस ली और पर्याप्त शुल्क ले लिया, क्योंकि अधिक धन पाये बिना तो वेश्या कोढ़ी को स्वीकार करने वाली नहीं थी। इसके बाद पति को कंधे पर बैठाकर घर से चल पड़ी।

संयोग की बात, उसी दिन माण्डव्य ऋषि को चोरी के संदेह में राजा ने शूली पर चढ़वा दिया था। शूली मार्ग में पड़ती थी। अंधकारपूर्ण रात्रि, आकाश में मेघ छाये थे, केवल बिजली चमकने से मार्ग दीखता था। पति को कंधे पर बैठाये शाण्डिली जा रही थी। शूली शरीर में चुभी होने से माण्डव्य ऋषि को वैसे ही बहुत पीड़ा थी, अंधकार में दीख न पड़ने के कारण कंधे पर बैठे कौशिक के पैर शूली से टकरा गये। शूली हिली तो ऋषि को और पीड़ा हुई। ऋषि ने क्रोध में शाप दे दिया- ‘जिसने इस कष्ट की दशा में पड़े मुझे शूली हिलाकर और कष्ट दिया है, वह पापात्मा, नराधम सूर्योदय होते ही मर जायेगा।’ यह सुनते ही शाण्डिली के पद रूक गये। उसने भी दृढ़ स्वर में कहा, ‘अब सूर्योदय ही नहीं होगा।’

मृत्यु सम्मुख देखकर कौशिक ब्राह्मण की भोगेच्छा मर गई। उसके कहने से शाण्डिली उसे लेकर घर लौट आयी। किंतु समय पर सूर्योदय नहीं हुआ तो सारी सृष्टि में व्याकुलता फैल गई। देवता व्याकुल हो गये। देवताओं ने ब्रह्माजी की शरण ली। ब्रह्माजी ने उन्हें महर्षि अत्रि की पत्नी अनसूया जी के पास भेजा। देवताओं की प्रार्थना से अनसूया जी उस सती के घर पधारीं। शाण्डिली ने अनसूया जी को प्रणाम करके उनकी पूजा की और उनसे पूछा- ‘देवि! आपने पधारकर मुझे कृतार्थ किया। पतिव्रताओं में आप शिरोमणि हैं। आपके आने से मेरी श्रद्धा पतिसेवा में और बढ़ गयी। मैं और मेरे पतिदेव आपकी क्या सेवा करें?’

अनसूया जी ने कहा- ‘तुम्हारे वचन से सूर्योदय नहीं हो रहा है। इससे धर्म की मर्यादा नष्ट हो रही है। तुम सूर्योदय होने दो, क्योंकि पतिव्रता नारी के वचन को टालने की शक्ति त्रिलोकी में किसी में नहीं है।’

शाण्डिली ने कातर प्रार्थना की- ‘देवि! पति ही मेरे परम देवता हैं। पति ही मेरे परम धर्म हैं। पतिसेवा छोड़कर मैं दूसरा धर्म-कर्म नहीं जानती।’ अनसूया जी ने आश्वासन दिया- ‘डरो मत! सूर्योदय होने पर ऋषि के शाप से तुम्हारे पति प्राणहीन तो हो जायेंगे, किंतु मैं उन्हें पुनः जीवित कर दूँगी।’ ब्राह्मणी ने कहा, ‘अच्छा, ऐसा ही हो।’ तपस्विनी अनसूया जी ने अघ्र्य उठाया और सूर्य का आवाहन किया तो तत्काल क्षितिज पर सूर्यबिम्ब उग आया। सूर्य उगते ही ब्राह्मण कौशिक प्राणहीन होकर गिर पड़ा।

अनसूया जी ने प्रतिज्ञा की कि ‘यदि मैंने पति को छोड़कर संसार में और कोई पुरुष जाना ही न हो तो यह ब्राह्मण जीवित हो जाये। रोगहीन युवा होकर पत्नी के साथ दीर्घकाल तक सुख भोगे।’ ब्राह्मण तुरंत जीवित होकर बैठ गया। उसके शरीर में रोग के चिन्ह नहीं थे। वह सुन्दर, स्वस्थ युवा हो गया था। इस प्रकार पातिव्रत्य-रूप विशेष धर्म के बल पर शाण्डिली ने सब कुछ पा लिया। धन्य है शाण्डिली का सतीत्व।

करमैती की कृष्ण भक्ति Date :- 01-Jul-2014

पंडित परशुराम जी जयपुर के अन्तर्गत खण्डेला के सेखावत सरदार के राजपुरोहित थे। इनकी पुत्री करमैती का मन बचपन से ही भगवान में लग गया था। वह बालिका निरन्तर श्रीकृष्ण का ध्यान तथा नाम-जप किया करती थी। कभी वह, हा नाथ! हा नाथ! कहकर क्रन्दन करती, कभी कीर्तन करते हुए नाचने लगती और कभी हँसते-हँसते लोटपोट हो जाती। नन्ही-सी बच्ची के भगवत्प्रेम को देखकर घर के लोग प्रसन्न हुआ करते थे।

करमैती की इच्छा विवाह करने की नहीं थी, परन्तु लज्जावश वह कुछ कह नहीं सकी। पिता ने इसका विवाह कर दिया, लेकिन जब ससुराल वाले उसे लेने गये, तब वह व्याकुल हो उठी। जो तन-मन श्यामसुन्दर का हो चुका, उसे दूसरे के अधिकार में कैसे दिया जा सकता है। उसने अपने प्रभु से प्रार्थना प्रारम्भ की और जो कातर होकर उन श्रीवृन्दावनचन्द्र को पुकारता है, उसे अवश्य मार्ग मिल जाता है। करमैती को भी एक उपाय सूझ गया। आधी रात को जबकि सब लोग सो रहे थे, वह अकेली बालिका चुपचाप घर से वृन्दावन के लिए चल पड़ी।

सुबह घर में करमैती के न मिलने पर हलचल मच गई। परशुराम पंडित जानते थे कि उनकी पुत्री कितनी पवित्र है, किंतु लोक-लाज के भय से अपने यजमान राजा के पास गये। राजा ने अपने पुरोहित की सहायता के लिए चारों ओर घुड़सवार भेजे कि वे करमैती को ढूँढ़ लायें। करमैती दौड़ी चली जा रही थी। रात्रिभर में वह कितनी दूर निकल आई, सो उसे पता ही नहीं। सवेरा होने पर भी वह भागी ही जा रही थी कि उसने घोड़ों की टाप का शब्द सुना। उसे डर लगा कि घुड़सवार उसे ही पकड़ने आ रहे हैं। आसपास न कोई वृक्ष था और न कोई दूसरा छिपने का स्थान, किंतु एक उँट मरा पड़ा था और रात्रि में सियारों ने उसके पेट का भाग खा लिया था। करमैती की दृष्टि उँट के पेट में बनी कन्दरा पर गयी। उस समय वह सांसारिक विषयों की भयंकर दुर्गंध से भाग रही थी। मरे उँट के शरीर से निकलने वाली गन्ध उसे विषयों की दुर्गंध के सामने तुच्छ जान पड़ी। भागकर वह उँट के पेट में छिप गई। घुड़सवार पास आये तो दुर्गंध के मारे उन्होंने उस उँट की ओर देखा तक नहीं। वहाँ से शीघ्रतापूर्वक वे आगे बढ़ गये और अन्त में हताश होकर लौट गये। माता-पिता आदि भी पुत्री के सम्बन्ध में निराश हो गये।

जिसकी कृपा से विष अमृत हो जाता है, अग्नि शीतल हो जाती है, उसी की कृपावर्षा करमैती पर हो रही थी। उँट के शरीर में वह भूखी-प्यासी तीन दिन छिपी रही। उस सड़े उँट के शरीर की गन्ध उसके लिये सुगन्ध में बदल गई थी। चैथे दिन वह वहाँ से निकली। मार्ग उसका जाना हुआ नहीं था, किंतु जो सबका एकमात्र मार्गदर्शक है, उसकी ओर जाने वाले को मार्ग नहीं ढूँढ़ना पड़ता। मार्ग ही उसे ढूँढ़ लेता है। करमैती को साथ मिल गया और वह वृन्दावन पहुँच गई। वहाँ पहुँचकर मानो वह आनन्द के समुद्र में मग्न हो गई।

जब परशुराम पंडित को अपनी पुत्री का कहीं पता न लगा, तब वे वृन्दावन आये, लेकिन भला वृन्दावन में करमैती को जानता-पहचानता कौन था कि पता लगता। एक दिन वृक्ष पर चढ़कर परशुराम पंडित इधर-उधर देख रहे थे। ब्रह्मकुण्ड पर उन्हें एक वैरागिनी दिखाई पड़ी। वहाँ जाने पर उन्होंने देखा कि साधुवेश में करमैती ध्यानमग्न बैठी है। पुत्री की दीन-हीन बाहरी दशा देखकर पिता को शोक तो हुआ, परंतु उसके भगवत्प्रेम को देखकर वे अपने को धन्य मानने लगे। कई घंटे बैठे रहने पर भी जब करमैती का ध्यान भंग नहीं हुआ, तब पिता ने उसे हिला-डुलाकर जगाया। वे उससे घर चलकर भजन करने का आग्रह करने लगे। करमैती ने कहा- ‘पिताजी! यहाँ आकर भी कोई कभी लौटा है। मैं तो व्रजराजकुमार के प्रेम में डूबकर मर चुकी हूँ। अब मुर्दा यहाँ से उठे कैसे?’

अन्ततः परशुराम जी उसके भक्तिभाव को देखकर वापस घर लौट गये। राजा ने जब यह समाचार सुना तब वह भी करमैती के दर्शन करने वृन्दावन आये। राजा के बहुत आग्रह करने पर करमैतीबाई ने एक छोटी कुटिया बनवाना स्वीकार कर लिया। राजा ने करमैतीबाई के लिये ब्रह्मकुण्ड के पास एक मठिया बना दी। करमैतीबाई की भक्ति ने राजा को भी भक्त बना दिया।

श्री श्री चैतन्य महाप्रभु के अभिन्न कलेवर - श्री निवासाचार्य Date :- 01-May-2014

श्री श्री चैतन्य महाप्रभु के अभिन्न कलेवर श्री निवासाचार्य जी को वैष्णव धर्म का प्रचार करने के लिए महाप्रभु ने स्वयं जगत में आने के लिये आमंत्रित किया था।

श्री निवासाचार्य जी के पिता श्री चैतन्य दास गौरांग महाप्रभु के परम भक्त थे। एक दिन चैतन्य दास की पत्नी ने इनसे कहा कि उन्हें स्वप्न में गौरांग महाप्रभु ने संतान उत्पन्न करने का आदेश दिया है। चैतन्य दास ने उनके इस स्वप्न पर विश्वास न करते हुए कहा कि इसकी पुष्टि हम स्वयं महाप्रभु से जगन्नाथ पुरी जाकर करेंगे। (संन्यास के पश्चात् महाप्रभु नवद्वीप से पुरी आ गये थे।)

अगले दिन से ही दोनों नवद्वीप से पुरी की यात्रा के लिये रवाना हो गये। जब ये पुरी पहुँचे तो उस समय चैतन्य महाप्रभु अपने अनेक अनुयायी भक्तों एवं संन्यासियों से घिरे हुए जगन्नाथ मंदिर के सामने सड़क पर संकीर्तन करते हुए जा रहे थे। इन्हें देखकर महाप्रभु ने भीड़ को चीरते हुए इनका स्वागत किया और बाद में उन्हें ‘गम्भीरा’ अपने दर्शन के लिये आने को कहा। चैतन्य दास एवं उनकी पत्नी जब ‘गम्भीरा’ आये, तब गौरांग महाप्रभु ने स्वप्न की पुष्टि करते हुए कहा कि उनकी इच्छा है कि वे संतान उत्पन्न करें एवं उसका नाम ‘श्री निवास’ रखें। चैतन्य महाप्रभु के ये वाक्य सुनकर पति एवं पत्नी के आनंद का ठिकाना नहीं रहा। असीम आनंद एवं दिव्य उनमद से ओतप्रोत होकर दोनों कुछ दिन बाद पुरी से नवद्वीप लौट आये एवं श्री निवासाचार्य जी को जन्म दिया।

जब श्री निवासाचार्य जी लगभग पाँच वर्ष के हुए, तब एक दिन अपने पिता के पूजा-कक्ष में पहुँचकर उन्होंने अपने पिता चैतन्य दास को रोते हुए देखा। पूछने पर चैतन्य दास ने कहा कि मेरे हृदय में ‘श्री राधा’ एवं ‘श्री कृष्ण’ के प्रति प्रेम नहीं है, इसलिये मैं रो रहा हूँ, यह सुनकर निवासाचार्य भी रो-रोकर चिल्लाने लगे कि मेरे हृदय में भी श्रीकृष्ण प्रेम नहीं है, जब उनकी माता ने पिता-पुत्र को इस तरह बिलखते हुए देखा तो वह भी उन्हीं की तरह प्रलाप करने लगीं। हम अनुमान लगा सकते हैं कि इनका पूरा परिवार ही कृष्ण भक्त से ओतप्रोत था। आगे चलकर श्री निवासाचार्य जी की पुत्री भक्तिमती ‘हेमलता ठकुरानी’ जी भी प्रसिद्ध वैष्णव आचार्या बनीं।

जब श्री निवासाचार्य जी लगभग आठ-दस वर्ष के थे, तब उनके घर एक संन्यासी आगमन हुआ। उनके मुख से श्रीकृष्ण कथा सुनकर पूरा भक्त परिवार आनंद एवं भक्ति भाव से ओतप्रोत हो गया। भाव-विभोर होकर चैतन्य दास ने संन्यासी के चरण पकड़कर उनसे कुछ भी माँगने के लिये कहा, जब संन्यासी ने उनसे श्री निवासाचार्य को ही मांग लिया, तो एक बार तो वह मूच्र्छित हो गये किंतु अपने वचन को सत्य करते हुए उन्होंने श्रीनिवासाचार्य को संन्यासी को सौंप दिया। यहीं से इनकी आध्यात्मिक यात्रा का शुभारंभ हुआ।

श्री वृंदावन आकर इन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेमपात्र परम कृष्णभक्त श्री गोपालभट्ट गोस्वामी से दीक्षा ग्रहण की। इसके पश्चात् वैष्णव धर्म के सिद्धांतों एवं भक्ति-दर्शन के गहन अध्ययन के लिये श्री चैतन्य महाप्रभु के निर्देशानुसार ये श्री राधा दामोदर मंदिर में ‘श्रील प्रभुपाद जीव गोस्वामी’ के सान्निध्य में रहे।

सभी दर्शन-शास्त्रों एवं वैष्णव सिद्धांतों में पारंगत होकर श्री निवासाचार्य पश्चिम बंगाल में ‘श्रीपत जगजीग्राम’ में रहने लगे। इनकी दो पत्नियाँ ईश्वरी एवं श्रीमती अत्यन्त भक्तिमती थीं। एक बार श्री निवासाचार्य जब नित्य नियमानुसार जप करते हुए मानसिक रूप से ‘श्रीराधा-कृष्ण’ की ब्रज लीला में लीन थे तो तीन दिन तक गहन समाधि में रहे। जब इनकी यह देशा देखकर इनके प्रियतम शिष्य रामचन्द्र कविराज को बुलाया गया तो अपने गुरुदेव के निकट बैठते ही वह भी गहन समाधि में ब्रज लीला में पहुँच गये। उन्होंने देखा कि ‘जल-केलि’ करते हुए श्री श्रीराधा रानी जी की नासिका की बाली राधाकुण्ड में खो गई है। उन्होंने अपने गुरु श्री निवासाचार्य जी को मंजरी के रूप में उस मनोहर बाली को ढूँढ़कर श्री राधा-रानी जी की सखी को देते हुए देखा, तत्पश्चात् उस मंजरी रूपी सखी ने उस बाली को श्रीराधा रानी जी की नासिका में पहना दिया एवं उसी के साथ श्रीनिवासाचार्य जी एवं उनके शिष्य रामचन्द्र कविराज की समाधि भंग हुई।

श्री निवासाचार्य जी को स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा वैष्णव जगत को दिये गये प्रसाद के रूप में जाना जाता है।

वीर सावरकर Date :- 30-Apr-2014

महान राष्ट्रवादी चिन्तक और विचारक वीर सावरकर ने 4 जून 1947 को कहा कि नेहरू का यह कथन गलत सिद्ध होगा कि भारत विभाजन से हिन्दू-मुस्लिम समस्या का सदा के लिए समाधान हो जाएगा। हिन्दू-मुस्लिम समस्या के समाधान के रूप में देश को खंड-खंड करने वालों को मैं चेतावनी देता हूँ कि देश के बंटवारे से यह समस्या सुलझने के स्थान पर और अधिक उलझ जाएगी।

अहमदाबाद में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष पद से बोलते हुए वीर सावरकर ने 1937 में कहा था कि हमारे एकतावादी कांग्रेसी नेता उनकी हर अनुचित दुराग्रहपूर्ण मांग के सामने झुकते जा रहे हैं। आज वे वंदेमातरम् का विरोध कर रहे हैं, कल हिन्दुस्थान और भारत नामों पर ऐतराज करेंगे। उनका एकमात्र उद्देश्य भारत को मुस्लिम राष्ट्र बनाना है। तुष्टीकरण की नीति से उनकी भूख और बढ़ती जाएगी, जिसका घातक परिणाम सभी को भोगना पड़ेगा।

7 अक्टूबर 1944 को अखंड भारत सम्मेलन में वीर सावरकर जी ने कहा था कि भारत को खंडित करके पाकिस्तान बनाने की माँग करके मुस्लिम लीग ने समस्त हिन्दुओं के स्वाभिमान को चुनौती दी है। कांग्रेसी नेताओं की मुस्लिम तुष्टीकरण की आत्मघाती नीति के कारण देश को खंड-खंड, अंग-भंग करने का षडयंत्र रचा जा रहा है। देश के प्रत्येक हिन्दू को अपने राष्ट्र की अखण्डता की रक्षा के लिए सर्वस्व होम करने के लिए तत्पर रहना चाहिए।

कांग्रेस और गाँधीजी की तुष्टीकरण की क्रियाओं ने हिन्दुओं के स्वाभिमान को समाप्त कर दिया। यदि वीर सावरकर की कही हुई बात हम आज भी मान लें तो भारत भावी दुर्दशा से बच सकता है। वीर सावरकर का विरोध आजादी के बाद भी हुआ। जीते जी उनसे अन्याय किया गया और मृत्यु के बाद अपमान।

विडम्बना देखिए भरी जवानी में काला पानी भोगते हुए वीर सावरकर ने अखंड हिन्दू राष्ट्र की आजादी के लिए कोल्हू चलाया, उसी काले पानी के कीर्ति स्तम्भ से कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर ने सावरकर के यशोगान का पत्थर हटवाकर उन महात्मा गाँधी का पत्थर लगा दिया, जिन्होंने वहाँ कभी दस मिनट भी चरखा नहीं चलाया।

यह एक स्वतंत्रता सेनानी का घोर अपमान है। केन्द्र सरकार को चाहिए तो यह था कि नोटों पर वीर सावरकर का काले पानी में कोल्हू चलाते हुए का चित्र छापती, वीर सावरकर के नाम पर वहाँ मेडिकल काॅलेज, दिल्ली, मुम्बई में विश्वविद्यालय बनवाती, वीर सावरकर एक्सप्रैस गाड़ी चलाती तथा स्कूल की पाठ्य पुस्तकों में सावरकर का साहित्य पढ़ाती।

आज देश चाहता है कि हिन्दुत्व और हिन्दुस्थान के भविष्य की रक्षा के लिए सावरकर के विचारों को पुनः जीवित करके आगे बढ़ें तथा तुष्टीकरण के अंधेरे को दूर करके स्वाभिमान का वीर सावरकर रूपी सूर्य फिर सें उदय हो।

वीर सावरकर ने 1955 में जोधपुर में हिन्दू महासभा के मंच से बोलते हुए कहा था- जब तक देश की राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दू का सैनिकीकरण नहीं किया जाएगा, तब तक भारत की स्वाधीनता, उसकी सीमाएँ, उसकी सभ्यता व संस्कृति कदापि सुरक्षित नहीं रह सकेगी। मेरी तो हिन्दू युवकों से यही अपेक्षा है कि वे अधिक से अधिक संख्या में सेना में भर्ती होकर सैन्य विद्या प्राप्त करें ताकि समय पड़ने पर वे अपने देश की स्वाधीनता की रक्षा में योगदान दे सकें।

कबीरदास जी Date :- 01-Apr-2014

कबीरदास जी की बढ़ती हुई महिमा को देखकर ब्राह्मणों के हृदय में ईष्र्या पैदा हो गई। उस समय भारत का तत्कालीन बादशाह सिकन्दर लोदी काशी आया हुआ था। भक्तिविमुख ब्राह्मण इकट्ठे होकर सिकन्दर लोदी के दरबार में गये। सबने पुकार की कि इस कबीरदास ने सारे गाँव को दुःखी कर रखा है। मुसलमान होकर हिन्दू बाबाजी बन गया है, किसी धर्म को न मानकर ढोंग फैलाता रहता है। बादशाह ने तुरंत आज्ञा दे दी कि उसे अभी पकड़कर मेरे पास ले आओ, मैं उसे देखूँगा कि वह कैसा मक्कार है। बादशाह की आज्ञा पाकर सिपाही लोग कबीरदास जी को ले आये और बादशाह के सामने खड़ा कर दिया। तब किसी काजी ने कबीरदास जी से कहा- ये बादशाह सलामत हैं, इन्हें सलाम करो। इन्होंने उत्तर दिया कि हम श्रीराम के अतिरिक्त दूसरे किसी को सलाम करना जानते ही नहीं हैं।

कबीरदास जी की बातें सुनकर बादशाह ने इन्हें लोहे की जंजीरों से बँधवाकर गंगाजी की धारा में डुबा दिया। परंतु ये जीवित ही रहे, लोहे की जंजीरें न जाने कहाँ गईं। ये गंगाजी की धारा से निकलकर तट पर खड़े हो गये। तत्पश्चात् बादशाह की आज्ञा से बहुत-सी लकडि़यों में इन्हें दबाकर आग लगा दी गई। उस समय नया आश्चर्य हुआ, सभी लकडि़याँ जलकर भस्म हो गईं और इनका शरीर इस प्रकार चमकने लगा, जिसे देखकर तपे हुए सोने की चमक भी लज्जित हो जाये। जब यह उपाय भी व्यर्थ हो गया तो एक मतवाला हाथी लेकर उसे उनके उपर झपटाया गया। परंतु लाख प्रयत्न करने पर भी हाथी कबीरदास जी के पास नहीं आया। बड़ी जोर से चिंघाड़कर वह दूर भाग जाता था। इनके समीप में हाथी के न आने का कारण यह था कि स्वयं श्रीरामजी सिंह का रूप धारणकर कबीरदास जी के आगे बैठे थे।
बादशाह सिकन्दर लोदी ने कबीरदास जी का ऐसा अद्भुत प्रभाव देखा तो वह सिंहासन से कूदकर इनके चरणों में गिर पड़ा और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगा कि ‘अब आप कृपा करके ईश्वर के कोप से मुझे बचा लीजिये।’ कबीरदास जी ने कहा- ‘अब कभी भी किसी साधु-संत के उपर ऐसा गजब न करना।’ बादशाह ने कहा- ‘प्रभो! गाँव, देश तथा अनेक सुख-सुविधा के सभी सामान जो-जो आप चाहें, वह सब मैं आपको दूँगा।’ तब कबीरदास जी ने उत्तर दिया- हम तो केवल श्रीरामजी को चाहते हैं और उन्हीं को अष्ट-प्रहर जपते हैं। दूसरे किसी धर्म से हमें कुछ भी प्रयोजन नहीं है, इस प्रकार बादशाह से सम्मानित होकर कबीरदास जी अपने घर आ गये।

कबीरदास जी की विजय से वे विरोधी ब्राह्मण लोग अत्यन्त लज्जित हुए। साधुओं से शाप दिलाकर इन्हें परास्त करने के विचार से उन्होंने अपने में से चार ब्राह्मणों के सुन्दर वैरागी साधुओं के से वेष बनाये। उन चारों को चारों दिशाओं में भेज दिया। वे लोग दूर-दूर तक गाँवों में साधुओं के स्थानों और नामों को पूछ-पूछकर सब जगह सबको न्यौता दे आये कि अमुक दिन कबीरदास जी के यहाँ भण्डारा है, वस्त्र और दक्षिणा का भी प्रबन्ध है, आप पधारें। अगणित साधु-सन्त कबीरदास जी के यहाँ आये। तब कबीरदास जी घर से अलग कहीं दूर जाकर छिप गये। अपने भक्त की प्रतिष्ठा रखने के लिए भगवान स्वयं कबीरदास जी का रूप धारण करके आ गये और भण्डारे का प्रबंध करने लगे। बड़ी-बड़ी पंगतें बैठ गईं। अब कबीरदास जी भी आकर इन्हीं में मिल गये। भगवान ने खिला-पिलाकर और दान-सम्मान से सभी साधु-संतों को तथा कबीरदास जी को भी अच्छी प्रकार से प्रसन्न किया।

कबीरदास जी के सम्मुख आकर भगवान ने अपना चतुर्भुज रूप प्रकट कर दिया। उसका दर्शन करके इनके नेत्र सपल हो गये। ऐसे परम सौभाग्यशाली सन्त कबीरदास जी थे। भगवान ने अपना करकमल इनके मस्तक पर रखकर कहा- तुम धन्य हो, तुम्हारी बुद्धि मेरे नाम-रूपादि में पग गई है। अपनी इच्छानुसार जब तक चाहो, इस मत्र्यलोक में रहो और मेरे गुणों का गान करो। उसके बाद अपने इस शरीर के सहित मेरे परमधाम बैकुण्ठ में चले आना। मगहर में जाकर कबीरदास जी ने भगवद्भक्ति का प्रताप दिखाया। भक्ति का प्रचार किया। अन्त समय में इन्होंने बहुत-से पुष्प मँगाये, उन्हें बिछाकर लेट गये और भगवान से जा मिले। (सौजन्यः भक्तमाल)

कृष्णभक्त 'बिल्वमंगल' Date :- 01-Mar-2014

दक्षिण प्रदेश में कृष्णवेणा नदी के तट पर एक भगवद्भक्त ब्राह्मण रामदास के घर बिल्वमंगल का जन्म हुआ था। पिता ने पुत्र को धर्मशास्त्रों की शिक्षा दी थी। परन्तु माता-पिता के देहावसान के बाद संगदोष से बिल्वमंगल गलत संगत में पड़ गया। वह चिन्तामणि नामक एक वेश्या के रूप पर आसक्त हो गया।

एक दिन बिल्वमंगल के पिता का श्राद्ध था। कुलपुरोहित श्राद्ध-कर्म करवा रहे थे, परन्तु बिल्वमंगल का मन चिन्तामणि की चिन्ता में निमग्न था। किसी प्रकार श्राद्ध समाप्त कर, झटपट ब्राह्मणों को भोजन करवाकर चिन्तामणि के घर चलने को तैयार हुआ। लोगों ने समझाया कि आज तुम्हारे पिताश्री का श्राद्ध है, अतः आज वेश्या के घर नहीं जाना चाहिए, उसका हृदय तो कभी का कर्म-शून्य हो चुका था। बिल्वमंगल दौड़कर नदी के किनारे पहुँचा। अकस्मात् प्रबल वेग से तूफान आया और मूसलाधार वर्षा होने लगी। सर्वत्र अंधकार छा गया। नाविकों ने तूफान के डर से नदी पार जाने से इंकार कर दिया। वह सहसा उफनती नदी में कूद पड़ा और एक बहते मुर्दे पर चढ़कर नदी पार पहुँचा। कुछ ही दूरी पर चिन्तामणि का घर था।

श्राद्ध के कारण आज बिल्वमंगल के आने की बात नहीं थीं, अतएव चिन्तामणि निश्चिंत होकर सो चुकी थी। बिल्वमंगल ने बाहर से पुकारा, पर तूफान के शोर के कारण अन्दर कुछ सुनाई नहीं पड़ा। बिल्वमंगल को दीवाल पर एक रस्सी लटकती प्रतीत हुई, उसी के सहारे वह उपर पहुँचा और चिन्तामणि को जगाया। वह उसे देखते ही स्तम्भित-सी रह गई। बिल्वमंगल का सारा शरीर भीगा हुआ था व शरीर से दुर्गन्ध आ रही थी। चिन्तामणि ने पूछा कि तुम इस भयानक नदी को कैसे पार कर उपर आए हो? बाहर जाकर देखा तो वहाँ एक गला-सड़ा मुर्दा पड़ा था तथा जिसे रस्सी समझ कर वह लटका था, वह एक विषैला नाग था। ये सब देखकर बिल्वमंगल भी काँप उठा।

चिन्तामणि ने घोर भत्र्सना करके कहा- ‘अरे आज तेरे पिता का श्राद्ध था, परन्तु एक हाड़-मांस की पुतली पर तू इतना आसक्त हो गया कि अपने सारे धर्म-कर्म को तिलांजलि देकर इस डरावनी रात में मुर्दे और साँप की सहायता से यहाँ आ पहुँचा। जिसे आज तू सुन्दर समझकर इस तरह पागल हो रहा है, उसका भी एक दिन वही हाल होने वाला है, जैसा कि यह सड़ा हुआ मुर्दा। अरे! यदि तू इसी प्रकार उस मनमोहन श्यामसुन्दर से मिलने के लिए यों छटपटाकर दौड़ता तो अब तक उनको पाकर तू अवश्य ही कृतार्थ हो चुका होता।

वेश्या की वाणी ने बड़ा काम किया। बिल्वमंगल ने चिन्तामणि के चरण पकड़ लिए और कहा- ‘माता! तूने आज मुझको दिव्य ज्ञान देकर कृतार्थ कर दिया।’ दोनों ने पूरी रात भजन-कीर्तन किया और प्रातः होते ही चिन्तामणि ने हरिद्वार और बिल्वमंगल ने संत सोमगिरि जी महाराज के आश्रम की राह ली। वहाँ गुरुदेव से दीक्षा लेकर वृन्दावन धाम के लिए चल पड़ा।

बिल्वमंगल को एक दिन अकस्मात् रास्ते में एक परम रूपवती युवती दीख पड़ी। पूर्व संस्कार अभी सर्वथा नहीं मिटे थे। युवती का सुन्दर रूप देखते ही नेत्र चंचल हो उठे। वह युवती के पीछे-पीछे उसके मकान तक गया। युवती घर के अन्दर चली गई, वह उदास होकर घर के बाहर बैठ गया। घर के मालिक ने बाहर आकर पूछा तो बिल्वमंगल ने कपट छोड़कर सारी घटना सुना दी और कहा कि ‘मैं एक बार फिर उस युवती को प्राण भर देखना चाहता हूँ, तुम उसे यहाँ बुलवा दो।’ युवती उसी गृहस्थ की धर्मपत्नी थी, अतिथिवत्सल गृहस्थ अपनी पत्नी को बुलाने के लिए अन्दर गया। इधर बिल्वमंगल को अपनी अवस्था का यथार्थ ज्ञान हुआ, हृदय शोक से भर गया, न मालूम क्या सोचकर उसने पास के पेड़ से दो काँटे तोड़ लिये। रूपवती युवती को देखकर मन-ही-मन अपने को धिक्कार देकर कहने लगा कि ‘अभागी आँखें’ यदि तुम न होती तो आज मेरा इतना पतन ना होता। इतना कहकर बिल्वमंगल ने अपनी आँखें काँटों से फोड़ ली। रक्तधारा बह निकली। गृहस्थ और उसकी पत्नी को बहुत दुःख हुआ।

बिल्वमंगल का बचा-खुचा चित्त-मल भी आज सारा नष्ट हो गया। परम प्रियतम श्रीकृष्ण के वियोग की दारूण व्यथा से उसकी फूटी आँखों ने चैबीसों घंटे आँसुओं की झड़ी लगा दी। ‘कृष्ण-कृष्ण’ की पुकार से दिशाओं को गुँजाता हुआ बिल्वमंगल जंगल-जंगल और गाँव-गाँव में घूमता रहा। एक दिन छोटे-से गोप बालक के वेष में भगवान बिल्वमंगल के पास आकर अपनी मनमोहनी मधुर वाणी से बोले- भूख लगी होगी, मैं कुछ मिठाई लाया हूँ। बिल्वमंगल के प्राण तो बालक के मधुर स्वर से ही मोहे जा चुके थे। बालक जाते-जाते कह गया कि मैं रोज आकर भोजन करवाया करूँगा।

एक दिन बालक ने अपनी दीवाना बना देने वाली वाणी में कहा, ‘बाबाजी, वृन्दावन चलोगे? वृन्दावन का नाम सुनते ही बिल्वमंगल का हृदय हरा हो गया। बालक ने कहा- ‘यह लो मेरी लाठी, इसे पकड़ लो।’ उसका मुख खिल उठा, लाठी पकड़कर भगवान भक्त के आगे-आगे चलने लगे। कुछ दूर जाकर बालक ने कहा- ‘लो वृन्दावन आ गया, अब मैं जाता हूँ।’ बिल्वमंगल ने बालक का हाथ पकड़ लिया, हाथ का स्पर्श होते ही सारे शरीर में बिजली-सी दौड़ गई। सात्विक प्रकाश से सारे द्वार प्रकाशित हो उठे, बिल्वमंगल ने दिव्य दृष्टि पाई और उसने देखा कि बालक रूप में साक्षात् मेरे श्याम सुन्दर ही हैं। उसका शरीर रोमांचित हो गया, आँखों से प्रेमाश्रुओं की अनवरत धारा बहने लगी। भगवान का हाथ उसने और जोर से पकड़ लिया और कहा कि ‘अब पहचान लिया है, बहुत दिनों के बाद पकड़ सका हूँ। प्रभु! अब नहीं छोड़ने का।’
rnभगवान ने जोर से झटका देकर हाथ छुड़ा लिया। हाथ छुड़ाते ही बिल्वमंगल ने कहा- जाते हो, पर स्मरण रखो-

हाथ छुड़ाये जात हो, निबल जानि कै मोहि।
हिरदै तें जब जाहुगे, सबल बदौंगो तोहि।।

भगवान ने बिल्वमंगल की आँखों पर अपना कोमल करकमल फिराया, उसकी आँखें खुल गईं। नेत्रों से प्रत्यक्ष भगवान को देखकर उनकी भुवनमोहिनी अनूप रूपराशि के दर्शन पाकर बिल्वमंगल अपने आपको संभाल नहीं सका। वह चरणों में गिर पड़ा और प्रेमाश्रुओं से प्रभु के पावन चरणकमलों को धोने लगा।

भगवान ने उठाकर उसे अपनी छाती से लगा लिया। भक्त और भगवान के मधुर मिलन से समस्त जगत में मधुरता छा गई। देवता पुष्पवृष्टि करने लगे। सन्त-भक्तों के दल नाचने लगे। हरिनाम की पवित्र ध्वनि से आकाश परिपूर्ण हो गया। भक्त और भगवान दोनों धन्य हुए। वेश्या चिन्तामणि, गृहस्थ और उसकी रूपवती पत्नी भी वहाँ आ गईं। भक्त के प्रभाव से भगवान ने उन सबको अपना दिव्य दर्शन और दूध-भात का प्रसाद देकर कृतार्थ किया। धन्य बिल्वमंगल! धन्य चिन्तामणि! बिल्वमंगल ने चिन्तामणि को अपना गुरू ही माना और अपने ग्रंथ ‘कृष्णकर्णामृत’ का मंगलाचरण ‘चिन्तामणिर्जयति’ से किया। बिल्वमंगल जीवन भर भक्ति का प्रचार करके भगवान की महिमा बढ़ाते रहे और अंत में गोलोकधाम पधारे।

वीर हकीकत राय Date :- 02-Feb-2014

शाहजहाँ के शासनकाल की बात है। स्यालकोट के एक छोटे-से मदरसे में हकीकत राय पढ़ता था। एक लंबी दाढ़ी वाले मौलवी साहब वहाँ बच्चों को पढ़ाया करते थे। एक दिन मौलवी कहीं बाहर गये तो उनकी अनुपस्थिति में बच्चे खेलने-कूदने लगे। हकीकत राय इस खेल-कूद में सम्मिलित नहीं हुआ, इस पर दूसरे बच्चों ने उसे छेड़ा। एक मुसलमान बच्चे ने हकीकत राय को गाली दी, दूसरे ने सारे हिंदुओं को और तीसरे ने हिंदुओं के देवी-देवताओं को- भगवती दुर्गा को।

इस पर हकीकत चुप न रह सका। वह बोल उठा, ‘अगर मैं भी बदले में यही शब्द कहूँ तो तुम बुरा तो नहीं मानोगे?’ एक बच्चे ने कहा, ‘तो क्या तू ऐसा भी कर सकता है?’ हकीकत राय ने कहा, ‘क्यों नहीं? मुझे भी तो भगवान ने जुबान दी है।’ दूसरा बच्चा बोला, ‘तो कहकर देख।’ और हकीकत राय ने वही शब्द दुहरा दिये। आखिर बच्चा ही तो था और साथ ही अपने धर्म का पक्का भी। चारों ओर सन्नाटा छा गया। मौलवी साहब आये तो मुसलमान बच्चों ने नमक-मिर्च लगाकर सारी घटना उन्हें सुनाई। मौलवी साहब ने आँखें फाड़ते हुए पूछा, ‘हकीकत! क्या सचमुच ही तूने यह सब कुछ कहा है?’ हकीकत ने दृढ़ता से उत्तर दिया, ‘हाँ, लेकिन उससे पहले इन सबने भी तो मेरी देवी भगवती के लिये वही सब कुछ कहा था।’ मौलवी साहब ने इस्लाम की तौहीन का यह मामला स्यालकोट के हाकिम अमीर बेग की अदालत में भेज दिया। वहाँ भी हकीकत राय ने सब कुछ स्वीकार कर लिया। हाकिम ने मुल्लाओं की सम्मति ली। उन्होंने बताया कि इस्लाम की तौहीन करने वाले के लिये शहर में मौत की सजा लिखी है।’

हकीकत राय का बूढ़ा बाप रो पड़ा। उसकी माँ बिलखने लगी। उसकी नन्ही-सी पत्नी बेहोश होकर गिर पड़ी। हकीकत राय की अवस्था उस समय मात्र 13 वर्ष की थी। हाकिम के निर्णय के विरूद्ध लाहौर में अपील भी की गई, वहाँ से भी वही फैसला बहाल रहा। हकीकत जेल की सलाखों के पीछे बैठा था। वह निश्चिंत था, गंभीर था और प्रसन्न भी। मौत का फैसला सुनकर उसके हृदय में घबराहट नहीं थी।

काजी, मुल्ला और उसके बूढ़े माँ-बाप सलाखों के बाहर आकर खड़े हो गये। काजी ने कहा, ‘हकीकत! अगर तू मुसलमान बन जाये तो मरने से बच सकता है।’

हकीकत राय का चेहर तमतमा उठा। वह कुछ बोलना ही चाहता था कि उसके बूढ़े पिता भागमल हिचकियाँ लेते हुए कह उठे, ‘हाँ-हाँ बेटा, मुसलमान बन जा, अगर तू जीवित रहेगा तो हमारी आँखें तुझे देखकर ठंडी तो होती रहेंगी।’

हकीकत ने कहा, ‘आप भी यही कहने लगे, पिताजी! तो क्या मैं मुसलमान बन जाने पर फिर कभी नहीं मरूँगा? और अगर एक-न-एक दिन मरना ही है तो फिर दो दिन के जीवन के लिये धर्म छोड़ने से क्या लाभ?’ काजी ने कहा, ‘बड़ा लाभ होगा तुम्हें हकीकत।’ शाही दरबार में इज्जत, बेशुमार दौलत और..........।’

हकीकत राय हँस पड़ा, ‘बस-बस इतना ही? इतने भर के लिये ही मैं अपना धर्म छोड़ दूँ, काजी साहब? धर्म कभी बदला नहीं जाता, वह तो अटल होता है। जीवनभर के लिये वह हमारे साथ रहता है और मरने पर भी हमारे साथ ही जाता है।’

माता पिता और सम्बन्धियों ने बहुत समझाया, किंतु हकीकत राय टस-से-मस न हुआ। इस्लाम का अपमान करने के अपराध में हकीकत राय का सिर काट देने का आयोजन खुले मैदान में किया गया था। मैदान हिंदू और मुसलमान स्त्री-पुरुषों से खचाखच भरा हुआ था। जिस समय उस मैदान में हकीकत राय लाया गया, वह तलवारों की छाया में था, हथकड़ी-बेडि़यों में जकड़ा हुआ था, मुसलमानी फौजों से घिरा हुआ था। काजी ने एक बार फिर उससे मुसलमान हो जाने के लिये कहा। उसने फिर उसी दृढ़ता से उत्तर दिया, ‘मैं धर्म नहीं छोड़ सकता, दुनिया छोड़ सकता हूँ।’

मुल्ला ने काजी को संकेत किया और काजी ने जल्लाद को। जल्लाद ने तलवार उठाई और उस फूल जैसे बच्चे को अपनी तलवार के नीचे देखा तो उसका पत्थर-जैसा हृदय भी पिघल गया। तलवार उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ी।

काजी और मुल्लाओं की त्योरियाँ चढ़ गईं। सारी भीड़ में हलचल-सी मच गई। किंतु एक क्षण बाद ही सबने देखा कि हकीकत राय स्वयं तलवार उठाकर जल्लाद के हाथों में दे रहा है। हकीकत ने तलवार देकर कहा, ‘घबराओ नहीं, जल्लाद! लो, अपने कत्र्तव्य का पालन करो।’ जल्लाद ने तलवार थामी और हकीकत की गर्दन पर दे मारी। एक छोटी-सी किंतु तीखी रक्त की धार पृथ्वी पर बह निकली।

रानी कलावती Date :- 01-Feb-2014

अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करने से पूर्व रास्ते में एक छोटे-से राज्य के राजा कर्णसिंह को अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा। बिना युद्ध किये एक क्षत्रिय पराजय स्वीकार कर ले, यह कैसे संभव हो सकता है? अतः कर्णसिंह यवनों से संघर्ष करने के लिये तैयार हो गए। अंतःपुर में अपनी रानी से जब वह युद्ध के लिए विदा लेने गये तो उनकी रानी कलावती ने युद्ध में साथ चलने का निवेदन करते हुए कहा- ‘स्वामी! मैं आपकी जीवनसंगिनी हूँ, मुझे सदा संग रहने का अवसर प्रदान कीजिये। सिंहनी के आघात अपने वनराज से दुर्बल भले हों, पर गीदड़ों व सियारों के संहार हेतु तो पर्याप्त हैं।’ कर्णसिंह ने अपनी वीर पत्नी की भावनाओं को समझते हुए उसे साथ चलने की अनुमति दे दी। छोटी-सी सेना का विशाल यवन सेना से मुकाबला था। रानी कलावती शस्त्र-संचालन में निपुण थीं। अपने पति की पाश्र्व रक्षा करती हुई वह शत्रु संहार कर रही थीं। इधर स्वाधीनता की रक्षा करने वाले वीर राजपूत मृत्यु का वरण करने को उत्सुक थे और उनके सामने थे वेतनभोगी यवन सैनिक।

घमासान युद्ध हो रहा था। इतने में एक आघात कर्णसिंह को लगा, जिससे वे बेहोश हो गए। कलावती ने दोनों हाथों से शस्त्र संचालन कर पति के आसपास स्थित सारे शत्रु सैनिकों का सफाया कर दिया। युद्ध उत्साही क्षत्रिय सैनिकों के आगे यवन सेना पराजित हुई। विजय हासिल कर रानी कलावती अपने घायल पति को लेकर वापिस लौटीं। राजवैद्य ने परीक्षण कर बताया कि विषैले शस्त्र से आघात लगने के कारण राजा कर्णसिंह बेहोश हुए हैं, उनके विष को चूसने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है। विष चूसने वाले के जीवित रहने की सम्भावना कम थी, क्योंकि शत्रु द्वारा प्रयुक्त जहर बहुत विषैला था। इससे पहले कि विष चूसने वाले की खोज की जाती या उसे तलाश करने का प्रयास किया जाता, रानी ने स्वयं उस मारक विष को चूस लिया। विष चूसने की विधि में कलावती निपुण नहीं थीं, फिर भी पति के प्राणों की रक्षार्थ उसने अविलम्ब यह कार्य किया। जब राजा कर्णसिंह की बेहोशी टूटी और उन्होंने अपने नेत्र खोले तो समीप ही पड़ी प्रेम-प्रतिमा की मृत देह नजर आई। अपने प्राणोत्सर्ग कर पति के प्राणों की रक्षा करने वाली रानी कलावती का त्याग अविस्मरणीय व वन्दनीय है।

रानी कलावती के साहस और बलिदान को शत्-शत् नमन।

– अरविन्द गोयल (सम्पादक)
 

साहसी सांवल्या Date :- 01-Jan-2014

होनहार बिरवान के होत चीकने पात। किसी ने सच कहा है कि वीरता किसी आयु, जाति अथवा वर्ग से बंधी नहीं होती। सांवल्या महाराष्ट्र के एक निर्धन परिवार में जन्मा था। पर उसकी रगों में मालवों का सच्चा रक्त था। वह बचपन से ही तलवार का शौकीन था। भारतवर्ष में उस समय क्रूर मुगलों का शासन था।

महाराष्ट्र में शिवाजी का उदय हो चुका था। छत्रपति शिवाजी हिन्दू पद पादशाही की स्थापना करना चाहते थे। उन्होंने देशभक्त, बहादुर और सच्चे वीरों का संगठन कर एक बड़ी सेना तैयार की। हिन्दुस्थान में हिन्दू धर्म, गोरक्षा और स्त्री जाति के सम्मान की रक्षा के लिए वे वचनबद्ध थे।

सांवल्या किसी भी तरह शिवाजी महाराज की सेना में शामिल होना चाहता था। पर वह अभी छोटा था। उसने निश्चय कर लिया था कि वह शिवाजी महाराज की सेना में शामिल होकर अपने देश, धर्म और समाज की रक्षा करेगा। वह शिवाजी से मिलने के लिए लालायित था।

शिवाजी वेष बदलकर प्रायः राज्य की सुरक्षा व्यवस्था तथा प्रजा की दशा देखने रात्रि के समय निकला करते थे। एक बार ऐसे ही अवसर पर जब शिवाजी घोड़े पर सवार होकर राज्य की सीमा के पास चक्कर लगा रहे थे, तभी एक छोटा बालक हाथ में तलवार लिए उनके पास गया। उसने तलवार निकालकर तान ली और जोर से ललकारा, तुम कौन हो? हमारे राज्य की सीमा में आने की तुमने हिम्मत कैसे की? क्या तुम्हें पता नहीं, यह शिवाजी महाराज का राज्य है? यहाँ का बच्चा-बच्चा देश की रक्षा में प्राण देना जानता है।

उस काल में मुगल प्रायः चोरी-छिपे घुसकर लूटपाट करते तथा मूर्तियों को नष्ट किया करते थे। सांवल्या ने ऐसा ही सुन रखा था। उसने शिवाजी महाराज को कभी भी नहीं देखा था। शिवाजी महाराज इस बालक की परीक्षा लेने के लिए घोड़े से उतरे और खड्ग खींच ली। सांवल्या तनिक भी नहीं घबराया और बोला खबरदार एक पग भी आगे बढ़ाया तो शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दूँगा। भला चाहते हो तो लौट जाओ। उसने बड़ी फुर्ती से शिवाजी पर वार किया। शिवाजी ने बचाकर ऐसा काट मारा कि सांवल्या की तलवार हाथ से दूर जा गिरी। सांवल्या ने बिजली की फुर्ती से तलवार उठा ली और क्रुद्ध होकर शिवाजी पर झपटा। शिवाजी पलक झपकते घोड़े पर बैठकर अदृश्य हो गये। सांवल्या धूल उड़ती देखता रह गया। वह पछताता रह गया।

शिवाजी ने दुर्ग में पहुँचकर सांवल्या को बुलवाया और उसे अपनी सेना में उँचा पद प्रदान किया। सांवल्या यह देखकर कि उस दिन वह जिस व्यक्ति से भिड़ा था, वे ही महाराज शिवाजी थे, वह उनके चरणों में गिर पड़ा। बाद में स्वराज्य स्थापना के लिए युद्ध में वीरगति पाकर सांवल्या सदैव के लिए अमर हो गया।

- अरविन्द गोयल, सम्पादक
 

वीरता की प्रतिमूर्ति अवन्तीबाई लोधी Date :- 01-Aug-2013

मण्डला, मध्य प्रदेश के रामगढ़ राज्य की रानी अवन्तीबाई ने एक बार राजा विक्रमजीत सिंह से कहा कि उन्होंने स्वप्न में एक चील को आपका मुकुट ले जाते हुए देखा है। ऐसा लगता है कि कोई संकट आने वाला है। राजा ने कहा, हाँ, वह संकट अंग्रेजों की ओर से आ रहा है, पर मेरी रूचि अब पूजा-पाठ में अधिक हो गयी है, इसलिए तुम ही राज संभालकर इस संकट से निबटो। रानी एक बार मंत्रियों के साथ बैठी कि लार्ड डलहौजी का दूत एक पत्र लेकर आया। उसमें लिखा था कि राजा के विक्षिप्त होने के कारण हम शासन की व्यवस्था के लिए एक अंग्रेज अधिकारी नियुक्त करना चाहते हैं। रानी समझ गयी कि सपने वाली चील आ गई है, उसने उत्तर दिया कि मेरे पति स्वस्थ हैं। मैं उनकी आज्ञा से तब तक काम देख रही हूँ, जब तक मेरे बेटे अमानसिंह और शेरसिंह बड़े नहीं हो जाते। अतः रामगढ़ को अंग्रेज अधिकारी की कोई आवश्यकता नहीं है। पर डलहौजी तो राज्य हड़पने का निश्चय कर चुका था। उसने अंग्रेज अधिकारी नियुक्त कर दिया। इसी बीच राजा का देहान्त हो गया। अब रानी ने पूरा काम संभाल लिया। वह जानती थी कि देर-सवेर अंग्रेजों से मुकाबला होगा ही, अतः उसने आसपास के देशभक्त सामन्तों तथा रजवाड़ों से सम्पर्क किया। अनेक उनका साथ देने को तैयार हो गये। वह सन् 1847 का काल था। नाना साहब पेशवा के नेतृत्व में अंग्रेजों को बाहर निकालने के लिए संघर्ष की तैयारी हो रही थी। रामगढ़ में भी क्रान्ति का प्रतीक लाल कमल और रोटी घर-घर घूम रही थी। रानी ने इस यज्ञ में अपनी आहुति देने का निश्चय कर लिया। उनकी तैयारी देखकर अंग्रेज सेनापति वाशिंगटन ने हमला बोल दिया। रानी ने बिना घबराये खैरी गाँव के पास वाशिंगटन को घेर लिया। रानी के कौशल से अंग्रेजों के पाँव उखड़ने लगे। इसी बीच वाशिंगटन रानी को पकड़ने के लिए अपने घोड़े सहित पानी के पास आ गया। रानी ने तलवार के भरपूर वार से घोड़े की गरदन उड़ा दी। वाशिंगटन नीचे गिर पड़ा और प्राणों की भीख माँगने लगा। रानी ने दया कर उसे छोड़ दिया।

पर कुछ वर्ष बाद वह सन् 1858 में फिर रामगढ़ आ धमका। इस बार उसके पास पहले से अधिक सेना तथा रसद दी। उसने किले को घेर लिया, पर तीन महीने बीतने पर भी वह किले में प्रवेश नहीं कर सका। इधर किले में रसद समाप्त हो रही थी। अतः रानी कुछ विश्वासपात्र सैनिकों के साथ एक गुप्तद्वार से बाहर निकल पड़ीं। इसी बीच किले के द्वार खोलकर भारतीय सैनिक अंग्रेजों पर टूट पड़े, पर वाशिंगटन को रानी के भागने की सूचना मिल गई। वह एक टुकड़ी लेकर पीछे दौड़ा। देवहारगढ़ के जंगल में दोनों की मुठभेड़ हुई। वह 20 मार्च, 1858 का दिन था। रानी ने काल का रूप धारण कर लिया, वह रणचण्डी बनकर शत्रुओं पर टूट पड़ी। अचानक एक फिरंगी के वार से रानी का दाहिना हाथ कट गया।  तलवार छूट गयी। रानी समझ गई कि अब मृत्यु निकट है। उसने जेल में सड़ने की अपेक्षा मरना श्रेयस्कर समझा। अतः एक झटके से अपने बायें हाथ से कमर से कटार निकाली और सीने में घोप ली। अगले ही क्षण रानी का मृत शरीर घोड़े पर झूल गया। भारतीय स्वतंत्रता के गौरवशाली इतिहास में आज भी रानी अवन्तीबाई लोधी का नाम अमर है।

- अरविन्द गोयल, सम्पादक
 

पन्ना धायः स्वामिभक्ति की एक अद्वितीय मिसाल Date :- 01-Jul-2013

पन्ना धाय राणा साँगा के पुत्र राणा उदय सिंह की धाय (दासी) माँ थी। पन्ना धाय किसी राज-परिवार की सदस्य नहीं थी। अपना सर्वस्व स्वामी को अर्पण करने वाली वीरांगना पन्ना धाय का जन्म कमेरी गाँव में हुआ था। राणा साँगा के पुत्र उदयसिंह को माँ के स्थान पर दूध पिलाने के कारण पन्ना धाय ‘माँ’ कहलाई थी। पन्ना का पुत्र चन्दन और राजकुमार उदयसिंह साथ-साथ बड़े हुए थे। उदय सिंह को पन्ना ने अपने पुत्र के समान पाला था। पन्नाधाय ने उदय सिंह की माँ कर्मावती के सामूहिक आत्मबलिदान (जौहर) करने पर बालक उदयसिंह की परवरिश करने का दायित्व संभाला था। पन्ना ने पूरी लगन से बालक की देख-रेख और सुरक्षा की। पन्ना चित्तौड़ के कुम्भा महल में रहती थी।

गुजरात के बादशाह बहादुर शाह ने जब चित्तौड़ पर हमला किया, उस समय राजमाता कर्मावती ने अपने सभी राजपूत सामंतों को संदेश भिजवा दिया कि यह तुम्हारी मातृभूमि है, या तो इसे दुश्मन को सौंपो या रखो। इस संदेश से सभी राजपूत सामंत चित्तौड़ की रक्षा करने के लिए दुर्ग में जमा हो गये। राजपूत सैनिक शौर्यता से युद्ध लड़ने के बाद भी बहादुर शाह के हमले के आगे टिक न सके। राजमाता कर्मावती के साथ 13,000 वीरांगनाओं ने विजय स्तम्भ के सामने लकड़ी के अभाव में बारूद के ढेर पर बैठकर जौहर व्रत का पालन किया। बहादुरशाह ने किले में भयंकर मारकाट और लूटपाट मचाई। चित्तौड़ पर विजय पाने के बाद बहादुरशाह, हुमायूँ से लड़ने चला गया और मुगल सेना से युद्ध हार गया। ऐसे में विक्रमादित्य ने पुनः आक्रमण कर चित्तौड़ की गद्दी पर कब्जा जमा लिया।

पुत्र का बलिदान- दासी का पुत्र बनवीर चित्तौड़ का शासक बनना चाहता था। उसने राणा के वंशजों को एक-एक कर मार डाला। बनवीर एक रात विक्रमादित्य की हत्या करके उदयसिंह को मारने के लिए उसके महल की ओर चल पड़ा। एक विश्वस्त सेवक द्वारा पन्ना धाय को इसकी पूर्व सूचना मिल गई। पन्ना राजवंश और अपने कत्र्तव्यों के प्रति सजग थी, वह उदयसिंह को बचाना चाहती थी। उसने उदय सिंह को एक बांस की टोकरी में सुलाकर उसे झूठे पत्तलों से ढककर एक विश्वासपात्र सेवक के साथ महल से बाहर भेज दिया। बनवीर को धोखा देने के उद्देश्य से अपने पुत्र चंदन को उदय सिंह के पलंग पर सुला दिया। बनवीर रक्तरंजित तलवार लिए उदय सिंह के कक्ष में आया और उसके बारे में पूछा। पन्ना ने उदय सिंह के पलंग की ओर संकेत किया, जिस पर उसका पुत्र सोया था। बनवीर ने पन्ना के पुत्र को उसके सामने ही उदयसिंह समझकर मार डाला।

पन्ना अपनी आँखों के सामने अपने पुत्र के वध को अविचलित रूप से देखती रही। बनवीर को पता न लगे इसलिए वह आँसू भी नहीं बहा पाई। बनवीर के जाने के बाद अपने मृत पुत्र की लाश को चूमकर राजकुमार को सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए निकल पड़ी। स्वामीभक्त वीरांगना पन्ना धाय ने अपने कत्र्तव्य-पूर्ति में अपनी आँखों के तारे पुत्र का बलिदान देकर मेवाड़ राजवंश को बचाया।

मेवाड़ का वैधानिक महाराणा- पुत्र की मृत्यु के बाद पन्ना उदयसिंह को लेकर बहुत दिनों तक शरण के लिए भटकती रही, पर दुष्ट बनवीर के डर से कई राजकुल, जिन्हें पन्ना को आश्रय देना चाहिए था, उन्होंने पन्ना को आश्रय नहीं दिया। पन्ना जगह-जगह राजद्रोहियों से बचती, कतराती तथा स्वामीभक्त प्रतीत होने वाले प्रजाजनों के सामने अपने को जाहिर करती भटकती रही। कुम्भलगढ़ में उसे शरण मिल गई। उदयसिंह किलेदार का भांजा बनकर बड़ा हुआ। तेरह वर्ष की आयु में मेवाड़ी उमरावों ने उदयसिंह को अपना राजा स्वीकार कर लिया और उसका राज्याभिषेक कर दिया। उदय सिंह 1542 में मेवाड़ के वैधानिक महाराणा बन गए।

मेवाड़ के इतिहास में जिस गौरव के साथ प्रातः स्मरणीय ‘महाराणा प्रताप’ को याद किया जाता है, उसी गौरव के साथ ‘पन्ना धाय’ का नाम भी लिया जाता है, जिसने स्वामिभक्ति को सर्वोपरि मानते हुए अपने पुत्र चन्दन का बलिदान दे दिया था। इतिहास में पन्ना धाय का नाम स्वामिभक्ति के शिरमोरों में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है।

- अरविन्द गोयल (सम्पादक)
 

महाराष्ट्र की मीरा- जनाबाई Date :- 01-Jul-2013

महाराष्ट्र की मीरा नाम से विख्यात संत ‘जनाबाई’ का जन्म मीरा बाई से लगभग 200 वर्ष पूर्व हुआ था। जनाबाई के विट्ठल अथवा पाण्डुरंग ही मीराबाई के गिरधर गोपाल हैं। इनका स्थान महाराष्ट्र की संत-कवियित्रियों में सर्वोच्च है। भाषा की सरलता तथा भोले और प्रेमाद्र्र हृदय की भक्ति- विह्लता ही इनके काव्य की विशेषताएँ हैं, जिन्होंने इन्हें मराठी के संत-साहित्य में सदा के लिए अमर बना दिया। इनके द्वारा रचित अभंग आज लगभग 600 वर्ष के पश्चात् भी मराठियों की वाणी पर तरंगित दिखाई देते हैं।

गोदावरी के पुनीत तट पर गंगाखेड़ नामक एक ग्राम में जनाबाई का जन्म एक शूद्र परिवार में हुआ था। पाँच वर्ष की अवस्था से ही इनका मन भगवान में लग गया, तब इनके माता-पिता ने जनाबाई को सुप्रसिद्ध संत नामदेव के परिवार को सौंप दिया। नामदेव की सेवा करना और उनके साथ भगवद् भक्ति में तल्लीन रहना ही इनका जीवन बन गया। जनाबाई आजन्म अविवाहित रहीं। भगवान विट्ठल इनकी दिनचर्या में साथ-साथ रहते थे।

अन्य भगवद्-भक्तों की तरह जनाबाई के जीवन से सम्बन्धित भी अनेक चमत्कारपूर्ण घटनाएँ सुनी जाती हैं। उनमें से एक घटना इस प्रकार है-

एक दिन रात्रि के तृतीय प्रहर में विट्ठल भगवान जनाबाई के साथ अनाज पीसने बैठ गए और इनके स्वर से स्वर मिलाकर गाने लगे। गीतों की तल्लीनता में उन्हें समय का ध्यान न रहा। प्रातःकाल की आरती का समय हो गया, किन्तु मंदिर में भगवान नहीं हैं। यह स्मरण आते ही जनाबाई ने तुरंत ही विट्ठल भगवान को मंदिर में भेज दिया। शीघ्रता में जनाबाई का कम्बल भी उनके साथ चला गया। मंदिर में भगवान को कम्बल ओढ़े देखकर ब्राह्मणों को बड़ा आश्चर्य हुआ। पता लगाने से विदित हुआ कि वह कम्बल जनाबाई का है, फिर क्या था, उन सबके क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने सोचा, जनाबाई ने भगवान का स्वर्णपदक चुरा लिया है और चोरी छिपाने के लिए उसने अपना कम्बल उन्हें ओढ़ा दिया है। उन्होंने जनाबाई के लिए प्राणदण्ड घोषित कर दिया। जनाबाई को सूली पर चढ़ाने के लिए वध-स्थल पर लाया गया।

जनाबाई ने मृत्यु से पूर्व जैसे ही अपने आराध्य का स्मरण करते हुए सूली की ओर देखा तो सूली जल के रूप में परिवर्तित हो गई। उपस्थित जनसमूह यह चमत्कार देखकर स्तब्ध रह गया और जनाबाई की भगवद्-भक्ति की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा करने लगा।


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